Class 11 Chemistry Chapter 9 Notes – Hydrocarbons ( हाइड्रोकार्बन ) (Hindi Medium)

हाइड्रोकार्बन ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं तथा
विभिन्न प्रकार के होते हैं। कार्बन–कार्बन आबंधों की प्रकृति के आधार पर
इन्हें मुख्यतः तीन समूहों में वर्गीकृत किया
गया है —

  1. संतृप्त
  2. असंतृप्त
  3. ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन

एल्केन

एल्केन का सामान्य सूत्र
CnH2n+2 होता है, जहाँ
n = कार्बन परमाणुओं की संख्या।

कार्बन परमाणु से जुड़े हुए अन्य
कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर
कार्बन परमाणुओं को
प्राथमिक (1°),
द्वितीयक (2°),
तृतीयक (3°) तथा
चतुर्थक (4°)
कार्बन परमाणु कहते हैं।

एल्केन को बनाने की विधियाँ

एल्केन के मुख्य स्रोत
पेट्रोलियम तथा
प्राकृतिक गैस हैं।
फिर भी एल्केनों को निम्न विधियों द्वारा बनाया जा सकता है —

  1. असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों से
  2. एल्किल हैलाइड से
  3. कार्बोक्सिलिक अम्लों से

    1. सोडा लाइम से
    2. कोल्बे की विद्युत-अपघटनीय विधि

(1) असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों से

हाइड्रोजन गैस सूक्ष्म विभाजित उत्प्रेरक
जैसे प्लैटिनम, पैलेडियम तथा निकेल की
उपस्थिति में एल्कीन के साथ योग करके
एल्केन बनाती है।
इस प्रक्रिया को हाइड्रोजनीकरण कहते हैं।

ये उत्प्रेरक हाइड्रोजन को अपनी सतह पर अधिशोषित करते हैं और
हाइड्रोजनीकरण की अभिक्रिया को सक्रिय करते हैं।
प्लैटिनम तथा पैलेडियम कमरे के ताप पर ही अभिक्रिया को उत्प्रेरित कर देते हैं,
परन्तु निकेल उत्प्रेरक के लिए
अपेक्षाकृत उच्च ताप तथा दाब की आवश्यकता होती है।

CH2 = CH2 + H2
  (Pt / Pd / Ni) →
CH3 − CH3

CH3 − CH = CH2 + H2
  (Pt / Pd / Ni) →
CH3 − CH2 − CH3

(2) एल्किल हैलाइड से

R − Cl + H2
  (Zn / HCl) →
R − H + ZnCl2

Note :
वुर्ट्ज अभिक्रिया —
एल्किल हैलाइड के दो अणु शुष्क ईथर में
Na के साथ अभिक्रिया करके
हाइड्रोकार्बन बनाते हैं।
इस अभिक्रिया द्वारा कार्बन शृंखला की वृद्धि होती है।

  • जब दो समान एल्किल हैलाइड लिये जाएँ —

R − X + 2Na + X − R
  (शुष्क ईथर) →
R − R + 2NaX

CH3 − I + 2Na + I − CH3
  (शुष्क ईथर) →
CH3 − CH3 + 2NaI

  • जब दो असमान एल्किल हैलाइड लिये जाएँ तो
    तीन प्रकार के एल्केन का मिश्रण प्राप्त होता है।

R − X + R’ − X + 2Na
  (शुष्क ईथर) →
(R − R) + (R’ − R’) + (R − R’) + 2NaX

कार्बोक्सिलिक अम्लों से अल्केन

  1. सोडा लाइम से
  2. कोल्बे की विद्युत-अपघटनी विधि
1. सोडा लाइम के साथ अभिक्रिया

कार्बोक्सिलिक अम्लों के
सोडियम लवण को
सोडा लाइम (NaOH + CaO)
के मिश्रण के साथ गर्म करने पर कार्बोक्सिलिक अम्ल से
एक कार्बन परमाणु कम
वाला अल्केन प्राप्त होता है।

कार्बोक्सिलिक अम्ल से
कार्बन डाइऑक्साइड के हटने को
विकर्बोक्सिलीकरण कहते हैं।

R − COO Na+
  Sodalime (NaOH + CaO) →
  R − H + Na2CO3

कोल्बे की विद्युत-अपघटनी विधि

कार्बोक्सिलिक अम्लों के
सोडियम लवणों के जलीय विलयन का
विद्युत-अपघटन करने पर
सम संख्या में कार्बन परमाणु
वाले अल्केन प्राप्त होते हैं।

2R − COO Na + 2H2O →
R − R + 2CO2 + H2 + 2NaOH

क्रिया विधि (Mechanism)

मूल लवण अभिक्रिया

RCOONa → RCOO− + Na+

H2O → H+ + OH−

एनोड पर

2RCOO− → 2RCOO• + 2e−

2RCOO• → 2R• + 2CO2 ↑

2R• → R − R

कैथोड पर

2H+ + 2e− → H2 ↑

भौतिक गुण

  • एल्केन अणुओं में C–C तथा C–H आबंध
    सहसंयोजक होते हैं तथा
    कार्बन एवं हाइड्रोजन परमाणुओं की
    विद्युत ऋणात्मकता में बहुत कम अंतर के कारण
    लगभग सभी एल्केन अध्रुवीय होते हैं।
    इनके मध्य दुर्बल वान-डर-वाल्स बल पाए जाते हैं।
  • वान-डर-वाल्स बलों के कारण एल्केनों की
    भौतिक अवस्था बदलती रहती है।
    सामान्यतः C1 से C4 तक गैस,
    C5 से C17 तक द्रव तथा
    C18 या उससे अधिक कार्बन वाले एल्केन
    ठोस होते हैं।
  • ये रंगहीन तथा गंधहीन होते हैं।

क्वथनांक का प्रभाव

CH4    
CH3 − CH3    
CH3 − CH2 − CH3

(Methane)     (Ethane)     (Propane)

Molecular mass = 16u    
Molecular mass = 30u    
Molecular mass = 44u

(b.p.: 111.0 K)    
(b.p.: 184.4 K)    
(b.p.: 230.9 K)

एल्केनों का क्वथनांक
कार्बन शृंखला की संख्या बढ़ने पर बढ़ता है।

Example

पेन्टेन के तीन समावयवी एल्केन
पेन्टेन,
2-मेथिलब्यूटेन तथा
2,2-डाइमेथिलप्रोपेन
के क्वथनांक भिन्न होते हैं।
पेन्टेन में पाँच कार्बन परमाणुओं की
सीधी शृंखला होने के कारण
इसका उच्च क्वथनांक 309.1 K होता है,
जबकि 2,2-डाइमेथिलप्रोपेन
का क्वथनांक 282.5 K होता है।

CH3 − (CH2)3 − CH3

(Pentane)    b.p. = 309.1 K

जल में विलेयता

एल्केन अध्रुवीय प्रकृति के होते हैं,
जिस कारण ये केवल अध्रुवीय विलायकों जैसे
बेंजीन,
ईथर आदि में घुलते हैं
तथा जल में अविलेय होते हैं।

रासायनिक गुणधर्म

अल्केन सामान्यतः
निष्क्रिय होते हैं क्योंकि
इनमें केवल σ-बन्ध होते हैं।
इसलिए ये सामान्य परिस्थितियों में कम अभिक्रियाशील होते हैं।
विशेष परिस्थितियों में अल्केन निम्न अभिक्रियाएँ करते हैं।

1. प्रतिस्थापन अभिक्रिया

वे अभिक्रियाएँ जिनमें अल्केन के
हाइड्रोजन परमाणु का स्थान किसी अन्य
परमाणु द्वारा ले लिया जाता है,
प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहलाती हैं।

उदाहरण के लिए मीथेन का क्लोरीनीकरण
(हैलोजनीकरण)।

यह अभिक्रिया सामान्यतः
उच्च ताप (573–773 K) या
सूर्य के प्रकाश / UV light
की उपस्थिति में होती है।

CH4 + Cl2
 UV light →
CH3Cl + HCl

CH3Cl → CH2Cl2 →
CHCl3 → CCl4

  • हैलोजन के साथ अभिक्रिया की गति का क्रम :
    F2 > Cl2 > Br2 > I2
  • हाइड्रोजन के प्रतिस्थापन की प्रवृत्ति का क्रम :
    3° > 2° > 1°
  • क्लोरीनीकरण प्रायः प्रबल तथा
    अनियंत्रित होता है।

आयोडीनीकरण बहुत धीमी अभिक्रिया है।
यह एक उष्माग्राही अभिक्रिया है।
इसलिए इसे ऑक्सीकारक जैसे
HIO3 या
HNO3
की उपस्थिति में किया जाता है।

CH4 + I2 ⇌ CH3I + HI

5HI + HIO3 → 3I2 + 3H2O

हैलोजनीकरण मुक्त मूलक शृंखला क्रियाविधि

  1. प्रारंभ
  2. संवर्धन
  3. समापन

प्रारंभ (Initiation)

यह अभिक्रिया वायु तथा प्रकाश की उपस्थिति में
क्लोरीन अणु के
समरूप विखंडन (Homolysis)
से प्रारंभ होती है।

Cl2  
hν
  →  
Cl• + Cl•

संवर्धन (Propagation)

क्लोरीन मुक्त मूलक मीथेन अणु पर आक्रमण करके
C–H बंध को तोड़ता है और
HCl बनाते हुए
मेथिल मुक्त मूलक बनाता है।

CH4 + Cl•
  hν →
CH3• + HCl

मेथिल मुक्त मूलक क्लोरीन के दूसरे अणु पर आक्रमण करता है
जिससे CH3Cl
तथा एक नया क्लोरीन मुक्त मूलक बनता है।

CH3• + Cl2
  →  
CH3Cl + Cl•

इसी प्रकार आगे की अभिक्रियाएँ होती हैं —

CH3Cl + Cl•
  hν →
CH2Cl• + HCl

CH2Cl• + Cl2
  →  
CH2Cl2 + Cl•

समापन (Termination)

जब दो मुक्त मूलक आपस में अभिक्रिया कर लेते हैं
तब शृंखला समाप्त हो जाती है।

CH3• + CH3•
  →  
CH3 − CH3

Cl• + Cl•
  →  
Cl2

CH3• + Cl•
  →  
CH3Cl

2. दहन

  • एल्केन वायु तथा ऑक्सीजन की उपस्थिति में
    गर्म करने पर पूर्णतः ऑक्सीकरण होकर
    CO2 तथा
    H2O बनाते हैं तथा साथ ही
    अधिक मात्रा में ऊष्मा निकलती है।
  • CH4(g) + 2O2(g) →
    CO2(g) + 2H2O(l)
       ΔH° = −890 kJ mol−1

  • अधिक मात्रा में ऊष्मा निकलने के कारण
    एल्केनों को
    ईंधन के रूप में भी काम में लिया जाता है।
  • किसी एल्केन के लिए दहन अभिक्रिया सामान्यतः निम्नलिखित होती है —
  • CnH2n+2 +
    (3n+1)/2 O2
    →
    nCO2 + (n+1)H2O

  • एल्केनों का अपर्याप्त वायु या
    डाइऑक्सीजन द्वारा अपूर्ण दहन
    कार्बन काजल (Black) बनाता है,
    जिसका उपयोग स्याही, मुद्रण स्याही (प्रिंटर स्याही) के
    काले वर्णक (pigments)
    एवं भरक (filler) के रूप में होता है।
  • CH4(g) + O2(g)
    → C(s) + 2H2O(l)

समावयवीकरण (Isomerisation)

n-अल्केन को
निर्जल एल्युमिनियम क्लोराइड तथा
हाइड्रोजन क्लोराइड गैस की उपस्थिति में
गर्म करने पर वे अपने शाखित श्रृंखला वाले अल्केन
में परिवर्तित हो जाते हैं। इस अभिक्रिया को
समावयवीकरण कहते हैं।

CH3 − CH2 − CH2 − CH3
  AlCl3 / HCl, 573 K →
CH3 − CH(CH3) − CH3

एरोमैटीकरण या एरोमैटाइजेशन

छह या उससे अधिक कार्बन परमाणु वाले
n-अल्केन को
क्रोमियम ऑक्साइड, मोलिब्डेनम ऑक्साइड
अथवा वैनेडियम ऑक्साइड की उपस्थिति में
773 K से 10 atm दाब पर गर्म करने पर
डीहाइड्रोजनीकरण होता है तथा
बेंजीन या उसके व्युत्पन्न प्राप्त होते हैं।

इस अभिक्रिया को
एरोमैटीकरण (Aromatization)
या एरोमैटाइजेशन कहते हैं।

n-Hexane
  Cr2O3 / V2O5 / MoO3
  773 K →
Benzene

भाप के साथ अभिक्रिया

मीथेन को
निकेल उत्प्रेरक की उपस्थिति में
लगभग 1273 K पर
जल वाष्प के साथ गर्म करने पर
कार्बन मोनोऑक्साइड तथा
हाइड्रोजन प्राप्त होते हैं।

यह विधि डाइहाइड्रोजन के
औद्योगिक उत्पादन में प्रयुक्त होती है।

CH4 + H2O
  Ni / Δ →
CO + 3H2

संरूपण (Conformation)

एल्केन में C–C एकल आबंध के चारों ओर
e− का मुक्त घूर्णन होता है।
इस घूर्णन के कारण त्रिविम में अणुओं की विभिन्न
त्रिविमीय विन्यास होते हैं।
जिस कारण विभिन्न
ज्यामितीय व्यवस्थाओं
में परिवर्तन होते रहते हैं।

ऐसे परमाणुओं की विभिन्न व्यवस्था जो
C–C एकल आबंध के चारों ओर घूर्णन के कारण
एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाती हैं,
संरूपण समावयव या
Rotamers कहलाते हैं।

एथेन के संरूपण

एथेन के अनेक संरूपण होते हैं।
इनमें से दो संरूपण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं —

  1. ग्रहण (Eclipsed)
  2. सांतारित (Staggered)

(1) ग्रहण :
इस संरूपण में दोनों कार्बन के H परमाणु
एक-दूसरे के ठीक सामने होते हैं।

(2) सांतारित :
इस संरूपण में H परमाणु
दूसरे कार्बन के हाइड्रोजन परमाणुओं से
अधिकतम दूरी पर होते हैं।

इनके अतिरिक्त कुछ मध्यवर्ती संरूपण
विकर्णीय (skew)
संरूपण कहलाते हैं।

Note :
ग्रहण तथा सांतारित संरूपणों को
सॉहॉर्स प्रक्षेप तथा
न्यूमैन प्रक्षेप
द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

संरूपणों का आपेक्षिक स्थायित्व

  • न्यूनतम प्रतिकर्षण बल,
    न्यूनतम ऊर्जा तथा अणु का
    अधिकतम स्थायित्व होता है।
  • ग्रहण संरूप में
    e− के अधिक प्रतिकर्षण के कारण
    यह कम स्थायी होता है।
  • सांतारित संरूप में
    e− के न्यूनतम प्रतिकर्षण के कारण
    यह अधिक स्थायी होता है।

एल्कीन

एल्कीनों की विशेषताएँ
  • दि–आबंधयुक्त असंतृप्त हाइड्रोकार्बन
  • इनका सामान्य सूत्र
    CnH2n होता है।
  • प्रथम सदस्य
    एथीन
    अथवा
    इथिलीन
    (C2H4) है।
  • एल्कीनों को
    ओलेफिन
    (तैलीय यौगिक बनाने वाले) भी कहते हैं।
  • एल्कीनों में
    C = C
    द्वि-बंध होता है जिसमें एक
    σ (सिग्मा) बन्ध
    तथा एक
    π (पाई) बन्ध
    होता है।
  • π-बन्ध
    अपेक्षाकृत कमजोर होता है, इसलिए
    एल्कीन
    इलेक्ट्रोफिलिक अभिक्रियाओं
    में आसानी से भाग लेते हैं।
  • एल्कीन, इलेक्ट्रोफिलिक अभिकारकों के साथ अभिक्रिया कर
    एकल बन्धयुक्त यौगिक
    बनाते हैं।

समावयवता

एल्कीनों में संरचनात्मक एवं
ज्यामितीय समावयवता पायी जाती है।

संरचनात्मक समावयवता

C4H8
अणुसूत्र वाली एल्कीनों को तीन प्रकार से लिखा जा सकता है —

संरचना नाम
CH2 = CH − CH2 − CH3 ब्यूट-1-ईन
CH3 − CH = CH − CH3 ब्यूट-2-ईन
CH2 = C(CH3) − CH3 2-मेथिलप्रोप-1-ईन
  1. संरचना I एवं III तथा II एवं III
    शृंखला समावयवता दर्शाती हैं।
  2. संरचना I एवं II
    स्थिति समावयवता दर्शाती हैं।

ज्यामितीय समावयवता (त्रिविम समावयवता)

  • त्रिविम समावयवता जिसमें दो समान परमाणु या समूह
    एक ही ओर स्थित हों,
    उसे समपक्ष (cis) कहते हैं।
  • जबकि जब समान परमाणु या समूह
    विपरीत ओर स्थित हों,
    उसे विपक्ष (trans) समावयव कहते हैं।

उदाहरण : ब्यूट-2-ईन में
ज्यामितीय समावयवता पायी जाती है —

समपक्ष (cis) विपक्ष (trans)
cis-But-2-ene trans-But-2-ene
  • समपक्ष ब्यूट-2-ईन ध्रुवीय होता है।
  • जबकि विपक्ष ब्यूट-2-ईन
    अध्रुवीय होता है।

एल्कीनों को बनाने की विधियाँ

  1. एल्काइनों से
  2. ऐल्किल हैलाइड से
  3. Vic-डाइहैलाइड से
  4. एल्कोहल के निर्जलीकरण से

(i) एल्काइनों से

एल्काइन को
H2 के साथ
पैलेडियम चारकोल (Pd/C)
की उपस्थिति में आंशिक अपचयन कराने पर
समपक्ष ज्यामिति वाले
एल्कीन प्राप्त होते हैं।

लिंडलर अभिकर्मक : आंशिक रूप से निष्क्रिय पैलेडियम चारकोल (Pd/C)

RC ≡ CR + H2
  Pd/C →
RCH = CHR

Note : एल्काइन को
Na / द्रव NH3
के साथ अपचयन करने पर
विपक्ष समावयव वाले एल्कीन बनते हैं।

RC ≡ CR + H2
  Na / द्रव NH3 →
RCH = CHR

(ii) ऐल्किल हैलाइड से

ऐल्किल हैलाइड (R–X) को
ऐल्कोहॉलिक पोटाश (alc. KOH)
की उपस्थिति में गर्म करने पर
HX के विलोपन से
एल्कीन बनते हैं।

इस अभिक्रिया को
डीहाइड्रोहैलोजनीकरण कहते हैं।

Note : यह एक
β-विलोपन अभिक्रिया है
जिसमें β-कार्बन से हाइड्रोजन का विलोपन होता है।

RCH2CH2X
  alc. KOH / Δ →
RCH = CH2 + HX

(iii) Vic-डाइहैलाइड से

Vic-डाइहैलाइड वे डाइहैलाइड होते हैं
जिनमें दो निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं पर
दो हैलोजन परमाणु उपस्थित होते हैं।

Vic-डाइहैलाइड को
Zn धातु के साथ अभिक्रिया कराने पर
ZnX2 के विलोपन से
एल्कीन प्राप्त होते हैं।

CH2Br − CH2Br + Zn →
CH2 = CH2 + ZnBr2

(iv) एल्कोहॉल का निर्जलीकरण

CH3CH2OH
 
Conc. H2SO4
  443K →
CH2 = CH2 + H2O

(एथिल एल्कोहॉल)        (एथीन)

Note :
सेयज़ेफ का नियम —
यदि निर्जलीकरण के कारण दो प्रकार की
एल्कीन बनने की संभावना हो,
तो वह एल्कीन अधिक बनती है जिसमें
द्विबंधित कार्बन पर अधिक प्रतिस्थापन
होता है।

CH3 − CH2 − CH(OH) − CH3
 
Conc. H2SO4
(433–443K)
→

CH3 − CH = CH − CH3

2-ब्यूटीन (80%)

CH3 − CH2 − CH2 = CH2

1-ब्यूटीन (20%)

भौतिक गुणधर्म

प्रथम तीन सदस्य गैस, अगले चौदह सदस्य
द्रव तथा उससे अधिक कार्बन संख्या वाले सदस्य
ठोस होते हैं।

रासायनिक गुणधर्म

  1. H2 का संयोजन
  2. हैलोजन का संयोजन
  3. हाइड्रोजन हैलाइड (HX) का संयोजन
  4. ऑक्सीजन अपचयन
  5. बहुलकीकरण

(1) H2 का संयोजन

एल्कीन को सूक्ष्म पिसे हुए
Ni, Pd अथवा Pt की उपस्थिति में
H2 गैस के साथ गर्म करने पर
एल्केन बनते हैं।

CH2 = CH2 + H2
  Ni / Pd / Pt →
CH3 − CH3

(2) हैलोजन का संयोजन

जब एथीन की अभिक्रिया
ब्रोमीन के साथ करवाई जाती है,
तब Vic-डाइहैलाइड का निर्माण होता है।

इस अभिक्रिया में ब्रोमीन का
लाल-नारंगी रंग समाप्त हो जाता है।
इसलिए इस अभिक्रिया का उपयोग
हाइड्रोकार्बनों की असंतृप्तता
की जाँच के लिए किया जाता है।

CH2 = CH2 + Br2
  CCl4 →
CH2Br − CH2Br

Note : एल्कीन पर हैलोजन का योग
इलेक्ट्रोफिलिक योगात्मक अभिक्रिया
का उदाहरण है।

(3) हाइड्रोजन हैलाइड (HX) का संयोजन

  • हाइड्रोजन हैलाइड
    HCl, HBr, HI एल्कीनों से संयोग होकर
    एल्किल हैलाइड बनाते हैं।
  • हाइड्रोजन हैलाइड की अभिक्रियाशीलता का क्रम —
    HI > HBr > HCl

Note :
सममित एल्कीनों में
HBr की संयोजन अभिक्रिया —

CH2 = CH2 + HBr →
CH3 − CH2 − Br

CH3 − CH = CH − CH3 + HBr →
CH3 − CH2 − CH(Br) − CH3

असममित एल्कीनों पर HBr का संयोजन
(मार्कोनीकॉफ नियम)

मार्कोनीकॉफ नियम —
द्विबंधित कार्बन परमाणुओं पर आक्रमण करने वाला
ऋणात्मक भाग उस कार्बन से संयोजित होता है
जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो।

CH3 − CH = CH2 + HBr →

CH3 − CHBr − CH3

2-ब्रोमोप्रोपेन (अधिक)

CH3 − CH2 − CH2Br

1-ब्रोमोप्रोपेन (कम)

क्रियाविधि

HBr
इलेक्ट्रोफाइलिक अभिक्रिया में
H+ देता है,
जो द्विबंध पर आक्रमण करके
कार्बोकैटायन बनाता है।

CH3 − CH = CH2 + HBr →

CH3 − CH+ − CH3
   +    Br−

कार्बोकैटायनों का स्थायित्व —
2° > 1°

इसलिए द्वितीयक कार्बोकैटायन से अधिक उत्पाद बनेगा
और Br− के आक्रमण से
2-ब्रोमोप्रोपेन
मुख्य उत्पाद प्राप्त होगा।

प्रतिमार्कोनीकॉफ संयोजन
(परॉक्साइड प्रभाव / खाराश प्रभाव)

  • परॉक्साइड
    (H2O2 या R−O−O−R) की उपस्थिति में
    असममित एल्कीनों
    (जैसे प्रोपीन) में
    HBr का संयोजन
    प्रतिमार्कोनीकॉफ नियम
    के अनुसार होता है।
  • यह प्रभाव केवल
    HBr के साथ होता है,
    HCl तथा
    HI के साथ नहीं।

क्रियाविधि

CH3 − CH = CH2
+ Br• + H•

↓

CH3 − CHBr − CH2•
      
CH3 − CH• − CH2Br

(कम स्थायी प्राथमिक मुक्त मूलक)
      
(अधिक स्थायी द्वितीयक मुक्त मूलक)

↓

CH3 − CHBr − CH3
      
CH3 − CH2 − CH2Br

सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल का संयोजन (मार्कोवनीकॉफ नियम)

एल्कीन की अभिक्रिया
ठंडे सांद्र H2SO4
के साथ कराने पर
ऐल्किल हाइड्रोजन सल्फेट बनते हैं।

CH3 − CH = CH2 + H2SO4 →
CH3 − CH(OSO3H) − CH3

(प्रोपिल हाइड्रोजन सल्फेट)

जल का संयोजन (मार्कोवनीकॉफ नियम)

एल्कीन में
जल (H2O) का संयोजन
अम्लीय माध्यम (H+) में कराने पर
अल्कोहल बनते हैं।

CH3 − C(CH3) = CH2 + H2O
  H+ →
(CH3)3C − OH

(2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल)

(4) ओजोनोलिसिस

CH3CH = CH2 + O3 →
ओजोनाइड →
Zn + H2O →
CH3CHO + HCHO

(एथेनल)     (मेथेनल)

(CH3)2C = CH2 + O3 →
ओजोनाइड →
Zn + H2O →
(CH3)2CO + HCHO

(प्रोपेन-2-ओन)

(5) बहुलकीकरण

n(CH2 = CH2)
  उच्च ताप / उच्च दाब / उत्प्रेरक →
(−CH2 − CH2−)n

पॉलीएथीन

एल्काइन

  • एल्काइन का सामान्य सूत्र
    CnH2n−2 होता है।
  • एल्काइन का प्रथम सदस्य
    एथाइन (CH ≡ CH) है,
    जो एसीटिलीन नाम से भी जाना जाता है।
  • एसीटिलीन का उपयोग
    ऑक्सी-एसीटिलीन ज्वाला
    के रूप में धातुओं की वेल्डिंग के लिए किया जाता है।
    यह ज्वाला ऑक्सीजन गैस तथा एसीटिलीन को मिलाने से बनती है।

त्रि-आबंध की संरचना

  • एथाइन के प्रत्येक कार्बन परमाणु में
    sp संकरण होता है।
  • sp संकरित कक्षकों के सम्मुखी अतिव्यापन से
    कार्बन–कार्बन σ (सिग्मा) आबंध बनता है।
  • शेष sp संकरित कक्षक का अतिव्यापन
    हाइड्रोजन परमाणु के
    1s कक्षक से होकर
    C–H σ आबंध बनाता है।
  • H–C–C बंध कोण
    180° होता है,
    इसलिए एथाइन अणु
    रेखीय (Linear) होता है।
  • प्रत्येक कार्बन परमाणु के पास
    दो असंकरित
    p-कक्षक होते हैं।
  • ये p-कक्षक पार्श्व अतिव्यापन करके
    दो π (पाई) आबंध
    बनाते हैं।
  • इस प्रकार एथाइन में
    एक σ आबंध तथा
    दो π आबंध होते हैं।

नामकरण

सामान्य :
एल्काइन को एसीटिलीन के व्युत्पन्न के नाम से लिखा जाता है।

एल्काइन (CnH2n−2) श्रेणी के सामान्य तथा IUPAC नाम

n का मान सूत्र संरचना-सूत्र सामान्य नाम IUPAC नाम
2 C2H2 HC ≡ CH एसीटिलीन एथाइन
3 C3H4 CH3 − C ≡ CH मेथिल एसीटिलीन प्रोपाइन
4 C4H6 CH3CH2C ≡ CH एथिल एसीटिलीन ब्यूट-1-आइन
4 C4H6 CH3 − C ≡ C − CH3 डाइमेथिल एसीटिलीन ब्यूट-2-आइन

एल्काइन में समावयवता —
स्थिति समावयवता तथा
शृंखला समावयवता पायी जाती है।

विधियाँ

  1. कैल्सियम कार्बाइड से
  2. Vic-डाइहैलाइड से
  3. जेम डाइहैलाइड के डिहाइड्रोजनिकरण से

(1) कैल्सियम कार्बाइड से (औद्योगिक विधि)

CaCO3
  Δ →
CaO + CO2

CaO + 3C
  Δ →
CaC2 + CO

(कैल्सियम ऑक्साइड)     (कोक या कोयला)
    (कैल्सियम कार्बाइड)

CaC2 + 2H2O →
Ca(OH)2 + C2H2

(कैल्सियम कार्बाइड)     (एथाइन)

(2) Vic-डाइहैलाइड से

डाइहैलाइड की अभिक्रिया
ऐल्कोहॉलिक पोटेशियम हाइड्रॉक्साइड (Alc. KOH)
के साथ कराने पर उनका
डीहाइड्रोहैलोजनीकरण होता है।

डिहाइड्रोहैलोजनीकरण के एक चरण पूर्ण होने पर
ऐल्केनाइल हैलाइड प्राप्त होता है,
जो सोडामाइड के साथ अभिक्रिया करने पर
एल्काइन देता है।

CH2Br − CH2Br
  Alc. KOH →
CH2 = CHBr

CH2 = CHBr
  NaNH2 →
CH ≡ CH + NaBr + NH3

(3) जेम-डाइहैलाइड के डीहाइड्रोहैलोजनीकरण से

जेम डाइहैलाइड में दोनों हैलोजन
एक ही कार्बन परमाणु से जुड़े होते हैं।

जब जेम-डाइहैलाइड को
ऐल्कोहॉलिक KOH के साथ गर्म किया जाता है,
तब क्रमिक डीहाइड्रोहैलोजनीकरण से
एल्काइन प्राप्त होता है।

CH3CHCl2
  Alc. KOH →
CH2 = CHCl

CH2 = CHCl
  Alc. KOH →
CH ≡ CH

भौतिक गुणधर्म

  • एल्काइनों के भौतिक गुण
    एल्कीनों तथा
    एल्केनों के समान होते हैं।
    प्रथम तीन सदस्य
    गैस,
    अगले आठ सदस्य
    द्रव तथा
    शेष उच्चतर सदस्य
    ठोस होते हैं।
  • एथाइन की
    आणविक गंध होती है,
    जबकि शुद्ध अन्य सदस्य
    गंधहीन होते हैं।
  • एल्काइन
    जल से हल्के तथा
    जल में अविलेय होते हैं,
    परंतु कार्बनिक विलायकों जैसे
    ईथर,
    कार्बन टेट्राक्लोराइड
    तथा बेंजीन में
    विलेय होते हैं।
  • इनके गलनांक तथा
    क्वथनांक
    अणुभार के साथ बढ़ते जाते हैं।

रासायनिक गुण

  1. एल्काइन की अम्लीय प्रकृति
  2. योगात्मक अभिक्रियाएँ

    1. H2 के साथ योग
    2. HX के साथ योग
    3. X2 का योग
    4. जल का संयोजन
    5. बहुलकीकरण

(1) एल्काइन की अम्लीय प्रकृति

एल्काइन अम्लीय प्रकृति के होते हैं।
एथाइन के sp संकरणित कक्षक में
अधिक S-चरित्र (50%) होने के कारण
उसमें उच्च विद्युतऋणात्मकता होती है।

इसलिए C–H बन्ध में साझा इलेक्ट्रॉनों
के अपने ओर आकर्षण के कारण यह
H+ को पृथक कर देता है।
इसलिए टर्मिनल एल्काइन के हाइड्रोजन परमाणु
अम्लीय प्रकृति के होते हैं।

इस प्रकार की अभिक्रियाएँ एथाइन तथा प्रोपाइन में देखी जाती हैं,
इसलिए एल्काइन की ये अभिक्रियाएँ एल्केन तथा एल्कीन से भिन्न होती हैं।

HC ≡ CH + Na → HC ≡ CNa + ½H2

(सोडियम एथाइनाइड)

HC ≡ CNa + Na → NaC ≡ CNa + ½H2

(डाइसोडियम एथाइनाइड)

CH3 − C ≡ CH + NaNH2 →
CH3 − C ≡ CNa + NH3

(सोडियम प्रोपाइनाइड)

एल्केन, एल्कीन तथा एल्काइन में अम्लीय प्रकृति का क्रम :

(i) HC ≡ CH > H2C = CH2 > CH3 − CH3

(ii) HC ≡ CH > CH3 − C ≡ CH > CH3 − C ≡ C − CH3

(2) योग अभिक्रिया

एल्काइनों में
त्रिबंध होता है,
अतः यह H2, X2, HX
आदि के दो अणुओं से योग करते हैं।

(i) H2 के साथ योग

CH3 − C ≡ CH + H2
(Pt/Pd/Ni)
→
CH3 − CH = CH2
→
CH3 − CH2 − CH3

(प्रोपाइन)     
(प्रोपीन)     
(प्रोपेन)

(ii) HX के साथ योग

एल्काइनों में
HX (HCl, HBr, HI)
के दो अणुओं का योग होने से
जेम डाइहैलाइड
बनते हैं।

HC ≡ CH + HBr →
CH2 = CHBr →
CH3 − CHBr2

CH3 − C ≡ CH + HBr
(मार्कोनीकॉफ नियम)
→
CH3 − CBr = CH2
→
CH3 − CBr2 − CH3

(iii) X2 के साथ योग

CH3 − C ≡ CH + Br2 →
CH3CBr = CHBr →
CH3 − CBr2 − CHBr2

(1,2-डाइब्रोमोप्रोपीन)    
(1,1,2,2-टेट्राब्रोमोप्रोपेन)

Note :
इस प्रक्रिया में
ब्रोमीन का लाल-नारंगी रंग
समाप्त हो जाता है,
इसलिए इसे
असंतृप्तता की पहचान
के लिए प्रयोग किया जाता है।

(iv) जल का योग

एल्काइन जल के साथ सामान्यतः अभिक्रिया नहीं करते,
परन्तु Hg2+
उत्प्रेरक तथा अम्लीय माध्यम में
333 K पर
जल का योग होकर
कार्बोनिल यौगिक बनाते हैं।

HC ≡ CH + H2O
(Hg2+/H+)
333K →
CH2 = CHOH
→
CH3CHO

CH3 − C ≡ CH + H2O
→
CH3 − C(OH) = CH2
→
CH3 − CO − CH3

(v) बहुलकीकरण

एथाइन को
लाल तप्त लोहे की नलिका में
873 K
पर प्रवाहित करने पर
इसका चक्रीय बहुलकीकरण होता है।

एथाइन के तीन अणु बहुलकीकृत होकर
बेंजीन बनाते हैं।

ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन

  • ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन को
    एरीन्स भी कहते हैं,
    क्योंकि इनके अधिकांश यौगिकों में
    विशिष्ट गंध होती है।
    (ग्रीक शब्द Aroma का अर्थ सुगंध होता है)
  • अधिकतर ऐसे यौगिकों में
    बेंजीन वलय
    उपस्थित होता है।
  • जिन ऐरोमैटिक यौगिकों में
    बेंजीन वलय
    उपस्थित होती है उन्हें
    बेंजेनोइड तथा
    जिनमें बेंजीन वलय नहीं होती
    उन्हें अबेंजेनोइड कहते हैं।

उदाहरण : बेंजीन, टोल्यून, नेफ्थलीन, बाइफेनिल

ऐरोमैटिकता के लिए आवश्यक शर्तें

  1. समतलता (Planarity)
  2. वलय में
    π-इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण विस्थानीकरण
    होना चाहिए।
  3. हकल नियम (Hückel Rule) —
    वलय में
    (4n + 2)π इलेक्ट्रॉन होने चाहिए,
    जहाँ n = 0,1,2,3…

अर्थात यदि किसी चक्रीय यौगिक में
π-इलेक्ट्रॉनों की संख्या
2, 6, 10 या 14 हो,
तो वह यौगिक
ऐरोमैटिक होगा।

उदाहरण —
बेंजीन (6 π इलेक्ट्रॉन),
नेफ्थलीन (10 π इलेक्ट्रॉन),
एन्थ्रासीन (14 π इलेक्ट्रॉन),
फेनैंथ्रीन (14 π इलेक्ट्रॉन)

बेंजीन को बनाने की विधियाँ

  1. एथाइन के चक्रीय बहुलकीकरण से
  2. एरोमैटिक अम्लों के विकार्बोक्सिलीकरण से
  3. फिनॉल के अपचयन से

(ii) बेंजोइक अम्ल से

बेंजोइक अम्ल के
सोडियम लवण को
सोडा लाइम (NaOH + CaO)
के साथ गर्म करने पर
बेंजीन प्राप्त होती है।

C6H5COONa + NaOH
  CaO / Δ →
C6H6 + Na2CO3

(iii) फिनॉल के अपचयन से

फिनॉल की वाष्प को
जस्ता (Zn) के चूर्ण पर
प्रवाहित करने पर यह
बेंजीन में अपचयित हो जाती है।

C6H5OH + Zn →
C6H6 + ZnO

रासायनिक गुणधर्म

बेंजीन की
इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ
प्रमुख होती हैं।
जैसे —
नाइट्रीकरण, हैलोजनीकरण,
सल्फोनीकरण तथा फ्रिडेल–क्राफ्ट अभिक्रिया।

(i) नाइट्रीकरण

यदि बेंजीन वलय को
सांद्र नाइट्रिक अम्ल
तथा
सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल
(नाइट्रीकरण मिश्रण) के साथ गर्म किया जाए
तो बेंजीन वलय में
NO2
समूह जुड़ जाता है।

C6H6 + HNO3
(H2SO4)
→
C6H5NO2 + H2O

(ii) हैलोजनीकरण

लुईस अम्ल जैसे
FeCl3, FeBr3, AlCl3
की उपस्थिति में बेंजीन
हैलोजन
के साथ अभिक्रिया करके
हैलोबेंजीन बनाता है।

C6H6 + Cl2
(AlCl3)
→
C6H5Cl + HCl

(iii) सल्फोनीकरण

सांद्र
सल्फ्यूरिक अम्ल
या
ओलियम
द्वारा बेंजीन वलय का
सल्फोनीकरण
किया जाता है।

C6H6 + H2SO4
→
C6H5SO3H + H2O

(iv) फ्रिडेल–क्राफ्ट ऐल्किलीकरण

निर्जल
AlCl3
की उपस्थिति में बेंजीन की
एल्किल हैलाइड
के साथ अभिक्रिया कराने पर
एल्किल बेंजीन
प्राप्त होता है।

C6H6 + CH3Cl
(AlCl3)
→
C6H5CH3 + HCl

(v) फ्रिडेल–क्राफ्ट एसीलीकरण

लुईस अम्ल
AlCl3
की उपस्थिति में बेंजीन की
एसिल क्लोराइड
के साथ अभिक्रिया कराने पर
एसिल बेंजीन
प्राप्त होता है।

C6H6 + CH3COCl
(AlCl3)
→
C6H5COCH3 + HCl

इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन की क्रियाविधि

  1. इलेक्ट्रोफाइल का बनना
  2. कार्बोनियम आयन का बनना
  3. मध्यवर्ती कार्बोनियम से प्रोटॉन (H+) का हटना

(a) इलेक्ट्रोफाइल (E+) का बनना

बेंजीन के क्लोरीनीकरण, एल्किलीकरण तथा एसीलीकरण में
निर्जल AlCl3
लुईस अम्ल के रूप में कार्य करता है और
इलेक्ट्रोफाइल उत्पन्न करता है।

Cl2 + AlCl3 → Cl+ + [AlCl4]−

R − Cl + AlCl3 → R+ + [AlCl4]−

RCOCl + AlCl3 → RCO+ + [AlCl4]−

नाइट्रीकरण में सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल की अभिक्रिया से
नाइट्रोनियम आयन (NO2+)
बनता है।

HNO3 + H2SO4 →
NO2+ + HSO4− + H2O

(b) कार्बोनियम आयन (एरीनियम आयन) का बनना

इलेक्ट्रोफाइल के आक्रमण से
एरीनियम आयन बनता है,
जिसे सिग्मा संकुल भी कहते हैं।
इसमें एक कार्बन sp3
संकरण अवस्था में होता है।

एरीनियम आयन विभिन्न अनुनादी संरचनाओं द्वारा स्थायित्व प्राप्त करता है।

(c) प्रोटॉन (H+) का हटना

एरीनियम आयन से
प्रोटॉन (H+) हटने पर
बेंजीन की सुगंधित प्रकृति पुनः स्थापित हो जाती है।

C6H6E+ + AlCl4− →
C6H5E + HCl + AlCl3

C6H6E+ + HSO4− →
C6H5E + H2SO4

बेंजीन की योगात्मक अभिक्रियाएँ

(i) H2 के साथ अभिक्रिया

C6H6 + 3H2
(Ni, Δ)
→
C6H12

(साइक्लोहेक्सेन)

(ii) Cl2 के साथ अभिक्रिया

पराबैंगनी प्रकाश की उपस्थिति में
तीन क्लोरीन अणु बेंजीन वलय पर
संयोजित होकर
बेंजीन हेक्साक्लोराइड
(C6H6Cl6) बनाते हैं,
जिसे गेमेक्सीन कहते हैं।

C6H6 + 3Cl2
(UV, 500 K)
→
C6H6Cl6

दहन

बेंजीन को वायु की उपस्थिति में
गर्म करने पर
CO2 तथा
H2O
बनते हैं।

C6H6 +
15/2 O2
→
6CO2 + 3H2O

Note :
किसी हाइड्रोकार्बन की सामान्य दहन अभिक्रिया —

CxHy +
(x + y/4)O2
→
xCO2 + (y/2)H2O

ऑर्थो एवं पैरा निर्देशक समूह

बेंजीन वलय पर उपस्थित वे समूह
जो आने वाले समूह को ऑर्थो तथा
पैरा स्थिति पर निर्देशित करते हैं,
उन्हें ऑर्थो तथा पैरा निर्देशक समूह कहते हैं।

अनुनादी संरचनाओं से स्पष्ट है कि
ऑर्थो एवं
पैरा स्थिति पर
इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक होता है।
इसलिए –OH समूह बेंजीन वलय को
इलेक्ट्रोफिलिक (E+)
के आक्रमण के लिए सक्रिय कर देता है।

अन्य सक्रियकारी समूहों के उदाहरण :

−NH2, −NHR, −NHCOCH3, −OCH3,
−CH3, −C2H5, −X

मेटा निर्देशक समूह

वे समूह जो आने वाले समूह को
मेटा स्थिति पर निर्देशित करते हैं,
उन्हें मेटा निर्देशक समूह कहते हैं।

मेटा निर्देशक समूहों के उदाहरण :

−NO2, −CN, −CHO, −COR, −COOH, −COOR, −SO3H

नाइट्रो समूह के उदाहरण में
−I प्रभाव के कारण
बेंजीन वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है।

इसलिए ऑर्थो एवं
पैरा स्थिति पर
इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है और
इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन प्रायः
मेटा स्थिति पर होता है।

कैंसरजनक गुण तथा विषाक्तता

बेंजीन तथा हाइड्रोकार्बन
सीमित मात्रा में भी अत्यधिक विषैले तथा
कैंसर उत्पन्न करने वाले हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए
पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन
जैसे कोलतार तथा
पेट्रोलियम के अपूर्ण दहन से बनते हैं।
ये शरीर में प्रवेश कर विभिन्न जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा
डीएनए को क्षति पहुँचाते हैं और कैंसर उत्पन्न कर सकते हैं।


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