NCERT Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 6 – Haloalkanes and Haloarenes (हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन)
📘 यहाँ आपको Class 12 Chemistry Chapter 6 NCERT Solutions (Hindi + English Medium) में सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों के सटीक उत्तर और Step-by-Step Explanation मिलेंगे। इस chapter में IUPAC nomenclature of halo compounds, Preparation of haloalkanes and haloarenes, Physical and chemical properties, Nucleophilic substitution reactions (SN1/SN2), Elimination reactions, Reactivity of haloarenes, और Polyhalogen compounds (DDT, BHC, CCl4, CHI3) को आसान भाषा में समझाया गया है ताकि आपकी board exam preparation के साथ JEE/NEET foundation भी मजबूत हो। ✅
👉 किसी भी question को जल्दी ढूंढने के लिए नीचे दिए गए Search Box में Q. नंबर (जैसे Q.2, Q.8, Q.13) या question का keyword (जैसे SN1, SN2, Haloarene, Chlorobenzene, Wurtz reaction, Sandmeyer reaction, Grignard reagent, DDT uses) टाइप करें। ✅
- Example: Search में लिखें: Q.9 या Haloalkane या SN2 reaction
- Tip: 2–3 keyword से सही question जल्दी मिल जाता है।
- Mobile: Browser का Find in page (Chrome: Menu → Find in page) भी use कर सकते हैं।
(i) (CH3)2CHCH(Cl)CH3
(ii) CH3CH2CH(CH3)CH(C2H5)Cl
(iii) CH3CH2C(CH3)2CH2I
(iv) (CH3)3CCH2CH(Br)C6H5
(v) CH3CH(CH3)CH(Br)CH3
(vi) CH3C(C2H5)2CH2Br
(vii) CH3C(Cl)(C2H5)CH2CH3
(viii) CH3CH=C(Cl)CH2CH(CH3)2
(ix) CH3CH=CHC(Br)(CH3)2
(x) p-ClC6H4CH2CH(CH3)2
(xi) m-ClCH2C6H4CH2C(CH3)3
(xii) o-Br-C6H4CH(CH3)CH2CH3
2. 3-क्लोरो-4-मेथिलहेक्सेन — 2° ऐल्किल हैलाइड
3. 1-आयोडो-2,2-डाइमेथिलब्यूटेन — 1° ऐल्किल हैलाइड
4. 1-ब्रोमो-3,3-डाइमेथिल-1-फेनिलब्यूटेन — 2° बेंज़िलिक हैलाइड
5. 2-ब्रोमो-3-मेथिलब्यूटेन — 2° ऐल्किल हैलाइड
6. 1-ब्रोमो-2-एथिल-2-मेथिलब्यूटेन — 1° ऐल्किल हैलाइड
7. 3-क्लोरो-3-मेथिलपेंटेन — 3° ऐल्किल हैलाइड
8. 3-क्लोरो-5-मेथिलहेक्स-2-ईन — वाइनिलिक हैलाइड
9. 4-ब्रोमो-4-मेथिलपेंट-2-ईन — ऐलीलिक हैलाइड
10. 1-क्लोरो-4-(2-मेथिलप्रोपिल) बेंजीन — ऐरिल हैलाइड
11. 1-(क्लोरोमेथिल)-3-(2,2-डाइमेथिलप्रोपिल) बेंजीन — 1° बेंज़िलिक हैलाइड
12. 1-ब्रोमो-2-(1-मेथिलप्रोपिल) बेंजीन — ऐरिल हैलाइड
👉 स्टेप 1: पहले IUPAC नाम लिखो
• सबसे लंबी मुख्य शृंखला चुनो।
• हैलोजन (Cl, Br, I) और अन्य उपस्थापकों को सही स्थान संख्या दो।
• डबल बॉन्ड हो तो “-ईन” का स्थान भी सही दो।
👉 स्टेप 2: अब वर्गीकरण करो
हैलोजन जिस कार्बन पर लगा है, उसकी प्रकृति देखकर वर्ग बताओ:
1. ऐल्किल हैलाइड: हैलोजन sp3 कार्बन पर हो (सामान्य खुली शृंखला)।
2. वाइनिलिक हैलाइड: हैलोजन सीधे C=C वाले कार्बन पर हो।
3. ऐलीलिक हैलाइड: हैलोजन C=C के पास वाले कार्बन पर हो।
4. बेंज़िलिक हैलाइड: हैलोजन बेंजीन रिंग के बगल वाले कार्बन (–CH2–) पर हो।
5. ऐरिल हैलाइड: हैलोजन सीधे बेंजीन रिंग पर लगा हो।
👉 स्टेप 3: 1°, 2°, 3° कैसे तय करें?
जिस कार्बन पर हैलोजन लगा है, उससे जुड़े कार्बनों की संख्या गिनो:
• 1 कार्बन जुड़ा → 1°
• 2 कार्बन जुड़े → 2°
• 3 कार्बन जुड़े → 3°
इसी नियम से ऊपर दिए गए 12ों यौगिकों का वर्गीकरण किया गया है।
✅ बेंज़िलिक हैलाइड कई बार तेजी से अभिक्रिया देते हैं, क्योंकि बनने वाला बेंज़िलिक कार्बोकैटायन अनुनाद से स्थिर हो जाता है।
✅ ऐरिल हैलाइड का व्यवहार साधारण ऐल्किल हैलाइड से अलग होता है, इसलिए इनके अभिक्रिया-मार्ग भी अलग मिलते हैं।
✅ नामकरण में छोटी गलती अक्सर नंबरिंग से होती है, इसलिए हमेशा पहले मुख्य शृंखला + न्यूनतम लोकेंट नियम चेक करें।
👉 ऐसे नाभिकरागी को ही उभयदन्ती नाभिकरागी (Ambident nucleophile) कहा जाता है।
Example (उदाहरण)
✅ सायनाइड आयन (CN-) उभयदन्ती नाभिकरागी है।
• यह कार्बन (C) छोर से भी आक्रमण कर सकता है।
• यह नाइट्रोजन (N) छोर से भी आक्रमण कर सकता है।
इसी कारण CN- से अलग-अलग प्रकार के उत्पाद बन सकते हैं (जैसे ऐल्किल सायनाइड/नाइट्राइल और ऐल्किल आइसोसायनाइड), जो आक्रमण के स्थान पर निर्भर करते हैं।
C- छोर से भी आक्रमण (cyanide / nitrile बनता है):
R–X + KCN → R–C≡N + KX
(उत्पाद: ऐल्किल सायनाइड / नाइट्राइल)
N- छोर से भी आक्रमण (isocyanide) बनता है):
R–X + AgCN → R–N≡C + AgX
(उत्पाद: ऐल्किल आइसोसायनाइड)
✅ उभयदन्ती नाभिकरागी में कौन-सा छोर आक्रमण करेगा, यह अभिक्रिया की दशाओं, विलायक और अभिकारक की प्रकृति पर निर्भर करता है।
(i) CH3Br अथवा CH3I
(ii) (CH3)3CCl अथवा CH3Cl
(ii) CH3Cl अधिक तेजी से अभिक्रिया करेगा।
👉 SN2 में अच्छा leaving group (निर्गमन समूह) होने पर अभिक्रिया तेज होती है।
👉 I– , Br– की तुलना में बेहतर leaving group है।
👉 इसलिए CH3I में C–I बंध अपेक्षाकृत आसानी से टूटता है और OH– का आक्रमण जल्दी होता है।
✅ इसलिए CH3I की SN2 गति अधिक है।
(ii) (CH3)3CCl v/s CH3Cl
👉 SN2 अभिक्रिया में nucleophile को पीछे से (backside attack) आना पड़ता है।
👉 (CH3)3CCl एक तृतीयक (3°) यौगिक है, इसमें बहुत अधिक त्रिविम बाधा (steric hindrance) होती है।
👉 CH3Cl में बाधा बहुत कम होती है, इसलिए OH– आसानी से attack कर सकता है।
✅ इसलिए CH3Cl SN2 में अधिक तीव्रता से अभिक्रिया करता है।
CH3X > 1° > 2° >> 3°
✅ SN2 अभिक्रिया एक ही चरण में होती है और इसकी दर:
Rate = k[RX][Nu–]
✅ यही कारण है कि methyl halide (जैसे CH3Cl, CH3I) अक्सर SN2 के लिए बहुत उपयुक्त माने जाते हैं।
(i) क्लोरोबेंजीन का द्विध्रुव आघूर्ण साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड की तुलना में कम होता है?
(ii) ऐल्किल हैलाइड ध्रुवीय होते हुए भी जल में अमिश्रणीय हैं?
(iii) ग्रीन्यार अभिकर्मक का विरचन निर्जलीय अवस्था में करना चाहिए?
(ii) ऐल्किल हैलाइड ध्रुवीय होने पर भी पानी में अच्छी तरह नहीं घुलते, इसलिए वे अमिश्रणीय होते हैं।
(iii) ग्रीन्यार अभिकर्मक (R–MgX) नमी/जल से तुरंत अभिक्रिया कर नष्ट हो जाता है, इसलिए इसे निर्जलीय (anhydrous) दशा में ही बनाते हैं।
👉 क्लोरोबेंजीन में C, sp2 संकरित होता है, जबकि साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड में C, sp3 संकरित होता है।
👉 sp2 कार्बन में s-लक्षण अधिक होने से वह अधिक ऋणविद्युती होता है, इसलिए C–Cl बंध कम ध्रुवीय होता है।
👉 क्लोरोबेंजीन में Cl के lone pair का बेंजीन वलय के साथ विस्थानीकरण (delocalization) होता है, जिससे C–Cl बंध में आंशिक द्विआबंध लक्षण आ जाता है।
👉 इससे C–Cl बंध अपेक्षाकृत छोटा और कम ध्रुवीय प्रभाव वाला हो जाता है।
👉 चूँकि द्विध्रुव आघूर्ण (μ) = आवेश × दूरी, और प्रभावी दूरी/ध्रुवण कम हो जाता है, इसलिए क्लोरोबेंजीन का μ कम मिलता है।
(ii) ऐल्किल हैलाइड जल में अमिश्रणीय क्यों?
👉 ऐल्किल हैलाइड अणुओं में अपने-अपने बीच द्विध्रुव आकर्षण होता है।
👉 जल के अणु आपस में मजबूत हाइड्रोजन बंध से जुड़े रहते हैं।
👉 जब हम ऐल्किल हैलाइड को पानी में मिलाते हैं, तो पानी-हैलाइड के बीच बनने वाले नए आकर्षण उतने मजबूत नहीं बनते कि पानी के हाइड्रोजन बंध को तोड़ सकें।
👉 इसलिए घुलनशीलता बहुत कम रहती है और वे प्रायः अमिश्रणीय दिखते हैं।
(iii) ग्रीन्यार अभिकर्मक निर्जलीय अवस्था में ही क्यों?
👉 ग्रीन्यार अभिकर्मक (R–MgX) बहुत क्रियाशील होता है।
👉 यह नमी या पानी से तुरंत अभिक्रिया करके हाइड्रोकार्बन बना देता है:
R–MgX + H–OH → R–H + Mg(OH)X
👉 यानी अभिक्रिया में बनने वाला हाइड्रोकार्बन ज्वलनशील होने के कारण आग पकड सकता है।
👉 इसलिए इसका निर्माण और प्रयोग हमेशा सूखे (निर्जल) ईथर तथा निर्जलीय उपकरणों में किया जाता है।
✅ ऐल्किल हैलाइड का पानी में न घुलना “like dissolves like” सिद्धांत से भी समझा जाता है।
✅ ग्रीन्यार अभिकर्मक बनाते समय कांच के उपकरण को पहले अच्छी तरह सुखाया जाता है, क्योंकि थोड़ी-सी नमी भी अभिकर्मक को नष्ट कर सकती है।
• एरोसॉल प्रणोदक (aerosol propellant) के रूप में
• प्रशीतक (refrigerant) के रूप में
• वायु शीतलन (air-conditioning) प्रणालियों में
2) DDT के उपयोग
• मुख्य रूप से कीटनाशी (insecticide) के रूप में प्रयोग
• मच्छर/कीट नियंत्रण में उपयोग हुआ
• लेकिन जीवों में इसके विषैले और जैव-संचयी प्रभावों के कारण कई स्थानों पर इसका उपयोग प्रतिबंधित/सीमित कर दिया गया
3) कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl4) के उपयोग
• शुष्क धुलाई (dry cleaning) में विलायक के रूप में
• वसा, तेल, मोम और रेजिन के लिए विलायक
• आयोडाइड/ब्रोमाइड के क्लोरीन जल परीक्षण में विलायक
• फ्रेऑन-12 के निर्माण में कच्चे पदार्थ के रूप में
• अग्निशामक द्रव (पुराने समय में, “पाइरीन” नाम से) के रूप में उपयोग
4) आयोडोफॉर्म (CHI3) के उपयोग
• पहले पूतिरोधी (antiseptic) के रूप में उपयोग किया जाता था
• इसका प्रभाव मुक्त हुई आयोडीन के कारण माना जाता है
• तीखी/अरुचिकर गंध के कारण अब इसके स्थान पर अन्य आयोडीनयुक्त दवाओं का प्रयोग अधिक होता है
👉 फ्रेऑन-12 का संबंध ठंडक देने वाली प्रणालियों से,
DDT का संबंध कीट नियंत्रण से,
CCl4 का संबंध विलायक और पुराने fire-extinguisher उपयोग से,
और आयोडोफॉर्म का संबंध पुराने antiseptic उपयोग से है।
👉 परीक्षा में अक्सर इनका उत्तर बिंदुवार (point-wise) लिखने पर ज्यादा स्पष्ट और अच्छे अंक मिलते हैं।
✅ DDT बहुत प्रभावी कीटनाशी था, पर इसकी जैव-वृद्धि (biomagnification) के कारण पर्यावरणीय चिंता बढ़ी।
✅ CCl4 गरम सतह/आग की स्थिति में हानिकारक गैसें बना सकता है, इसलिए आज इसके उपयोग में सुरक्षा मानक बहुत महत्वपूर्ण हैं।
✅ आयोडोफॉर्म का विशिष्ट पीला रंग और गंध प्रयोगशाला में इसे पहचानने में मदद करते हैं।
