NCERT Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 4 – Chemical Bonding and Molecular Structure (रासायनिक आबन्धन एवं आण्विक संरचना)
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Q.1: मेथेन के क्लोरीनीकरण के दौरान एथेन कैसे बनती है? आप इसे कैसे समझाएँगे?
Answer (उत्तर)
✅ मेथेन का क्लोरीनीकरण एक मुक्त मूलक (free radical) श्रृंखला अभिक्रिया है।
✅ इस प्रक्रिया में बना मेथिल मुक्त मूलक (CH₃•) आपस में जुड़कर एथेन (C₂H₆) बनाता है।
✅ इसलिए एथेन, क्लोरीनीकरण के दौरान श्रृंखला समापन (chain termination) चरण में उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है।
Explanation: व्याख्या (Step by Step)
👉 (i) श्रृंखला समारम्भ (Chain initiation):
Cl₂ ⟶ Cl• + Cl• (प्रकाश/ऊष्मा की उपस्थिति में)

👉 (ii) श्रृंखला संचरण (Chain propagation):
CH₄ + Cl• ⟶ CH₃• + HCl
CH₃• + Cl₂ ⟶ CH₃Cl + Cl•
इस चरण में CH₃• लगातार बनते रहते हैं।

👉 (iii) श्रृंखला समापन (Chain termination):
जब दो मुक्त मूलक आपस में टकराते हैं, तो अभिक्रिया रुकती है:
CH₃• + CH₃• ⟶ C₂H₆ (एथेन)
CH₃• + Cl• ⟶ CH₃Cl
Cl• + Cl• ⟶ Cl₂

👉 इसलिए स्पष्ट है कि एथेन का निर्माण CH₃• मूलकों के युग्मन (coupling) से होता है।
Did you know ( क्या आप जानते हैं?)
✅ मुक्त मूलक अभिक्रियाओं में मुख्य उत्पाद के साथ थोड़ी मात्रा में coupling products भी बन सकते हैं।

✅ मेथेन के क्लोरीनीकरण में CH₃Cl के साथ CH₂Cl₂, CHCl₃ और CCl₄ भी क्रमशः बन सकते हैं (स्थिति के अनुसार)।

प्रकाश (hν) मुक्त मूलक अभिक्रियाओं को शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
Q.8: निम्नलिखित हाइड्रोकार्बनों के दहन की रासायनिक अभिक्रियाएँ लिखिए:
(i) ब्यूटेन
(ii) पेन्टीन
(iii) हेक्साइन
(iv) टॉलूईन
Answer (उत्तर)
✅ संतुलित दहन समीकरण:

(i) ब्यूटेन (C₄H₁₀):
C₄H₁₀(g) + 13/2 O₂(g) → 4CO₂(g) + 5H₂O(g)

(ii) पेन्टीन (C₅H₁₀):
C₅H₁₀(g) + 15/2 O₂(g) → 5CO₂(g) + 5H₂O(g)

(iii) हेक्साइन (C₆H₁₀):
C₆H₁₀(g) + 17/2 O₂(g) → 6CO₂(g) + 5H₂O(g)

(iv) टॉलूईन (C₇H₈):
C₇H₈(g) + 9O₂(g) → 7CO₂(g) + 4H₂O(g)
व्याख्या (Step by Step)
👉 पूर्ण दहन (complete combustion) में हाइड्रोकार्बन ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलकर CO₂ और H₂O बनाते हैं।

👉 संतुलन का आसान नियम:
• जितने C परमाणु, उतने CO₂
• जितने H परमाणु, उसका आधा H₂O
• फिर O परमाणुओं के आधार पर O₂ का गुणांक तय करते हैं।

👉 उदाहरण (पेन्टीन):
C₅H₁₀ → 5CO₂ और 5H₂O
दाएँ तरफ कुल O = (5×2) + (5×1) = 15 O परमाणु
इसलिए O₂ = 15/2

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👉 इसी विधि से बाकी सभी समीकरण संतुलित किए गए हैं।
क्या आप जानते हैं?
✅ यदि O₂ पर्याप्त न हो, तो अपूर्ण दहन से CO (कार्बन मोनोऑक्साइड) या कार्बन (कालिख) बन सकता है।

✅ दहन अभिक्रियाएँ सामान्यतः ऊष्माक्षेपी (exothermic) होती हैं, यानी ऊष्मा निकलती है।

✅ समान कार्बन संख्या वाले यौगिकों में संरचना (अल्केन/अल्कीन/अल्काइन/एरोमैटिक) के अनुसार दहन का व्यवहार और ज्वाला-स्वभाव अलग हो सकता है।
Q.10: बेंजीन में तीन द्वि-आबंध होते हुए भी यह अत्यधिक स्थायी क्यों है?
Answer (उत्तर)
✅ बेंजीन के अति स्थायित्व का मुख्य कारण उसके 6 π-इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण (delocalization) है।
✅ ये π-इलेक्ट्रॉन किसी एक C=C बंध तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे बेंजीन वलय में फैले रहते हैं
✅ इस कारण बेंजीन को अनुनाद से स्थायित्व प्राप्त होता है, इसलिए वह अपेक्षा से अधिक स्थायी होता है।
व्याख्या (Step by Step)
👉 बेंजीन में प्रत्येक कार्बन sp² संकरित होता है और एक खाली p-कक्षक बचता है।

👉 ये सभी खाली p-कक्षक आपस में पार्श्व (sidewise) अतिव्यापन करके वलय के ऊपर और नीचे एक सतत π-अभ्र बना देते हैं।

👉 परिणामस्वरूप 6 π-इलेक्ट्रॉन पूरे वलय में विस्थानीकृत (delocalized) हो जाते हैं।

👉 जब इलेक्ट्रॉन पूरे अणु में फैल जाते हैं, तो अणु की ऊर्जा घटती है और स्थिरता बढ़ती है

👉 यही कारण है कि बेंजीन सामान्य अल्कीनों की तरह तीव्र योग अभिक्रियाएँ कम देता है और अपनी एरोमैटिक संरचना को बनाए रखता है।
क्या आप जानते हैं?
✅ बेंजीन के सभी C–C बंधों की लंबाई लगभग समान (~1.39 Å) होती है, जो एकल और द्वि-बंध के बीच की होती है।

✅ यदि बेंजीन में सचमुच अलग-अलग 3 एकल और 3 द्वि-बंध स्थिर रूप में होते, तो बंध-लंबाइयाँ अलग-अलग मिलतीं, पर प्रयोग ऐसा नहीं दिखाते।

✅ बेंजीन की अतिरिक्त स्थिरता को रेजोनेंस ऊर्जा से भी व्यक्त किया जाता है।
Q.11: किसी यौगिक द्वारा एरोमैटिकता (Aromaticity) प्रदर्शित करने के लिए आवश्यक शर्तें क्या हैं?
उत्तर (उत्तर)
✅ किसी अणु के एरोमैटिक होने के लिए मुख्य शर्तें ये हैं:

👉 अणु चक्रीय (cyclic) होना चाहिए और उसमें π-इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकरण (delocalization) हो।

👉 अणु समतलीय (planar) होना चाहिए, ताकि p-कक्षकों का निरंतर अतिव्यापन हो सके।

👉 अणु को हकल नियम (Hückel Rule) मानना चाहिए:

π-इलेक्ट्रॉनों की संख्या = (4n+2), n = 0,1,2,3,…
Explanation (व्याख्या – Step by Step)
👉 पहली शर्त: चक्रीय संरचना + π-इलेक्ट्रॉन बादल
एरोमैटिक यौगिक में वलय (ring) के ऊपर और नीचे π-इलेक्ट्रॉनों का एक सतत चक्रीय बादल बनता है। यही delocalized cloud अणु को अतिरिक्त स्थिरता देता है।

👉 दूसरी शर्त: समतलीयता (Planarity)
यदि अणु समतल नहीं होगा, तो p-कक्षक एक-दूसरे के साथ सही ढंग से overlap नहीं करेंगे।
जब p-कक्षक लगातार overlap करते हैं, तभी π-इलेक्ट्रॉन पूरे वलय में फैल पाते हैं।

👉 तीसरी शर्त: (4n+2) π-इलेक्ट्रॉन
यह एरोमैटिकता की सबसे महत्वपूर्ण गणितीय शर्त है।
अगर π-इलेक्ट्रॉनों की संख्या 2, 6, 10, 14… जैसी हो, तो यौगिक सामान्यतः एरोमैटिक माना जाता है (जब बाकी शर्तें भी पूरी हों)।

👉 निष्कर्ष
एरोमैटिकता सिर्फ रिंग होने से नहीं आती, बल्कि चक्रीय + समतलीय + (4n+2) π-इलेक्ट्रॉन तीनों शर्तें साथ में पूरी होनी चाहिए।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
बेंजीन (C₆H₆) एरोमैटिकता का सबसे क्लासिक उदाहरण है, क्योंकि इसमें 6 π-इलेक्ट्रॉन होते हैं (n=1, तो 4n+2 = 6)।

✅ अगर चक्रीय और समतलीय अणु में π-इलेक्ट्रॉन 4n हों (जैसे 4, 8, 12…), तो वह अक्सर एंटीएरोमैटिक व्यवहार दिखा सकता है, जो कम स्थिरता से जुड़ा होता है।

✅ एरोमैटिकता की वजह से कई कार्बनिक यौगिक अपेक्षाकृत कम क्रियाशील होते हैं और उनकी स्थिरता अधिक होती है।
Q.15: क्वथनांक पर ऐल्केनों में शाखन (Branching) का क्या प्रभाव पड़ता है?
Answer (उत्तर)
✅ ऐल्केनों में शाखन (Branching) बढ़ने पर क्वथनांक घटता है
Explanation (व्याख्या – Step by Step)
👉 सीधी शृंखला में संपर्क क्षेत्र अधिक
जब ऐल्केन की शृंखला सीधी (straight chain) होती है, तब अणुओं का आपसी surface contact ज्यादा होता है।

👉 शाखन से अणु अधिक compact
शाखन बढ़ने पर अणु का आकार अधिक सघन (compact) और लगभग गोले जैसा हो जाता है।

👉 आकर्षण बल घटते हैं
गोले जैसे आकार में प्रभावी पृष्ठ क्षेत्रफल कम होता है, इसलिए अणुओं के बीच Van der Waals/London forces घटते हैं।

👉 ऊर्जा कम चाहिए, क्वथनांक कम
अंतराअणुक बल कम होने पर अणुओं को अलग करने के लिए कम ऊर्जा चाहिए, इसलिए क्वथनांक कम हो जाता है।

✅ इसलिए: n-पेन्टेन > आइसोपेन्टेन > नियोपेन्टेन (क्वथनांक का क्रम)
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
✅ समान आणविक सूत्र वाले समावयवों (isomers) में, अधिक शाखित समावयव का क्वथनांक सामान्यतः कम होता है।

✅ शाखन बढ़ने से कई बार ऑक्टेन संख्या (petrol quality) बढ़ती है, इसलिए branched alkanes ईंधन रसायन में महत्वपूर्ण हैं।
Q.18: बेंजीन, n-हेक्सेन तथा एथाइन को घटते हुए अम्लीय व्यवहार के क्रम में व्यवस्थित कीजिए और इस व्यवहार का कारण बताइए।
Answer (उत्तर)
✅ घटते हुए अम्लीय व्यवहार का क्रम:
एथाइन > बेंजीन > n-हेक्सेन
व्याख्या (Step by Step)
📌 अम्लीय व्यवहार को समझने के लिए उस कार्बन का संकरण (hybridization) देखते हैं, जिससे H जुड़ा है।
👉 एथाइन (HC≡CH) में C = sp
👉 बेंजीन (C₆H₆) में C = sp²
👉 n-हेक्सेन में C = sp³

📌 s-लक्षण (s-character):
👉 sp = 50%
👉 sp² = 33.3%
👉 sp³ = 25%

📌 s-लक्षण जितना अधिक होगा, कार्बन उतना अधिक विद्युतऋणात्मक प्रभाव दिखाता है और C–H बंध के इलेक्ट्रॉन नाभिक के पास अधिक खिंचे रहते हैं। इससे H⁺ निकलने के बाद बनने वाला संयुग्मी क्षार तुलनात्मक रूप से अधिक स्थिर होता है।

📌 इसलिए अम्लीयता का क्रम: sp > sp² > sp³
अर्थात एथाइन > बेंजीन > n-हेक्सेन
क्या आप जानते हैं?
✅ टर्मिनल अल्काइन (जैसे एथाइन) का H साधारण अल्केन की तुलना में काफी अधिक अम्लीय होता है, इसलिए वह प्रबल क्षारों (जैसे NaNH₂) से हटाया जा सकता है।

✅ अल्केन (sp³ C–H) बहुत कमजोर अम्ल होते हैं, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में H⁺ नहीं छोड़ते।

✅ संकरण आधारित अम्लीयता का यही नियम कार्बेनियन की स्थिरता समझने में भी बहुत उपयोगी है।
Q.19: बेंजीन इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ आसानी से क्यों देता है, जबकि नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है?
Answer (उत्तर)
✅ बेंजीन में वलय के ऊपर और नीचे π-इलेक्ट्रॉनों का विस्थानीकृत अभ्र (electron cloud) होता है, इसलिए वह इलेक्ट्रॉनस्नेही (electrophile) को आसानी से आकर्षित करता है।
✅ इसी कारण बेंजीन में इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन (Electrophilic Substitution) सरलता से होता है।
✅ जबकि नाभिकस्नेही (nucleophile) इलेक्ट्रॉन-समृद्ध बेंजीन वलय पर आसानी से आक्रमण नहीं कर पाता, इसलिए नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन होता है।
Explanation (व्याख्या – Step by Step)
👉 1) बेंजीन की इलेक्ट्रॉनिक प्रकृति
बेंजीन (C₆H₆) में 6 π-इलेक्ट्रॉन पूरे वलय में विस्थानीकृत (delocalized) रहते हैं। यह π-इलेक्ट्रॉन घनत्व वलय के ऊपर-नीचे फैला रहता है।

👉 2) इलेक्ट्रॉनस्नेही के लिए अनुकूल स्थिति
इलेक्ट्रॉनस्नेही इलेक्ट्रॉन की कमी वाला कण होता है।
बेंजीन का π-इलेक्ट्रॉन अभ्र उसे इलेक्ट्रॉन उपलब्ध कराता है, इसलिए इलेक्ट्रॉनस्नेही आसानी से आकर्षित होता है और अभिक्रिया आगे बढ़ती है।

👉 3) प्रतिस्थापन क्यों, योग (addition) क्यों नहीं
बेंजीन अपनी एरोमैटिक स्थिरता बनाए रखना चाहता है, इसलिए वह प्रायः प्रतिस्थापन देता है, योग नहीं

👉 4) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन क्यों
नाभिकस्नेही इलेक्ट्रॉन-समृद्ध होता है।
बेंजीन वलय भी π-इलेक्ट्रॉन से समृद्ध है, इसलिए नाभिकस्नेही का आक्रमण प्रतिकूल (electron-electron repulsion) होता है।
इसलिए सामान्य परिस्थितियों में नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन आसानी से नहीं होती।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
✅ बेंजीन पर साधारण नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन तभी आसान होती है जब वलय पर प्रबल इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह (जैसे –NO₂) और उपयुक्त लीविंग ग्रुप मौजूद हों।
लीविंग ग्रुप = वह परमाणु/समूह होता है जो अभिक्रिया के दौरान बंध के इलेक्ट्रॉन युग्म (electron pair) के साथ अणु से अलग हो जाता है।

✅ बेंजीन में नाइट्रेशन, सल्फोनेशन, हैलोजनीकरण और फ्राइडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रियाएँ एरोमैटिक यौगिकों की इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।
Q.22: निम्नलिखित यौगिकों को इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिकर्मक (E⁺) के प्रति घटती हुई आपेक्षिक क्रियाशीलता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
(क) क्लोरोबेंजीन, p-नाइट्रोक्लोरोबेंजीन, 2,4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन
(ख) टॉलूईन, p-H₃C–C₆H₄–NO₂, p-O₂N–C₆H₄–NO₂
Answer (उत्तर)
✅ (क) घटती क्रियाशीलता का क्रम:
क्लोरोबेंजीन > p-नाइट्रोक्लोरोबेंजीन > 2,4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन

✅ (ख) घटती क्रियाशीलता का क्रम:
टॉलूईन > p-H₃C–C₆H₄–NO₂ > p-O₂N–C₆H₄–NO₂
Explanation (व्याख्या – Step by Step)
👉 मुख्य नियम:
EAS (Electrophilic Aromatic Substitution) में जिस वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक होगा, वह E⁺ के प्रति अधिक क्रियाशील होगा।

👉 –CH₃ समूह का प्रभाव (Activating):
–CH₃ समूह +I प्रभाव देता है, वलय में इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाता है, इसलिए क्रियाशीलता बढ़ती है।

👉 –NO₂ समूह का प्रभाव (Strong Deactivating):
–NO₂ समूह –I और –M दोनों प्रभाव से वलय से इलेक्ट्रॉन घनत्व कम करता है, इसलिए E⁺ के प्रति क्रियाशीलता घटती है।

(क) के लिए तर्क
👉 क्लोरोबेंजीन में केवल Cl है; यह कुल मिलाकर निष्क्रियकारी समूह (deactivating) है, लेकिन –NO₂ जितना प्रबल निष्क्रियकारी नहीं।
👉 p-नाइट्रोक्लोरोबेंजीन में एक –NO₂ जुड़ने से वलय और कम क्रियाशील हो जाती है।
👉 2,4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन में दो –NO₂ होने से क्रियाशीलता और भी कम हो जाती है।
इसलिए:
क्लोरोबेंजीन > p-नाइट्रोक्लोरोबेंजीन > 2,4-डाइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन

(ख) के लिए तर्क
👉 टॉलूईन (methylbenzene) में –CH₃ सक्रियकारी समूह (activating group) है, इसलिए सबसे अधिक क्रियाशील है।
👉 p-H₃C–C₆H₄–NO₂ में एक –CH₃ (सक्रियकारी समूह) और एक –NO₂ (निष्क्रियकारी समूह) है;
कुल प्रभाव टॉलूईन से कम क्रियाशीलता ।
👉 p-O₂N–C₆H₄–NO₂ में दो –NO₂ हैं, इसलिए सबसे कम reactive।
इसलिए:
टॉलूईन > p-H₃C–C₆H₄–NO₂ > p-O₂N–C₆H₄–NO₂
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
–NO₂ सबसे प्रबल निष्क्रियकारी समूह में से एक है, जबकि –CH₃ दूर्बल सक्रियकारी समूह माना जाता है।

✅ एक से अधिक निष्क्रियकारी समूह होने पर एरोमैटिक रिंग की नाइट्रेशन, हैलोजनीकरण जैसी अभिक्रियाएँ बहुत धीमी हो जाती हैं।
Q.23: बेंजीन, m-डाइनाइट्रोबेंजीन तथा टॉलूईन में से किसका नाइट्रीकरण आसानी से होता है और क्यों?
Answer (उत्तर)
✅ नाइट्रीकरण सबसे आसानी से टॉलूईन का होता है।
✅ इसके बाद बेंजीन का नाइट्रीकरण होता है।
✅ सबसे कठिन नाइट्रीकरण m-डाइनाइट्रोबेंजीन का होता है।
✅ घटता हुआ क्रम:
टॉलूईन > बेंजीन > m-डाइनाइट्रोबेंजीन
Explanation (व्याख्या – Step by Step)
👉 1) नाइट्रीकरण किस प्रकार की अभिक्रिया है?
नाइट्रीकरण, एरोमैटिक यौगिकों की इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया (EAS) है।
इसमें वलय पर इलेक्ट्रॉन घनत्व जितना अधिक होगा, अभिक्रिया उतनी आसान होगी।

👉 2) टॉलूईन में –CH₃ का प्रभाव
–CH₃ समूह इलेक्ट्रॉनदाता (+I प्रभाव) होता है।
यह बेंजीन वलय में इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाता है, इसलिए इलेक्ट्रॉनस्नेही (NO₂⁺) का आक्रमण आसान हो जाता है।
इसलिए टॉलूईन सबसे अधिक reactive है।

👉 3) बेंजीन की स्थिति
बेंजीन में कोई अतिरिक्त सक्रियकारी समूह या निष्क्रियकारी समूह नहीं होता, इसलिए इसकी क्रियाशीलता मध्यम रहती है।

👉 4) m-डाइनाइट्रोबेंजीन में –NO₂ समूहों का प्रभाव
–NO₂ समूह प्रबल इलेक्ट्रॉन-निष्कासक (–I, –M) होता है।
m-डाइनाइट्रोबेंजीन में दो –NO₂ समूह होने से वलय का इलेक्ट्रॉन घनत्व बहुत कम हो जाता है, इसलिए NO₂⁺ का आक्रमण कठिन हो जाता है।
इसलिए इसका नाइट्रीकरण सबसे कठिन होता है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
–CH₃ जैसे सक्रियकारी समूह , EAS की गति बढ़ाते हैं, जबकि –NO₂ जैसे निष्क्रियकारी समूह गति बहुत घटा देते हैं।

✅ m-डाइनाइट्रोबेंजीन में नाइट्रो जैसे निष्क्रियकारी समूह के कारण वलय में नाइट्रेशन के लिए प्रबल परिस्थितियाँ (stronger conditions) लग सकती हैं।
Q.24: बेंजीन के एथिलीकरण (Friedel-Crafts Alkylation) में निर्जल AlCl₃ के स्थान पर कौन-से अन्य लुईस अम्ल प्रयुक्त किए जा सकते हैं?
Answer (उत्तर)
✅ निर्जल AlCl₃ के स्थान पर ये लुईस अम्ल उपयोग किए जा सकते हैं:
👉 निर्जल FeCl₃
👉 SnCl₄
👉 BF₃
Explanation (व्याख्या – Step by Step)
👉 फ्राइडेल-क्राफ्ट्स एथिलीकरण में लुईस अम्ल का मुख्य कार्य ऐल्किल हैलाइड को सक्रिय करके इलेक्ट्रॉनस्नेही कण (इलेक्ट्रोफाइल) बनाना होता है।

👉 AlCl₃ की तरह FeCl₃, SnCl₄ और BF₃ भी इलेक्ट्रॉन-युग्म स्वीकार करने की क्षमता रखते हैं, इसलिए ये प्रभावी लुईस अम्ल उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं।

👉 जब उत्प्रेरक ऐल्किल हैलाइड को सक्रिय करता है, तब बेंजीन वलय पर इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया आसानी से हो जाती है।
Did You Know? (क्या आप जानते हैं?)
✅ प्रयोगशाला और उद्योग में उत्प्रेरक का चयन सब्सट्रेट की प्रकृति, लागत, नमी के प्रति संवेदनशीलता और उप-उत्पादों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

✅ फ्राइडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रियाओं में निर्जल परिस्थितियाँ बहुत आवश्यक होती हैं, क्योंकि नमी उत्प्रेरक को निष्क्रिय कर सकती है।
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