NCERT Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12Organic Chemistry: Some Basic Principles and Techniques (कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें)

📘 यहाँ आपको Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry NCERT Solutions (Hindi + English Medium) में सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों के सटीक उत्तर और Step-by-Step Explanation मिलेंगे। इस chapter में IUPAC nomenclature, Electronic displacement effects (inductive, resonance, hyperconjugation), Electrophile & Nucleophile, Reaction intermediates (carbocation, carbanion, free radical), Purification techniques (crystallisation, distillation, sublimation, chromatography), और Qualitative/Quantitative analysis को आसान भाषा में समझाया गया है ताकि आपकी board exam preparation के साथ JEE/NEET foundation भी मजबूत हो। ✅

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NCRT Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 12 Organic Chemistry : Some Basic Principles and Techniques (कार्बनिक रसायन : कुछ आधारभूत सिद्धान्त तथा तकनीकें)
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Q.1: रासायनिक आबन्ध के बनने की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
✅ अधिकांश तत्व स्वतंत्र परमाणु के रूप में स्थिर नहीं रहते, वे अणु बनाते हैं।
✅ अणु में परमाणुओं को जोड़कर रखने वाला आकर्षण बल रासायनिक आबन्ध कहलाता है।
✅ कॉसेल-लूइस सिद्धांत के अनुसार बन्ध बनने के दो मुख्य तरीके हैं:
1. संयोजी इलेक्ट्रॉनों का स्थानान्तरण
2. संयोजी इलेक्ट्रॉनों का सहभाजन
✅ इन प्रक्रियाओं से परमाणु स्थिर इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (अष्टक) की ओर बढ़ते हैं।
व्याख्या
(i) द्रव्य, परमाणु और अणु का संबंध
👉 पदार्थ में परमाणु प्रायः अकेले नहीं रहते, बल्कि समूह बनाकर स्थिर अवस्था में रहते हैं।
👉 इस स्थिर समूह को अणु कहते हैं।
👉 अणु में परमाणुओं को जोड़े रखने वाला बल ही रासायनिक आबन्ध है।

(ii) रासायनिक आबन्ध की परिभाषा
विभिन्न रासायनिक स्पीशीज में परमाणुओं/आयनों को साथ रखने वाला आकर्षण बल रासायनिक आबन्ध कहलाता है।

(iii) कॉसेल-लूइस अवधारणा
👉 परमाणु बन्ध बनाकर स्थिरता (विशेषकर अष्टक) प्राप्त करते हैं।
👉 यह या तो इलेक्ट्रॉन देने-लेने (स्थानान्तरण) से होता है,
👉 या इलेक्ट्रॉन युग्म साझा करने (सहभाजन) से।

(iv) NaCl से समझें
👉 Na एक इलेक्ट्रॉन छोड़ता है।
👉 Cl वही इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है।
👉 Na+ और Cl बनते हैं और दोनों अधिक स्थिर हो जाते हैं।
👉 इनके बीच आकर्षण से आयनिक (विद्युत-संयोजी) आबन्ध बनता है।
क्या आप जानते हैं?
✅ उत्कृष्ट गैसों का बाहरी कोश पहले से स्थिर होने के कारण वे सामान्यतः बन्ध नहीं बनातीं।
✅ रासायनिक आबन्ध बनने का मुख्य कारण है: कम ऊर्जा + अधिक स्थिरता।
✅ इलेक्ट्रॉन स्थानान्तरण से आयनिक बन्ध, और इलेक्ट्रॉन सहभाजन से सहसंयोजी बन्ध बनता है।
Q.5: निम्नलिखित यौगिकों में से कौन-सा नाम IUPAC पद्धति के अनुसार सही है?
(क) 2,2-डाइएथिलपेन्टेन अथवा 2-मेथिलहेप्टेन
(ख) 2,4,7-ट्राइमेथिलऑक्टेन अथवा 2,5,7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
(ग) 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन अथवा 4-क्लोरो-2-मेथिलपेन्टेन
(घ) ब्यूट-3-आइन-1-ऑल अथवा ब्यूट-4-ऑल-1-आइन
उत्तर
✅ सही नाम हैं:
1. 2,2-डाइमेथिलपेन्टेन
2. 2,4,7-ट्राइमेथिलऑक्टेन
3. 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन
4. ब्यूट-3-आइन-1-ऑल
व्याख्या – Step by Step
(i) मुख्य नियम
👉 पहले मुख्य कार्बन शृंखला चुनते हैं।
👉 फिर क्रमांकन ऐसा करते हैं कि महत्वपूर्ण समूह/बन्ध को छोटा स्थानांक मिले।
👉 यदि दो विकल्प मिलें, तो न्यूनतम स्थानांकों का समुच्चय देखा जाता है।
👉 तुलना में जहाँ पहली बार अंतर मिले, उसे पहला भिन्नता-बिंदु कहते हैं।
👉 टकराव हो तो वर्णक्रम नियम लागू करते हैं।

(ii) विकल्प (ख) में 2,4,7 और 2,5,7
👉 पहले स्थानांक दोनों में 2 है।
👉 अगला स्थानांक 4 और 5 है।
👉 यहीं पहला भिन्नता-बिंदु आता है, और 4 छोटा है।
✅ इसलिए 2,4,7-ट्राइमेथिलऑक्टेन सही है।

(iii) विकल्प (ग) में क्लोरो और मेथिल
👉 स्थानांकों का समूह बराबरी जैसा लगे तो वर्णक्रम नियम (Alphabetical order) देखते हैं।
👉 “क्लोरो” वर्णक्रम में “मेथिल” से पहले आता है।
✅ इसलिए 2-क्लोरो-4-मेथिलपेन्टेन सही है।

(iv) विकल्प (घ) में –OH की प्राथमिकता
👉 –OH (ऑल) को उच्च प्राथमिकता मिलती है, इसलिए उसे छोटा स्थानांक दिया जाता है।
✅ इसलिए ब्यूट-3-आइन-1-ऑल सही है, न कि ब्यूट-4-ऑल-1-आइन।
क्या आप जानते हैं?
✅ नामकरण में सबसे ज्यादा गलती क्रमांकन और स्थानांक चुनने में होती है।
✅ द्वि-, त्रि-, टेट्रा-/चतुर- जैसे संख्या-उपसर्ग वर्णक्रम तुलना में नहीं गिने जाते।
✅ वर्णक्रम तय करते समय वास्तविक उपस्थापक नाम (जैसे क्लोरो, मेथिल, एथिल) देखा जाता है।
Q.9: निम्नलिखित में से कौन अधिक स्थायी है और क्यों?
O2N–CH2–CH2–O और CH3–CH2–O
उत्तर
✅ O2N–CH2–CH2–O अधिक स्थायी है।
✅ कारण: NO2 समूह का ऋण-प्रेरक प्रभाव (−I प्रभाव) बहुत प्रबल होता है, जो O पर उपस्थित ऋणावेश के घनत्व को कम करता है और आयन को स्थिर बनाता है।
व्याख्या – Step by Step
(i) स्थिरता किस पर निर्भर करेगी?
👉 दोनों ऐल्कॉक्साइड आयन हैं, जिनमें O पर ऋणावेश है।
👉 जिस आयन में यह ऋणावेश बेहतर तरीके से “खींच” लिया जाए या फैल जाए, वह अधिक स्थायी होता है।

(ii) पहले आयन में क्या हो रहा है?
O2N–CH2–CH2–O में NO2 समूह मौजूद है।
👉 NO2 शक्तिशाली −I प्रभाव दिखाता है।
👉 यह σ-बन्धों के माध्यम से इलेक्ट्रॉन घनत्व अपनी ओर खींचता है।
👉 परिणाम: O पर ऋणावेश की तीव्रता घटती है, इसलिए आयन अधिक स्थायी हो जाता है।

(iii) दूसरे आयन में क्या हो रहा है?
CH3–CH2–O में एथिल समूह है।
👉 एथिल समूह का +I प्रभाव होता है।
👉 यह इलेक्ट्रॉन घनत्व O की ओर धकेलता है।
👉 परिणाम: O पर ऋणावेश और सघन हो जाता है, इसलिए आयन अपेक्षाकृत कम स्थायी होता है।

(iv) निष्कर्ष
✅ −I प्रभाव स्थायीत्व बढ़ाता है, जबकि +I प्रभाव स्थायीत्व घटाता है (ऐल्कॉक्साइड जैसे ऋणायनों में)।
✅ इसलिए O2N–CH2–CH2–O > CH3–CH2–O (स्थायीत्व क्रम)।
क्या आप जानते हैं?
✅ किसी ऋणायन (anion) के पास अगर इलेक्ट्रॉन खींचने वाला समूह (जैसे NO2, CN, COOH) हो, तो वह ऋणायन सामान्यतः अधिक स्थायी हो जाता है।
✅ ऐल्किल समूह (+I) कार्बऐनियन/ऐल्कॉक्साइड जैसे ऋणायनों को अक्सर अस्थिर करते हैं।
✅ यही कारण है कि अम्लता (acidity) और संयुग्मी क्षार की स्थिरता में −I/+I प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Q.12: इलेक्ट्रॉनस्नेही तथा नाभिकस्नेही क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
✅ नाभिकस्नेही (Nucleophile) वह अभिकर्मक है जो इलेक्ट्रॉन-युग्म दान करता है।
✅ इलेक्ट्रॉनस्नेही (Electrophile) वह अभिकर्मक है जो इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करता है।
✅ सरल भाषा में:
• नाभिकस्नेही = इलेक्ट्रॉन-समृद्ध (electron-rich), इसलिए दाता |
• इलेक्ट्रॉनस्नेही = इलेक्ट्रॉन-न्यून (electron-deficient), इसलिए ग्राही |
व्याख्या – Step by Step
(i) नाभिकस्नेही की परिभाषा
👉 “नाभिकस्नेही” का अर्थ है नाभिक को खोजने वाला।
👉 यह प्रायः ऋणावेशित या एकाकी इलेक्ट्रॉन-युग्म वाले कण होते हैं।
👉 ये किसी इलेक्ट्रॉन-न्यून केंद्र को अपना इलेक्ट्रॉन-युग्म देते हैं।
📌 सामान्य उदाहरण:
👉 OH (हाइड्रॉक्साइड)
👉 CN (सायनाइड)
👉 Cl, Br, I
👉 NH3, H2O (उदासीन परंतु एकाकी युग्म वाले)

(ii) इलेक्ट्रॉनस्नेही की परिभाषा
👉 “इलेक्ट्रॉनस्नेही” का अर्थ है इलेक्ट्रॉन चाहने वाला।
👉 ये प्रायः धनावेशित या इलेक्ट्रॉन-न्यून कण होते हैं।
👉 ये नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉन-युग्म स्वीकार करते हैं।
📌सामान्य उदाहरण:
👉 H+
👉 NO2+
👉 कार्बधनायन (R+)
👉 BF3, AlCl3 (लुईस अम्ल)
👉 कार्बोनिल कार्बन (>C=O में C परमाणु)

(iii) ध्रुवीय कार्बनिक अभिक्रिया में क्या होता है?
👉 नाभिकस्नेही, अणु के इलेक्ट्रॉन-न्यून केंद्र पर आक्रमण करता है।
👉 इलेक्ट्रॉनस्नेही, अणु के इलेक्ट्रॉन-धनी केंद्र पर आक्रमण करता है।
👉 इलेक्ट्रॉन-युग्म का प्रवाह हमेशा नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉनस्नेही की ओर माना जाता है।

(iv) छोटा उदाहरण (ऐल्किल हैलाइड)
R–Cl में C–Cl आबन्ध ध्रुवीय होता है।
👉 कार्बन पर आंशिक धनावेश (δ+) आता है, इसलिए वह इलेक्ट्रॉनस्नेही केंद्र बनता है।
👉 OH (नाभिकस्नेही) उस कार्बन पर आक्रमण करता है।
👉 परिणाम: R–OH बन सकता है।

(v) निष्कर्ष
✅ नाभिकस्नेही = इलेक्ट्रॉन-युग्म दाता
✅ इलेक्ट्रॉनस्नेही = इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्राही
✅ कार्बनिक अभिक्रियाओं की दिशा समझने में यह सबसे मूलभूत विचार है।
क्या आप जानते हैं?
✅ जिन कणों पर ऋणावेश या lone pair होता है, वे प्रायः अच्छे नाभिकस्नेही होते हैं।
✅ जिन कणों में अपूर्ण अष्टक (incomplete octet) होता है, वे अच्छे इलेक्ट्रॉनस्नेही होते हैं (जैसे BF3)।
✅ “लुईस क्षार” सामान्यतः नाभिकस्नेही और “लुईस अम्ल” सामान्यतः इलेक्ट्रॉनस्नेही की तरह व्यवहार करते हैं।
Q.14: निम्नलिखित अभिक्रियाओं को वर्गीकृत कीजिए।
(क) CH3CH2Br + HS → CH3CH2SH + Br
(ख) (CH3)2C=CH2 + HCl → (CH3)2C(Cl)–CH3
(ग) CH3CH2Br + OH → CH2=CH2 + H2O + Br
(घ) (CH3)3C–CH2OH + HBr → (CH3)2CBr–CH2CH3 + H2O
उत्तर
✅ (क) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Nucleophilic Substitution)
✅ (ख) इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया (Electrophilic Addition)
✅ (ग) विलोपन अभिक्रिया (Elimination)
✅ (घ) पुनर्विन्यास युक्त नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन (Nucleophilic Substitution with Rearrangement)
व्याख्या – Step by Step
(i) (क) CH3CH2Br + HS → CH3CH2SH + Br
👉 यहाँ HS नाभिकस्नेही है।
👉 यह Br वाले कार्बन पर आक्रमण करता है और Br बाहर निकल जाता है।
👉 एक समूह (Br) हटकर दूसरा समूह (HS) आ गया।
✅ इसलिए यह नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन है।

(ii) (ख) (CH3)2C=CH2 + HCl → (CH3)2C(Cl)–CH3
👉 अल्कीन के द्विबन्ध पर HCl जुड़ रहा है।
👉 पहले H+ (इलेक्ट्रॉनस्नेही) द्विबन्ध पर जुड़ता है, फिर Cl जुड़ता है।
👉 यानी π-आबन्ध टूटकर दो नए σ-आबन्ध बनते हैं।
✅ इसलिए यह इलेक्ट्रॉनस्नेही योगात्मक अभिक्रिया है।

(iii) (ग) CH3CH2Br + OH → CH2=CH2 + H2O + Br
👉 यहाँ OH क्षार की तरह β-H हटाता है।
👉 साथ में Br निकलता है और द्विबन्ध बनता है।
👉 छोटे अणु/आयन हटकर असंतृप्त (C=C) बनती है।
✅ इसलिए यह विलोपन अभिक्रिया है।

(iv) (घ) (CH3)3C–CH2OH + HBr → (CH3)2CBr–CH2CH3 + H2O
👉 पहले –OH, प्रोटॉनन (प्रोटॉन का जुड़ना) के बाद पानी के रूप में निकलता है।
👉 मध्यवर्ती कार्बधनायन बनता है, जो अधिक स्थिर बनने के लिए पुनर्विन्यास करता है।
👉 फिर Br आकर प्रतिस्थापन उत्पाद देता है।
✅ इसलिए यह पुनर्विन्यास युक्त नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन है।
क्या आप जानते हैं?
✅ यदि leaving group हटकर नया समूह आ जाए, तो सामान्यतः प्रतिस्थापन अभिक्रिया होती है।
✅ यदि द्विबन्ध पर अभिकर्मक जुड़ें, तो वह योगात्मक अभिक्रिया कहलाती है।
✅ यदि H और निर्गामी समूहनिकलकर C=C बने, तो वह विलोपन अभिक्रिया होती है।
निर्गामी समूह = वह समूह जो अभिक्रिया के दौरान अणु से निकल जाता है|
✅ तृतीयक/निकट-तृतीयक कार्बधनायनों में पुनर्विन्यास (hydride/alkyl shift) अक्सर देखा जाता है।
Q.18: प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित प्रक्रियाओं के सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण दीजिए—
(क) क्रिस्टलन
(ख) आसवन
(ग) क्रोमैटोग्राफी (वर्णलेखन)
उत्तर
✅ (क) क्रिस्टलन: विलेयता (घुलनशीलता) के अंतर पर आधारित शोधन विधि।
✅ (ख) आसवन: क्वथनांक (उबलने के ताप) के अंतर पर आधारित पृथक्करण विधि।
✅ (ग) क्रोमैटोग्राफी (वर्णलेखन): स्थिर प्रावस्था और गतिशील प्रावस्था के बीच अवयवों के अलग-अलग व्यवहार पर आधारित पृथक्करण/शोधन विधि।
व्याख्या – Step by Step
(क) क्रिस्टलन (Crystallisation)
👉 यह ठोस कार्बनिक पदार्थों के शोधन की बहुत सामान्य और उपयोगी विधि है।
👉 सिद्धान्त: शुद्ध पदार्थ और अशुद्धियों की विलेयता में अंतर।
कैसे किया जाता है?
1. अशुद्ध ठोस को ऐसे विलायक में घोलते हैं जिसमें वह गरम करने पर अच्छी तरह घुल जाए, पर ठंडा करने पर कम घुले।
2. गरम विलयन को सान्द्र करके लगभग संतृप्त बनाते हैं।
3. ठंडा करने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टल के रूप में अलग हो जाता है।
4. निस्यंदन (फिल्ट्रेशन) से क्रिस्टल अलग कर लेते हैं।
5. निस्यन्द (मातृ-द्रव) में अधिकतर अशुद्धियाँ रह जाती हैं।
उदाहरण:
✅ अशुद्ध बेंजोइक अम्ल को गरम जल से क्रिस्टलन करके शुद्ध बेंजोइक अम्ल प्राप्त किया जाता है।

(ख) आसवन (Distillation)
👉 यह द्रवों के शोधन/पृथक्करण की महत्त्वपूर्ण विधि है।
👉 सिद्धान्त: द्रवों के क्वथनांक में अंतर।
कैसे किया जाता है?
1. द्रव मिश्रण को फ्लास्क में गरम करते हैं।
2. कम क्वथनांक वाला द्रव पहले वाष्पित होता है।
3. वाष्प को संघनित्र (condenser) से ठंडा कर द्रव में बदलते हैं।
4. उसे अलग पात्र में एकत्र करते हैं।
5. बाद में अधिक क्वथनांक वाला घटक प्राप्त होता है।
उदाहरण:
✅ क्लोरोफॉर्म (कम क्वथनांक) और ऐनिलीन (अधिक क्वथनांक) का मिश्रण आसवन से अलग किया जा सकता है।

(ग) क्रोमैटोग्राफी / वर्णलेखन (Chromatography)
👉 यह मिश्रण के अवयवों को अलग करने, शोधन करने और शुद्धता जाँचने की अत्यंत महत्त्वपूर्ण तकनीक है।
👉 सिद्धान्त: अवयवों का स्थिर प्रावस्था और गतिशील प्रावस्था के प्रति अलग-अलग आकर्षण/वितरण।
• स्थिर प्रावस्था: जो अपनी जगह स्थिर रहती है (ठोस/द्रव)
• गतिशील प्रावस्था: जो चलती है (विलायक/विलायकों का मिश्रण/गैस)
कैसे पृथक्करण होता है?
👉 मिश्रण के विभिन्न अवयव स्थिर प्रावस्था पर अलग-अलग मात्रा में रुकते हैं या अलग गति से आगे बढ़ते हैं।
👉 इसलिए वे अलग-अलग दूरी तय करके अलग हो जाते हैं।
उदाहरण:
✅ कागज वर्णलेखन (Paper Chromatography) से स्याही में उपस्थित अलग-अलग रंगों को अलग किया जा सकता है।
क्या आप जानते हैं?
✅ क्रिस्टलन में रंगीन अशुद्धियाँ हटाने के लिए सक्रियित काष्ठ-कोयला (activated charcoal) उपयोग किया जाता है।
✅ आसवन के कई प्रकार हैं, जैसे सरल आसवन और भिन्नात्मक आसवन।
✅ TLC (पतली पर्त वर्णलेखन) और कॉलम वर्णलेखन प्रयोगशालाओं में यौगिक पहचान और शुद्धता जाँच के लिए बहुत उपयोगी हैं।
Q.19: ऐसे दो यौगिकों, जिनकी विलेयताएँ एक ही विलायक s में भिन्न हों, को पृथक करने की विधि समझाइए।
उत्तर
✅ ऐसे यौगिकों को अलग करने के लिए क्रिस्टलन (क्रिस्टलीकरण) विधि का प्रयोग किया जाता है।
✅ यह विधि दोनों पदार्थों की विलेयता में अंतर पर आधारित होती है।
व्याख्या – Step by Step
(i) सिद्धान्त
👉 यदि दो यौगिकों की एक ही विलायक s में घुलनशीलता अलग-अलग हो, तो ताप बदलने पर वे अलग-अलग पद (चरण) में क्रिस्टल बनाते हैं।
👉 कम विलेय (अल्प-विलेय) पदार्थ पहले क्रिस्टलित होता है, अधिक विलेय पदार्थ बाद में।

(ii) प्रक्रिया
1. मिश्रण को ऐसे उपयुक्त विलायक में गरम करके घोलते हैं, जिसमें ऊँचे ताप पर दोनों पर्याप्त घुल जाएँ।
2. विलयन को सान्द्र करके लगभग संतृप्त किया जाता है।
3. अब विलयन को धीरे-धीरे ठंडा करते हैं।
4. जो घटक कम विलेय है, वह पहले क्रिस्टल के रूप में निकलता है।
5. निस्यंदन (छानकर) से इसे अलग कर लेते हैं।
6. बचे हुए मातृ-द्रव को पुनः सान्द्रित/ठंडा करके अधिक विलेय घटक को क्रिस्टलित कर लेते हैं।

(iii) शुद्धता बढ़ाने के लिए
👉 यदि रंगीन अशुद्धियाँ हों, तो सक्रियित काष्ठ-कोयला मिलाकर हटाई जाती हैं।
👉 यदि विलेयता का अंतर कम हो, तो बार-बार क्रिस्टलन करके अधिक शुद्ध पदार्थ प्राप्त किया जाता है।

(iv) निष्कर्ष
✅ अलग-अलग विलेयता वाले दो यौगिकों के पृथक्करण के लिए क्रिस्टलन सबसे उपयुक्त और प्रभावी विधि है।
क्या आप जानते हैं?
✅ क्रिस्टलन में धीरे-धीरे ठंडा करने से बड़े और अधिक शुद्ध क्रिस्टल प्राप्त होते हैं।
✅ बहुत तेज ठंडा करने पर अशुद्धियाँ क्रिस्टल में फँस सकती हैं।
✅ प्रयोगशाला में “पुनःक्रिस्टलन” (Recrystallisation) शुद्धता बढ़ाने की मानक तकनीक मानी जाती है।
Q.20: आसवन, निम्न दाब पर आसवन तथा भाप आसवन में क्या अंतर है? विवेचना कीजिए।
उत्तर
✅ तीनों विधियों का मुख्य सिद्धान्त वाष्पीकरण और संघनन है, लेकिन दाब, प्रयोग की स्थिति और उपयोग अलग हैं।
👉 आसवन (Simple Distillation): सामान्य वायुमंडलीय दाब पर किया जाता है।
👉 निम्न दाब पर आसवन (Vacuum Distillation): दाब घटाकर किया जाता है, ताकि क्वथनांक कम हो जाए।
👉 भाप आसवन (Steam Distillation): जल-वाष्प की सहायता से, सामान्य दाब के आसपास, ऊँचे क्वथनांक वाले जल-अमिश्रणीय कार्बनिक द्रवों को कम ताप पर उबाला जाता है।
व्याख्या – Step by Step
(i) साधारण आसवन (आसवन)
👉 सिद्धान्त: द्रव को गरम करके वाष्प बनाना और फिर वाष्प को ठंडा करके शुद्ध द्रव प्राप्त करना।
👉 यह विधि उन द्रवों के लिए उपयुक्त है जो बिना अपघटन के उबलते हैं और जिनमें अवाष्पशील अशुद्धियाँ हों।
👉 दाब: वायुमंडलीय दाब।
उपयोग:
✅ अवाष्पशील अशुद्धि से द्रव का शोधन।
✅ पर्याप्त क्वथनांक-अंतर वाले द्रवों का पृथक्करण।

(ii) निम्न दाब पर आसवन (वैक्यूम आसवन)
👉 यहाँ निर्वात पम्प से दाब कम किया जाता है।
👉 दाब घटने पर क्वथनांक घट जाता है, इसलिए पदार्थ कम ताप पर उबल जाता है।
👉 यह उन द्रवों के लिए बहुत उपयोगी है जिनका क्वथनांक बहुत अधिक हो या जो उच्च ताप पर टूट (अपघटित) जाते हों।
दाब:
✅ वायुमंडलीय दाब से कम।
उपयोग:
✅ ऊँचे क्वथनांक वाले या ऊष्मा-संवेदनशील (heat sensitive) कार्बनिक द्रवों का शोधन।

(iii) भाप आसवन (Steam Distillation)
👉 इसमें जल-वाष्प (steam) पास कराई जाती है।
👉 कार्बनिक द्रव और जल साथ-साथ वाष्पित होते हैं।
👉 मिश्रण उस ताप पर उबलता है जब दोनों के वाष्प-दाबों का योग वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाए:
p = p₁ + p₂
(जहाँ p₁ = कार्बनिक द्रव का वाष्प-दाब, p₂ = जल का वाष्प-दाब)
👉 परिणाम: कार्बनिक पदार्थ अपने सामान्य क्वथनांक से कम ताप पर आसुत हो जाता है, इसलिए अपघटन कम होता है।
दाब:
✅ कुल बाहरी दाब सामान्यतः वायुमंडलीय ही रहता है (वैक्यूम जैसा दाब-घटाव नहीं)।
उपयोग:
✅ जल-अमिश्रणीय (water-immiscible) और ऊँचे क्वथनांक वाले कार्बनिक यौगिक, जैसे कुछ आवश्यक तेल।

(iv) आसवन विधियों की तुलना तालिका

क्र.सं. आधार आसवन (Simple Distillation) निम्न दाब आसवन (Reduced Pressure / Vacuum Distillation) भाप आसवन (Steam Distillation)
1 दाब की स्थिति सामान्य दाब पर किया जाता है। दाब को कम करके किया जाता है। सामान्य दाब के आसपास, लेकिन भाप (steam) की उपस्थिति में।
2 क्वथनांक पर प्रभाव द्रव अपने सामान्य क्वथनांक पर उबलता है। दाब घटने से क्वथनांक घट जाता है, इसलिए कम ताप पर उबाल आता है। संयुक्त वाष्प-दाब के कारण कम ताप पर उबाल संभव हो जाता है।
3 कब उपयोग करें जब द्रव में अवाष्पशील अशुद्धि हो और साधारण पृथक्करण करना हो। ऊँचे क्वथनांक वाले या गर्म करने पर अपघटित होने वाले द्रवों के लिए। जल-अमिश्रणीय (water-immiscible) और वाष्पशील कार्बनिक पदार्थों के पृथक्करण के लिए।
क्या आप जानते हैं?
✅ इत्र और आवश्यक तेलों के निष्कर्षण में भाप आसवन बहुत प्रसिद्ध तकनीक है।
✅ वैक्यूम आसवन पेट्रोलियम उद्योग और उच्च क्वथनांक वाले कार्बनिक द्रवों में व्यापक रूप से उपयोग होता है।
✅ सही आसवन-विधि चुनने से उत्पाद की शुद्धता भी बढ़ती है और अपघटन भी कम होता है।
Q.25: ‘सोडियम संलयन निष्कर्ष’ में हैलोजन के परीक्षण के लिए सिल्वर नाइट्रेट मिलाने से पहले नाइट्रिक अम्ल क्यों मिलाया जाता है?
उत्तर
✅ हैलोजन परीक्षण में सिल्वर नाइट्रेट (AgNO3) डालने से पहले नाइट्रिक अम्ल (HNO3) इसलिए मिलाया जाता है ताकि निष्कर्ष में उपस्थित CN और S2– आयन हट जाएँ।
✅ यदि ये आयन न हटाए जाएँ, तो AgNO3 इनके साथ भी अवक्षेप बना देता है, जिससे हैलोजन परीक्षण में गलत परिणाम आ सकता है।
व्याख्या – Step by Step
(i) समस्या क्या होती है?
👉 सोडियम संलयन निष्कर्ष में कभी-कभी NaCN और Na2S भी उपस्थित होते हैं।
👉 हैलोजन जाँच के लिए हम AgNO3 मिलाते हैं, जो हैलाइड आयनों के साथ AgX (अवक्षेप) देता है।
👉 लेकिन AgNO3 CN और S2– के साथ भी अवक्षेप बना देता है।

(ii) बाधा पैदा करने वाली अभिक्रियाएँ
• Na2S + 2AgNO3 → Ag2S↓ + 2NaNO3 (काला अवक्षेप)
• NaCN + AgNO3 → AgCN↓ + NaNO3 (श्वेत अवक्षेप)
👉 ये अवक्षेप हैलोजन के AgCl/AgBr/AgI जैसे अवक्षेपों से भ्रम पैदा कर देते हैं।

(iii) HNO3 क्या करता है?
👉 पहले निष्कर्ष को HNO3 के साथ उबालते हैं।
👉 इससे बाधक आयन गैस के रूप में निकल जाते हैं:
• NaCN + HNO3 → NaNO3 + HCN↑
• Na2S + 2HNO3 → 2NaNO3 + H2S↑
👉 अब CN और S2– हट जाने पर AgNO3 केवल हैलाइड आयनों से अभिक्रिया करता है।

(iv) निष्कर्ष
✅ नाइट्रिक अम्ल मिलाने का उद्देश्य हैलोजन परीक्षण को विश्वसनीय और विशिष्ट बनाना है।
✅ इससे झूठे/भ्रामक अवक्षेप नहीं बनते और सही पहचान होती है।
क्या आप जानते हैं?
✅ इस चरण को अनदेखा करने पर practical में false positive/false precipitate की समस्या बहुत आम है।
✅ हैलोजन परीक्षण की शुद्धता के लिए “HNO3 से उबालना” एक अनिवार्य पूर्व-चरण माना जाता है।
✅ AgNO3 परीक्षण की सफलता काफी हद तक sample pre-treatment पर निर्भर करती है।
Q.26: नाइट्रोजन, सल्फर तथा फॉस्फोरस के परीक्षण के लिए कार्बनिक यौगिक का सोडियम के साथ संगलन क्यों किया जाता है?
उत्तर
✅ कार्बनिक यौगिक में नाइट्रोजन, सल्फर और फॉस्फोरस प्रायः सह-संयोजी (कोवैलेंट) रूप में जुड़े होते हैं।
✅ इनका सीधे सामान्य अकार्बनिक परीक्षण करना कठिन होता है।
✅ इसलिए यौगिक का सोडियम के साथ संगलन किया जाता है, ताकि ये तत्त्व आयनिक (जल में घुलनशील) सोडियम लवणों में बदल जाएँ।
व्याख्या – Step by Step
(i) मूल समस्या
👉 कार्बनिक यौगिकों में N, S, P कार्बन से सह-संयोजी आबन्ध में बंधे रहते हैं।
👉 सह-संयोजी रूप में ये आयन नहीं देते, इसलिए इन तत्त्वों कि पहचान-परीक्षण सरल नहीं होता।

(ii) सोडियम संगलन का उद्देश्य
👉 सोडियम के साथ तीव्र गरम करने पर ये तत्त्व आयनिक लवणों में परिवर्तित हो जाते हैं।
👉 बने हुए लवण जल में घुलकर परीक्षण योग्य हो जाते हैं।

(iii) सामान्य परिवर्तन (धारणा स्तर पर)
• N → NaCN (उपयुक्त परिस्थितियों में)
• S → Na2S
• P → Na3PO4
👉 अब इन आयनों पर आधारित अकार्बनिक अभिक्रियाएँ करके तत्त्वों की पहचान की जाती है।

(iv) निष्कर्ष
✅ सोडियम संगलन का मुख्य सिद्धान्त है:
“सह-संयोजी रूप में उपस्थित तत्त्वों को आयनिक रूप में बदलना”
ताकि उनका गुणात्मक परीक्षण स्पष्ट और विश्वसनीय हो सके।
क्या आप जानते हैं?
✅ इस विधि को लासेन परीक्षण (Lassaigne’s test) के नाम से जाना जाता है।
✅ सोडियम संलयन निष्कर्ष को ही आगे N, S, हैलोजन आदि की पहचान में उपयोग किया जाता है।
✅ सही संगलन न होने पर परीक्षण में false negative परिणाम आ सकता है।
Q.27: कैल्सियम सल्फेट तथा कपूर के मिश्रण के अवयवों को पृथक करने के लिए एक उपयुक्त तकनीक बताइए।
उत्तर
✅ उर्ध्वपातन (Sublimation) तकनीक सबसे उपयुक्त है।
संक्षेप में
👉 कपूर उर्ध्वपातनीय है, यानी गरम करने पर ठोस से सीधे वाष्प बन जाता है।
👉 कैल्सियम सल्फेट (CaSO4) उर्ध्वपातित नहीं होता।
👉 इसलिए मिश्रण को गरम करने पर कपूर वाष्प बनकर ऊपर ठंडी सतह/फनल पर फिर से ठोस के रूप में जम जाता है, जबकि CaSO4 नीचे रह जाता है।
क्या आप जानते हैं?
✅ इसी सिद्धान्त से अमोनियम क्लोराइड जैसे पदार्थ भी मिश्रण से अलग किए जाते हैं।
Q.28: भाप-आसवन करने पर एक कार्बनिक द्रव अपने क्वथनांक से निम्न ताप पर वाष्पीकृत। क्यों हो जाता है?
उत्तर
✅ भाप-आसवन में कार्बनिक द्रव और जल साथ मिलकर उबलते हैं।
✅ जब दोनों के वाष्प-दाबों का योग वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाता है तब यें साथ मिलकर उबलते हैं।
✅ इसलिए कार्बनिक द्रव को अकेले अपने सामान्य क्वथनांक तक पहुँचने की जरूरत नहीं पड़ती, और वह कम ताप पर ही आसवित हो जाता है।
संक्षेप में
👉 भाप-आसवन में कुल दाब: p = p(जल) + p(कार्बनिक द्रव)
👉 जल का वाष्प-दाब उच्च होता है।
👉 परिणाम: मिश्रण अपेक्षाकृत कम ताप पर उबल जाता है।
👉 इसी कारण ऊँचे क्वथनांक वाला कार्बनिक द्रव भी कम ताप पर वाष्पित/आसवित हो जाता है।
क्या आप जानते हैं?
✅ भाप-आसवन का उपयोग ऊष्मा-संवेदनशील (heat-sensitive) पदार्थों, जैसे आवश्यक तेलों, को बिना अपघटन के अलग करने में किया जाता है।
Q.29: क्या CCl4 को सिल्वर नाइट्रेट (AgNO3) के साथ गरम करने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप मिलेगा? कारण सहित समझाइए।
उत्तर
✅ नहीं, AgCl का श्वेत अवक्षेप नहीं बनेगा।
व्याख्या
👉 CCl4 एक सह-संयोजी यौगिक है।
👉 यह जल में आयनित होकर Cl आयन नहीं देता।
👉 जबकि AgNO3 से AgCl का अवक्षेप बनने के लिए विलयन में मुक्त Cl आयन होना आवश्यक है।
👉 चूँकि CCl4 से Cl उपलब्ध नहीं होता, इसलिए AgCl नहीं बनता।
क्या आप जानते हैं?
✅ AgNO3 परीक्षण मुख्यतः उन यौगिकों/विलयनों पर काम करता है जो वास्तव में हैलाइड आयन (Cl, Br, I) मुक्त करते हैं।
✅ सह-संयोजी हैलोजन यौगिक हमेशा सीधे AgX अवक्षेप नहीं देते।
Q.30 किसी कार्बनिक यौगिक में कार्बन का आकलन करते समय उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने के लिए पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड विलयन का उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर
✅ क्योंकि CO2 अम्लीय प्रकृति की गैस है और यह प्रबल क्षार KOH द्वारा आसानी से अवशोषित हो जाती है।
✅ अभिक्रिया में KOH, CO2 को स्थिर कार्बोनेट (K2CO3) में बदल देता है, इसलिए CO2 का पूरा अवशोषण हो पाता है।
2KOH+CO_2→K_2 CO_3+H_2 O
व्याख्या – Step by Step
(i) कार्बन आकलन में CO₂ की भूमिका
👉 कार्बनिक यौगिक के दहन पर कार्बन, CO₂ में बदलता है।
👉 इसलिए बनी हुई CO₂ की मात्रा से ही नमूने में कार्बन की मात्रा निकाली जाती है।

(ii) KOH क्यों चुना जाता है?
👉 KOH प्रबल क्षार है और CO₂ (अम्लीय ऑक्साइड) को प्रभावी ढंग से अवशोषित करता है।
👉 CO₂ गैस को K₂CO₃ में बदल देने से गैस बाहर नहीं निकलती और मापन सटीक होता है।

(iii) द्रव्यमान में वृद्धि का अर्थ
👉 CO₂ अवशोषित होने पर KOH वाले अवशोषक का द्रव्यमान बढ़ता है।
👉 यह बढ़ा हुआ द्रव्यमान = अवशोषित CO₂ का द्रव्यमान।

(iv) कार्बन प्रतिशत का सूत्र
👉 CO₂ में कार्बन का द्रव्यमान-अंश = 12/44
इसलिए,
%C = (12/44) × (निर्मित CO₂ का द्रव्यमान / लिए गए पदार्थ का द्रव्यमान) × 100
क्या आप जानते हैं?
✅ CO2 का सटीक अवशोषण न हो तो कार्बन प्रतिशत कम निकलता है।
✅ इसी कारण कार्बन के परिमाणात्मक विश्लेषण में क्षारीय अवशोषक (जैसे KOH) बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
Q.31 सल्फर के लेड ऐसीटेट द्वारा परीक्षण में ‘सोडियम संलयन निष्कर्ष’ को ऐसीटिक अम्ल द्वारा अम्लीकृत किया जाता है, न कि सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा। क्यों?
उत्तर
✅ क्योंकि इस परीक्षण में लेड ऐसीटेट (Lead acetate) प्रयुक्त होता है, और ऐसीटिक अम्ल (CH₃COOH) परीक्षण में बाधा नहीं देता।
✅ यदि H₂SO₄ लिया जाए, तो वह लेड ऐसीटेट से अभिक्रिया करके लेड सल्फेट (PbSO₄) का सफेद अवक्षेप बना देता है, जो सल्फर परीक्षण में बाधा उत्पन्न करता है।
व्याख्या – Step by Step
(i) परीक्षण का उद्देश्य
👉 हमें सोडियम संलयन निष्कर्ष में उपस्थित सल्फाइड आयन की जाँच करनी होती है।
👉 इसके लिए लेड ऐसीटेट का उपयोग किया जाता है।

(ii) ऐसीटिक अम्ल क्यों?
👉 CH₃COOH दूर्बल अम्ल है और ऐसा कोई अवांछित अवक्षेप नहीं बनाता जो परीक्षण को प्रभावित करे।
👉 इसलिए वास्तविक सल्फर-परीक्षण स्पष्ट मिलता है।

(iii) H₂SO₄ क्यों नहीं?
👉 H₂SO₄ देने पर सल्फेट आयन (SO₄²⁻) उपस्थित हो जाते हैं।
👉 ये लेड आयन से तुरंत अभिक्रिया करके सफेद PbSO₄ अवक्षेप बना देते हैं:
(CH₃COO)₂Pb + H₂SO₄ → PbSO₄↓ + 2CH₃COOH
👉 यह अतिरिक्त सफेद अवक्षेप भ्रम पैदा करता है और परीक्षण को गलत कर देता हैहै।

(iv) निष्कर्ष
✅ इसलिए सल्फर के लेड ऐसीटेट परीक्षण में अम्लीकरण के लिए ऐसीटिक अम्ल लिया जाता है, सल्फ्यूरिक अम्ल नहीं।
क्या आप जानते हैं?
✅ गुणात्मक विश्लेषण में सही अम्ल का चयन बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि गलत अम्ल “निर्गामी समूह” या अवक्षेप से झूठा परिणाम दे सकता है।
✅ लेड लवणों के साथ सल्फेट आयन सामान्यतः अविलेय PbSO₄ बनाते हैं, इसलिए सल्फेट स्रोतों से बचा जाता है।
Q.32 एक कार्बनिक यौगिक में 69% कार्बन, 4.8% हाइड्रोजन तथा शेष ऑक्सीजन है। इस यौगिक के 0.20 g के पूर्ण दहन के फलस्वरूप उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल की मात्राओं की गणना कीजिए।
उत्तर
✅ 0.20 g यौगिक के पूर्ण दहन से:
• CO₂ का द्रव्यमान = 0.506 g (लगभग)
• H₂O का द्रव्यमान = 0.0864 g (लगभग)
व्याख्या – Step by Step
(i) दिए गए आँकड़े
• यौगिक का द्रव्यमान = 0.20 g
• कार्बन = 69%
• हाइड्रोजन = 4.8%
• ऑक्सीजन = शेष (यहाँ CO₂ और H₂O निकालने के लिए सीधे जरूरी नहीं)

(ii) यौगिक में कार्बन का द्रव्यमान
कार्बन का द्रव्यमान = 69/100 × 0.20
= 0.138 g
अब, unitary method लगाने पर

C का द्रव्यमान (g) CO₂ का द्रव्यमान (g)
12 44
0.138 X

x का मान ज्ञात करने करने पर:
x = (0.138 g x 44 g) ÷ 12 g
x = 0.506 g
CO₂ का द्रव्यमान = 0.506 g (लगभग)

(iii) यौगिक में हाइड्रोजन का द्रव्यमान
हाइड्रोजन का द्रव्यमान = 4.8/100 × 0.20
= 0.0096 g
अब, unitary method लगाने पर

H का द्रव्यमान (g) H₂O का द्रव्यमान (g)
2 18
0.0096 X

x का मान ज्ञात करने करने पर:
x = (0.0096g x 18 g) ÷ 2 g
x = 0.0096 × 9
x = 0.0864 g
H₂O का द्रव्यमान = 0.0864 g

(iv) अंतिम परिणाम
✅ CO₂ = 0.506 g (लगभग)
✅ H₂O = 0.0864 g
क्या आप जानते हैं?
✅ दहन-आधारित प्रश्नों में CO₂ की गणना कार्बन प्रतिशत से और H₂O की गणना हाइड्रोजन प्रतिशत से सीधी की जाती है।
✅ याद रखने का त्वरित अनुपात:
👉 C → CO₂ के लिए गुणक = 44/12
👉 H → H₂O के लिए गुणक = 9
Q.33: 0.50 g कार्बनिक यौगिक को केजेलडाल विधि के अनुसार उपचारित करने पर प्राप्त अमोनिया को 0.5 M H₂SO₄ के 50 mL में अवशोषित किया गया। अवशिष्ट अम्ल के उदासीनीकरण के लिए 0.5 M NaOH के 50 mL की आवश्यकता हुई। यौगिक में नाइट्रोजन प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
✅ यौगिक में नाइट्रोजन का प्रतिशत = 70%
व्याख्या – Step by Step
(i) प्रारम्भिक H₂SO₄ के मोल
\( n(\mathrm{H_2SO_4})_{\text{initial}} = M \times V = 0.5 \times 0.050 = 0.025\ \mathrm{mol} \)
(ii) अवशिष्ट अम्ल (H₂SO₄) की गणना NaOH से
दिया है: 0.5 M NaOH के 50 mL लगे
\( n(\mathrm{NaOH}) = M \times V = 0.5 \times 0.050 = 0.025\ \mathrm{mol} \)

उदासीनीकरण अभिक्रिया:
\( \mathrm{H_2SO_4 + 2NaOH \rightarrow Na_2SO_4 + 2H_2O} \)
अतः अवशिष्ट H₂SO₄ के मोल:
\( n(\mathrm{H_2SO_4})_{\text{left}} = \frac{n(\mathrm{NaOH})}{2} = \frac{0.025}{2} = 0.0125\ \mathrm{mol} \)

(iii) NH₃ द्वारा अभिक्रियित H₂SO₄

\( n(\mathrm{H_2SO_4})_{\text{reacted}} = 0.025 - 0.0125 = 0.0125\ \mathrm{mol} \)
अब,
\( \mathrm{H_2SO_4 + 2NH_3 \rightarrow (NH_4)_2SO_4} \)

तो NH₃ के मोल:
\( n(\mathrm{NH_3}) = 2 \times n(\mathrm{H_2SO_4})_{\text{reacted}} = 2 \times 0.0125 = 0.025\ \mathrm{mol} \)
NH₃ में N और NH₃ का अनुपात 1:1 है, इसलिए \( n(\mathrm{N}) = 0.025\ \mathrm{mol} \)
(iv) नाइट्रोजन का द्रव्यमान
\( m(\mathrm{N}) = n(\mathrm{N}) \times 14 = 0.025 \times 14 = 0.35\ \mathrm{g} \)
(v) प्रतिशत नाइट्रोजन
\( \%N = \frac{0.35}{0.50}\times100 = 70\% \)
✅ अतः यौगिक में नाइट्रोजन = 70%
क्या आप जानते हैं?
✅ केजेलडाल विधि में कार्बनिक नाइट्रोजन को अंततः अमोनिया में बदलकर परिमाणात्मक रूप से मापा जाता है।
✅ ऐसे प्रश्नों में अम्ल-क्षार उदासीनीकरण का स्टॉइकियोमेट्री (mole ratio) सही रखना सबसे महत्वपूर्ण कदम होता है।
Q.34 कैरियस आकलन में 0.3780 g कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0.5740 g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ। यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
✅ यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता = 37.57% (लगभग)
व्याख्या – Step by Step
(i) दिए गए आँकड़े
यौगिक का द्रव्यमान = 0.3780 g
AgCl का द्रव्यमान = 0.5740 g

(ii) AgCl से Cl का द्रव्यमान निकालें
आणविक द्रव्यमान:
AgCl = 143.5
Cl = 35.5
तो,
143.5 g AgCl में Cl = 35.5 g
0.5740 g AgCl में Cl:
Cl का द्रव्यमान =35.5/143.5×0.5740=0.142" g " "(लगभग)

(iii) प्रतिशत क्लोरीन
%Cl = (Cl का द्रव्यमान / यौगिक का द्रव्यमान) ×100
=0.142/0.3780×100=37.57%
क्या आप जानते हैं?
✅ कैरियस विधि में हैलोजन का आकलन प्रायः सिल्वर हैलाइड (AgCl/AgBr/AgI) के द्रव्यमान से किया जाता है।
✅ इस प्रकार के प्रश्नों में सबसे महत्वपूर्ण कदम है: “अवक्षेप से तत्व का द्रव्यमान” सही अनुपात से निकालना।
Q.34 कैरियस आकलन में 0.3780 g कार्बनिक क्लोरो यौगिक से 0.5740 g सिल्वर क्लोराइड प्राप्त हुआ। यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
✅ यौगिक में क्लोरीन की प्रतिशतता = 37.57% (लगभग)
व्याख्या – Step by Step
(i) दिए गए आँकड़े
यौगिक का द्रव्यमान = 0.3780 g
AgCl का द्रव्यमान = 0.5740 g

(ii) AgCl से Cl का द्रव्यमान निकालें
आणविक द्रव्यमान:
AgCl = 143.5
Cl = 35.5
तो,
143.5 g AgCl में Cl = 35.5 g
0.5740 g AgCl में Cl:
Cl का द्रव्यमान =35.5/143.5×0.5740=0.142" g " "(लगभग)

(iii) प्रतिशत क्लोरीन
%Cl = (Cl का द्रव्यमान / यौगिक का द्रव्यमान) ×100
=0.142/0.3780×100=37.57%
क्या आप जानते हैं?
✅ कैरियस विधि में हैलोजन का आकलन प्रायः सिल्वर हैलाइड (AgCl/AgBr/AgI) के द्रव्यमान से किया जाता है।
✅ इस प्रकार के प्रश्नों में सबसे महत्वपूर्ण कदम है: “अवक्षेप से तत्व का द्रव्यमान” सही अनुपात से निकालना।
Q.35 कैरियस विधि द्वारा सल्फर के आकलन में 0.468 g सल्फरयुक्त कार्बनिक यौगिक से 0.668 g बेरियम सल्फेट प्राप्त हुआ। दिए गए कार्बनिक यौगिक में सल्फर की प्रतिशतता की गणना कीजिए।
उत्तर
✅ यौगिक में सल्फर की प्रतिशतता = 19.60% (लगभग)
व्याख्या – Step by Step
(i) दिए गए आँकड़े
कार्बनिक यौगिक का द्रव्यमान = 0.468 g
प्राप्त BaSO₄ का द्रव्यमान = 0.668 g

(ii) BaSO₄ से S का द्रव्यमान निकालें
मोलर द्रव्यमान:
BaSO₄ = 233 g mol⁻¹
S = 32 g mol⁻¹
अर्थात
233 g BaSO₄ में S = 32 g
तो 0.668 g BaSO₄ में S:
S का द्रव्यमान =32/233×0.668=0.0917" g " (लगभग)

(iii) प्रतिशत सल्फर
%S =(S का द्रव्यमान /यौगिक का द्रव्यमान) ×100
%S=0.0917/0.468×100=19.60%
क्या आप जानते हैं?
✅ कैरियस विधि में सल्फर को अंततः सल्फेट में बदलकर BaSO₄ अवक्षेप के रूप में मापा जाता है।
✅ ऐसे प्रश्नों में मुख्य ट्रिक है: “अवक्षेप के द्रव्यमान से तत्व का द्रव्यमान” सही अनुपात से निकालना।
Q.36: CH₂=CH–CH₂–CH₂–C≡CH कार्बनिक यौगिक में C₂–C₃ आबन्ध किन संकरित कक्षकों के युग्म से निर्मित होता है?
(क) sp–sp² (ख) sp–sp³ (ग) sp²–sp³ (घ) sp³–sp³
उत्तर
✅ सही विकल्प: (ग) sp²–sp³
व्याख्या – Step by Step
👉 यौगिक है: CH₂=CH–CH₂–CH₂–C≡CH
कार्बन क्रमांकन करें:
C₁H₂ = C₂H – C₃H₂ – C₄H₂ – C₅ ≡ C₆H
अब C₂–C₃ आबन्ध देखें:
C₂ डबल बॉन्ड (C₁=C₂) में है, इसलिए C₂ की संकरण अवस्था sp² होगी।
C₃ एकल आबन्धों वाला संतृप्त कार्बन है (C₂–C₃–C₄ और 2H), इसलिए C₃ की संकरण अवस्था sp³ होगी।
इसलिए C₂–C₃ σ-आबन्ध बनेगा sp² और sp³ कक्षकों के अतिव्यापन से।
✅ अतः सही युग्म: sp²–sp³
क्या आप जानते हैं?
✅ डबल बॉन्ड वाला कार्बन प्रायः sp² होता है।
✅ ट्रिपल बॉन्ड वाला कार्बन प्रायः sp होता है।
✅ केवल एकल आबन्धों वाला संतृप्त कार्बन सामान्यतः sp³ होता है।
Q.37 किसी कार्बनिक यौगिक में लासेन (Lassaigne) परीक्षण द्वारा नाइट्रोजन की जाँच में प्रुशियन ब्लू रंग निम्नलिखित में से किसके कारण प्राप्त होता है?
(क) Na₄[Fe(CN)₆]
(ख) Fe₄[Fe(CN)₆]₃
(ग) Fe₂[Fe(CN)₆]
(घ) Fe₃[Fe(CN)₆]₄
उत्तर
✅ सही विकल्प: (ख) Fe₄[Fe(CN)₆]₃
व्याख्या – Step by Step
लासेन निष्कर्ष में नाइट्रोजन होने पर सोडियम साइनाइड (NaCN) बनता है।
यह FeSO₄ के साथ अभिक्रिया करके फेरोसाइनाइड आयन [Fe(CN)₆]4− देता है।
अम्लीकरण/ऑक्सीकरण की स्थिति में Fe³⁺ आयन उपस्थित होते हैं।
Fe³⁺ और [Fe(CN)₆]4− से फेरिक फेरोसाइनाइड बनता है, जिसे प्रुशियन ब्लू कहते हैं:
Fe₄[Fe(CN)₆]₃
इसी यौगिक के कारण गहरा नीला (Prussian blue) रंग दिखाई देता है।
क्या आप जानते हैं?
✅ लासेन परीक्षण में नीला रंग नाइट्रोजन की उपस्थिति का बहुत प्रसिद्ध संकेत है।
✅ यदि सोडियम संलयन ठीक से न हो, तो नाइट्रोजन होते हुए भी नीला रंग कमजोर या अनुपस्थित मिल सकता है।
Q.38 निम्नलिखित कार्बधनायनों में से कौन-सा सबसे अधिक स्थायी है?
(क) (CH₃)₃C–CH₂⁺
(ख) (CH₃)₃C⁺
(ग) CH₃CH₂CH₂⁺
(घ) CH₃CH⁺CH₂CH₃
उत्तर
✅ सबसे अधिक स्थायी कार्बधनायन: (ख) (CH₃)₃C⁺ (टर्शियरी कार्बधनायन)
व्याख्या – Step by Step
(i) कार्बधनायन स्थिरता का सामान्य क्रम
👉 3° > 2° > 1° > मिथाइल
(कारण: +I प्रभाव और हाइपरसंयुग्मन)

(ii) विकल्पों की पहचान
(क) (CH₃)₃C–CH₂⁺ = नियोपेंटाइल प्रकार, वास्तविक धनावेश CH₂⁺ पर है, यानी प्राथमिक (1°)
(ख) (CH₃)₃C⁺ = टर्शियरी (3°)
(ग) CH₃CH₂CH₂⁺ = प्राथमिक (1°)
(घ) CH₃CH⁺CH₂CH₃ = द्वितीयक (2°)

(iii) क्यों (ख) सबसे स्थायी है?
👉 (CH₃)₃C⁺ में धनावेशित कार्बन से जुड़े तीन ऐल्किल समूह होते हैं।
👉 ये +I प्रभाव से इलेक्ट्रॉन घनत्व धकेलते हैं और धनावेश को कुछ हद तक स्थिर करते हैं।
👉 साथ ही अधिक हाइपरसंयुग्मन संभव होता है।

(iv) निष्कर्ष
✅ टर्शियरी कार्बधनायन होने के कारण (CH₃)₃C⁺ सबसे अधिक स्थायी है।
क्या आप जानते हैं?
✅ नियोपेंटाइल कार्बधनायन (CH₃)₃C–CH₂⁺ प्राथमिक होने के कारण काफी अस्थिर माना जाता है।
✅ कार्बधनायन की स्थिरता अभिक्रियाओं में पुनर्विन्यास (rearrangement) की प्रवृत्ति भी तय करती है।
Q.39 कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शोधन की सर्वोत्तम तथा आधुनिकतम तकनीक कौन-सी है?
(क) क्रिस्टलन (ख) आसवन (ग) उर्ध्वपातन (घ) क्रोमैटोग्राफी
उत्तर
✅ सही विकल्प: (घ) क्रोमैटोग्राफी
व्याख्या – Step by Step
👉 क्रोमैटोग्राफी पृथक्करण, शोधन और शुद्धता-जाँच तीनों कार्यों के लिए अत्यंत प्रभावी तकनीक है।
👉 यह स्थिर प्रावस्था और गतिशील प्रावस्था के बीच अवयवों के अलग-अलग व्यवहार पर आधारित होती है।
👉 बहुत कम मात्रा वाले मिश्रणों में भी अच्छे परिणाम देती है।
👉 आधुनिक प्रयोगशालाओं में TLC, कॉलम क्रोमैटोग्राफी, HPLC, GC जैसी उन्नत तकनीकें व्यापक रूप से उपयोग होती हैं।
इसलिए इसे कार्बनिक यौगिकों के लिए सबसे उन्नत और उपयोगी तकनीक माना जाता है।
क्या आप जानते हैं?
✅ दवाइयों, खाद्य पदार्थों और जैव-नमूनों के विश्लेषण में क्रोमैटोग्राफी अनिवार्य तकनीक बन चुकी है।
✅ HPLC और GC से बहुत सूक्ष्म अशुद्धियाँ भी पहचानी जा सकती हैं।
Q.40: CH₃CH₂I + KOH(aq) → CH₃CH₂OH + KI अभिक्रिया को नीचे दिए गए प्रकार में वर्गीकृत कीजिए—
(क) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
(ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
(ग) विलोपन
(घ) संकलन
उत्तर
✅ सही विकल्प: (ख) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
व्याख्या – Step by Step
👉 CH₃CH₂I (एथिल आयोडाइड) में I एक अच्छा निर्गामी समूह (वह समूह जो अभिक्रिया के दौरान अणु से निकल जाता है) है।
👉 KOH(aq) से OH⁻ आयन मिलता है, जो नाभिकस्नेही होता है।
👉 OH⁻, कार्बन पर आक्रमण करके I⁻ को हटाता है।
👉 यानी एक समूह (I) हटता है और उसकी जगह दूसरा समूह (OH) आ जाता है।
इसलिए यह स्पष्ट रूप से नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया है।
क्या आप जानते हैं?
✅ जलीय KOH प्रायः प्रतिस्थापन को बढ़ावा देता है, जबकि ऐल्कोहॉलिक KOH अक्सर विलोपन को बढ़ावा देता है।
✅ प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड (जैसे CH₃CH₂I) में यह अभिक्रिया सामान्यतः SN2 मार्ग से होती है।

📘 Chapter FAQs: Organic Chemistry – Some Basic Principles and Techniques (Class 11 Chemistry)

Quick revision for NCERT Class 11 Chemistry Chapter 12 questions on IUPAC nomenclature, electronic effects, reaction intermediates, purification methods, and qualitative/quantitative organic analysis.

सबसे पहले longest carbon chain चुनते हैं, फिर numbering ऐसी देते हैं कि principal functional group, multiple bond और substituents को lowest possible locants मिलें। Tie होने पर first point of difference rule और फिर alphabetical order लागू किया जाता है।
Nucleophile electron pair donor होता है (electron-rich), जबकि electrophile electron pair acceptor होता है (electron-deficient)। उदाहरण: OH, CN nucleophile हैं; H+, NO2+, BF3 electrophile हैं।
−I समूह electron density खींचते हैं, इसलिए कई anions (जैसे alkoxide/carbanion) को stabilize कर सकते हैं। +I समूह electron density धकेलते हैं, जो carbocation को stabilize करने में मदद करते हैं लेकिन कई anions को destabilize कर सकते हैं।
सामान्य क्रम: 3° > 2° > 1° > methyl। कारण: +I effect और hyperconjugation। Alkyl groups धनावेशित कार्बन की electron deficiency को कम करते हैं।
Crystallisation solubility difference पर आधारित है (मुख्यतः solids के लिए), distillation boiling point difference पर (liquids के लिए), और chromatography stationary vs mobile phase में differential affinity पर आधारित advanced separation technique है।
Steam distillation में कुल vapour pressure = p(organic) + p(water) होता है। जब यह योग atmospheric pressure के बराबर हो जाता है, मिश्रण उबलता है। इसलिए organic compound अपने normal boiling point से कम ताप पर distill हो जाता है।
Sodium fusion extract में CN और S2− interfere कर सकते हैं। HNO3 से treatment करने पर ये हट जाते हैं, ताकि AgNO3 केवल halide ions के साथ सही precipitate दे और false result न आए।
Carius method सामान्यतः halogens और sulphur के quantitative estimation में उपयोग होती है (AgX या BaSO4 precipitate के माध्यम से)। Kjeldahl method nitrogen estimation के लिए उपयोग होती है, जहाँ nitrogen को NH3 में बदलकर acid-base titration से calculate किया जाता है।
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