NCERT Solution – Mass Percentage
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Q.1: निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।
(i) Cr3+ (ii) Pm3+ (iii) Cu+ (iv) Ce4+ (v) Co2+ (vi) Lu2+ (vii) Mn2+ (viii) Th4+
Answer (उत्तर)
(i) Cr3+ : [Ar] 3d3
(ii) Pm3+ : [Xe] 4f4
(iii) Cu+ : [Ar] 3d10
(iv) Ce4+ : [Xe]
(v) Co2+ : [Ar] 3d7
(vi) Lu2+ : [Xe] 4f14 5d1
(vii) Mn2+ : [Ar] 3d5
(viii) Th4+ : [Rn]
Explanation (व्याख्या)
👉 आयन बनाते समय नियम: सबसे पहले बाह्यतम आवरण (सबसे बड़ा n) से इलेक्ट्रॉन निकलते हैं।
👉 d-ब्लॉक में विशेष नियम: पहले 4s के इलेक्ट्रॉन निकलते हैं, फिर 3d के।

Cr (Z = 24): [Ar] 3d5 4s1
⇒ Cr3+ में 4s1 + 2 (3d) निकलेंगे ⇒ [Ar] 3d3

Cu (Z = 29): [Ar] 3d10 4s1
⇒ Cu+ में 4s1 निकलेगा ⇒ [Ar] 3d10

Co (Z = 27): [Ar] 3d7 4s2
⇒ Co2+ में 4s2 निकलेगा ⇒ [Ar] 3d7

Mn (Z = 25): [Ar] 3d5 4s2
⇒ Mn2+ में 4s2 निकलेगा ⇒ [Ar] 3d5

👉 लैंथेनाइड/ऐक्टिनाइड में: सामान्यतः 6s/7s पहले निकलते हैं, फिर d/f से।

Ce (Z = 58): [Xe] 4f1 5d1 6s2
⇒ Ce4+ में 6s2, 5d1, 4f1 निकलकर ⇒ [Xe]

Pm (Z = 61): [Xe] 4f5 6s2
⇒ Pm3+ में 6s2 + 1 (4f) ⇒ [Xe] 4f4

Lu (Z = 71): [Xe] 4f14 5d1 6s2
⇒ Lu2+ में 6s2 निकलकर ⇒ [Xe] 4f14 5d1

Th (Z = 90): [Rn] 6d2 7s2
⇒ Th4+ में 7s2 + 6d2 निकलकर ⇒ [Rn]
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
Cu+ क्यों stable माना जाता है?
Cu+ में 3d10 पूरा भर जाता है, इसलिए कई यौगिकों में यह अपेक्षाकृत स्थिर होता है।

Mn2+ का special point
Mn2+ का [Ar] 3d5 “half-filled” विन्यास है, इसलिए इसमें 5 unpaired electrons हो सकते हैं और यह अक्सर अनुचुम्बकीय होता है।

Ce4+ में +4 state common क्यों?
Ce4+ का विन्यास [Xe] (noble gas जैसा) हो जाता है, इसलिए Ce में +4 अवस्था काफी सामान्य मिलती है।

Quick Trick (सबसे काम की लाइन)
d-ब्लॉक आयन बनाते समय ज्यादातर मामलों में 4s पहले हटता है, इसलिए आयन के विन्यास में 4s आमतौर पर नहीं दिखता।
Q.2: +3 ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत होने के संदर्भ में Mn2+ के यौगिक, Fe2+ के यौगिकों की तुलना में अधिक स्थायी क्यों हैं?
Answer (उत्तर)
Mn2+ के यौगिक अधिक स्थायी होते हैं क्योंकि Mn2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d5 (अर्द्ध-पूर्ण) होता है जो अधिक स्थायी है। इसलिए Mn2+ आसानी से Mn3+ में ऑक्सीकृत नहीं होता।

जबकि Fe2+ का विन्यास [Ar] 3d6 है और यह अपेक्षाकृत सरलता से Fe3+ में ऑक्सीकृत हो जाता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 Mn2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d5 होता है, जबकि Fe2+ का [Ar] 3d6 होता है।
👉 Mn2+ में 3d5 अर्द्ध-पूर्ण विन्यास होने के कारण यह Fe2+ की 3d6 अवस्था की तुलना में अधिक स्थायी होता है।
👉 इसी अधिक स्थायित्व के कारण Mn2+ का Mn3+ में ऑक्सीकरण सरल नहीं होता, क्योंकि Mn2+ की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी अधिक होती है।
👉 इसके विपरीत Fe2+ की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी कम होने के कारण Fe2+ सरलता से ऑक्सीकृत होकर Fe3+ बन जाता है।
👉 इसलिए +3 ऑक्सीकरण अवस्था में ऑक्सीकृत होने के संदर्भ में Mn2+ के यौगिक, Fe2+ के यौगिकों से अधिक स्थायी होते हैं।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 आयनन एन्थैल्पी की परिभाषा: गैसीय अवस्था में किसी परमाणु/आयन से एक इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए जितनी ऊर्जा चाहिए, उसे आयनन एन्थैल्पी कहते हैं।

👉 याद रखने वाली बात: ऊर्जा जितनी ज्यादा लगेगी, इलेक्ट्रॉन निकालना उतना ही कठिन होगा, इसलिए वह आयन ऑक्सीकरण के प्रति अधिक स्थायी दिखाई देता है।

👉 इसलिए Mn2+ में इलेक्ट्रॉन निकालकर Mn3+ बनाना “महँगा” पड़ता है (ऊर्जा ज्यादा लगती है), जबकि Fe2+ से Fe3+ बनाना तुलनात्मक रूप से “सस्ता” पड़ता है।
Q.3: प्रथम संक्रमण श्रेणी के प्रथम अर्द्ध भाग में बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ +2 ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी क्यों होती जाती है?
Answer (उत्तर)
प्रथम संक्रमण श्रेणी में बायें से दायें जाने पर IE1 + IE2 (प्रथम + द्वितीय आयनन एन्थैल्पी) का योग बढ़ता जाता है।

इसलिए धातु से 2 इलेक्ट्रॉन निकालकर M2+ आयन बनाना धीरे-धीरे कठिन होता जाता है।

इसी कारण श्रेणी के प्रथम अर्द्ध भाग में +2 ऑक्सीकरण अवस्था अधिकाधिक स्थायी होती जाती है।
Explanation (व्याख्या)
👉 प्रथम संक्रमण श्रेणी में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर नाभिकीय आवेश बढ़ता है, जिससे इलेक्ट्रॉन अधिक मजबूती से आकर्षित होते हैं।
👉 इसलिए बायें से दायें जाने पर IE1 + IE2 (पहली और दूसरी आयनन एन्थैल्पी का योग) सामान्यतः बढ़ता जाता है।
👉 जब IE1 + IE2 बढ़ता है, तो धातु से 2 इलेक्ट्रॉन निकालकर M2+ बनाना कठिन होता जाता है, यानी M2+ बनने की प्रवृत्ति घटती जाती है।
👉 परिणामस्वरूप, श्रेणी के प्रथम अर्द्ध भाग में जो +2 अवस्था बनती है, वह धीरे-धीरे अधिक स्थायी दिखाई देती है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 IE1 + IE2 को आप “2 इलेक्ट्रॉन निकालने की कुल कीमत” समझ सकते हैं।

जैसे-जैसे यह कीमत बढ़ती है, +2 अवस्था से आगे परिवर्तन (अर्थात् अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन निकालना/ऑक्सीकरण) अपेक्षाकृत कम अनुकूल हो जाता है।

इसलिए +2 ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी लगती है।
Q.4: प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस सीमा तक ऑक्सीकरण अवस्थाओं को निर्धारित करते हैं? उत्तर को उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
Answer (उत्तर)
👉 प्रथम संक्रमण श्रेणी में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ मुख्यतः (n−1)d और ns इलेक्ट्रॉनों पर निर्भर करती हैं।
👉 सामान्यतः प्रारम्भिक तत्वों (Sc से Mn) में अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था बढ़ती है, क्योंकि 4s और 3d दोनों के इलेक्ट्रॉन बन्धन में भाग लेते हैं।

लेकिन वास्तविक स्थायित्व केवल विन्यास से ही नहीं, बल्कि आयनन एन्थैल्पी, जालक ऊर्जा, जल्योजन एन्थैल्पी और लिगेण्ड/कम्प्लेक्स स्थिरता पर भी निर्भर करता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था का नियम (Sc → Mn):
प्रारम्भिक भाग में अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था लगभग (4s + 3d) कुल वैलेन्स इलेक्ट्रॉनों के बराबर हो सकती है।

उदाहरण:
Sc: [Ar] 3d1 4s2 → अधिकतम +3
Ti: [Ar] 3d2 4s2 → अधिकतम +4
V: [Ar] 3d3 4s2 → अधिकतम +5
Cr: [Ar] 3d5 4s1 → अधिकतम +6
Mn: [Ar] 3d5 4s2 → अधिकतम +7

👉 Mn के बाद प्रवृत्ति:
Fe, Co, Ni में उच्च ऑक्सीकरण अवस्थाएँ कम स्थायी होती जाती हैं और +2, +3 ज्यादा सामान्य हो जाती हैं।

उदाहरण:
Fe2+: [Ar] 3d6, Fe3+: [Ar] 3d5 (अर्द्ध-पूर्ण)
Co2+: [Ar] 3d7, Co3+: [Ar] 3d6

👉 अर्द्ध-पूर्ण/पूर्ण-पूर्ण d-विन्यास का स्थायित्व:
जिस ऑक्सीकरण अवस्था में d-कक्ष d5 (अर्द्ध-पूर्ण) या d10 (पूर्ण-पूर्ण) हो, वह आयन अक्सर अधिक स्थायी होता है।

उदाहरण:
Mn2+: [Ar] 3d5 इसलिए +2 अवस्था काफी स्थायी
Zn2+: [Ar] 3d10 इसलिए Zn की सबसे स्थायी अवस्था +2

👉 केवल विन्यास ही पर्याप्त नहीं:
कौन-सी ऑक्सीकरण अवस्था ज्यादा स्थायी होगी, यह आयनन एन्थैल्पी, जालक ऊर्जा, जलीय माध्यम में जल्योजन एन्थैल्पी, और लिगेण्ड क्षेत्र स्थिरीकरण (कॉम्प्लेक्स बनने पर) भी तय करते हैं। इसलिए एक ही तत्व की अलग-अलग अवस्थाएँ अलग परिस्थितियों में स्थायी दिख सकती हैं।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Cu में +1 अवस्था: Cu+ का विन्यास [Ar] 3d10 (पूर्ण-पूर्ण) बन जाता है, इसलिए कुछ यौगिकों में Cu+ अपेक्षाकृत स्थायी मिल सकता है।

👉 फिर भी कई परिस्थितियों में Cu2+ बहुत सामान्य और अधिक स्थायी रूप में मिलता है, क्योंकि स्थायित्व केवल विन्यास नहीं, बल्कि आसपास का माध्यम/लिगेण्ड/ऊर्जा कारक भी तय करते हैं।
Q.5: संक्रमण तत्वों की मूल अवस्था में नीचे दिए गए d-इलेक्ट्रॉनिक विन्यासों में कौन-सी ऑक्सीकरण अवस्था स्थायी होगी? 3d3, 3d5, 3d8 तथा 3d4
Answer (उत्तर)
3d5 (अर्द्ध-पूर्ण) और 3d10 (पूर्ण-पूर्ण, अगर बन सके) विन्यास सबसे अधिक स्थायी माने जाते हैं।

दिए गए विकल्पों में 3d5 सबसे अधिक स्थायी होगा। इसके बाद 3d3 अपेक्षाकृत स्थायी माना जाता है, जबकि 3d4 कम स्थायी होता है।

3d8 की स्थिरता मध्यम होती है और यह तत्व/परिस्थिति पर निर्भर करती है।
Explanation (व्याख्या)
👉 d-कक्ष में अर्द्ध-पूर्ण (d5) और पूर्ण-पूर्ण (d10) विन्यास विशेष रूप से स्थायी होते हैं।
इसलिए वह ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी होगी जिसमें आयन का d-विन्यास d5 या d10 बन जाए।

👉 3d5: अर्द्ध-पूर्ण होने से अतिरिक्त स्थिरता मिलती है, इसलिए यह सबसे अधिक स्थायी।
👉 3d3: कई संक्रमण तत्वों में यह भी तुलनात्मक रूप से स्थायी माना जाता है।
उदाहरण: Cr3+ का विन्यास [Ar] 3d3
👉 3d4: d5 की तुलना में कम स्थिर, इसलिए अक्सर आसानी से ऑक्सीकरण/अपचयन करके अधिक स्थायी विन्यास की ओर जाता है।
👉 3d8: कुछ स्थितियों में स्थिर हो सकता है, पर d5/d10 जैसी “विशेष स्थिरता” नहीं होती, इसलिए इसकी स्थिरता सामान्य/मध्यम मानी जाती है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Mn2+ का विन्यास [Ar] 3d5 (अर्द्ध-पूर्ण) होता है।
इसी वजह से इसकी +2 अवस्था काफी स्थायी मानी जाती है और यह अक्सर अनुचुम्बकीय (paramagnetic) भी होता है।
Q.6: प्रथम संक्रमण श्रेणी के ऑक्सो-धात्वऋणायनों के नाम लिखिए, जिनमें धातु संक्रमण श्रेणी की वर्ग संख्या के बराबर ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करती है।
Answer (उत्तर)
(i) Cr2O72− : डाइक्रोमेट आयन (Dichromate ion)
(ii) CrO42− : क्रोमेट आयन (Chromate ion)
(iii) MnO4 : परमैंगनेट आयन (Permanganate ion)
(iv) VO3 : मेटावैनाडेट आयन (Metavanadate ion)
Explanation (व्याख्या)
👉 Cr2O72− तथा CrO42− में Cr की ऑक्सीकरण अवस्था +6 होती है, जो Cr की वर्ग संख्या 6 के बराबर है।

👉 MnO4 में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +7 होती है, जो Mn की वर्ग संख्या 7 के बराबर है।

👉 VO3 में V की ऑक्सीकरण अवस्था +5 होती है, जो V की वर्ग संख्या 5 के बराबर है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 परमैंगनेट (MnO4) गहरा बैंगनी रंग का होता है और ऑक्सीकरण अभिक्रियाओं में प्रबल ऑक्सीकारक के रूप में इस्तेमाल होता है।
Q.7: लैन्थेनॉइड आकुंचन क्या है? लैन्थेनॉइड आकुंचन के परिणाम क्या हैं?
Answer (उत्तर)
लैन्थेनॉइड श्रेणी में परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ परमाण्विक तथा आयनिक त्रिज्याओं में होने वाली नियमित (परन्तु बहुत कम) कमी को लैन्थेनॉइड आकुंचन कहते हैं।

इसके कारण द्वितीय और तृतीय संक्रमण श्रेणियों में बहुत अधिक समानता, लैन्थेनॉइडों के गुणों की समानता, तथा उनके हाइड्रॉक्साइडों की क्षारकीयता में कमी जैसे प्रभाव दिखाई देते हैं।
Explanation (व्याख्या)
👉 परिभाषा: लैन्थेनॉइड तत्वों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर परमाणु तथा आयन (विशेषकर Ln3+) का आकार धीरे-धीरे घटता है। यही लैन्थेनॉइड आकुंचन कहलाता है।

👉 उदाहरण (आकार में कमी):
Ce से Lu तक परमाण्विक त्रिज्या लगभग 183 pm से 173 pm तक घटती है।
इसी प्रकार Ce3+ से Lu3+ तक आयनिक त्रिज्या लगभग 103 pm से 85 pm हो जाती है।

👉 कारण (मुख्य कारण):
• लैन्थेनॉइड श्रेणी में इलेक्ट्रॉन 4f उपकोश में भरते हैं।
• 4f इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण (shielding) प्रभाव कम होता है, इसलिए बढ़ता हुआ नाभिकीय आवेश बाहरी इलेक्ट्रॉनों को अधिक खींचता है।
• परिणामस्वरूप प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ता है और आकार में नियमित कमी होती जाती है।

👉 लैन्थेनॉइड आकुंचन के परिणाम:

👉 (1) द्वितीय तथा तृतीय संक्रमण श्रेणियों की समानता:
Ti–Zr–Hf, V–Nb–Ta, Mo–W जैसे युग्मों में त्रिज्याएँ लगभग समान हो जाती हैं, इसलिए उनके गुण भी काफी समान होते हैं।

👉 (2) लैन्थेनॉइडों में समानता और पृथक्करण कठिन:
त्रिज्याओं में बहुत कम अंतर होने से इनके रासायनिक गुण बहुत मिलते-जुलते हैं, इसलिए इन्हें अलग करना कठिन होता है।

👉 (3) क्षारकीयता में परिवर्तन:
परमाणु क्रमांक बढ़ने पर Ln3+ का आकार घटता है, इसलिए Ln(OH)3 की क्षारकीयता घटती है।
यानी La(OH)3 सबसे अधिक क्षारकीय तथा Lu(OH)3 सबसे कम क्षारकीय होता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
(1) Ln3+ का आकार क्यों घटता है?
Lanthanides में परमाणु क्रमांक बढ़ता जाता है (La → Lu), तो इलेक्ट्रॉन 4f में भरते हैं।
4f इलेक्ट्रॉन ढंग से shielding नहीं कर पाते, इसलिए nucleus का खिंचाव (effective nuclear charge) बाहर के इलेक्ट्रॉनों पर बढ़ता है।
Result: Ln3+ आयन का radius धीरे-धीरे घटता जाता है।
➡️ मतलब: La3+ सबसे बड़ा, Lu3+ सबसे छोटा

(2) आकार घटने से Ln(OH)3 की क्षारकीयता क्यों घटती है?
(A) छोटा Ln3+ = charge density ज्यादा ⇒ polarising power ज्यादा ⇒ Ln–O bond ज्यादा मजबूत
Bond मजबूत होगा तो OH आसानी से अलग नहीं होगा ⇒ basicity घटेगी

(B) छोटा Ln3+ पानी में ज्यादा hydrolysis कराता है, जिससे solution acidic nature की तरफ जाता है ⇒ basicity कम होती है।

(3) सीधा निष्कर्ष
• La3+ बड़ा → Ln–OH bond कम मजबूत → basicity ज्यादा
• Lu3+ छोटा → Ln–OH bond ज्यादा मजबूत → basicity कम

याद रखने की Trick
Size ↓ ⇒ Polarising power ↑ ⇒ Ln–OH bond मजबूत ⇒ Basicity ↓
Q.8: संक्रमण धातुओं के अभिलक्षण क्या हैं? ये संक्रमण धातु क्यों कहलाती हैं? d-ब्लॉक के तत्वों में कौन से तत्व संक्रमण श्रेणी के तत्व नहीं कहे जा सकते?
Answer (उत्तर)
👉 संक्रमण धातुएँ (d-ब्लॉक) सामान्यतः धात्विक गुण, रंगीन यौगिक, संकुल बनाने की प्रवृत्ति, अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ और प्रायः अनुचुम्बकीय गुण दिखाती हैं।

👉 इन्हें “संक्रमण” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके गुण s-ब्लॉक और p-ब्लॉक के बीच मध्यवर्ती होते हैं तथा आवर्त सारणी में इनका स्थान भी s और p ब्लॉक के बीच है।

👉 d-ब्लॉक में Zn, Cd और Hg को संक्रमण तत्व नहीं माना जाता क्योंकि इनकी परमाण्विक तथा सामान्य आयनिक अवस्थाओं में d-कक्ष पूर्ण-पूर्ण (d10) रहती है।
Explanation (व्याख्या)
👉 संक्रमण धातुओं के मुख्य अभिलक्षण:

(1) प्रायः सभी धात्विक गुण दिखाती हैं जैसे उच्च तनन सामर्थ्य, तन्यता, वर्धनीयता, धात्विक चमक तथा उच्च तापीय/विद्युत चालकता।

(2) इनके गलनांक तथा क्वथनांक सामान्यतः उच्च होते हैं और वाष्पन ऊष्मा भी अधिक होती है।

(3) s-ब्लॉक की तुलना में इनके घनत्व सामान्यतः अधिक होते हैं।

(4) ये रंगीन यौगिक बनाती हैं।

(5) संकुल (complex) बनाने की प्रवृत्ति अधिक होती है।

(6) ये अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करती हैं।

(7) इनके यौगिक अक्सर अनुचुम्बकीय होते हैं क्योंकि इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं।

(8) ये मिश्रधातु (alloy) बनाती हैं।

(9) H, B, C, N आदि के साथ अन्तराकाशी यौगिक (interstitial compounds) भी बना सकती हैं।

(10) Mn, Ni, Co, Cr, V, Pt आदि तथा इनके यौगिक उत्प्रेरक के रूप में उपयोग किए जाते हैं।


📌 ये संक्रमण धातु क्यों कहलाती हैं?
👉 ये s-ब्लॉक के अधिक विद्युत-धनात्मक तत्वों और p-ब्लॉक के कम विद्युत-धनात्मक तत्वों के बीच “मध्यवर्ती” गुण दिखाती हैं।
👉 आवर्त सारणी में इनका स्थान भी s और p ब्लॉक के बीच होने के कारण इन्हें संक्रमण धातु कहा जाता है।

📌 d-ब्लॉक में कौन से तत्व संक्रमण तत्व नहीं हैं?
👉 Zn, Cd और Hg संक्रमण तत्व नहीं माने जाते, क्योंकि इनका विन्यास सामान्यतः (n−1)d10 ns2 होता है।
👉 इनकी परमाण्विक अवस्था तथा सामान्य आयनिक अवस्था में d-कक्ष पूर्ण-पूर्ण रहती है (उपकोश अपूर्ण नहीं होता), इसलिए इन्हें संक्रमण तत्व नहीं कहा जाता।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 संक्रमण धातुओं में रंग और चुम्बकीय गुण (अनुचुम्बकीय/प्रतिचुम्बकीय) का मुख्य कारण अक्सर d-कक्ष में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन और d–d संक्रमण होते हैं।

👉 Zn2+ में d10 होने के कारण यह सामान्यतः रंगहीन और प्रतिचुम्बकीय होता है।
Q.9: संक्रमण धातुओं के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास किस प्रकार असंक्रमण तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास से भिन्न हैं?
Answer (उत्तर)
संक्रमण धातुओं में सामान्यतः (n−1)d उपकोश अपूर्ण (partially filled) होता है या इनके आयनों में (n−1)d उपकोश अपूर्ण रह सकता है।

जबकि असंक्रमण तत्वों में प्रायः d-उपकोश या तो उपस्थित नहीं होता या पूर्ण-भरा (d10) होता है, इसलिए उनके आयनों में d-उपकोश अपूर्ण नहीं मिलता।
Explanation (व्याख्या)
👉 संक्रमण धातु (Transition metals):
इनके परमाणुओं या सामान्य आयनों में (n−1)d कक्षकों में इलेक्ट्रॉन अपूर्ण रहते हैं।

👉 सामान्य विन्यास: (n−1)d1–10 ns1–2 (अर्थात d उपकोश partially filled)

उदाहरण:
Fe: [Ar] 3d6 4s2 और Fe2+: [Ar] 3d6
Cu: [Ar] 3d10 4s1 (पर Cu2+ में [Ar] 3d9, यानी d अपूर्ण)

👉 असंक्रमण तत्व (Non-transition elements):
इनके परमाणुओं/आयनों में d-उपकोश अपूर्ण नहीं होता।
इनके विन्यास में d उपकोश या तो नहीं होता (s, p-ब्लॉक) या पूर्ण-भरा (d10) होता है।

उदाहरण:
Na: [Ne] 3s1 (d उपकोश नहीं)
Zn: [Ar] 3d10 4s2 और Zn2+: [Ar] 3d10 (d पूर्ण-भरा, इसलिए संक्रमण नहीं)

👉 मुख्य अंतर (Key Point):
संक्रमण धातुओं में d-कक्ष में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, इसलिए इनमें रंगीन यौगिक, अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ और अक्सर अनुचुम्बकीय गुण मिलते हैं।
असंक्रमण तत्वों में यह प्रवृत्ति सामान्यतः नहीं मिलती।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Zn, Cd, Hg d-ब्लॉक में होते हुए भी “संक्रमण” नहीं माने जाते, क्योंकि इनके परमाणु और सामान्य आयनों (Zn2+/Cd2+/Hg2+) में d-उपकोश हमेशा पूर्ण-भरा (d10) रहता है।

👉 इसी कारण इनमें प्रायः प्रतिचुम्बकीय (diamagnetic) गुण पाए जाते हैं।
Q.10: लैन्थेनॉइडों द्वारा कौन-कौन सी ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित की जाती हैं?
Answer (उत्तर)
लैन्थेनॉइड सामान्यतः +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।
इसके अतिरिक्त कुछ लैन्थेनॉइड +2 तथा +4 अवस्थाएँ भी प्रदर्शित करते हैं (विशेष परिस्थितियों/यौगिकों में)।
Explanation (व्याख्या)
👉 सबसे सामान्य अवस्था: +3
अधिकांश लैन्थेनॉइडों में 6s2 तथा 5d1/4f इलेक्ट्रॉनों के हटने से Ln3+ बनता है, इसलिए +3 अवस्था सबसे अधिक स्थायी और सामान्य होती है।

👉 +2 अवस्था (कुछ तत्व):
कुछ लैन्थेनॉइड +2 अवस्था तब दिखाते हैं जब Ln2+ में विशेष स्थिर विन्यास मिल जाता है।
उदाहरण: Eu2+, Yb2+, Sm2+ (इनमें +2 अवस्था अपेक्षाकृत अधिक स्थायी मिल सकती है)।

👉 +4 अवस्था (कुछ तत्व):
कुछ लैन्थेनॉइड +4 अवस्था तब दिखाते हैं जब Ln4+ बनने पर अधिक स्थिर विन्यास मिल जाता है।
उदाहरण: Ce4+, Tb4+ (कुछ यौगिकों में)।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Ce का Ce4+ बनना आसान माना जाता है क्योंकि Ce4+ का विन्यास [Xe] हो जाता है (नॉबल गैस जैसा स्थिर विन्यास), इसलिए Ce में +4 अवस्था अक्सर देखी जाती है।
Q.11: कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए—
(i) संक्रमण धातुएँ तथा उनके अधिकांश यौगिक अनुचुम्बकीय होते हैं।
(ii) संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी के मान उच्च होते हैं।
(iii) संक्रमण धातुएँ सामान्यतः रंगीन यौगिक बनाती हैं।
(iv) संक्रमण धातुएँ तथा इनके अनेक यौगिक उत्तम उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।
Answer (उत्तर)
(i) संक्रमण धातुओं/आयनों में (n−1)d कक्षकों में प्रायः अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए वे अनुचुम्बकीय होते हैं।

(ii) इनमें प्रबल धात्विक बन्ध/अन्तरापरमाण्विक आकर्षण होता है, इसलिए कणन एन्थैल्पी उच्च होती है।

(iii) d-कक्षकों के बीच d–d संक्रमण (दृश्य प्रकाश का आंशिक अवशोषण) होने से इनके यौगिक रंगीन दिखाई देते हैं।

(iv) परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ और संकुल बनाने की प्रवृत्ति के कारण ये उत्प्रेरक के रूप में प्रभावी होते हैं।
Explanation (व्याख्या)
📌 (i) संक्रमण धातुएँ तथा उनके अधिकांश यौगिक अनुचुम्बकीय होते हैं
👉 अनुचुम्बकीय गुण की उत्पत्ति अयुग्मित इलेक्ट्रॉन की उपस्थिति से होती है।
👉 d0 (जैसे Sc3+, Ti4+) या d10 (जैसे Cu+, Zn2+) को छोड़कर, अधिकांश संक्रमण धातु आयनों में d-उपकोश अपूर्ण रहता है और अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं।
👉 इसलिए उनके अधिकांश यौगिक अनुचुम्बकीय होते हैं।

📌 (ii) संक्रमण धातुओं की कणन एन्थैल्पी के मान उच्च होते हैं
👉 संक्रमण धातुओं में (n−1)d तथा ns इलेक्ट्रॉन बन्धन में भाग लेते हैं।
👉 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होने से अन्तरापरमाण्विक आकर्षण बढ़ता है और धात्विक बन्ध मजबूत होता है।
👉 इसलिए परमाणुओं को अलग करने के लिए अधिक ऊर्जा चाहिए, परिणामस्वरूप कणन एन्थैल्पी उच्च होती है।

📌 (iii) संक्रमण धातुएँ सामान्यतः रंगीन यौगिक बनाती हैं
👉 अधिकांश संक्रमण धातु आयन विलयन/ठोस अवस्था में रंगीन होते हैं क्योंकि वे दृश्य प्रकाश का कुछ भाग अवशोषित करते हैं।
👉 अवशोषित ऊर्जा से इलेक्ट्रॉन समान d-उपकोश के एक कक्षक से दूसरे कक्षक में चला जाता है, इसे d–d संक्रमण कहते हैं।
👉 d–d संक्रमण के कारण ही इनके यौगिक रंगीन दिखाई देते हैं।

📌 (iv) संक्रमण धातुएँ तथा इनके अनेक यौगिक उत्तम उत्प्रेरक का कार्य करते हैं
👉 संक्रमण धातुओं में परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ होती हैं, इसलिए वे अभिक्रिया के बीच में इलेक्ट्रॉन देकर/लेकर मध्यवर्ती चरण बनाना आसान कर देती हैं।
👉 ये संकुल भी बनाती हैं, जिससे अभिकारकों के साथ अस्थायी बन्ध बनकर सक्रियण ऊर्जा कम हो सकती है।
👉 उदाहरण: V2O5 (संस्पर्श प्रक्रम), सूक्ष्म Fe (हेबर प्रक्रम), Ni (हाइड्रोजनीकरण) आदि।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 प्रतिचुम्बकीय पदार्थों में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं, जबकि अनुचुम्बकीय पदार्थों में कम-से-कम एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होता है।

👉 इसलिए Zn2+ (d10) प्रायः प्रतिचुम्बकीय, जबकि Mn2+ (d5) प्रायः अनुचुम्बकीय होता है।
Q.12: अन्तराकाशी यौगिक क्या हैं? इस प्रकार के यौगिक संक्रमण धातुओं के लिए भली प्रकार से ज्ञात क्यों हैं?
Answer (उत्तर)
वे यौगिक जिनमें क्रिस्टल जालक (crystal lattice) के अन्तराकाशी स्थलों (interstitial sites) में छोटे आकार वाले परमाणु प्रवेश कर जाते हैं, अन्तराकाशी यौगिक कहलाते हैं।

ये यौगिक संक्रमण धातुओं के लिए अधिक ज्ञात हैं क्योंकि संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालक में रिक्तियाँ (voids) होती हैं, जिनमें H, C, N जैसे छोटे परमाणु आसानी से समा जाते हैं।
Explanation (व्याख्या)
👉 अन्तराकाशी यौगिक की परिभाषा:
जिन यौगिकों के क्रिस्टल जालक में मौजूद अन्तराकाशी रिक्त स्थानों को छोटे परमाणु अध्यासित कर लेते हैं, उन्हें अन्तराकाशी यौगिक कहते हैं।

👉 संक्रमण धातुओं में अधिक क्यों मिलते हैं:
• संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल जालक में रिक्तियाँ/voids पर्याप्त मात्रा में होती हैं।
• H, C, N, B जैसे छोटे आकार वाले परमाणु इन रिक्तियों में बिना जालक को पूरी तरह तोड़े आसानी से “फिट” हो जाते हैं।
• इसलिए संक्रमण धातुएँ ऐसे अन्तराकाशी यौगिक अधिक बनाती हैं।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 अन्तराकाशी यौगिक बनने से धातु अक्सर ज्यादा कठोर (hard) और मजबूत हो जाती है, इसलिए कई औद्योगिक मिश्रधातुओं/स्टील में Carbon का महत्व बहुत ज्यादा होता है।

Example: लोहे में Carbon मिलाकर Steel बनाना
• Pure Iron (शुद्ध लोहा) नरम होता है, आसानी से मुड़ जाता है।
• जब Iron में थोड़ा सा Carbon मिलाया जाता है (लगभग 0.1%–1%), तो Carbon के छोटे-छोटे परमाणु iron की crystal lattice के खाली gaps (interstitial spaces) में घुस जाते हैं।
• इससे lattice “जाम” हो जाती है और layers आसानी से slide नहीं कर पातीं।
➡️ इसलिए धातु hard और strong हो जाती है।

रोज़मर्रा की चीज़ों में कहाँ दिखता है?
• Steel के gates/grills (iron से ज़्यादा मजबूत)
• Screws, nails, tools (hammer, spanner)
• Car body/chassis
• Railway tracks
• Knife/Blade (high carbon steel में hardness और बढ़ जाती है)

One-line समझ:
Carbon gaps में फँसकर iron को “movement” से रोकता है, इसलिए iron hard steel बन जाता है।
Q.13: संक्रमण धातुओं की ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तनशीलता असंक्रमण तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्थाओं में परिवर्तनशीलता से किस प्रकार भिन्न है? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
Answer (उत्तर)
संक्रमण धातुओं में ऑक्सीकरण अवस्था सामान्यतः +1 से एक-एक करके क्रमिक रूप से बढ़ती/घटती है, जबकि असंक्रमण तत्वों में ऑक्सीकरण अवस्थाओं का परिवर्तन प्रायः चयनात्मक होता है और सामान्य रूप से 2 के अन्तर से दिखाई देता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 संक्रमण धातुएँ (Transition metals):
इनमें (n−1)d और ns इलेक्ट्रॉन ऊर्जा में पास-पास होते हैं, इसलिए अलग-अलग संख्या में इलेक्ट्रॉन बन्ध में भाग ले सकते हैं।
परिणामस्वरूप ऑक्सीकरण अवस्थाएँ अक्सर क्रमिक (एक-एक के अन्तर से) मिलती हैं।

उदाहरण: Mn में +2, +3, +4, +5, +6, +7 अवस्थाएँ पाई जाती हैं।

👉 असंक्रमण तत्व (Non-transition elements):
इनमें ऑक्सीकरण अवस्थाओं का परिवर्तन सामान्यतः चयनात्मक होता है और अक्सर 2 के अन्तर से बदलता है।

उदाहरण: Cl में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ −1, +1, +3, +5, +7 पाई जाती हैं।

👉 निष्कर्ष:
संक्रमण धातुओं में ऑक्सीकरण अवस्थाओं की विविधता अधिक और क्रमिक होती है, जबकि असंक्रमण तत्वों में यह चयनात्मक और प्रायः 2 के अन्तर वाली होती है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 संक्रमण धातुओं में अनेक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ मिलने का एक बड़ा कारण d-उपकोश का अपूर्ण होना है।

👉 इसलिए इनके यौगिकों का रंग, चुम्बकीय गुण और अभिक्रियाशीलता अक्सर ऑक्सीकरण अवस्था बदलते ही बदल जाती है।
Q.14: आयरन क्रोमाइट अयस्क से पोटैशियम डाइक्रोमेट बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। पोटैशियम डाइक्रोमेट विलयन का pH बढ़ाने से क्या प्रभाव पड़ेगा?
Answer (उत्तर)
👉 आयरन क्रोमाइट (FeCr2O4) को वायु की उपस्थिति में Na2CO3/K2CO3 के साथ संगलन करने पर पहले क्रोमेट बनता है।
👉 क्रोमेट के विलयन को H2SO4 से अम्लीय करने पर सोडियम डाइक्रोमेट बनता है, फिर उसमें KCl मिलाकर कम विलेय पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7) के क्रिस्टल प्राप्त कर लेते हैं।

👉 pH बढ़ाने (विलयन को क्षारीय करने) पर डाइक्रोमेट आयन (नारंगी) क्रोमेट आयन (पीला) में बदल जाता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 Step-1: क्रोमेट बनाना (Roasting/Fusion)
आयरन क्रोमाइट अयस्क को वायु की उपस्थिति में सोडियम/पोटैशियम कार्बोनेट के साथ संगलित किया जाता है।
4FeCr2O4 + 8Na2CO3 + 7O2 → 8Na2CrO4 + 2Fe2O3 + 8CO2

👉 Step-2: डाइक्रोमेट बनाना (Acidification)
सोडियम क्रोमेट (पीला विलयन) को छानकर सल्फ्यूरिक अम्ल से अम्लीय किया जाता है, जिससे सोडियम डाइक्रोमेट बनता है।
2Na2CrO4 + 2H+ → Na2Cr2O7 + 2Na+ + H2O
(यहाँ Na2Cr2O7·2H2O के नारंगी क्रिस्टल भी प्राप्त किए जा सकते हैं।)

👉 Step-3: पोटैशियम डाइक्रोमेट बनाना (KCl Addition)
Na2Cr2O7 की विलेयता, K2Cr2O7 से अधिक होती है, इसलिए Na2Cr2O7 के विलयन में KCl डालने पर K2Cr2O7 क्रिस्टलित हो जाता है।
Na2Cr2O7 + 2KCl → K2Cr2O7 + 2NaCl

👉 pH बढ़ाने पर प्रभाव (Interconversion)
क्रोमेट–डाइक्रोमेट अन्तरारूपान्तरण pH पर निर्भर करता है।

2CrO42− + 2H+ → Cr2O72− + H2O
Cr2O72− + 2OH → 2CrO42− + H2O

👉 इसलिए pH बढ़ाने पर (क्षारीय माध्यम में) Cr2O72− (नारंगी) → CrO42− (पीला) हो जाता है और विलयन का रंग नारंगी से पीला हो जाता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 जलीय विलयन में क्रोमेट (CrO42−) और डाइक्रोमेट (Cr2O72−) दोनों में क्रोमियम की ऑक्सीकरण अवस्था +6 ही रहती है।
फर्क केवल pH के कारण बनने वाली प्रजाति (species) का होता है।
Q.15: पोटैशियम डाइक्रोमेट की ऑक्सीकरण क्रिया का उल्लेख कीजिए, तथा निम्नलिखित के साथ आयनिक समीकरण लिखिए—
(i) आयोडाइड आयन
(ii) आयरन (II) विलयन
(iii) H2S
Answer (उत्तर)
पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7) प्रबल ऑक्सीकारक है। अम्लीय माध्यम में डाइक्रोमेट आयन (Cr2O72−) Cr3+ में अपचयित होता है।

Cr2O72− + 14H+ + 6e → 2Cr3+ + 7H2O

(i) आयोडाइड आयन के साथ
Cr2O72− + 14H+ + 6I → 2Cr3+ + 7H2O + 3I2

(ii) आयरन (II) विलयन के साथ
Cr2O72− + 14H+ + 6Fe2+ → 2Cr3+ + 7H2O + 6Fe3+

(iii) H2S के साथ
Cr2O72− + 8H+ + 3H2S → 2Cr3+ + 7H2O + 3S↓
Explanation (व्याख्या)
👉 K2Cr2O7 अम्लीय माध्यम में बहुत प्रबल ऑक्सीकारक होता है, क्योंकि इसमें Cr2O72− आयन आसानी से इलेक्ट्रॉन लेकर Cr3+ में बदल जाता है।

👉 डाइक्रोमेट आयन का अपचयन (मुख्य आधी अभिक्रिया):
Cr2O72− + 14H+ + 6e → 2Cr3+ + 7H2O

👉 इसी कारण यह I को I2 में, Fe2+ को Fe3+ में तथा H2S को S में ऑक्सीकृत कर देता है (ऊपर दिए गए आयनिक समीकरण)।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 K2Cr2O7 का उपयोग आयतनमितीय विश्लेषण में अक्सर किया जाता है, क्योंकि यह हवा में काफी स्थिर रहता है और इसका विलयन अम्लीय माध्यम में स्पष्ट ऑक्सीकरण क्रियाएँ दिखाता है (जैसे I से I2 बनना)।
Q.16: पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4) बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट किस प्रकार—
(i) आयरन (II) आयन
(ii) SO2 तथा
(iii) ऑक्सैलिक अम्ल से अभिक्रिया करता है?
अभिक्रियाओं के लिए आयनिक समीकरण लिखिए।
Answer (उत्तर)
👉 KMnO4 बनाने की विधि:

👉 MnO2 को KOH तथा वायु/O2 (या KNO3 जैसे ऑक्सीकारक) के साथ संगलित करने पर पहले मैंगनेट (K2MnO4, हरा) बनता है।
2MnO2 + 4KOH + O2 → 2K2MnO4 + 2H2O

👉 फिर मैंगनेट (MnO42−) को क्षारीय विलयन में विद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण (electrolytic oxidation) करके परमैंगनेट (MnO4, बैंगनी) में बदला जाता है।
MnO42− → MnO4 + e

👉 अम्लीय KMnO4 की आयनिक अभिक्रियाएँ:

(i) Fe2+ (आयरन II आयन) के साथ
MnO4 + 8H+ + 5Fe2+ → Mn2+ + 4H2O + 5Fe3+

(ii) SO2 के साथ
2MnO4 + 2H2O + 5SO2 → 2Mn2+ + 4H+ + 5SO42−

(iii) ऑक्सैलिक अम्ल (ऑक्सैलेट आयन) के साथ
2MnO4 + 16H+ + 5C2O42− → 2Mn2+ + 8H2O + 10CO2
Explanation (व्याख्या)
👉 MnO2 का क्षारीय ऑक्सीकरण करने पर Mn की ऑक्सीकरण अवस्था बढ़कर मैंगनेट (MnO42−) बनती है।

👉 मैंगनेट को आगे ऑक्सीकारित करने पर परमैंगनेट (MnO4) मिलता है, इसलिए औद्योगिक रूप से मैंगनेट का विद्युत-अपघटनी ऑक्सीकरण करके KMnO4 बनाया जाता है।

👉 अम्लीय माध्यम में KMnO4 प्रबल ऑक्सीकारक होता है और MnO4 का अपचयन होकर Mn2+ बनता है, इसलिए
Fe2+ → Fe3+, SO2 → SO42− और C2O42− → CO2 हो जाता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 KMnO4 “self-indicator” की तरह काम करता है: टाइट्रेशन में इसका बैंगनी रंग खुद ही संकेत देता है (अन्त बिन्दु पर हल्का गुलाबी रंग दिखता है)।

👉 ऑक्सैलिक अम्ल वाली अभिक्रिया कमरे के ताप पर धीमी हो सकती है, इसलिए इसे अक्सर हल्का गरम किया जाता है ताकि CO2 तेजी से निकले और अभिक्रिया साफ दिखे।
Q.17: M2+/M तथा M3+/M2+ निकाय के संदर्भ में कुछ धातुओं के E° के मान नीचे दिए गए हैं:

Cr2+/Cr = −0.9 V, Cr3+/Cr2+ = −0.4 V
Mn2+/Mn = −1.2 V, Mn3+/Mn2+ = +1.5 V
Fe2+/Fe = −0.4 V, Fe3+/Fe2+ = +0.8 V

उपरोक्त आँकड़ों के आधार पर निम्नलिखित पर टिप्पणी कीजिए—
(i) अम्लीय माध्यम में Cr3+ या Mn3+ की तुलना में Fe3+ का स्थायित्व।
(ii) समान प्रक्रिया के लिए क्रोमियम अथवा मैंगनीज धातुओं की तुलना में आयरन के ऑक्सीकरण में सुगमता।
Answer (उत्तर)
(i) अम्लीय माध्यम में स्थायित्व का क्रम: Cr3+ > Fe3+ > Mn3+

(ii) धातुओं के ऑक्सीकरण की सुगमता का क्रम: Mn > Cr > Fe
Explanation (व्याख्या)
📌 (i) अम्लीय माध्यम में Cr3+, Mn3+ की तुलना में Fe3+ का स्थायित्व
👉 M3+/M2+ के E° (अपचयन विभव) से M3+ आयन की M2+ में अपचयित होने की प्रवृत्ति पता चलती है।

👉 Mn3+/Mn2+ का E° = +1.5 V बहुत अधिक धनात्मक है, इसलिए Mn3+ आसानी से Mn2+ में अपचयित हो जाता है, यानी Mn3+ कम स्थायी है।

👉 Fe3+/Fe2+ का E° = +0.8 V धनात्मक है, पर Mn3+ से कम है, इसलिए Fe3+, Mn3+ की तुलना में अधिक स्थायी है।

👉 Cr3+/Cr2+ का E° = −0.4 V ऋणात्मक है, इसलिए Cr3+ का Cr2+ में अपचयन आसान नहीं होता, यानी Cr3+ सबसे अधिक स्थायी है।

अतः अम्लीय माध्यम में स्थायित्व का क्रम: Cr3+ > Fe3+ > Mn3+


📌 (ii) Cr/Mn की तुलना में Fe के ऑक्सीकरण में सुगमता
👉 M2+/M के E° दिए हैं, जो M2+ → M (अपचयन) की प्रवृत्ति बताते हैं।
धातु का ऑक्सीकरण (M → M2+) इसका उल्टा होता है।

👉 इसलिए ऑक्सीकरण विभव = −E°(M2+/M) होगा:
• Fe के लिए: −(−0.4) = +0.4 V
• Cr के लिए: −(−0.9) = +0.9 V
• Mn के लिए: −(−1.2) = +1.2 V

👉 ऑक्सीकरण विभव जितना अधिक, ऑक्सीकरण उतना अधिक सुगम।
इसलिए ऑक्सीकरण की सुगमता का क्रम: Mn > Cr > Fe
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Mn3+/Mn2+ का E° बहुत ज्यादा होने से Mn3+ अम्लीय माध्यम में प्रबल ऑक्सीकारक की तरह व्यवहार करता है और आसानी से Mn2+ में बदल जाता है।
Q.18: निम्नलिखित में से कौन-से आयन जलीय विलयन में रंगीन होंगे? Ti3+, V3+, Cu+, Sc3+, Mn2+, Fe3+, Co2+। प्रत्येक के लिए कारण बताइए।
Answer (उत्तर)
👉 रंगीन आयन: Ti3+, V3+, Mn2+, Fe3+, Co2+
👉 रंगहीन आयन: Cu+, Sc3+
Explanation (व्याख्या)
👉 जलीय विलयन में संक्रमण धातु आयन का रंग सामान्यतः d–d संक्रमण के कारण होता है।
यह तभी संभव है जब d-उपकोश आंशिक रूप से भरा हो (अर्थात d1 से d9 तक)।

👉 जिन आयनों में d0 या d10 विन्यास होता है, उनमें d–d संक्रमण नहीं होता, इसलिए वे सामान्यतः रंगहीन होते हैं।

👉 Ti3+: Ti (Z=22) = [Ar] 3d2 4s2 → Ti3+ : [Ar] 3d1 (d1) ⇒ आंशिक भरा d, इसलिए रंगीन

👉 V3+: V (Z=23) = [Ar] 3d3 4s2 → V3+ : [Ar] 3d2 (d2) ⇒ रंगीन

👉 Cu+: Cu (Z=29) = [Ar] 3d10 4s1 → Cu+ : [Ar] 3d10 (d10) ⇒ d पूर्ण-भरा, इसलिए रंगहीन

👉 Sc3+: Sc (Z=21) = [Ar] 3d1 4s2 → Sc3+ : [Ar] 3d0 (d0) ⇒ d रिक्त, इसलिए रंगहीन

👉 Mn2+: Mn (Z=25) = [Ar] 3d5 4s2 → Mn2+ : [Ar] 3d5 (d5) ⇒ रंगीन

👉 Fe3+: Fe (Z=26) = [Ar] 3d6 4s2 → Fe3+ : [Ar] 3d5 (d5) ⇒ रंगीन

👉 Co2+: Co (Z=27) = [Ar] 3d7 4s2 → Co2+ : [Ar] 3d7 (d7) ⇒ रंगीन
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 d0 (जैसे Sc3+, Ti4+) और d10 (जैसे Cu+, Zn2+) आयन प्रायः रंगहीन होते हैं, जबकि d1 से d9 वाले आयन अक्सर रंगीन दिखाई देते हैं।

📌 जलीय विलयन में रंग क्यों आता है? (d–d Transition)
👉 जब कोई संक्रमण धातु आयन पानी में होता है, तो वह अक्सर संकुल बनाता है, जैसे: [Cu(H2O)6]2+, [Ni(H2O)6]2+ आदि।
पानी (ligand) के कारण d-कक्षकों की ऊर्जा बराबर नहीं रहती, वे दो energy levels (t2g और eg) में टूट जाते हैं (Crystal Field Splitting)।

• नीचे वाले d-level (t2g) में इलेक्ट्रॉन होते हैं
• visible light पड़ने पर इलेक्ट्रॉन t2g से eg में jump कर सकता है
➡️ यही d–d transition कहलाता है।

धातु आयन कुछ तरंगदैर्ध्य अवशोषित करता है और जो तरंगदैर्ध्य बचती है वही हमें रंग (पूरक रंग) के रूप में दिखती है।

फिर d0 और d10 आयन रंगहीन क्यों?
✅ d0 में d-electron होते ही नहीं → d–d transition संभव नहीं → रंग नहीं आता।
✅ d10 में d-orbitals पूरी तरह भरे होते हैं → jump के लिए उपयुक्त खाली जगह नहीं → d–d transition नहीं → रंग नहीं आता।

Quick example
• Cu2+ (d9) → d–d संक्रमण होगा → नीला जलीय विलयन
• Zn2+ (d10) → d–d संक्रमण नहीं → रंगहीन जलीय विलयन
Q.19: प्रथम संक्रमण श्रेणी की धातुओं की +2 ऑक्सीकरण अवस्थाओं के स्थायित्व की तुलना कीजिए।
Answer (उत्तर)
👉 प्रथम संक्रमण श्रेणी में +2 ऑक्सीकरण अवस्था का स्थायित्व प्रारम्भ में (Sc से Mn तक) सामान्यतः बढ़ता है, क्योंकि परमाणु क्रमांक बढ़ने पर प्रथम तथा द्वितीय आयनन एन्थैल्पियों का योग बढ़ता है और मानक अपचायक विभव (E°) कम/अधिक ऋणात्मक हो जाता है।

👉 +2 ऑक्सीकरण अवस्था का अधिक स्थायित्व, Mn2+ में अर्द्धपूरित d-उपकोश (d5) के कारण, Zn2+ में पूर्णपूरित d-उपकोश (d10) के कारण तथा Ni2+ में उच्च ऋणात्मक जलयोजन एन्थैल्पी के कारण होता है।
Explanation (व्याख्या)
📌 प्रथम अर्द्ध-भाग (Sc → Mn) में प्रवृत्ति:
👉 परमाणु क्रमांक बढ़ने पर IE1 + IE2 (प्रथम + द्वितीय आयनन एन्थैल्पी का योग) बढ़ता जाता है।
👉 इसके परिणामस्वरूप M → M2+ बनना क्रमशः कम अनुकूल होता है, यानी M2+ बनने की प्रवृत्ति घटती है।
👉 इसलिए प्रथम अर्द्ध-भाग में +2 ऑक्सीकरण अवस्था तुलनात्मक रूप से अधिक स्थायी होती जाती है।

📌 कुछ विशेष स्थिरताएँ (Important exceptions/extra stability):
👉 Mn2+ में [Ar] 3d5 (अर्द्ध-पूर्ण d-विन्यास) होने से +2 अवस्था बहुत स्थायी होती है।
👉 Zn2+ में [Ar] 3d10 (पूर्ण-पूर्ण d-विन्यास) होने से +2 अवस्था सबसे स्थायी होती है।
👉 Ni2+ में जलीय विलयन में जलयोजन एन्थैल्पी का मान (अधिक ऋणात्मक) होने से +2 अवस्था को अतिरिक्त स्थायित्व मिलता है।

📌 निष्कर्ष:
👉 +2 अवस्था प्रथम संक्रमण श्रेणी में बहुत सामान्य है, पर Mn2+ (d5) और Zn2+ (d10) जैसे आयनों में यह विशेष रूप से अधिक स्थायी दिखाई देती है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Mn2+ का d5 (अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों वाला) विन्यास इसे अक्सर अनुचुम्बकीय बनाता है, जबकि Zn2+ का d10 विन्यास इसे सामान्यतः प्रतिचुम्बकीय बनाता है।

Ni2+ की +2 अवस्था को पानी में extra स्थायित्व क्यों मिलता है?

(1) जलयोजन एन्थैल्पी (Hydration Enthalpy) क्या है?
जब कोई आयन पानी में जाता है, तो उसके चारों ओर पानी के अणु घेर लेते हैं और उससे आकर्षित होकर जुड़ जाते हैं। इसे जलयोजन (hydration) कहते हैं।
इस प्रक्रिया में ऊर्जा निकलती है, इसलिए जलयोजन एन्थैल्पी का मान ऋणात्मक (negative) होता है।
• जितनी ज्यादा ऊर्जा निकलेगी, जलयोजन एन्थैल्पी उतनी अधिक ऋणात्मक (more negative) होगी।

(2) Ni2+ की जलयोजन एन्थैल्पी ज्यादा ऋणात्मक क्यों होती है?
Ni2+ आयन आकार में छोटा होता है और उस पर +2 आवेश होता है।
इस वजह से उसकी charge density अधिक होती है, यानी वह पानी के अणुओं को ज्यादा जोर से खींचता है।
फलस्वरूप पानी के अणु मजबूती से जुड़ते हैं और बहुत अधिक ऊर्जा निकलती है।

(3) इससे +2 अवस्था स्थायी कैसे हो जाती है?
क्योंकि Ni2+ बनते ही पानी में बहुत ज्यादा ऊर्जा निकलकर सिस्टम स्थायी हो जाता है, इसलिए Ni की +2 अवस्था को जलीय विलयन में अतिरिक्त स्थायित्व मिल जाता है।

याद रखो:
Ni2+ पानी में strongly hydrate होता है → ज्यादा ऊर्जा निकलती है (जलयोजन एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक) → इसलिए Ni की +2 अवस्था अधिक स्थायी हो जाती है।
Q.20: निम्नलिखित के संदर्भ में लैन्थेनॉइड तथा ऐक्टिनॉइड के रसायन की तुलना कीजिए—
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
(ii) परमाण्वीय एवं आयनिक आकार
(iii) ऑक्सीकरण अवस्था
(iv) रासायनिक अभिक्रियाशीलता
Answer (उत्तर)
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
लैन्थेनॉइड: [Xe] 4f1–14 5d0–1 6s2
ऐक्टिनॉइड: [Rn] 5f1–14 6d1–2 7s2 (आरम्भिक सदस्यों में 6d भागीदारी अधिक)

(ii) परमाण्वीय एवं आयनिक आकार
दोनों श्रेणियों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर आकार घटता है।
लैन्थेनॉइड में इसे लैन्थेनॉइड आकुंचन और ऐक्टिनॉइड में ऐक्टिनॉइड आकुंचन कहते हैं।

(iii) ऑक्सीकरण अवस्था
लैन्थेनॉइड: मुख्यतः +3; कुछ में +2 और +4 भी।
👉 कारण: 4f, 5d तथा 6s उपकोशों के बीच ऊर्जा-अन्तर अधिक होता है।

ऐक्टिनॉइड: अधिक परिवर्तनशील; +3 के साथ-साथ +4, +5, +6 (कभी-कभी +7) भी।
👉 कारण: 5f, 6d तथा 7s उपकोशों में ऊर्जा-अन्तर कम होता है।

(iv) रासायनिक अभिक्रियाशीलता
लैन्थेनॉइड: काफ़ी क्रियाशील; आरम्भिक सदस्य अधिक क्रियाशील (कैल्सियम जैसे), आगे बढ़ने पर क्रियाशीलता कुछ घटती है।
ऐक्टिनॉइड: बहुत क्रियाशील (विशेषकर सूक्ष्मविभाजित); आसानी से कई अधातुओं से संयोजन करते हैं, सतह पर ऑक्साइड परत बन सकती है।
Explanation (व्याख्या)
📌 (i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
👉 लैन्थेनॉइड 4f-श्रृंखला से जुड़े होते हैं, इसलिए उनके सामान्य विन्यास में 4f भरता है: [Xe] 4f1–14 5d0–1 6s2

👉 ऐक्टिनॉइड 5f-श्रृंखला से जुड़े होते हैं, इसलिए उनके सामान्य विन्यास में 5f भरता है: [Rn] 5f1–14 6d1–2 7s2

📌 (ii) परमाण्वीय एवं आयनिक आकार
👉 दोनों में आकार घटने का मुख्य कारण यह है कि श्रृंखला में नाभिकीय आवेश बढ़ता है, जबकि f-इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव कमजोर होता है।
👉 5f इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण बहुत कमजोर होने से ऐक्टिनॉइड आकुंचन का प्रभाव कई बार अधिक स्पष्ट माना जाता है।

📌 (iii) ऑक्सीकरण अवस्था
👉 लैन्थेनॉइड में 4f, 5d, 6s उपकोशों के बीच ऊर्जा-अन्तर अधिक होने से ऑक्सीकरण अवस्थाएँ सीमित रहती हैं और +3 सबसे सामान्य होती है।
👉 ऐक्टिनॉइड में 5f, 6d, 7s उपकोशों में ऊर्जा-अन्तर कम होने से कई इलेक्ट्रॉन बन्धन/ऑक्सीकरण में भाग ले सकते हैं, इसलिए ऑक्सीकरण अवस्थाएँ अधिक मिलती हैं।

📌 (iv) रासायनिक अभिक्रियाशीलता
👉 लैन्थेनॉइड धातुएँ गर्म करने पर O2 से ऑक्साइड (Ln2O3), हैलोजन से हैलाइड (LnX3), तनु अम्लों से H2, तथा जल से Ln(OH)3 + H2 जैसी अभिक्रियाएँ देती हैं।

👉 ऐक्टिनॉइड अत्यधिक अभिक्रियाशील होते हैं; उबलते जल से ऑक्साइड/हाइड्राइड का मिश्रण बन सकता है। HCl इन्हें प्रभावित करता है, जबकि कई धातुएँ HNO3 में सतही ऑक्साइड परत के कारण कम प्रभावित दिखती हैं।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 लैन्थेनॉइडों के Ln3+ आयनों के आकार में अंतर बहुत कम होता है, इसलिए इन्हें अलग-अलग शुद्ध रूप में अलग करना कठिन होता है।

👉 ऐक्टिनॉइडों में 5f कक्षकों की भागीदारी के कारण इनके संकुल यौगिक (complex) अक्सर अधिक विविध और अधिक परिवर्तनशील प्रकृति दिखाते हैं।

👉 सरल भाषा में: 5f कक्षक बन्ध बनाने में भी हिस्सा लेते हैं, इसलिए ऐक्टिनॉइड के complexes ज्यादा तरह के बनते हैं और उनकी ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी जल्दी-जल्दी बदल सकती हैं।
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