NCERT Solutions for Class 12 Chemistry Chapter 9 – Biomolecules (जैव-अणु)
📘 यहाँ आपको Class 12 Chemistry Chapter 9 Biomolecules NCERT Solutions (Hindi + English Medium) में सभी महत्वपूर्ण प्रश्नों के सटीक उत्तर और Step-by-Step Explanation मिलेंगे। इस chapter में Carbohydrates (mono, di, poly-saccharides), Proteins (peptide bond, primary/secondary structure, denaturation), Enzymes, Vitamins (A, C, K आदि), Nucleic acids (DNA, RNA, nucleoside, nucleotide), और Biological functions को आसान भाषा में समझाया गया है ताकि आपकी board exam preparation के साथ NEET/JEE foundation भी मजबूत हो। ✅
👉 किसी भी question को जल्दी ढूंढने के लिए नीचे दिए गए Search Box में Q. नंबर (जैसे Q.1, Q.12, Q.24) या question का keyword (जैसे Monosaccharide, Glycosidic bond, Denaturation, Enzyme, DNA vs RNA, Vitamin K) टाइप करें। ✅
- Example: Search में लिखें: Q.10 या Reducing sugar या Nucleotide
- Tip: 2–3 keyword से सही question जल्दी मिल जाता है।
- Mobile: Browser का Find in page (Chrome: Menu → Find in page) भी use कर सकते हैं।
✅ सरल शब्दों में: मोनोसैकेराइड, कार्बोहाइड्रेट की सबसे छोटी इकाई (simple sugar unit) होते हैं।
✅ उदाहरण: ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़, गैलेक्टोज़ ।
कार्बोहाइड्रेट ऐसे जैविक यौगिक हैं जो ऊर्जा का प्रमुख स्रोत होते हैं।
👉 जल-अपघटन का मतलब
जब किसी यौगिक को पानी की उपस्थिति में तोड़ा जाता है, उसे जल-अपघटन कहते हैं।
👉 मोनोसैकेराइड की पहचान
अगर कोई शर्करा (sugar) जल-अपघटन के बाद भी और छोटी शर्करा में न टूटे, तो वह मोनोसैकेराइड है।
👉 क्यों महत्वपूर्ण है?
डाइसेकेराइड और पॉलीसैकेराइड अंततः टूटकर मोनोसैकेराइड ही बनाते हैं। यानी मोनोसैकेराइड कार्बोहाइड्रेट के “बेसिक बिल्डिंग ब्लॉक्स” हैं।
✅ फ्रक्टोज़ प्राकृतिक रूप से फलों और शहद में अधिक मिलता है, इसलिए इसे “fruit sugar” भी कहते हैं।
✅ परीक्षा टिप:
“जो आगे hydrolysis से नहीं टूटे = मोनोसैकेराइड”
यह एक लाइन याद रखेंगे तो परिभाषा कभी नहीं भूलेगे।
✅ सामान्य नियम:
सभी मोनोसैकेराइड (ऐल्डोस व कीटोस) अपचायी होते हैं।
✅ डाइसैकेराइड में अधिकांश अपचायी होते हैं, लेकिन सुक्रोज़ (sucrose) अपचायी नहीं होता।
👉 टॉलेन अभिकर्मक के साथ अपचायी शर्करा अभिक्रिया करके सिल्वर मिरर टेस्ट दे सकती है।
👉 फेहलिंग विलयन के साथ अपचायी शर्करा ईंट-लाल रंग का अवक्षेप (आमतौर पर Cu2O ) देती है।
👉 मोनोसैकेराइड अपचायी इसलिए माने जाते हैं क्योंकि वे अभिक्रिया की दशाओं में ऐसा रूप दे सकते हैं जो अपचयन कर सके।
👉 सुक्रोज़ अपचायी शर्करा नहीं है, क्योंकि इसमें दोनों एनोमेरिक कार्बन ग्लाइकोसिडिक बंध में जुड़े होने से मुक्त रूप उपलब्ध नहीं रहता।
✅ माल्टोज़ और लैक्टोज़ अपचायी डाइसैकेराइड हैं, जबकि सुक्रोज़ non-reducing है।
✅ एग्ज़ाम ट्रिक:
“Sucrose = non-reducing, बाकी common mono + कई di = reducing”
यह लाइन याद रखने से MCQ जल्दी हल होते हैं।
पौधों में कार्बोहाइड्रेट, विशेषकर सेलुलोज , पादप कोशिका भित्ति (plant cell wall) का प्रमुख संरचनात्मक पदार्थ होता है।
✅ (ii) ऊर्जा/जैव ईंधन का कार्य (Biofuel/Energy role) :
कार्बोहाइड्रेट जैसे ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़, शर्करा (sugars), स्टार्च आदि ऊर्जा के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं और जैव-क्रियाओं के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं।
C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O + 2880 kJ
इसी वजह से पौधे खड़े रह पाते हैं और ऊतकों को यांत्रिक सहारा मिलता है।
👉 जब पौधों को ऊर्जा चाहिए होती है, तो कार्बोहाइड्रेट टूटकर ऊर्जा देते हैं ।
ग्लूकोज़ त्वरित ऊर्जा देता है, जबकि स्टार्च ऊर्जा का भंडारित रूप माना जाता है।
👉 इस तरह कार्बोहाइड्रेट पौधों में “बनावट + ऊर्जा” दोनों काम करते हैं।
✅ लकड़ी और रेशा (fibres) में सेलुलोज अधिक होने से उनका उपयोग कागज़, कपड़ा और कई जैव-आधारित उत्पादों में किया जाता है।
✅ एग्ज़ाम में लिखने की आसान ट्रिक:
कार्बोहाइड्रेट = Cell wall का material + Energy का fuel.
राइबोस, 2-डीऑक्सीराइबोस, गैलेक्टोस, फ्रक्टोस
✅ डाइसैकेराइड (Disaccharides) :
माल्टोस, लैक्टोस
इसलिए राइबोस, 2-डीऑक्सीराइबोस, गैलेक्टोस और फ्रक्टोस इस वर्ग में आते हैं।
👉 डाइसैकेराइड दो मोनोसैकेराइड इकाइयों से मिलकर बनते हैं।
इसलिए माल्टोस और लैक्टोस डाइसैकेराइड हैं।
✅ लैक्टोस को milk sugar भी कहा जाता है।
✅ फ्रक्टोस फलों में मिलने वाली प्रमुख शर्करा है, इसलिए इसे fruit sugar भी कहते हैं।
✅ यह बंध सामान्यतः जल के एक अणु (H2O) के निकलने से बनता है।
✅ सरल भाषा में:
Sugar unit – O - Sugar unit —> ग्लाइकोसाइडिक बंध
👉 इसके बाद दोनों इकाइयाँ एक –O– से जुड़ जाती हैं।
👉 यही –O– के माध्यम वाला जुड़ाव डाइसैकेराइड/पॉलीसैकेराइड की मूल कड़ी बनता है।
👉 उदाहरण: माल्टोस में दो ग्लूकोज़ इकाइयाँ ग्लाइकोसाइडिक बंध से जुड़ी रहती हैं।
✅ स्टार्च और सेलुलोज दोनों ग्लूकोज़ से बने हैं, लेकिन ग्लाइकोसाइडिक बंध अलग होने से उनके गुण और पाचन व्यवहार अलग होते हैं।
✅ एग्ज़ाम टिप:
“दो मोनोसैकेराइड + जल की हानि + O के माध्यम से जुड़ाव = ग्लाइकोसाइडिक बंध”
यह लाइन लिखने से उत्तर सटीक और पूरे अंक वाला बनता है।
इसे जन्तु स्टार्च (animal starch) भी कहते हैं।
✅ यह मुख्यतः यकृत (liver) और पेशियों (muscles) में जमा रहता है।
जब शरीर को ग्लूकोज़ चाहिए होता है, एन्जाइम ग्लाइकोजन को तोड़कर ग्लूकोज़ उपलब्ध करा देते हैं।
✅ स्टार्च पौधों का प्रमुख संचित पॉलीसैकेराइड है, जबकि ग्लाइकोजन जन्तुओं का।
👉 ग्लाइकोजन की संरचना बहुत अधिक शाखित (highly branched) होती है।
इस कारण यह जल्दी टूटकर ऊर्जा दे सकता है।
👉 स्टार्च दो भागों का मिश्रण है:
• ऐमाइलोस (15–20%) : अपेक्षाकृत रेखीय, जल में विलेय
• ऐमाइलोपेक्टिन (80–85%) : शाखित, जल में अविलेय
👉 ऐमाइलोपेक्टिन शाखित होता है, लेकिन ग्लाइकोजन उससे भी अधिक शाखित होता है।
यही प्रमुख संरचनात्मक अंतर है।
ग्लाइकोजन vs स्टार्च (तुलनात्मक साणी)
| आधार | ग्लाइकोजन | स्टार्च |
|---|---|---|
| 👉 स्रोत | जन्तु | पौधे |
| 👉 संग्रह-स्थान | यकृत और पेशियाँ | बीज, कंद, पौध ऊतक |
| 👉 संरचना | अत्यधिक शाखित | ऐमाइलोस + ऐमाइलोपेक्टिन का मिश्रण |
| 👉 कार्य | त्वरित ऊर्जा के लिए पशु शरीर का रिज़र्व | पौधों में ऊर्जा भंडारण |
✅ खेल-कूद के दौरान मांसपेशियों का ग्लाइकोजन तेज ऊर्जा का बड़ा स्रोत होता है।
✅ (b) लैक्टोज (Lactose) के जल-अपघटन से D-ग्लूकोज़ + D-गैलेक्टोज़ प्राप्त होते हैं।
👉 सुक्रोज एक डाइसैकेराइड है, इसलिए टूटने पर ग्लूकोज़ और फ्रक्टोज़ देता है।
👉 लैक्टोज भी डाइसैकेराइड है, इसलिए टूटने पर ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ देता है。
C12H22O11 + H2O ⟶ C6H12O6 + C6H12O6
(ग्लूकोज़) + (फ्रक्टोज़)
✅ लैक्टोज का जल-अपघटन:
C12H22O11 + H2O ⟶ C6H12O6 + C6H12O6
(ग्लूकोज़) + (गैलेक्टोज़)
✅ लैक्टोज को milk sugar भी कहते हैं, क्योंकि यह दूध में पाया जाता है।
✅ एग्ज़ाम ट्रिक:
सुक्रोज → ग्लूकोज़ + फ्रक्टोज़
लैक्टोज → ग्लूकोज़ + गैलैक्टोस
इसीलिए ये अभिक्रियाएँ बताती हैं कि ग्लूकोस केवल सरल विवृत-श्रृंखला (open chain) रूप में नहीं रहता।
✅ मुख्य अभिक्रियाएँ/प्रेक्षण जो open chain संरचना से नहीं समझाए जा सकते:
1) 2,4-DNP और Schiff’s test न देना
ऐल्डिहाइड समूह उपस्थित होने पर भी ग्लूकोस 2,4-DNP तथा शिफ़-परीक्षण नहीं देता।
साथ ही NaHSO3 के साथ अपेक्षित योगज (adduct) भी नहीं बनाता।
2) ग्लूकोस पेन्टाऐसीटेट का हाइड्रॉक्सिलऐमीन से अभिक्रिया न करना
यदि मुक्त –CHO समूह होता, तो ऑक्साइम बनने जैसी अभिक्रिया होनी चाहिए थी।
लेकिन पेन्टाऐसीटेट यह अभिक्रिया नहीं करता, यानी मुक्त –CHO उपलब्ध नहीं है।
3) मेथेनॉल + शुष्क HCl से दो ग्लूकोसाइड बनना
D-ग्लूकोस, मेथेनॉल (dry HCl की उपस्थिति) के साथ दो समावयवी मोनोमेथिल व्युत्पन्न देता है:
• मेथिल-α-D-ग्लूकोसाइड
• मेथिल-β-D-ग्लूकोसाइड
ये दोनों फेहलिंग विलयन को अपचयित नहीं करते, न ही HCN/हाइड्रॉक्सिलऐमीन से सामान्य ऐल्डिहाइड जैसी अभिक्रिया देते हैं।
यह भी मुक्त –CHO समूह की अनुपस्थिति का प्रमाण है।
👉 लेकिन प्रयोगों में ऐसा नहीं दिखता।
👉 इससे निष्कर्ष निकलता है कि ग्लूकोस का प्रमुख रूप चक्रीय (hemiacetal) संरचना है, जिसमें मुक्त –CHO समूह लगातार उपलब्ध नहीं रहता।
👉 इसी कारण α और β रूप (anomers) तथा ग्लूकोसाइड बनना समझ में आता है, जबकि open-chain मॉडल अकेले पर्याप्त नहीं है।
✅ α-D-ग्लूकोस और β-D-ग्लूकोस एक-दूसरे में बदलते रहते हैं, इसे म्यूटारोटेशन (mutarotation) कहते हैं।
✅ एग्ज़ाम टिप:
इस प्रश्न में सिर्फ “तथ्य” नहीं, हर बिंदु के बाद यह जरूर लिखें:
“यह मुक्त –CHO समूह की अनुपस्थिति/चक्रीय संरचना की ओर संकेत करता है।”
वे ऐमीनो अम्ल जो शरीर की वृद्धि और स्वास्थ्य के लिए जरूरी होते हैं, लेकिन मानव शरीर उन्हें स्वयं पर्याप्त मात्रा में नहीं बना पाता, आवश्यक ऐमीनो अम्ल कहलाते हैं।
इसलिए इन्हें भोजन से प्राप्त करना पड़ता है।
उदाहरण (कोई दो):
• वेलिन (Valine)
• ल्यूसीन (Leucine)
(अन्य: फेनिलऐलानीन आदि)
✅ (ii) अनावश्यक ऐमीनो अम्ल (Non-essential amino acids) :
वे ऐमीनो अम्ल जो शरीर के लिए आवश्यक तो होते हैं, पर उनका संश्लेषण शरीर में हो जाता है, अनावश्यक ऐमीनो अम्ल कहलाते हैं।
उदाहरण (कोई दो):
• ग्लाइसीन (Glycine)
• ऐलानीन (Alanine)
(अन्य: ऐस्पार्टिक अम्ल आदि)
👉 “अनावश्यक” का मतलब यह नहीं कि वे जरूरी नहीं हैं;
मतलब सिर्फ इतना है कि शरीर उन्हें स्वयं बना सकता है।
👉 इसलिए आहार योजना में आवश्यक ऐमीनो अम्लों का पर्याप्त स्रोत होना बहुत जरूरी है।
✅ दाल + अनाज जैसे भोजन से ऐमीनो की आवश्यकता पूर्ति हो सकती है।
दो ऐमीनो अम्लों के बीच एक के –COOH समूह और दूसरे के –NH2 समूह के संयोग से, जल ( H2O) निकलने पर जो –CO–NH– बन्ध बनता है, उसे पेप्टाइड बन्ध कहते हैं।
✅ (ii) प्राथमिक संरचना (Primary structure) :
प्रोटीन की पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला में ऐमीनो अम्लों का विशिष्ट क्रम (sequence) उसकी प्राथमिक संरचना कहलाता है।
✅ (iii) विकृतीकरण (Denaturation) :
ताप, pH या अन्य भौतिक/रासायनिक परिवर्तनों के कारण प्रोटीन की प्राकृतिक त्रिविम (3D) संरचना बिगड़कर उसकी जैविक सक्रियता समाप्त हो जाए, तो इसे विकृतीकरण कहते हैं।
जब दो ऐमीनो अम्ल जुड़ते हैं, तो संघनन अभिक्रिया होती है।
एक अणु के –COOH और दूसरे के –NH2 से H2O निकलता है और –CO–NH– लिंक बनता है।
इसी लिंक से पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला बनती है।
👉 प्राथमिक संरचना क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रोटीन में ऐमीनो अम्ल का क्रम बदलते ही प्रोटीन की प्रकृति और कार्य बदल सकता है।
👉 विकृतीकरण में क्या होता है?
प्रोटीन की 2° और 3° संरचनाएँ (और कभी 4°) बिगड़ जाती हैं।
लेकिन सामान्यतः 1° संरचना बनी रहती है।
इसीलिए प्रोटीन अपनी जैविक क्रियाशीलता खो देती है।
ग्लाइसीन + ऐलानीन ⟶ ग्लाइसिल-ऐलानीन (डाइपेप्टाइड) + H2O
✅ विकृतीकरण के सामान्य उदाहरण:
• अण्डे की सफेदी उबालने पर जमना (coagulation)
• दूध का दही में बदलना (pH परिवर्तन/लैक्टिक अम्ल के कारण)
✅ कई enzymes हल्का ताप बढ़ने पर भी denature हो जाते हैं, इसलिए शरीर का तापमान नियंत्रित रहना जरूरी है।
✅ एग्ज़ाम टिप:
विकृतीकरण लिखते समय यह पंक्ति जरूर जोड़ें:
“2°/3° संरचनाएँ नष्ट होती हैं, 1° संरचना सामान्यतः अप्रभावित रहती है।”
1. α-हेलिक्स (Alpha-helix)
2. β-प्लीटेड शीट (Beta-pleated sheet)
👉 यह कुंडलित रूप मुख्यतः पेप्टाइड बन्ध के C=O (कार्बोनिल ऑक्सीजन) और N–H समूहों के बीच बनने वाले हाइड्रोजन बन्धों से स्थिर होती है।
👉 जब श्रृंखला कुंडलित रूप लेती है, तो α-हेलिक्स बनती है।
👉 जब श्रृंखला मोड़दार/चादर जैसी व्यवस्थित हो जाती है, तो β-प्लीटेड शीट बनती है।
✅ रेशम ( silk fibroin ) में β-प्लीटेड शीट संरचना प्रमुख होती है, इसलिए वह मजबूत और कम लचीला होता है।
✅ ये H-बन्ध एक ऐमीनो अम्ल के शेष भाग के C=O समूह और उसी श्रृंखला के चौथे अगले शेष भाग के N–H समूह के बीच बनते हैं ( i → i+4 प्रकार)।
👉 इस कुंडलन को स्थिर रखने के लिए बैकबोन के कार्बोनिल ऑक्सीजन (C=O) और अमाइड हाइड्रोजन (N–H) के बीच नियमित H-बॉन्ड बनते हैं।
👉 यही नियमित, एक ही श्रृंखला के भीतर बनने वाले हाइड्रोजन बंध α-हेलिक्स को मजबूती और स्थिरता प्रदान करते हैं।
✅ तापमान या pH में बड़ा परिवर्तन होने पर ये H-बॉन्ड प्रभावित हो सकते हैं, जिससे हेलिक्स ढीली/विकृत हो सकती है।
👉 इनमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाएँ लंबी/समानान्तर व्यवस्थित होकर रेशे जैसी संरचना बनाती हैं।
👉 ये सामान्यतः जल में अविलेय होते हैं और शरीर में मुख्यतः संरचनात्मक कार्य करते हैं।
👉 कुछ सामान्य उदाहरण किरेटिन (बाल, ऊन तथा रेशम में उपस्थित) तथा मायोसिन (मांसपेशियों में उपस्थित) आदि हैं।
✅ गोलिकाकार प्रोटीन (Globular proteins) :
👉 इनमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला मुड़कर (fold होकर) सघन गोलाकार/गोलिकीय आकृति बनाती है।
👉 ये सामान्यतः जल में विलेय होते हैं और अधिकतर कार्यात्मक (functional) भूमिका निभाते हैं।
कुछ सामान्य उदाहरण : इन्सुलिन, ऐल्बुमिन
| आधार | रेशेदार प्रोटीन | गोलिकाकार प्रोटीन |
|---|---|---|
| आकृति | लंबी, धागेनुमा/रेशेनुमा | कॉम्पैक्ट, गोल/गोलिकीय |
| विलेयता | जल में प्रायः अविलेय | जल में प्रायः विलेय |
| मुख्य भूमिका | संरचनात्मक (support/protection) | जैव-कार्यात्मक (enzymes, hormones, transport) |
| उदाहरण | केराटिन, मायोसिन | इन्सुलिन, ऐल्बुमिन |
✅ रक्त प्लाज्मा में पाया जाने वाला ऐल्बुमिन एक गोलिकाकार प्रोटीन है, जो कई पदार्थों के परिवहन में मदद करता है।
✅ ये अभिक्रिया की गति बढ़ाते हैं, लेकिन स्वयं खत्म नहीं होते।
✅ रासायनिक रूप से अधिकांश एन्जाइम गोलिकाकार प्रोटीन (globular proteins) होते हैं।
✅ एन्जाइम बहुत विशिष्ट (specific) होते हैं, यानी हर एन्जाइम किसी खास अभिक्रिया/क्रियाधार (substrate) पर ही प्रभावी होता है।
👉 ये अभिक्रियाएँ शरीर की सामान्य दशाओं (मध्यम ताप, सामान्य pH) में भी तेज़ी से हो पाती हैं, क्योंकि एन्जाइम उनकी सक्रियण ऊर्जा (activation energy) कम कर देते हैं।
👉 इसी कारण जीवन-प्रक्रियाएँ सुचारु रूप से चलती रहती हैं।
👉 एन्जाइम की बहुत कम मात्रा भी पर्याप्त होती है, फिर भी वे अत्यंत प्रभावी होते हैं।
| विशेषता | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| प्रकृति | जैव-उत्प्रेरक; अधिकांशतः गोलिकाकार प्रोटीन |
| कार्य | रासायनिक अभिक्रियाओं की गति बढ़ाना (activation energy कम करके) |
| विशिष्टता | एक एन्जाइम सामान्यतः एक खास substrate/अभिक्रिया के लिए विशिष्ट |
| आवश्यक मात्रा | अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में भी प्रभावी |
| कार्य की अनुकूल दशाएँ | लगभग 310 K, pH ~7.4, 1 atm (शारीरिक दशाएँ) |
✅ अलग-अलग एन्जाइम अलग काम करते हैं, जैसे पाचन में अलग, DNA प्रतिकृति में अलग, ऊर्जा चक्र में अलग।
✅ प्राथमिक (1°) संरचना सामान्यतः परिवर्तित नहीं होती, यानी पेप्टाइड बन्धों का क्रम बना रहता है।
✅ इसके कारण प्रोटीन अपनी मूल गोलिकामय आकृति और जैव सक्रियता (biological activity) समाप्त हो जाती है।
✅ विलेय गोलिकाकार प्रोटीन अक्सर स्कन्दित/अवक्षेपित होकर अपेक्षाकृत तन्तुमय, जल में अविलेय रूप दिखाने लगते हैं।
👉 इन चीज़ों से प्रोटीन की मुड़ी हुई 3D बनावट बिगड़ जाती है।
👉 बनावट बिगड़ने पर एन्जाइम का active site बदल जाता है।
👉 इसलिए प्रोटीन/एन्जाइम अपना काम ठीक से नहीं कर पाते।
👉 ध्यान दें:
✅ प्राथमिक (1°) संरचना सामान्यतः परिवर्तित नहीं होती , यानी पेप्टाइड बन्धों का क्रम बना रहता है।
लेकिन द्वितीयक (2°) और तृतीयक (3°) संरचनाएँ नष्ट/बदल जाती हैं।
✅ कई एन्जाइम हल्के pH परिवर्तन से भी निष्क्रिय हो सकते हैं, इसलिए जैव तंत्र में pH नियंत्रण बहुत जरूरी है।
इन्हें दो वर्गों में बाँटा जाता है:
👉 1) जल में विलेय विटामिन (Water-soluble vitamins) :
विटामिन B-समूह (B-complex) और विटामिन C
👉 2) वसा में विलेय विटामिन (Fat-soluble vitamins) :
विटामिन A, D, E, K
✅ रक्त के थक्के (blood clotting) जमने के लिए जिम्मेदार विटामिन: विटामिन K
👉 जो विटामिन वसा/तेल में घुलते हैं, वे वसा में विलेय कहलाते हैं (जैसे A, D, E, K)।
👉 रक्त का थक्का जमने की प्रक्रिया में विटामिन K की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए इसकी कमी में bleeding tendency (छोटी चोट पर भी जल्दी या ज़्यादा खून निकलने की स्थिति।) बढ़ सकती है।
✅ विटामिन K का नाम याद रखने की ट्रिक:
K = Koagulation (clotting) (स्पेलिंग अलग है, याद रखने की ट्रिक है)।
इसकी कमी से रतौंधी (night blindness) और जेरोफ्थैल्मिया (xerophthalmia) हो सकते हैं।
✅ विटामिन C प्रतिरक्षा, घाव भरने, मसूड़ों के स्वास्थ्य और कोलेजन निर्माण के लिए आवश्यक है।
इसकी कमी से स्कर्वी (scurvy) , मसूड़ों से खून आना और कमजोरी हो सकती है।
महत्वपूर्ण स्रोत (Sources):
👉 विटामिन A : गाजर, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, दूध, मक्खन, अंडे की जर्दी, मछली का तेल
👉 विटामिन C : आंवला, नींबू, संतरा, अमरूद, टमाटर, हरी मिर्च
👉 विटामिन C शरीर के ऊतकों की मरम्मत और संक्रमण से बचाव में मदद करता है।
👉 इसलिए दोनों विटामिन रोज़ के संतुलित आहार में होना बहुत जरूरी है।
✅ गाजर में बीटा-कैरोटीन होता है, जिसे शरीर विटामिन A में बदल देता है।
मुख्य प्रकार: DNA और RNA ।
✅ दो महत्वपूर्ण कार्य:
👉 (1) अनुवांशिक सूचना का संग्रह और संचरण
DNA में वंशानुगत (genetic) जानकारी सुरक्षित रहती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होती है।
👉 (2) प्रोटीन संश्लेषण का नियंत्रण
RNA (mRNA, tRNA, rRNA) की सहायता से कोशिका में प्रोटीन बनते हैं, जिससे शरीर की संरचना और क्रियाएँ नियंत्रित होती हैं।
👉 जब कोशिका को कोई प्रोटीन बनाना होता है, तो DNA की सूचना RNA तक जाती है और फिर राइबोसोम पर प्रोटीन बनता है।
👉 इसी कारण न्यूक्लिक अम्ल जीवन की मूल प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य हैं।
✅ RNA सिर्फ संदेशवाहक नहीं, कुछ स्थितियों में catalytic भूमिका भी निभा सकता है (जैसे ribozymes)।
• न्यूक्लियोसाइड = नाइट्रोजनी क्षारक + पेन्टोज शर्करा
• न्यूक्लियोटाइड = नाइट्रोजनी क्षारक + पेन्टोज शर्करा + फॉस्फेट समूह
| आधार | न्यूक्लियोसाइड (Nucleoside) | न्यूक्लियोटाइड (Nucleotide) |
|---|---|---|
| संरचना | नाइट्रोजनी क्षारक + शर्करा | नाइट्रोजनी क्षारक + शर्करा + फॉस्फेट |
| फॉस्फेट समूह | अनुपस्थित | उपस्थित (एक/अधिक) |
| प्रकृति | अपेक्षाकृत सरल इकाई | अधिक क्रियाशील, न्यूक्लिक अम्ल की वास्तविक मोनोमर इकाई |
| न्यूक्लिक अम्ल में भूमिका | अकेले DNA/RNA की श्रृंखला नहीं बनाता | DNA/RNA की श्रृंखला बनाने वाली मूल इकाई |
| उदाहरण | एडेनोसिन, ग्वानोसिन | AMP, ADP, ATP, GMP आदि |
👉 पहले क्षारक (Base) और शर्करा (Sugar) जुड़ते हैं, तो न्यूक्लियोसाइड बनता है।
👉 जब इसी न्यूक्लियोसाइड से फॉस्फेट समूह जुड़ जाता है, तो न्यूक्लियोटाइड बनता है।
👉 DNA/RNA की लंबी शृंखला न्यूक्लियोटाइड्स के जुड़ने से बनती है, न्यूक्लियोसाइड्स के नहीं।
✅ एग्ज़ाम ट्रिक:
“Nucleoside + Phosphate = Nucleotide”
यह एक लाइन याद रहे, तो अंतर कभी नहीं भूलेंगे।
✅ इसका कारण यह है कि क्षारक (bases) यादृच्छिक रूप से नहीं जुड़ते, बल्कि निश्चित नियम से युग्मन करते हैं:
• A (एडेनिन) ↔ T (थायमिन) : 2 हाइड्रोजन बन्ध
• G (ग्वानिन) ↔ C (साइटोसीन) : 3 हाइड्रोजन बन्ध
✅ इसलिए यदि एक रज्जुक का क्रम पता हो, तो दूसरे रज्जुक का क्रम स्वतः निर्धारित हो जाता है।
यही DNA की पूरकता (complementarity) है।
👉 आकार और ज्यामिति के कारण केवल निश्चित base-pairing स्थिर रहती है:
A से T और G से C जुड़ते हैं।
👉 इसी विशिष्ट युग्मन के कारण दोनों strands की सूचना एक-दूसरे की पूरक होती है, समान नहीं।
👉 यह पूरकता DNA प्रतिकृति (replication) और अनुवांशिक सूचना के सही संचरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
✅ जिस DNA क्षेत्र में GC-content अधिक होता है, वहाँ DNA अपेक्षाकृत अधिक स्थिर पाया जाता है।
| क्र. | DNA | RNA |
|---|---|---|
| 1 | शर्करा: 2-डिऑक्सी-D-राइबोज | शर्करा: D-राइबोज |
| 2 | पिरिमिडीन क्षारक: साइटोसीन (C) और थाइमीन (T) | पिरिमिडीन क्षारक: साइटोसीन (C) और यूरैसिल (U) |
| 3 | सामान्यतः द्वि-रज्जुक, द्विकुण्डलित (double helix) | सामान्यतः एकल-रज्जुक (single strand) |
| 4 | अणु आकार बड़ा, आणविक द्रव्यमान अधिक | अणु आकार अपेक्षाकृत छोटा, आणविक द्रव्यमान कम |
| क्र. | DNA | RNA |
|---|---|---|
| 1 | सामान्यतः आत्म-प्रतिकरण (replication) करता है | सामान्यतः स्वयं replication नहीं करता |
| 2 | अनुवांशिक सूचना का दीर्घकालिक भंडारण/संचरण | प्रोटीन संश्लेषण में मुख्य भूमिका (mRNA, tRNA, rRNA) |
| 3 | कोशिकीय नियंत्रण का आधारभूत आनुवंशिक ब्लूप्रिंट | DNA की सूचना को अभिव्यक्त करके कार्यान्वयन कराता है |
👉 RNA उस जानकारी को “काम में” लाने वाला अणु है, खासकर प्रोटीन बनाने की प्रक्रिया में।
👉 DNA में T (Thymine) होता है, जबकि RNA में उसकी जगह U (Uracil) होता है।
यही एक बहुत पूछा जाने वाला exam point है।
👉 DNA का double helix रूप उसे अधिक स्थिर बनाता है; RNA single-stranded होने से अपेक्षाकृत कम स्थिर होता है।
✅ RNA के कुछ रूप ( ribozymes ) उत्प्रेरक की तरह भी काम कर सकते हैं।
✅ एग्ज़ाम ट्रिक:
DNA = Deoxyribose + Thymine + Double strand
RNA = Ribose + Uracil + Single strand
यह 3-point trick बहुत उपयोगी है।
👉 1) राइबोसोमल RNA (rRNA)
👉 2) सन्देशवाहक RNA (mRNA)
👉 3) स्थानान्तरण RNA (tRNA)
👉 tRNA (transfer RNA) : उपयुक्त अमीनो अम्ल को राइबोसोम तक लाता है और codon के अनुसार जोड़ने में मदद करता है।
👉 rRNA (ribosomal RNA) : राइबोसोम का प्रमुख संरचनात्मक और क्रियात्मक घटक है, जहाँ प्रोटीन संश्लेषण होता है।
