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NCERT Solutions For Class 12 – Coordination Compounds (समन्वय यौगिक)

यहाँ कक्षा 12 रसायन विज्ञान (NCERT) के अध्याय Coordination Compounds (समन्वय यौगिक) के सभी महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर आसान हिंदी में दिए गए हैं। यह पोस्ट CBSE Board, NEET और JEE तैयारी के लिए बहुत मददगार है।

इस पोस्ट में क्या मिलेगा?

  • IUPAC नामकरण (Naming) के आसान नियम
  • ऑक्सीकरण अवस्था और step-by-step calculation
  • समावयवता (cis/trans, fac/mer, optical)
  • चुंबकीय आघूर्ण (μ) और unpaired electrons
  • VBT + CFT के बेसिक्स और examples
  • रंग, स्थिरता, घुलनशीलता और reactivity से जुड़े points

Quick Tip

Exam में scoring के लिए: Oxidation state, coordination number और isomerism वाले प्रश्न जरूर practice करें।

नीचे Solutions देखें
Class 12 Coordination Compounds Hindi Medium NCERT Solutions
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Q.1: वर्नर की अभिधारणाओं के आधार पर उपसहसंयोजन यौगिकों में आबन्धन को समझाइए।
Answer (उत्तर)
वर्नर के अनुसार Coordination (उपसहसंयोजन) यौगिकों में धातु आयन दो तरह की संयोजकताएँ दिखाता है:

1) प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency)
• यह धातु की ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation State) से जुड़ी होती है।
• ये आयननीय (ionizable) होती है यानी पानी में घुलकर बाहर के आयन बनाती है।
• इसे आमतौर पर ऋणात्मक आयन (Cl⁻, SO₄²⁻ आदि) संतुष्ट करते हैं।

2) द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency)
• यह धातु की उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number) से जुड़ी होती है।
• ये अन-आयननीय (non-ionizable) होती है यानी घोल में अलग आयन बनकर बाहर नहीं निकलती।
• इसे उदासीन अणु (NH₃, H₂O) या कभी-कभी ऋणात्मक आयन भी संतुष्ट कर सकते हैं।
• Secondary valency की संख्या ही Coordination Number होती है (कई धातुओं में यह लगभग तय रहती है)।
Explanation (व्याख्या – एकदम आसान भाषा में)
सोचो धातु आयन एक “केंद्र (center)” है और उसके चारों/छहों तरफ ligands उसकी “team” हैं।

अब वर्नर ने कहा:

Primary valency = धातु की “चार्ज वाली ज़रूरत” (oxidation state)
→ इसलिए ये बाहर वाले ions के रूप में दिखाई देती है और घोल में निकल भी सकती है।

Secondary valency = धातु के चारों तरफ “कितने लोग बैठ सकते हैं” (coordination number)
→ इसलिए ये ब्रैकेट [ ] के अंदर fix होकर रहते हैं और घोल में बाहर नहीं निकलते।

✅ Bracket Rule (सबसे काम की बात):
[ ] के अंदर = Complex / Coordination sphere
[ ] के बाहर = Counter ions

Geometry (ज्यामिति) – वर्नर की बड़ी बात
Coordination number के हिसाब से ligands एक खास shape में बैठते हैं:

CN = 6 → Octahedral (अष्टफलकीय)
उदाहरण: [Co(NH₃)₆]³⁺, [CoCl(NH₃)₅]²⁺, [CoCl₂(NH₃)₄]⁺

CN = 4 → Tetrahedral (चतुष्फलकीय) या Square Planar (वर्ग समतली)
उदाहरण: [Ni(CO)₄] (आमतौर पर tetrahedral)
उदाहरण: [PtCl₄]²⁻ (अक्सर square planar)

रंग अलग क्यों दिखता है? (Exam-friendly line)
कुछ compounds में ligands की position बदलने से cis–trans (समपक्ष–विपक्ष) isomerism बनता है।
इसी वजह से एक ही formula वाले compounds के रंग अलग हो सकते हैं।
जैसे: CoCl₃·4NH₃ के अलग-अलग arrangement में अलग color दिख सकता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
ट्रिक 1: “Outside = Primary”
जो ion घोल में बाहर निकल सकता है → Primary
जो [ ] के अंदर fix है → Secondary
एक लाइन में: Primary बाहर, Secondary अंदर!

ट्रिक 2: Coordination Number झट से निकालो
[ ] के अंदर जितने ligands = CN
[Co(NH₃)₆]³⁺ → 6 ligands → CN = 6

ट्रिक 3: Geometry Shortcut
CN 6 = Octahedral (बहुत common)
CN 4 = Tetrahedral / Square planar
(Pt(II) जैसे d⁸ में square planar बहुत दिखता है)

ट्रिक 4: “Color change = arrangement change”
अगर arrangement बदल रहा है (cis/trans), तो color भी बदल सकता है।
Exam में लिखो: isomerism leads to different colors

Quick Self-check (Student Engagement)
खुद से पूछो:
• Bracket के बाहर कौन? → Counter ion
• Bracket के अंदर कितने ligands? → CN
• CN 6 है? → Octahedral
• Same formula, different color? → Isomerism possible
Q.2: FeSO4 विलयन तथा (NH4)2SO4 विलयन का 1 : 1 मोलर अनुपात में मिश्रण Fe2+ आयन का परीक्षण देता है, परन्तु CuSO4 व जलीय अमोनिया का 1 : 4 मोलर अनुपात में मिश्रण Cu2+ आयनों का परीक्षण नहीं देता। समझाइए क्यों?
Answer (उत्तर)
👉 FeSO4 विलयन को (NH4)2SO4 विलयन में 1 : 1 मोलर अनुपात में मिश्रित करने पर एक द्विक-लवण (double salt) बनता है जिसे मोहर लवण (Mohr’s salt) कहते हैं:
FeSO4·(NH4)2SO4·6H2O
👉 यह जल में घुलकर पूरी तरह सामान्य आयनों में आयनित हो जाता है:
FeSO4·(NH4)2SO4·6H2O → Fe2+ + 2NH4+ + 2SO42− + 6H2O
👉 इसलिए विलयन में Fe2+ आयन स्वतंत्र रूप से उपस्थित रहता है, और Fe2+ का test positive आता है।
👉 लेकिन जब CuSO4 विलयन को जलीय अमोनिया के साथ 1 : 4 मोलर अनुपात में मिलाया जाता है, तो यह एक समन्वय (complex) यौगिक बनाता है:
[Cu(NH3)4]SO4
👉 यह विलयन में इस प्रकार आयनित होता है:
[Cu(NH3)4]SO4 → [Cu(NH3)4]2+ + SO42−
👉 यहाँ Cu2+ अलग होकर नहीं निकलता, क्योंकि ताँबा [Cu(NH3)4]2+ संकुल आयन के रूप में स्थिर रहता है।
✅ इसलिए विलयन में स्वतंत्र Cu2+ नहीं मिलता, और Cu2+ का सामान्य test negative आता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 मोहर लवण (double salt) पानी में घुलने पर Fe2+ जैसे सरल आयन देता है, इसलिए Fe2+ का test positive आता है।
👉 [Cu(NH3)4]SO4 (complex salt) में Cu2+ NH3 से coordinate होकर complex ion बना लेता है, इसलिए Cu2+ free form में उपलब्ध नहीं रहता और सामान्य Cu2+ test negative आता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Double salt घोल में जाकर अपनी पहचान खो देता है और साधारण आयन दे देता है (जैसे Fe2+)।
👉 Complex salt घोल में भी अपनी पहचान बनाए रखता है क्योंकि complex ion बना रहता है (जैसे [Cu(NH3)4]2+)।
👉 Exam trick: “Double salt = free ions” और “Complex salt = complex ions (no free metal ion)” ✅
Q.3: प्रत्येक के दो उदाहरण देते हुए, निम्नलिखित को समझाइए: समन्वय समूह, लिगण्ड, उपसहसंयोजन संख्या, उपसहसंयोजन बहुफलक, होमोलैप्टिक तथा हेटेरोलैप्टिक।
Answer (उत्तर)
(1) समन्वय समूह (Coordination group / entity): धातु आयन/परमाणु तथा उससे जुड़े लिगण्डों का पूरा भाग जो [ ] के अंदर लिखा जाता है।
उदाहरण: [Co(NH3)6]3+, [PtCl4]2−
(2) लिगण्ड (Ligand): वे आयन/अणु जो अपना इलेक्ट्रॉन युग्म देकर धातु से समन्वय बन्ध बनाते हैं।
उदाहरण: NH3, CN
(3) उपसहसंयोजन संख्या (Coordination number): धातु आयन से सीधे जुड़े दाता परमाणुओं (donor atoms) की कुल संख्या।
उदाहरण: [Co(NH3)6]3+ → CN = 6, [Ni(CO)4] → CN = 4
(4) उपसहसंयोजन बहुफलक (Coordination polyhedron): धातु के चारों ओर लिगण्डों की विशिष्ट ज्यामितीय व्यवस्था
उदाहरण: अष्टफलकीय (Octahedral): [Co(NH3)6]3+, वर्ग समतली (Square planar): [PtCl4]2−
(5) होमोलैप्टिक (Homoleptic): जिन संकुलों में केवल एक ही प्रकार के लिगण्ड हों।
उदाहरण: [Co(NH3)6]3+, [Fe(CN)6]4−
(6) हेटेरोलैप्टिक (Heteroleptic): जिन संकुलों में एक से अधिक प्रकार के लिगण्ड हों।
उदाहरण: [Co(NH3)5Cl]2+, [Pt(NH3)2Cl2]
Explanation (व्याख्या)
👉समन्वय समूह को पहचानने का सबसे आसान तरीका है: जो भी [ ] के अंदर है, वही coordination entity है।
👉लिगण्ड धातु को “डोनेट” करते हैं, इसलिए उनका काम होता है धातु से coordinate bond बनाना।
👉उपसहसंयोजन संख्या निकालने के लिए बस यह गिनो कि धातु से सीधे कितने donor atoms जुड़े हैं (जैसे NH3 में N, CO में C)।
👉उपसहसंयोजन बहुफलक मतलब ligands किस shape में बैठे हैं, जैसे CN = 6 में अक्सर Octahedral व्यवस्था बनती है।
👉होमोलैप्टिक में ligands एक जैसे होते हैं, जबकि हेटेरोलैप्टिक में ligands अलग-अलग प्रकार के होते हैं।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉Quick Trick:
👉Homoleptic = “Homo” मतलब same ligand
👉Heteroleptic = “Hetero” मतलब different ligands
👉Bracket Rule (Exam favourite):
👉[ ] के अंदर = complex/coordination sphere
👉[ ] के बाहर = counter ions
👉CN से geometry याद रखने की ट्रिक:
👉CN 6 → Octahedral (अष्टफलकीय)
👉CN 4 → Tetrahedral या Square planar
👉Donor atom याद रखें: NH3 में donor N, H2O में donor O, CO में donor C, CN में donor C होता है।
Q.4: एकदन्तुर, द्विदन्तुर तथा उभयदन्तुर लिगण्ड से क्या तात्पर्य है? प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए।
Answer (उत्तर)
👉 (1) एकदन्तुर लिगण्ड (Monodentate): जो धातु आयन से केवल एक दाता परमाणु द्वारा जुड़ते हैं।
👉 उदाहरण: NH3, Cl
👉 (2) द्विदन्तुर लिगण्ड (Bidentate): जो धातु आयन से दो दाता परमाणुओं द्वारा जुड़ते हैं।
👉 उदाहरण: एथिलीन डायमीन (en = H2N–CH2–CH2–NH2), C2O42− (ऑक्सालेट)
👉 (3) उभयदन्तुर लिगण्ड (Ambidentate): जिनमें दो अलग-अलग donor atoms होते हैं, पर एक समय में केवल एक donor atom से ही धातु से जुड़ते हैं।
👉 उदाहरण: NO2, SCN
Explanation (व्याख्या)
👉 एकदन्तुर: एक ही जगह से attach होता है (one-point attachment)।
👉 द्विदन्तुर: दो जगह से attach होता है (two-point attachment), इसलिए bonding अक्सर मजबूत होती है।
👉 उभयदन्तुर: दो विकल्प होते हैं, लेकिन धातु से एक ही विकल्प से जुड़ता है।

👉 NO2: N से जुड़े तो nitro, O से जुड़े तो nitrito
👉 SCN: S से जुड़े तो thiocyanato, N से जुड़े तो isothiocyanato
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Quick Trick: Mono = 1, Bi = 2, Ambi = 2 options (but one at a time)
👉 Bidentate ligands अक्सर complexes को ज्यादा stable बनाते हैं क्योंकि वे “ring-like” structure बना सकते हैं (chelation)।
👉 Exam में Ambidentate के सबसे common examples: NO2 और SCN
Q.5: निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता में धातुओं के ऑक्सीकरण अंक का उल्लेख कीजिए।
(i) [Co(H2O)(CN)(en)2]2+
(ii) [CoBr2(en)2]+
(iii) [PtCl4]2−
(iv) K3[Fe(CN)6]
(v) [Cr(NH3)3Cl3]
Answer (उत्तर)
👉 (i) Co = +3
👉 (ii) Co = +3
👉 (iii) Pt = +2
👉 (iv) Fe = +3
👉 (v) Cr = +3
Explanation (व्याख्या)
(i) [Co(H2O)(CN)(en)2]2+
👉 x + 0 + (−1) + 2×0 = +2 ⇒ x = +3
(ii) [CoBr2(en)2]+
👉 x + 2(−1) + 2×0 = +1 ⇒ x = +3
(iii) [PtCl4]2−
👉 x + 4(−1) = −2 ⇒ x − 4 = −2 ⇒ x = +2
(iv) K3[Fe(CN)6]
👉 Complex ion = [Fe(CN)6]3−
👉 x + 6(−1) = −3 ⇒ x − 6 = −3 ⇒ x = +3
(v) [Cr(NH3)3Cl3]
👉 x + 3×0 + 3(−1) = 0 ⇒ x − 3 = 0 ⇒ x = +3
Neutral ligands: H2O, NH3, en का charge 0 होता है।
👉 Negative ligands: CN, Cl, Br का charge −1 होता है।
👉 फिर total charge के हिसाब से metal का oxidation number निकाला जाता है।
👉 Quick example:
(iii) में 4Cl = −4 और कुल charge −2 है,
इसलिए Pt − 4 = −2 ⇒ Pt = +2
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Fast Trick: Complex का कुल charge = (Metal oxidation state) + (ligands के charges का योग)
👉 en bidentate है, लेकिन charge 0 ही रहता है (oxidation number में सिर्फ charge matter करता है) ✅
Q.6: IUPAC नियमों के आधार पर निम्नलिखित के लिए सूत्र लिखिए –
(i) टेट्राहाइड्रॉक्सीडोज़िन्केट(II)
(ii) पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोप्लैडेट(II)
(iii) डाइएमीन डाइक्लोरिडोप्लैटिनम(II)
(iv) पोटैशियम टेट्रासायनिडोनिकेलेट(II)
(v) पेन्टाअम्मीन नाइट्रिटो-O-कोबाल्ट(III)
(vi) हेक्साअम्मीनकोबाल्ट(III) सल्फेट
(vii) पोटैशियम ट्राइऑक्सालेटोक्रोमेट(III)
(viii) हेक्साअम्मीनप्लैटिनम(IV)
(ix) टेट्राब्रोमिडोक्यूप्रेट(II)
(x) पेन्टाअम्मीन नाइट्रिटो-N-कोबाल्ट(III)
Answer (उत्तर)
👉 (i) टेट्राहाइड्रॉक्सीडोज़िन्केट(II) : [Zn(OH)4]2−
👉 (ii) पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोप्लैडेट(II) : K2[PtCl4]
👉 (iii) डाइएमीन डाइक्लोरिडोप्लैटिनम(II) : [Pt(NH3)2Cl2]
👉 (iv) पोटैशियम टेट्रासायनिडोनिकेलेट(II) : K2[Ni(CN)4]
👉 (v) पेन्टाअम्मीन नाइट्रिटो-O-कोबाल्ट(III) : [Co(NH3)5(ONO)]2+
👉 (vi) हेक्साअम्मीनकोबाल्ट(III) सल्फेट : [Co(NH3)6]2(SO4)3
👉 (vii) पोटैशियम ट्राइऑक्सालेटोक्रोमेट(III) : K3[Cr(C2O4)3]
👉 (viii) हेक्साअम्मीनप्लैटिनम(IV) : [Pt(NH3)6]4+
👉 (ix) टेट्राब्रोमिडोक्यूप्रेट(II) : [CuBr4]2−
👉 (x) पेन्टाअम्मीन नाइट्रिटो-N-कोबाल्ट(III) : [Co(NH3)5(NO2)]2+
Explanation (व्याख्या)
👉 नाम में “पोटैशियम/सोडियम/अमोनियम” आए तो compound salt होता है; complex ion के charge के अनुसार K+/Na+/NH4+ की संख्या तय होती है।
👉 “-ate” (zincate, cuprate, chromate, platinate) का मतलब complex anion होता है, इसलिए bracket में कुल charge negative माना जाता है।
👉 NH3 neutral ligand है (charge 0), जबकि Cl, Br, CN, OH का charge −1 होता है।
👉 Nitrito-O का मतलब NO2 ligand O से जुड़ा है: (ONO)
👉 Nitrito-N का मतलब NO2 ligand N से जुड़ा है: (NO2)
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Exam Trick: नाम में “-O-” दिखे तो लिखो (ONO) और “-N-” दिखे तो लिखो (NO2)
👉 “-ate” ending वाले complexes में metal का नाम बदल जाता है:
👉 Zn → zincate, Cu → cuprate, Cr → chromate, Pt → platinate
👉 Fast rule: neutral ligands (NH3, H2O, en) oxidation state पर असर नहीं डालते; calculation में mainly ionic ligands के charges add होते हैं।
Q.7: IUPAC नियमों के आधार पर निम्नलिखित के सुव्यवस्थित नाम लिखिए।
(i) [Co(NH3)6]Cl3
(ii) [Pt(NH3)2Cl(NH2CH3)]Cl
(iii) [Ti(H2O)6]3+
(iv) [Co(NH3)4Cl(NO2)]Cl
(v) [Mn(H2O)6]2+
(vi) [NiCl4]2−
(vii) [Ni(NH3)6]Cl2
(viii) [Co(en)3]3+
(ix) [Ni(CO)4]
Answer (उत्तर)
👉 (i) हेक्साअमीनकोबाल्ट(III) क्लोराइड
👉 (ii) डाइअमीन क्लोरिडो(मेथिलअमीन) प्लेटिनम(II) क्लोराइड
👉 (iii) हेक्साएक्वाटाइटेनियम(III) आयन
👉 (iv) टेट्राअमीन क्लोरिडो(नाइट्रो) कोबाल्ट(III) क्लोराइड
👉 (v) हेक्साएक्वामैंगनीज़(II) आयन
👉 (vi) टेट्राक्लोरिडोनिकेलेट(II) आयन
👉 (vii) हेक्साअमीननिकेल(II) क्लोराइड
👉 (viii) ट्रिस(एथेन-1,2-डायमीन) कोबाल्ट(III) आयन (en = एथेन-1,2-डायमीन)
👉 (ix) टेट्राकार्बोनिलनिकेल(0)
Explanation (व्याख्या)
📌 ऑक्सीडेशन स्टेट निकालने का आइडिया:
👉 NH3, H2O, CO, en = 0 charge (neutral ligands)
👉 Cl, NO2 = −1 charge (negative ligands)
📌 नाम लिखने के नियम:
👉 पहले ligands के नाम, फिर metal का नाम + oxidation state (रोमन में)
👉 complex anion होने पर metal के नाम के अंत में “-ate” लगता है (जैसे nickelate)
👉 en जैसे ligands के लिए tris(...) का प्रयोग किया जाता है
Did you know
👉 [Ni(CO)4] (टेट्राकार्बोनिलनिकेल) बहुत ज़्यादा विषैला और वाष्पशील यौगिक है; nickel purification (Mond process) में इसका उपयोग किया जाता है।
Q.8: उपसहसंयोजन (Coordination) यौगिकों के लिए सम्भावित विभिन्न प्रकार की समावयवताओं (Isomerism) की सूची बनाइए तथा प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।
Answer (उत्तर)
A) संरचनात्मक समावयवता (Structural Isomerism)
बन्धनी (Linkage) समावयवता:
👉 [Co(NH3)5(NO2)]Cl2 और [Co(NH3)5(ONO)]Cl2
आयनन (Ionisation) समावयवता:
👉 [Co(NH3)4Cl2]NO2 और [Co(NH3)4Cl(NO2)]Cl
उपसहसंयोजन (Coordination) समावयवता:
👉 [Co(NH3)6][Cr(CN)6] और [Cr(NH3)6][Co(CN)6]
विलायक/जलयोजन (Solvate/Hydrate) समावयवता:
👉 [Cr(H2O)6]Cl3 और [Cr(H2O)5Cl]Cl2·H2O
B) त्रिविम (Stereoisomerism)
ज्यामितीय (Geometrical) समावयवता:
👉 cis-/trans- [Pt(NH3)2Cl2]
ध्रुवण (Optical) समावयवता:
👉 [Co(en)3]3+ के d- और l- रूप
Explanation (व्याख्या)
📌 संरचनात्मक समावयवता में atoms/ions की जुड़ने की व्यवस्था बदलती है (कौन अंदर [ ] में है, कौन बाहर, कौन किस atom से जुड़ा है, या पानी अंदर/बाहर है)।
📌 त्रिविम समावयवता में formula वही रहता है, पर ligands की space में position बदल जाती है:
👉 Geometrical: cis/trans जैसे arrangement
👉 Optical: mirror-image forms (d और l)
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
📌 Quick Trick:
👉 नाम में nitrito-N दिखे तो ligand (NO2), और nitrito-O दिखे तो (ONO) लिखो ✅
👉 cis/trans समावयवता सबसे ज्यादा square planar (Pt2+) और octahedral complexes में पूछी जाती है।
👉 Optical isomerism अक्सर तब मिलती है जब complex में तीन bidentate ligands हों, जैसे [Co(en)3]3+
Q.9: निम्नलिखित समन्वय सत्ताओं में कितने ज्यामितीय समावयव (geometrical isomers) संभव हैं?
(1) [Cr(C2O4)3]3−
(2) [Co(NH3)3Cl3]
Answer (उत्तर)
👉 (1) [Cr(C2O4)3]3− : 0
👉 (2) [Co(NH3)3Cl3] : 2 (fac और mer)
Explanation (व्याख्या)
(1) [Cr(C2O4)3]3−
👉 यह octahedral complex है और इसमें तीनों ligands एक जैसे bidentate (oxalate) हैं।
👉 ऐसे case में cis/trans या fac/mer जैसी geometrical variation नहीं बनती, इसलिए geometrical isomers = 0
(2) [Co(NH3)3Cl3]
👉 यह octahedral type MA3B3 complex है।
👉 इसमें दो arrangement संभव हैं:
👉 fac (facial): तीनों Cl एक ही face पर
👉 mer (meridional): तीनों Cl एक ही meridian plane में
👉 इसलिए geometrical isomers = 2
Did you know
👉 MA3B3 octahedral complexes में अक्सर fac/mer isomerism मिलता है, जबकि तीन समान bidentate ligands वाले complexes में आमतौर पर geometrical नहीं, लेकिन optical isomerism मिल सकता है।
Q.10: निम्नलिखित के प्रकाशिक समावयवों (Optical isomers) की संरचनाएँ बनाइए –
(i) [Cr(C2O4)3]3−
(ii) [PtCl2(en)2]2+
(iii) [Cr(NH3)2Cl2(en)]+
Answer (उत्तर)
👉 (i) [Cr(C2O4)3]3−
👉 d-[Cr(C2O4)3]3− (right-handed / दाहिना घुमाव)
👉 l-[Cr(C2O4)3]3− (left-handed / बायाँ घुमाव)
👉 (ii) [PtCl2(en)2]2+
👉 cis-d-[PtCl2(en)2]2+
👉 cis-l-[PtCl2(en)2]2+
👉 (trans रूप आमतौर पर अकिरैल (achiral) होता है, इसलिए optical isomers नहीं देता।)
👉 (iii) [Cr(NH3)2Cl2(en)]+
👉 d-[Cr(NH3)2Cl2(en)]+
👉 l-[Cr(NH3)2Cl2(en)]+
Explanation (व्याख्या)
👉 प्रकाशिक समावयवी (d और l) कैसे बनाते हैं?
Rule: जब octahedral complex में chelate (जैसे oxalate या en) rings “spiral” बनाती हैं, तब दो mirror-image structures बनते हैं:
👉 d - : chelate rings की spiral व्यवस्था दाहिने हाथ जैसी (right-handed)
👉 l - : वही spiral व्यवस्था बाएँ हाथ जैसी (left-handed)
👉 जल्दी sketch करने का तरीका :
👉 (1) पहले octahedron का simple outline बनाओ (ऊपर-नीचे 2 positions + बीच में 4)।
👉 (2) Bidentate ligand (en या C2O42−) को हमेशा दो adjacent positions में जोड़कर ring बनाओ।
👉 (3) अब तीन rings/या rings+ligands को ऐसे set करो कि arrangement spiral बने।
👉 (4) उसी का mirror बना दो → आपका दूसरा isomer तैयार (d ↔ l)।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 ट्रिक: Octahedral complex में अगर 3 bidentate ligands हों (जैसे [Cr(C2O4)3]3−), तो optical isomerism लगभग पक्का होता है (d और l type) ✅
👉 cis vs trans shortcut: बहुत बार cis chiral हो सकता है, लेकिन trans में symmetry आ जाती है, इसलिए वह optical activity नहीं दिखाता (जैसे [PtCl2(en)2]2+)।
👉 Exam में optical isomers लिखते समय d और l का नाम लिखना ही structure का correct indication माना जाता है ✅
Q.11: निम्नलिखित के सभी समावयवों (ज्यामितीय व ध्रुवण) की संरचनाएँ बनाइए –
1. [CoCl2(en)2]+
2. [Co(NH3)Cl(en)2]2+
3. [Co(NH3)Cl2(en)]+
Answer (उत्तर)
👉 1) [CoCl2(en)2]+

👉 ज्यामितीय समावयव (Geometrical):
👉 cis-[CoCl2(en)2]+
👉 trans-[CoCl2(en)2]+

👉 ध्रुवण समावयव (Optical): (केवल cis रूप में)
👉 cis-d-[CoCl2(en)2]+
👉 cis-l-[CoCl2(en)2]+

कुल समावयव = 3 (cis के 2 + trans का 1)

👉 2) [Co(NH3)Cl(en)2]2+

👉 ज्यामितीय समावयव (Geometrical):
👉 cis-[Co(NH3)Cl(en)2]2+
👉 trans-[Co(NH3)Cl(en)2]2+

👉 ध्रुवण समावयव (Optical): (केवल cis रूप में)
👉 cis-d-[Co(NH3)Cl(en)2]2+
👉 cis-l-[Co(NH3)Cl(en)2]2+

कुल समावयव = 3 (cis के 2 + trans का 1)

👉 3) [Co(NH3)Cl2(en)]+
इस प्रकार के प्रश्न में प्रायः इसे अष्टफलकीय (CN = 6) मानकर (एक bidentate en + शेष ligands) के आधार पर isomers लिखे जाते हैं।

👉 ज्यामितीय समावयव (Geometrical):
👉 trans रूप: trans-[Co(en)(NH3)2Cl2]+
👉 cis-α रूप: cis-α-[Co(en)(NH3)2Cl2]+
👉 cis-β रूप: cis-β-[Co(en)(NH3)2Cl2]+

👉 ध्रुवण समावयव (Optical): (दोनों cis रूपों में)
👉 cis-α-d और cis-α-l
👉 cis-β-d और cis-β-l

कुल समावयव = 5
(1 trans + 2×cis, और हर cis के 2 optical)
Explanation (व्याख्या)
👉 cis / trans का मतलब: समान ligands (जैसे Cl) पास-पास हैं तो cis, और आमने-सामने हैं तो trans
👉 en (एथिलीन डायमीन) bidentate है, इसलिए octahedral complex में chelate ring बनाता है। यही ring arrangement कई बार complex को chiral बना देती है।
👉 d और l optical isomers होते हैं:
👉 d = right-handed (दाहिनी spiral जैसी)
👉 l = left-handed (बाईं spiral जैसी)
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Fast rule: en वाले complexes में optical isomerism अक्सर cis रूप में मिलता है, trans में symmetry आ जाती है इसलिए वह अक्सर optical नहीं होता ✅
👉 Exam में structure बनाने की ट्रिक: पहले octahedral framework बनाओ, en को adjacent positions पर ring की तरह जोड़ो, फिर cis/trans और उसका mirror (d/l) बनाओ।
Q.12: [Pt(NH3)(Br)(Cl)(py)] के सभी ज्यामितीय समावयव लिखिए। इनमें से कितने ध्रुवण समावयवता दर्शाएँगे?
Answer
👉 ज्यामितीय समावयव (Geometrical isomers) = 3

👉 (1) trans जोड़ी: NH3 ↔ py, और Br ↔ Cl
👉 (2) trans जोड़ी: NH3 ↔ Br, और py ↔ Cl
👉 (3) trans जोड़ी: NH3 ↔ Cl, और py ↔ Br

👉 ध्रुवण समावयवता (Optical isomerism) दिखाने वाले = 0
Explanation (व्याख्या)
👉 यह Pt(II) का वर्ग समतलीय (square planar) समन्वय यौगिक है।
👉 Square planar में अगर चारों ligands अलग-अलग (A, B, C, D) हों, तो trans pairing तीन अलग तरीकों से हो सकती है, इसलिए 3 ज्यामितीय समावयव बनते हैं।
👉 वर्ग समतलीय यौगिक समतल (planar) होते हैं, इसलिए इनमें chirality नहीं बनती। इसी कारण ध्रुवण/ऑप्टिकल समावयवता नहीं होती।
Did you know (क्या आप जानते हैं?)
👉 [Pt(NH3)2Cl2] जैसे वर्ग समतलीय यौगिकों में केवल cis/trans (2) समावयव मिलते हैं।
👉 लेकिन जब चारों ligands अलग-अलग हों, तो 3 अलग-अलग trans pairing संभव हो जाती हैं, इसलिए 3 geometrical isomers मिलते हैं।
Q.13: जलीय कॉपर सल्फेट विलयन (नीले रंग का) निम्नलिखित प्रेक्षण दर्शाता है।
(i) जलीय पोटैशियम फ्लोराइड के साथ हरा रंग
(ii) जलीय पोटैशियम क्लोराइड के साथ चमकीला हरा रंग
उपर्युक्त प्रायोगिक परिणामों को समझाइए।
Answer (उत्तर)
👉 जलीय CuSO4 में मुख्य आयन [Cu(H2O)6]2+ (नीला) होता है।
👉 KF और KCl जोड़ने पर F / Cl लिगैंड पानी की जगह लेकर नए कॉम्प्लेक्स बनाते हैं, इसलिए रंग बदलता है।
👉 (i) KF के साथ:
[Cu(H2O)6]2+ + 4F ⇌ [CuF4]2− + 6H2O
👉 बनने वाला fluoro-complex नीले से हरा (blue-green) शेड देता है, इसलिए विलयन हरा दिखता है।
👉 (ii) KCl के साथ:
[Cu(H2O)6]2+ + 4Cl ⇌ [CuCl4]2− + 6H2O
👉 Cl से बनने वाला कॉम्प्लेक्स रंग में ज़्यादा intense होता है, इसलिए चमकीला हरा दिखाई देता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 CuSO4 (नीला) का कारण:
👉 पानी में Cu2+ प्रायः यह कॉम्प्लेक्स बनाता है: [Cu(H2O)6]2+ (नीला)
👉 KF के साथ हरा रंग क्यों?
👉 F आयन पानी के कुछ अणुओं को replace करके fluoro-complex बनाते हैं:
[Cu(H2O)6]2+ + 4F ⇌ [CuF4]2− + 6H2O
👉 यह कॉम्प्लेक्स नीले से हरा शेड देता है, इसलिए विलयन हरा दिखता है।
👉 KCl के साथ चमकीला हरा रंग क्यों?
👉 Cl आयन Cu2+ के साथ अधिक स्पष्ट रंग वाला कॉम्प्लेक्स बनाते हैं:
[Cu(H2O)6]2+ + 4Cl ⇌ [CuCl4]2− + 6H2O
👉 [CuCl4]2− का रंग पीला/पीला-भूरा होता है, और यह जब नीले कॉम्प्लेक्स के साथ equilibrium में रहता है तो कुल रंग हरा बनता है।
👉 Cl वाला कॉम्प्लेक्स रंग में ज़्यादा intense होता है, इसलिए चमकीला हरा दिखाई देता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 यह रंग परिवर्तन लिगैंड प्रतिस्थापन (ligand substitution) और कॉम्प्लेक्स निर्माण का क्लासिक उदाहरण है।
👉 नीला [Cu(H2O)6]2+ और पीला [CuCl4]2− साथ होने पर आँख को कुल मिलाकर हरा रंग दिखता है।
Q.14: कॉपर सल्फेट के जलीय विलयन में जलीय KCN को अधिकता में मिलाने पर बनने वाली उपसहसंयोजन सत्ता क्या होगी? इस विलयन में जब H2S गैस प्रवाहित की जाती है तो कॉपर सल्फाइड का अवक्षेप क्यों नहीं प्राप्त होता?
Answer (उत्तर)
• KCN अधिकता में मिलाने पर बनने वाली उपसहसंयोजन सत्ता: [Cu(CN)4]3− (टेट्रासायनिडोक्यूप्रेट(I))
• H2S प्रवाहित करने पर CuS का अवक्षेप नहीं बनता, क्योंकि कॉपर आयन प्रबल cyanide complex के रूप में बंधा रहता है, इसलिए विलयन में मुक्त Cu2+ (या पर्याप्त मुक्त कॉपर आयन) नहीं मिलता।
Explanation (व्याख्या)
👉KCN की अधिकता में CN लिगण्ड कॉपर के साथ बहुत स्थिर complex बना देता है। कई बार प्रक्रिया में Cu2+ का Cu+ में आना भी दिखता है और अंतिम रूप से stable complex बन जाता है।
👉जब H2S गैस प्रवाहित करते हैं, तो सामान्यतः कॉपर आयन उपलब्ध होने पर CuS (काला अवक्षेप) बनता है।
👉लेकिन यहाँ कॉपर [Cu(CN)4]3− में “locked” होता है।
👉इसलिए विलयन में मुक्त कॉपर आयन इतना नहीं होता कि S2− के साथ मिलकर CuS का अवक्षेप बना सके।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉CN बहुत strong ligand है, इसलिए यह धातुओं के साथ बहुत stable complexes बनाता है और कई बार precipitation reactions को रोक देता है।
👉Exam trick: अगर question में लिखा हो “KCN excess”, तो अक्सर याद रखो: metal ion free नहीं रहेगा → precipitation नहीं होगा ✅
👉कॉपर के cyanide complexes इतने stable होते हैं कि qualitative analysis में कई बार group precipitation disturb हो जाती है।
Q.15: संयोजकता आबंध सिद्धान्त (VBT) के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ताओं में आबंध की प्रकृति की विवेचना कीजिए—
(क) [Fe(CN)6]4−
(ख) [FeF6]3−
(ग) [Co(C2O4)3]3−
(घ) [CoF6]3−
Answer (उत्तर)
(क) [Fe(CN)6]4−
👉 Fe का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Ar] 3d6 4s2
👉 Fe2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = [Ar] 3d6
👉 लिगण्ड: CN (strong field) → pairing होती है
👉 संकरण (VBT): d2sp3 (अन्तः चक्रण संकुल)
👉 ज्यामिति: अष्टफलकीय
👉 चुंबकीय प्रकृति: प्रतिचुम्बकीय (अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 0)

(ख) [FeF6]3−
👉 Fe का ऑक्सीकरण अंक: +3 → d5
👉 लिगण्ड: F (weak field) → pairing नहीं होती
👉 संकरण (VBT): sp3d2 (outer orbital complex)
👉 ज्यामिति: अष्टफलकीय
👉 चुंबकीय प्रकृति: अनुचुम्बकीय (अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 5)

(ग) [Co(C2O4)3]3−
👉 Co का ऑक्सीकरण अंक: +3 → d6
👉 लिगण्ड: C2O42− (chelate ligand, Co3+ के साथ अक्सर pairing हो जाती है)
👉 संकरण (VBT): d2sp3 (inner orbital complex)
👉 ज्यामिति: अष्टफलकीय
👉 चुंबकीय प्रकृति: प्रतिचुम्बकीय (अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 0)

(घ) [CoF6]3−
👉 Co का ऑक्सीकरण अंक: +3 → d6
👉 लिगण्ड: F (weak field) → high spin
👉 संकरण (VBT): sp3d2 (outer orbital complex)
👉 ज्यामिति: अष्टफलकीय
👉 चुंबकीय प्रकृति: अनुचुम्बकीय (अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 4)
Explanation (व्याख्या)
👉 VBT के अनुसार strong field ligands (जैसे CN) d-orbitals में electrons को pair करवा देते हैं। तब complex inner orbital (d2sp3) बनता है और अक्सर प्रतिचुम्बकीय होता है।
👉 Weak field ligands (जैसे F) electrons को pair नहीं करवाते। तब complex outer orbital (sp3d2) बनता है और अनुचुम्बकीय रहता है।
👉 Co3+ (d6) वाले complexes में ligand के field के अनुसार low spin (0 unpaired) या high spin (4 unpaired) मिल सकता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 One-line trick: CN → pairing → d2sp3 → प्रतिचुम्बकीय ✅
👉 F → no pairing → sp3d2 → अनुचुम्बकीय ✅
👉 d5 high spin (Fe3+) का सबसे easy याद: 5 unpaired (एक-एक electron 5 d-orbitals में)।
👉 d6 high spin में अक्सर 4 unpaired, और d6 low spin में 0 unpaired आते हैं (exam में बहुत काम आता है)।
Q.16: अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों के विभाजन को दर्शाने के लिए चित्र बनाइए।
Answer (उत्तर)
👉 अष्टफलकीय (Octahedral) क्रिस्टल क्षेत्र में d-कक्षकों का विभाजन (Crystal Field Splitting) का चित्र: Coming soon
Explanation (व्याख्या)
👉 अष्टफलकीय व्यवस्था में 6 लिगण्ड धातु के चारों ओर x, y, z अक्षों के साथ आते हैं।
👉 जो कक्षक अक्षों की दिशा में होते हैं (dz2 और dx2−y2), उन पर लिगण्डों का प्रतिकर्षण ज्यादा होता है, इसलिए उनकी ऊर्जा बढ़ जाती है → इन्हें eg कहते हैं।
👉 जो कक्षक अक्षों के बीच होते हैं (dxy, dyz, dxz), उन पर प्रतिकर्षण कम होता है, इसलिए उनकी ऊर्जा कम हो जाती है → इन्हें t2g कहते हैं।
👉 ऊपर-नीचे के स्तरों के बीच ऊर्जा का अंतर Δo (डेल्टा-ऑक्टाहेड्रल) कहलाता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Δo जितना बड़ा, complex उतना ज्यादा low spin बनने की संभावना (strong field ligands जैसे CN)।
👉 Δo जितना छोटा, complex अक्सर high spin (weak field ligands जैसे F)।
👉 यही d–d transition और Δo कई coordination compounds के रंग का बड़ा कारण होता है।
Q.17: स्पेक्ट्रो रासायनिक श्रेणी क्या है? दुर्बल क्षेत्र लिगण्ड तथा प्रबल क्षेत्र लिगण्ड में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
Answer (उत्तर)
👉 स्पेक्ट्रो रासायनिक श्रेणी (Spectrochemical Series): लिगण्डों की वह क्रमबद्ध सूची है जिसमें उन्हें उनकी क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Δ) बढ़ाने की क्षमता के अनुसार रखा जाता है।
👉 एक सामान्य श्रेणी (कम Δ → अधिक Δ):
I < Br < S2− < SCN(S) < Cl < NO3 < F < OH < C2O42− < H2O < NCS(N) < NH3 < en < NO2 < CN < CO
👉 दुर्बल क्षेत्र लिगण्ड (Weak field ligands): जो Δ छोटा बनाते हैं।
👉 उदाहरण: I, Br, Cl, F, OH, H2O
👉 प्रबल क्षेत्र लिगण्ड (Strong field ligands): जो Δ बड़ा बनाते हैं।
👉 उदाहरण: NH3, en, NO2, CN, CO
Explanation (व्याख्या)
👉 Octahedral field में d-कक्षकों का विभाजन t2g (नीचे) और eg (ऊपर) में होता है। इनके बीच का gap = Δo
👉 Weak field ligands (जैसे halides) धातु पर कम प्रभाव डालते हैं → Δ छोटा → electron pairing कम होती है → अक्सर high spin complex बनते हैं।
👉 Strong field ligands (जैसे CN, CO) धातु पर अधिक प्रभाव डालते हैं → Δ बड़ा → electron pairing हो जाती है → अक्सर low spin complex बनते हैं।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Quick Trick: “CN और CO” को हमेशा सबसे strong field में याद रखो ✅
👉 अगर Δo > pairing energy, तो low spin; और अगर Δo < pairing energy, तो high spin बनता है।
👉 Spectrochemical series कई बार compounds के चुंबकीय गुण (magnetism) और रंग (color) predict करने में help करती है।
Q.18: क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Δ) क्या है? उपसहसंयोजन सत्ता में d-कक्षकों का वास्तविक विन्यास Δo के मान के आधार पर कैसे निर्धारित किया जाता है?
Answer (उत्तर)
क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Δ) वह ऊर्जा अंतर है जो लिगण्ड के विद्युत क्षेत्र के कारण d-कक्षकों के दो समूहों में टूटने पर बनता है।

अष्टफलकीय (octahedral) क्षेत्र में d-कक्षक t2g (कम ऊर्जा) और eg (अधिक ऊर्जा) में विभाजित होते हैं, और इनके बीच का अंतर Δo कहलाता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 1) Δo क्या बताता है?

👉 t2g (dxy, dyz, dxz) नीचे ऊर्जा पर

👉 eg (dz2, dx2−y22) ऊपर ऊर्जा पर

👉 इनके बीच का gap = Δo
👉 2) “वास्तविक विन्यास” कैसे तय करते हैं? (High spin या Low spin)
👉 यह मुख्यतः Δo और जोड़ीकरण ऊर्जा (Pairing energy, P) की तुलना से तय होता है:
👉 ✅ Case A: Δo < P (कम splitting) → High spin complex

👉 इलेक्ट्रॉन पहले unpaired रहते हैं, pairing कम होती है।

👉 कमजोर क्षेत्र लिगण्ड (F, Cl, H2O) में यह ज्यादा मिलता है।
👉 ✅ Case B: Δo > P (ज्यादा splitting) → Low spin complex

👉 इलेक्ट्रॉन t2g में ही pair हो जाते हैं, eg में जाने से बचते हैं।

👉 प्रबल क्षेत्र लिगण्ड (CN, CO, en) में यह ज्यादा मिलता है।
👉 3) लिखने का सबसे आसान तरीका (Steps)

👉 धातु का oxidation state निकालो

👉 धातु का d-electron count निकालो (जैसे d6, d5 आदि)

👉 compare करो: Δo vs P

👉 फिर filling करो: पहले t2g, फिर eg (और rule के अनुसार pairing)
👉 Quick Example (बहुत काम का)
👉 d6 (Octahedral):

👉 High spin: t2g4 eg2 (अक्सर 4 unpaired)

👉 Low spin: t2g6 eg0 (0 unpaired)
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Exam Trick: बस एक लाइन याद रखो: Δo बड़ा = low spin, Δo छोटा = high spin
👉 Δo बढ़ता है जब: धातु का oxidation state ज्यादा हो, metal छोटा/ज़्यादा charged हो, और ligand strong field हो (जैसे CN, CO)।
👉 यही Δo बहुत बार complex के रंग और चुंबकीय गुण (paramagnetic/diamagnetic) का main reason बनता है।
Q.19: [Cr(NH3)6]3+ अनुचुम्बकीय है जबकि [Ni(CN)4]2− प्रतिचुम्बकीय। समझाइए क्यों।
Answer (उत्तर)
👉 [Cr(NH3)6]3+ में 3 अयुग्मित (unpaired) इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए यह अनुचुम्बकीय (Paramagnetic) है।
👉 [Ni(CN)4]2− में कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होता, इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय (Diamagnetic) है।
Explanation (व्याख्या)
👉 (A) [Cr(NH3)6]3+ का निर्माण:

👉 ऑक्सीकरण अवस्था: Cr = +3

👉 Cr का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: Cr (Z = 24) = [Ar] 3d5 4s1

👉 Cr3+ बनने पर: 3 इलेक्ट्रॉन निकलते हैं → [Ar] 3d3

👉 अब NH3 के 6 lone pairs धातु को donate करते हैं। Cr3+ 6 रिक्त संकरित कक्षक बनाकर इन electron pairs को लेता है।

👉 संकरण (VBT): d2sp3
👉 ज्यामिति: Octahedral (अष्टफलकीय)

👉 चुम्बकीय गुण: Cr3+ में 3d3 होने से 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन रहते हैं (लगभग t2g3)।

निष्कर्ष: 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → अनुचुम्बकीय
👉 (B) [Ni(CN)4]2− का निर्माण:

👉 ऑक्सीकरण अवस्था: Ni = +2

👉 Ni का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: Ni (Z = 28) = [Ar] 3d8 4s2

👉 Ni2+ बनने पर: 2 इलेक्ट्रॉन निकलते हैं → [Ar] 3d8

👉 यहाँ CN strong field ligand है, इसलिए यह electron pairing करवा देता है और धातु में dsp2 प्रकार के संकरण के लिए व्यवस्था बनती है।

👉 संकरण (VBT): dsp2
👉 ज्यामिति: Square planar (वर्ग समतली)

👉 चुम्बकीय गुण: d8 square planar complex में इलेक्ट्रॉन paired हो जाते हैं, इसलिए unpaired = 0

निष्कर्ष: 0 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → प्रतिचुम्बकीय
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
📌 Quick Trick:
👉 Cr3+ = d3 → सामान्यतः 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → अनुचुम्बकीय ✅
👉 Ni2+ = d8 + CN (strong ligand) → अक्सर square planar (dsp2) → Diamagnetic ✅
👉 Ligand power याद रखने की लाइन: CN electron pairing करवा देता है, इसलिए चुम्बकीय गुण बदल जाते हैं।
👉 Square planar complexes (खासकर d8) अक्सर Pt(II), Pd(II), Ni(II) में दिखते हैं और कई बार diamagnetic होते हैं।
Q.20: [Ni(H2O)6]2+ का विलयन हरा है, परन्तु [Ni(CN)4]2− का विलयन रंगहीन है। समझाइए।
Answer (उत्तर)
📌 [Ni(H2O)6]2+ में d–d संक्रमण होता है, इसलिए विलयन हरा दिखाई देता है।
📌 [Ni(CN)4]2− में युग्मन (pairing/जोड़ना) हो जाने से d–d संक्रमण नहीं (या बहुत कम) होता, इसलिए विलयन रंगहीन रहता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 (1) [Ni(H2O)6]2+ विलयन हरा क्यों?

👉 यहाँ Ni की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है, इसलिए Ni2+ का विन्यास 3d8 होता है।

👉 H2O एक दुर्बल लिगेण्ड (weak ligand) है, इसलिए यह इलेक्ट्रॉनों का युग्मन (pairing) नहीं करवा पाता।

👉 परिणाम: complex अष्टफलकीय (Octahedral) रहता है और इसमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन मौजूद रहते हैं → यह अनुचुम्बकीय (Paramagnetic) होता है।

👉 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों के कारण d–d संक्रमण होता है। Ni2+ कुछ रंग (अक्सर लाल/पीला क्षेत्र) को absorb करता है, इसलिए उसका पूरक रंग हरा दिखाई देता है।

✅ इसलिए [Ni(H2O)6]2+ का विलयन हरा होता है।
👉 (2) [Ni(CN)4]2− विलयन रंगहीन क्यों?
👉 इसमें भी Ni2+ ही है, यानी विन्यास 3d8

👉 लेकिन CN प्रबल लिगेण्ड (strong ligand) है, इसलिए यह इलेक्ट्रॉनों का युग्मन (pairing/जोड़ना) करवा देता है।

👉 तब संकुल सामान्यतः वर्ग समतली (Square planar) बनता है और प्रतिचुम्बकीय (Diamagnetic) हो जाता है (अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं बचते)।

👉 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति में d–d संक्रमण नहीं होता (या बहुत कमजोर हो जाता), इसलिए विलयन रंगहीन दिखाई देता है।

✅ इसलिए [Ni(CN)4]2− का विलयन रंगहीन रहता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
📌 Quick Trick:
👉 दुर्बल लिगेण्ड (H2O) → pairing नहीं → अनुचुम्बकीय + रंगीन ✅
👉 प्रबल लिगेण्ड (CN) → pairing हो जाती है → प्रतिचुम्बकीय + रंगहीन ✅
👉 [Ni(CN)4]2− की geometry अक्सर वर्ग समतली (Square planar) होती है, जबकि [Ni(H2O)6]2+ अष्टफलकीय (Octahedral) होता है।
👉 रंग का बड़ा कारण अक्सर यही होता है: d–d transition + absorb किया गया रंग = दिखने वाला (पूरक) रंग।
Q.21: [Fe(CN)6]4− तथा [Fe(H2O)6]2+ के तनु विलयनों के रंग भिन्न होते हैं। क्यों?
Answer (उत्तर)
दोनों में धातु Fe2+ (3d6) ही है, फिर भी रंग अलग होता है क्योंकि लिगेण्ड अलग हैं।
👉 CN प्रबल लिगेण्ड (strong ligand) है, इसलिए Δo बड़ा हो जाता है और प्रकाश का अलग भाग अवशोषित होता है।
👉 H2O दुर्बल लिगेण्ड (weak ligand) है, इसलिए Δo छोटा रहता है और अलग तरंगदैर्घ्य का प्रकाश अवशोषित होता है।
👉 इसी कारण दोनों के d–d संक्रमण अलग होते हैं और रंग भिन्न दिखता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 दोनों संकुलों में Fe की ऑक्सीकरण अवस्था +2 है:

👉 [Fe(CN)6]4− में: 6×(−1)=−6, कुल −4 ⇒ Fe = +2

👉 [Fe(H2O)6]2+ में: H2O उदासीन होता है ⇒ Fe = +2
👉 Fe2+ का विन्यास 3d6 है और दोनों संकुल सामान्यतः अष्टफलकीय (Octahedral) होते हैं।
👉 अब फर्क आता है क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा Δo से:

👉 CN (प्रबल लिगेण्ड) → Δo बड़ा → electron pairing बढ़ती → ऊर्जा अंतर बदलता

👉 H2O (दुर्बल लिगेण्ड) → Δo छोटा → pairing कम → ऊर्जा अंतर अलग
👉 Δo बदलने से d–d transition के लिए आवश्यक ऊर्जा बदल जाती है, इसलिए दोनों संकुल अलग रंग का प्रकाश absorb करते हैं और देखा जाने वाला रंग (पूरक रंग) अलग हो जाता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
📌 Quick Trick:
👉 प्रबल लिगेण्ड (CN) → Δo बड़ा → अक्सर low spin
👉 दुर्बल लिगेण्ड (H2O) → Δo छोटा → अक्सर high spin ✅
📌 कई Fe-complexes में रंग सिर्फ d–d transition से नहीं, बल्कि charge transfer से भी बहुत तेज हो सकता है (खासकर strong ligands के साथ)।
📌 एक लाइन में याद रखो: Ligand बदलो → Δo बदलेगा → प्रकाश का अवशोषण बदलेगा → रंग बदल जाएगा।
Q.22: धातु कार्बोनाइलों (Metal carbonyls) में आबंध की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
Answer (उत्तर)
धातु कार्बोनिलों में आबन्ध की प्रकृति (Metal carbonyls में Bonding):
👉 Metal carbonyls (जैसे Ni(CO)4, Fe(CO)5) में धातु (Metal) और CO लिगेण्ड के बीच दो तरह के bonding साथ-साथ चलते हैं।
👉 इसे Synergic bonding (सह-क्रियाशीलता) भी कहते हैं क्योंकि दोनों bonding एक-दूसरे को मजबूत बनाती हैं।
Explanation (व्याख्या)
👉 (1) Sigma (σ) Donation: CO → Metal
👉 CO में कार्बन (C) के पास एक lone pair (एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म) होता है।

👉 यह lone pair धातु के खाली (रिक्त) कक्षक में donate करता है।
👉 इससे σ-बॉन्ड बनता है: M ← C (CO → Metal)
👉 आसान भाषा में: CO अपना electron pair देकर metal से जुड़ता है।
👉 (2) Pi (π) Back Donation: Metal → CO

👉 धातु के भरे हुए d-कक्षक (filled d orbitals) से electrons वापस CO में जाते हैं।

👉 ये electrons CO के रिक्त π* (anti-bonding) molecular orbital में donate होते हैं।

👉 इससे π-बॉन्ड बनता है: M → CO (π back bonding)

👉 आसान भाषा में: Metal भी अपने electrons CO को वापस देता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
Synergic Effect (सह-क्रियाशीलता) क्यों कहते हैं?
👉 σ donation से metal पर electron density बढ़ती है।
👉 इससे metal के लिए π back donation करना और आसान हो जाता है।
👉 और जब π back donation बढ़ता है तो Metal–CO bond और मजबूत हो जाता है।

✅ मतलब: CO देता भी है + Metal वापस भी देता है = bonding strong
📌 याद रखने की Trick
👉 CO → Metal = σ donation (CO देता है)
👉 Metal → CO = π back donation (Metal लौटाता है)
Q.23: निम्न संकुलों में केन्द्रीय धातु आयन की ऑक्सीकरण अवस्था, d-कक्षकों का अधिग्रहण तथा उपसहसंयोजन संख्या बताइए।
(i) K3[Co(C2O4)3]
(ii) cis-[CrCl2(en)2]Cl
(iii) (NH4)2[CoF4]
(iv) [Mn(H2O)6]SO4
Answer (उत्तर)
📌(i) K3[Co(C2O4)3]

👉 ऑक्सीकरण अवस्था: Co = +3
👉 गणना: 3(+1) + x + 3(−2) = 0 ⇒ x = +3
👉 d-विन्यास: Co3+ = d6
👉 Coordination number: 6 (3 oxalate × द्विदंतुक = 6 donor atoms)
👉 d-कक्षकों का अधिग्रहण (Octahedral): t2g6 eg0

📌(ii) cis-[CrCl2(en)2]Cl
👉 (Complex cation = [CrCl2(en)2]+, बाहर Cl counter ion है)

👉 ऑक्सीकरण अवस्था: Cr = +3
👉 गणना: x + 2(0) + 2(−1) = +1 ⇒ x = +3

👉 d-विन्यास: Cr3+ = d3
👉 Coordination number: 6 (2 en → 4 donor + 2 Cl → total 6)
👉 d-कक्षकों का अधिग्रहण (Octahedral): t2g3 eg0

📌(iii) (NH4)2[CoF4]
👉 (Complex anion = [CoF4]2−)

👉 ऑक्सीकरण अवस्था: Co = +2
👉 गणना: 2(+1) + x + 4(−1) = 0 ⇒ x = +2

👉 d-विन्यास: Co2+ = d7
👉 Coordination number: 4
👉 d-कक्षकों का अधिग्रहण (Tetrahedral): e4 t23

📌(iv) [Mn(H2O)6]SO4
👉 (Complex cation = [Mn(H2O)6]2+, क्योंकि SO42− बाहर है)

👉 ऑक्सीकरण अवस्था: Mn = +2
👉 गणना: x + 6(0) + (−2) = 0 ⇒ x = +2

👉 d-विन्यास: Mn2+ = d5
👉 Coordination number: 6
👉 d-कक्षकों का अधिग्रहण (Octahedral): t2g3 eg2
Explanation (व्याख्या)
👉 ऑक्सीकरण अवस्था निकालने का नियम:
👉 (Metal oxidation) + (ligands के charges का योग) = complex का charge
👉 Ligands के charges याद रखें:
👉 C2O42− = −2, Cl = −1, F = −1
👉 en और H2O neutral (0) होते हैं।
👉 Coordination number (CN): धातु से जुड़े दाता परमाणुओं की कुल संख्या।
👉 Hint: दुर्बल लिगेण्ड (F, H2O) अक्सर outer orbital (sp3d2 / sp3) देते हैं; strong / Co3+ जैसे cases में inner orbital भी मिल सकता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
📌 One-line revision:
👉 en (bidentate) = 1 ligand लेकिन 2 donor points, इसलिए CN तेजी से बढ़ जाता है ✅
👉 [CoF4]2− जैसे complexes अक्सर चतुष्फलकीय (tetrahedral) होते हैं, इसलिए इनका चुम्बकीय गुण और रंग भी अलग दिखता है।
Q.24: निम्न संकुलों के IUPAC नाम लिखिए तथा ऑक्सीकरण अवस्था, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, उपसहसंयोजन संख्या, संकुल का त्रिविम रसायन (ज्यामिति/समावयवता) तथा चुंबकीय आघूर्ण (μ) बताइए।
(i) K[Cr(H2O)2(C2O4)2]·3H2O
(ii) [CrCl3(py)3]
(iii) [Co(NH3)5Cl]Cl2
(iv) Cs[FeCl4]
(v) K4[Mn(CN)6]
Answer (उत्तर)
📌 (i) K[Cr(H2O)2(C2O4)2]·3H2O

👉 IUPAC नाम: Potassium diaquabis(oxalato)chromate(III) trihydrate
👉 हिंदी: पोटैशियम डायएक्वाबिस(ऑक्सालेटो)क्रोमेट(III) ट्राइहाइड्रेट

👉 ऑक्सीकरण अवस्था (Cr): +3
👉 गणना: (+1) + x + 2(0) + 2(−2) = 0 ⇒ x = +3

👉 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: Cr3+ = d3
👉 उपसहसंयोजन संख्या: 6
👉 ज्यामिति: Octahedral (अष्टफलकीय)
👉 समावयवता: cis / trans सम्भव; cis रूप के d/l (प्रकाशीय) भी सम्भव
👉 चुंबकीय गुण: Paramagnetic (अनुचुम्बकीय)
👉 चुंबकीय आघूर्ण (μ): μ ≈ 3.87 BM (n = 3)

📌 (ii) [CrCl3(py)3] (py = pyridine / पाइरीडीन)

👉 IUPAC नाम: Trichloridotripyridinechromium(III)
👉 हिंदी: ट्राइक्लोरिडोट्राइ(पाइरीडीन) क्रोमियम(III)

👉 ऑक्सीकरण अवस्था (Cr): +3
👉 गणना: x + 3(−1) + 3(0) = 0 ⇒ x = +3

👉 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: Cr3+ = d3
👉 उपसहसंयोजन संख्या: 6
👉 ज्यामिति: Octahedral (अष्टफलकीय)
👉 समावयवता: fac / mer (ज्यामितीय समावयव)
👉 चुंबकीय गुण: Paramagnetic (अनुचुम्बकीय)
👉 चुंबकीय आघूर्ण (μ): μ ≈ 3.87 BM (n = 3)

📌 (iii) [Co(NH3)5Cl]Cl2

👉 IUPAC नाम: Pentaamminechloridocobalt(III) chloride
👉 हिंदी: पेन्टाअम्मीन क्लोरिडोकोबाल्ट(III) क्लोराइड

👉 ऑक्सीकरण अवस्था (Co): +3
👉 गणना: x + 5(0) + (−1) = +2 ⇒ x = +3

👉 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: Co3+ = d6
👉 उपसहसंयोजन संख्या: 6
👉 ज्यामिति: Octahedral (अष्टफलकीय)
👉 समावयवता: (MA5B प्रकार) अलग ज्यामितीय नहीं; पर linkage (अगर ligand हो) सम्भव
👉 चुंबकीय गुण: Diamagnetic (प्रतिचुम्बकीय) (low spin d6)
👉 चुंबकीय आघूर्ण (μ): μ = 0 BM (n = 0)

📌 (iv) Cs[FeCl4]

👉 IUPAC नाम: Caesium tetrachloridoferrate(III)
👉 हिंदी: सीज़ियम टेट्राक्लोरिडोफेरेट(III)

👉 ऑक्सीकरण अवस्था (Fe): +3
👉 गणना: (+1) + x + 4(−1) = 0 ⇒ x = +3

👉 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: Fe3+ = d5
👉 उपसहसंयोजन संख्या: 4
👉 ज्यामिति: Tetrahedral (चतुष्फलकीय)
👉 समावयवता: (MA4 प्रकार) कोई geometrical नहीं
👉 चुंबकीय गुण: Paramagnetic (अनुचुम्बकीय)
👉 चुंबकीय आघूर्ण (μ): μ ≈ 5.92 BM (n = 5)
📌 (v) K4[Mn(CN)6]

👉 IUPAC नाम: Potassium hexacyanomanganate(II)
👉 हिंदी: पोटैशियम हेक्सासायनोमैंगनेट(II)

👉 ऑक्सीकरण अवस्था (Mn): +2
👉 गणना: 4(+1) + x + 6(−1) = 0 ⇒ x = +2

👉 इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: Mn2+ = d5
👉 उपसहसंयोजन संख्या: 6
👉 ज्यामिति: Octahedral (अष्टफलकीय)
👉 समावयवता: (MA6 प्रकार) कोई geometrical नहीं
👉 चुंबकीय गुण: Paramagnetic (अनुचुम्बकीय) (low spin d5)
👉 चुंबकीय आघूर्ण (μ): μ ≈ 1.73 BM (n = 1; CN प्रबल लिगेण्ड)
Explanation (व्याख्या)
👉 ऑक्सीकरण अवस्था निकालने का नियम:
👉 (Metal oxidation state) + (ligands के charges का योग) = complex का कुल charge
👉 उपसहसंयोजन संख्या (Coordination number):
👉 धातु से जुड़े donor atoms की कुल संख्या (oxalate/en जैसे bidentate = 2 donor)
👉 चुंबकीय आघूर्ण (spin only):
👉 μ = √(n(n+2)) BM, जहाँ n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉन
📌 समावयवता संकेत:
👉 MA3B3 type में fac/mer
👉 M(AA)2B2 type में cis/trans, और कई बार cis में optical (Δ/Λ) भी
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
📌 Quick याद:
👉 d3 (Cr3+) → लगभग हमेशा 3 unpaired → μ ≈ 3.87 BM ✅
👉 Co3+ (d6) + NH3 → अक्सर low spin → प्रतिचुम्बकीय ✅
👉 CN प्रबल लिगेण्ड है, इसलिए कई बार low spin बनाकर μ छोटा कर देता है ✅
Q.25: क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त (CFT) के आधार पर [Ti(H2O)6]3+ के बैंगनी रंग की व्याख्या कीजिए।
Answer (उत्तर)
[Ti(H2O)6]3+ बैंगनी दिखता है क्योंकि इसमें d–d संक्रमण के कारण दृश्य प्रकाश का एक भाग अवशोषित होता है और उसका पूरक रंग दिखाई देता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 Ti3+ का विन्यास d1 होता है।
👉 Octahedral field में d-कक्षकों का विभाजन t2g (नीचे) और eg (ऊपर) में होता है।
👉 d1 इलेक्ट्रॉन t2g में रहता है।
👉 प्रकाश अवशोषित करके यह t2g → eg जाता है (यही d–d संक्रमण है)।
👉 जो रंग absorb होता है, उसके पूरक (complementary) के रूप में विलयन बैंगनी दिखता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 d1 complexes (जैसे Ti3+) में color explanation सबसे आसान होता है क्योंकि सिर्फ एक electron का transition होता है ✅
Q.26: कीलेट प्रभाव (Chelate effect) से क्या तात्पर्य है? एक उदाहरण दीजिए।
Answer (उत्तर)
जब बहुदन्तुर (polydentate) लिगेण्ड धातु से जुड़कर रिंग (chelate ring) बनाते हैं, तब बने हुए complex की स्थायित्व (stability) समान एकदन्तुक (monodentate) लिगेण्ड की तुलना में अधिक हो जाती है। इसी को कीलेट प्रभाव (Chelate effect) कहते हैं।
👉 उदाहरण: [Cu(en)2]2+ (en = ethylenediamine) अक्सर [Cu(NH3)4]2+ जैसे एकदन्तुक complexes से ज्यादा स्थायी होता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 bidentate / polydentate ligands एक साथ कई बन्ध बनाते हैं, इसलिए complex “खुलना” मुश्किल हो जाता है।
👉 साथ ही reaction में कणों की संख्या बढ़ने से entropy बढ़ती है, जो stability बढ़ाने में मदद करती है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
📌 सबसे common example (Exam favourite):
👉 [Cu(en)2]2+ अक्सर [Cu(NH3)4]2+ जैसे monodentate complexes से ज्यादा स्थायी होता है ✅
Q.27: प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए, निम्नलिखित में उपसहसंयोजन यौगिकों की भूमिका की संक्षिप्त विवेचना कीजिए—
(i) जैव प्रणालियाँ
(ii) औषध रसायन
(iii) विश्लेषणात्मक रसायन
(iv) धातुओं का निष्कर्षण/धातुकर्म
Answer (उत्तर)
👉 (i) जैव प्रणालियाँ: क्लोरोफिल (Mg-complex), हीमोग्लोबिन (Fe-complex) जैसे संकुल जीवन प्रक्रियाओं में जरूरी हैं।
👉 उदाहरण: हीमोग्लोबिन (Fe-complex) ऑक्सीजन का वहन करता है।
👉 (ii) औषध रसायन: कुछ complexes दवा की तरह काम करते हैं या विषैली धातुओं को बाँधकर बाहर निकालते हैं (chelation therapy)।
👉 उदाहरण: EDTA का उपयोग Pb2+ (लेड) विषाक्तता में। (या cis-platin कैंसर उपचार में)
👉 (iii) विश्लेषणात्मक रसायन: रंगीन complexes बनाकर धातु आयनों की पहचान/मात्रा ज्ञात की जाती है।
👉 उदाहरण: DMG के साथ Ni2+ का लाल complex (test)।
👉 (iv) धातुओं का निष्कर्षण/धातुकर्म: कुछ धातुएँ complex बनाकर घोल में चली जाती हैं, फिर अलग की जाती हैं।
👉 उदाहरण: Au का cyanide संकुल (जैसे [Au(CN)2]) सोने के निष्कर्षण में काम आता है।
Explanation (व्याख्या)
👉 समन्वय (Coordination) यौगिकों में धातु–लिगेण्ड (metal–ligand) बन्धन के कारण विशेष गुण जैसे रंग, स्थिरता, घुलनशीलता और अभिक्रियाशीलता (reactivity) विकसित होते हैं।
👉 यही गुण उन्हें शरीर की प्रणालियों, औषधियों, विश्लेषण (जाँच) और धातुकर्म में उपयोगी बनाते हैं।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Chelate (कीलेट) complexes अक्सर ज्यादा stable होते हैं, इसलिए therapy और analysis में बहुत काम आते हैं ✅
Q.28: संकुल [Co(NH3)6]Cl2 से विलयन में कितने आयन उत्पन्न होंगे?
(i) 6
(ii) 4
(iii) 3
(iv) 2
Answer (उत्तर)
👉 3 आयन (Option iii)
Explanation (व्याख्या)
👉 Dissociation:
[Co(NH3)6]Cl2 → [Co(NH3)6]2+ + 2Cl

👉 कुल आयन = 1 + 2 = 3
Did You Know?
👉 [ ] के बाहर वाले आयन ही घोल में अलग आयन बनते हैं ✅
Q.29: निम्न में से किसका चुंबकीय आघूर्ण (μ) सबसे अधिक होगा?
(i) [Cr(H2O)6]3+
(ii) [Fe(H2O)6]2+
(iii) [Zn(H2O)6]2+
Answer (उत्तर)
👉 [Fe(H2O)6]2+ का μ सबसे अधिक होगा।
Explanation (व्याख्या)
👉 Cr3+ = d3 → 3 अयुग्मित (unpaired) इलेक्ट्रॉन
👉 Fe2+ = d6 (H2O weak ligand) → high spin → 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन
👉 Zn2+ = d10 → 0 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन
👉 जितने अधिक unpaired इलेक्ट्रॉन, उतना अधिक μ, इसलिए Fe वाला सबसे ज्यादा।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 चुंबकीय आघूर्ण (μ) : μ = √(n(n+2)) BM (जहाँ n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉन) ✅
Q.30: K[Co(CO)4] में कोबाल्ट की ऑक्सीकरण संख्या है—
(i) +1
(ii) +3
(iii) –1
(iv) –3
Answer (उत्तर)
👉 –1 (Option iii)
Explanation (व्याख्या)
👉 CO neutral (0) है, इसलिए Co का oxidation state = –1

👉 गणना:
(+1) + x + 4(0) = 0
👉 ∴ x = –1
Did You Know?
👉 Carbonyl complexes में metal की oxidation state कई बार 0 या negative भी हो सकती है ✅
Q.31: निम्न में सबसे अधिक स्थायी संकुल कौन सा है?
(i) [Fe(H2O)6]3+
(ii) [Fe(NH3)6]3+
(iii) [Fe(C2O4)3]3−
(iv) [FeCl6]3−
Answer (उत्तर)
👉 [Fe(C2O4)3]3− (Option iii)
Explanation (व्याख्या)
👉 C2O42− एक bidentate (कीलेट) ligand है और 3 ligands से तीन chelate rings बनते हैं।
👉 Chelate effect के कारण stability (स्थायित्व) सबसे ज्यादा बढ़ती है।
Did You Know?
👉 Exam line: “कीलेट संकुल, एकदन्तुक लिगैण्ड की तुलना में अधिक स्थायी होते हैं।” ✅
Q.32: दृश्य प्रकाश में अवशोषण की तरंगदैर्घ्य (λ) का सही क्रम क्या होगा?
[Ni(NO2)6]4−, [Ni(NH3)6]2+, [Ni(H2O)6]2+
Answer (उत्तर)
👉 अवशोषित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य (λabs) का क्रम:
👉 [Ni(NO2)6]4− < [Ni(NH3)6]2+ < [Ni(H2O)6]2+
Explanation (व्याख्या)
👉 स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी के अनुसार ligand strength:
👉 H2O < NH3 < NO2
👉 ligand जितना प्रबल होगा, Δo उतना बड़ा होगा।
👉 इसलिए splitting (Δo) का क्रम:
👉 [Ni(H2O)6]2+ < [Ni(NH3)6]2+ < [Ni(NO2)6]4−
👉 ऊर्जा और तरंगदैर्घ्य का सम्बन्ध:
E = hc/λ
👉 अर्थात E बढ़े तो λ घटती है।

👉 इसलिए अवशोषित प्रकाश की तरंगदैर्घ्य (λabs) का क्रम उल्टा हो जाता है: [Ni(NO2)6]4− < [Ni(NH3)6]2+ < [Ni(H2O)6]2+
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
👉 Quick Trick:
👉 Strong ligand → Δo बड़ा → energy ज्यादा → λabs छोटी ✅
👉 और जो रंग absorb होता है, विलयन अक्सर उसका पूरक (complementary) रंग दिखाता है।
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