d-block तत्व
वे तत्व जिनमें आने वाला अन्तिम e− (n−1)d कक्षक में भरा जाता है, d-block तत्व कहलाते हैं।
ये सभी तत्व धातु हैं।
ये आवर्त सारणी में s तथा p-block तत्वों के मध्य स्थित होते हैं।
इन्हें संक्रमण तत्व भी कहते हैं क्योंकि इन तत्वों में अपनी निम्नतम अवस्था या सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था में d-उपकोश आंशिक भरे होते हैं।
सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास : (n−1)d1−10 ns1−2
d-block तत्वों की चार श्रेणियाँ हैं —
- प्रथम संक्रमण श्रेणी अथवा 3d-श्रेणी Sc21 to Zn30
- द्वितीय संक्रमण श्रेणी अथवा 4d-श्रेणी Y39 to Cd48
- तृतीय संक्रमण श्रेणी अथवा 5d-श्रेणी La57 to Hg80
- चतुर्थ संक्रमण श्रेणी अथवा 6d-श्रेणी Ac89 to incomplete
प्रथम संक्रमण श्रेणी का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
| परमाणु क्रमांक | तत्व का नाम | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास |
|---|---|---|
| 21 | Sc | 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 4s2, 3d1 (wrong), 3d1, 4s2 (Right) |
| 22 | Ti | 3d2, 4s2 |
| 23 | V | 3d3, 4s2 |
| 24 | Cr | 3d5, 4s1 |
| 25 | Mn | 3d5, 4s2 |
| 26 | Fe | 3d6, 4s2 |
| 27 | Co | 3d7, 4s2 |
| 28 | Ni | 3d8, 4s2 |
| 29 | Cu | 3d10, 4s1 |
| 30 | Zn | 3d10, 4s2 |
आकार या परमाण्वीय त्रिज्या या आयनिक त्रिज्या
संक्रमण श्रेणी में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर परमाण्वीय त्रिज्या में बहुत कम परिवर्तन होता है। इसके दो कारण हैं —
- परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ नाभिकीय आवेश में वृद्धि होती है, जो आकार को कम करती है।
- (n−1)d कक्षकों के e− का परिरक्षण प्रभाव आकार को बढ़ाता है।
Sc से Mn तक आकार घटता जाता है। (नाभिकीय आवेश > परिरक्षण प्रभाव)
Mn, Fe, Co, Ni का आकार लगभग समान रहता है। (नाभिकीय आवेश = परिरक्षण प्रभाव)
Cu व Zn का आकार बढ़ता है। (नाभिकीय आवेश < परिरक्षण प्रभाव)
| तत्व | Sc | Ti | V | Cr | Mn | Fe | Co | Ni | Cu | Zn |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| परमाणु त्रिज्या (Å) | 1.62 | 1.47 | 1.34 | 1.27 | 1.26 | 1.26 | 1.25 | 1.24 | 1.28 | 1.38 |
आयनन ऊर्जा (Ionisation Energy) / आयनन विभव (Ionization Potential)
गैसीय परमाणु के बाह्यतम कोश से एक e− निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा की मात्रा को आयनन विभव कहते हैं।
Zeff ∝ 1/Size ∝ I.P.
प्रथम संक्रमण श्रेणी में बाएँ से दाएँ चलने पर Sc से Zn तक आयनन विभव के मान में थोड़ी वृद्धि होती है, क्योंकि (नाभिकीय आवेश > परिरक्षण प्रभाव)
Mn का I.P. अधिक होता है, क्योंकि इसमें अर्ध-पूर्ण भरे d-कक्षक की स्थायित्व होता है।
Fe, Co, Ni, Cu के I.P. मान लगभग समान होते हैं। (नाभिकीय आवेश = परिरक्षण प्रभाव)
पूरी संक्रमण श्रेणी में Zn का प्रथम I.P. का मान सबसे अधिक होता है, क्योंकि इसके पास पूर्ण भरा d-कक्षक (3d10) होता है।
घनत्व
संक्रमण धातुओं का घनत्व उच्च होता है। आवर्त में बाएँ से दाएँ चलने पर परमाण्वीय आयतन घटने से घनत्व बढ़ता है।
d = m / V
d ∝ 1 / V
प्रश्न : Zn, Cd एवं Hg संक्रमण तत्वों के घनत्व प्रायः कम होते हैं, क्यों?
हल : पूर्ण भरे d-कक्षकों के अधिक स्थायित्व होने के कारण।
गलनांक एवं क्वथनांक
इन तत्वों के गलनांक एवं क्वथनांक उच्च होते हैं। इसका कारण इनमें प्रबल धात्विक बंध का होना है।
प्रथम संक्रमण श्रेणी में Sc से Cr तक अयुग्मित e− की संख्या बढ़ती है, जिससे धात्विक बंध सामर्थ्य बढ़ता है। इसलिए Sc से Cr तक गलनांक बढ़ता है।
Mn का गलनांक एकदम बहुत कम हो जाता है, क्योंकि इसमें अर्ध-पूर्ण भरे d-कक्षक के अधिक स्थायित्व के कारण धात्विक बंध दुर्बल हो जाते हैं।
Fe से Cu तक गलनांक घटता जाता है।
प्रथम संक्रमण श्रेणी में Zn का गलनांक सबसे कम होता है, क्योंकि पूर्ण भरे d-कक्षक के अधिकतम स्थायित्व के कारण धात्विक बंध दुर्बलतम हो जाते हैं।
प्रश्न : प्रथम संक्रमण श्रेणी में Mn का निम्न गलनांक होता है, क्योंकि
- d10 विन्यास के कारण धात्विक बंध प्रबल
- d5 विन्यास के कारण धात्विक बंध दुर्बल
- d7 विन्यास के कारण धात्विक बंध दुर्बल
- इनमें से कोई नहीं
सही उत्तर : (2) d5 विन्यास के कारण धात्विक बंध दुर्बल
ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
प्रश्न : संक्रमण तत्व परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं। क्यों?
संक्रमण तत्व परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि 3d तथा 4s कक्षकों की ऊर्जा में अन्तर बहुत कम होता है। अतः दोनों ही ऊर्जा स्तरों के e− बन्ध बनाने में भाग लेते हैं।
किसी तत्व की न्यूनतम ऑक्सीकरण अवस्था ns कक्षक में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है तथा ये आयनिक बन्ध बनाते हैं।
किसी तत्व की अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था ns कक्षक में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा (n−1)d कक्षकों में उपस्थित अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के योग के बराबर होती है। ऐसे यौगिकों में सहसंयोजक बन्ध बनते हैं।
उदाहरण के लिए, परमैंगनेट आयन (MnO4−, O.N. = +7) में मैंगनीज तथा ऑक्सीजन के बीच निर्मित सभी बन्ध सहसंयोजी होते हैं।
संक्रमण धातुएँ +1 एवं 0 जैसी निम्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं में भी यौगिक बनाती हैं।
उदाहरण : [Ni(CO)4] में Ni की शून्य ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
[Fe(CO)5] में Fe की शून्य ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
| तत्व | बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास | ऑक्सीकरण अवस्थाएँ |
|---|---|---|
| Sc | 3d1 4s2 | +2, +3 |
| Ti | 3d2 4s2 | +2, +3, +4 |
| V | 3d3 4s2 | +2, +3, +4, +5 |
| Cr | 3d5 4s1 | +1, +2, +3, +4, +5, +6 |
| Mn | 3d5 4s2 | +2, +3, +4, +5, +6, +7 |
| Fe | 3d6 4s2 | +2, +3, +4, +5, +6 |
| Co | 3d7 4s2 | +2, +3, +4 |
| Ni | 3d8 4s2 | +2, +3, +4 |
| Cu | 3d10 4s1 | +1, +2 |
| Zn | 3d10 4s2 | +2 |
उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्थाएँ सामान्यतः फ्लोराइडों तथा ऑक्साइडों में पायी जाती हैं, क्योंकि फ्लोरीन और ऑक्सीजन उच्च ऋणविद्युती तत्व हैं।
किसी भी संक्रमण धातु द्वारा प्रदर्शित उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था +8 होती है। यह ऑक्सीकरण अवस्था Ru तथा Os द्वारा प्रदर्शित की जाती है।
ऑक्साइड
उच्च ताप पर संक्रमण धातुएँ O2 से क्रिया करके ऑक्साइड बनाती हैं।
धातुओं के ऑक्साइड में धातु की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था प्रायः वर्ग संख्या के बराबर होती है।
उदाहरण : V2O5 व Mn2O7 में ऑक्सीकरण अवस्था क्रमशः +5 एवं +7 है, जो वर्ग संख्या (5 एवं 7) के बराबर है।
प्रश्न : संक्रमण तत्वों के ऐसे दो ऑक्साइडों के सूत्र लिखिए, जिनमें ऑक्सीकरण अवस्था तथा वर्ग संख्या समान हो।
हल : V2O5 व Mn2O7
परमाणुकरण की एन्थैल्पी (Enthalpies of atomization)
संक्रमण तत्व परमाणुकरण की उच्च एन्थैल्पी प्रदर्शित करते हैं।
क्योंकि इन तत्वों में परमाणु एक-दूसरे से प्रबल धात्विक बन्धों द्वारा बन्धे होते हैं।
बाह्य कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के अन्तराकर्षण के परिणामस्वरूप धात्विक बन्ध निर्मित होते हैं।
संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या जितनी अधिक होती है, धात्विक बन्ध उतना ही प्रबल होता है।
संकुल यौगिकों का निर्माण
संक्रमण तत्वों या d-ब्लॉक तत्वों में संकुल यौगिक बनाने की प्रवृत्ति पायी जाती है, क्योंकि
- इनके धनायन का आकार छोटा होता है व आवेश का मान अधिक होता है।
- इनके धनायनों में रिक्त कक्षक होते हैं, जो लिगैण्डों से e− युग्म ग्रहण कर लेते हैं।
उदाहरण : Fe+2 आयन CN− के 6 एकाकी e− युग्म को ग्रहण कर निम्न संकुल यौगिक बनाती है।
[Fe(CN)6]4−
उत्प्रेरकीय गुण
वे संक्रमण तत्व जिनमें d-कक्षक पाए जाते हैं, वे उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त होते हैं। रिक्त d-कक्षक होने के कारण ये क्रियाकारक से बंधन कर अस्थायी मध्यवर्ती संकुल बनाते हैं। जो टूटकर उत्पाद बनाता है और उत्प्रेरक पुनः प्राप्त हो जाता है।
उदाहरण : (i) संपर्क विधि द्वारा H2SO4 के निर्माण में SO2 को SO3 में बदलने के लिए V2O5 को उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त करते हैं।
SO2 + V2O5 ⟶ SO3 + V2O4
(V2O4 + 1/2 O2 ⟶ V2O5)
SO3 + H2SO4 (aq) ⟶ H2S2O7 (l)
H2S2O7 (l) + H2O ⟶ 2H2SO4 (aq)
(ii) अपचयी तेल का निर्माण :
R-CH = CH-C-OR + H2 ⟶ R-CH2-CH2-C-OR
║
║
O
O
Ni
(iii) हैबर विधि द्वारा NH3 का निर्माण :
N2(g) + 3H2(g) ⟶ 2NH3(g)
Fe + Mo
रंग (Colour)
संक्रमण तत्वों के वे आयन, जिनके d-कक्षकों में अयुग्मित e− होते हैं, रंग प्रदर्शित करते हैं।
d-कक्षक में उपस्थित e− ऊर्जा प्राप्त करके उत्तेजित हो जाते हैं और उच्च ऊर्जा स्तर में चले जाते हैं।
इस संक्रमण के दौरान वे दृश्य क्षेत्र के किसी उपयुक्त भाग से ऊर्जा अवशोषित करते हैं।
इसलिए इनके द्वारा उत्सर्जित / दिखाई देने वाला रंग वही होता है, जो अवशोषित प्रकाश के रंग का पूरक रंग होता है।
Note
- संक्रमण तत्वों के जिन आयनों में e− की संख्या समान होती है, उनके रंग भी प्रायः समान होते हैं।
- अयुग्मित e− की संख्या कम होने पर गहरा रंग प्राप्त होता है।
- अयुग्मित e− की संख्या zero होने पर आयन रंगहीन होगा।
चुम्बकीय गुण
परमाणु में अयुग्मित e− के कारण चुम्बकीय गुण पाया जाता है। इस गुण को चुम्बकीय आघूर्ण से व्यक्त करते हैं।
μ = √n(n + 2) BM (BM = Bohr magneton)
n = अयुग्मित e− की संख्या
पदार्थ बाहरी चुम्बकीय क्षेत्र में तीन प्रकार से व्यवहार करता है।
(i) अनुचुम्बकीय गुण
जब पदार्थों को बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखते हैं, तो बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता को बढ़ा देते हैं। चुम्बकीय बल रेखाएँ पदार्थ में से होकर गुजरती हैं तथा चुम्बकीय बल रेखाओं को आकर्षित करती हैं। ऐसे पदार्थों को अनुचुम्बकीय पदार्थ कहते हैं तथा इस गुण को अनुचुम्बकीय गुण कहते हैं।
- इस आयनों में अयुग्मित e− उपस्थित होते हैं।
- उदाहरण : Sc+1, Ti+2, Mn+2
Note: बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र से अनुचुम्बकीय पदार्थों का भार बढ़ जाता है।
(ii) प्रतिचुम्बकीय गुण
जब पदार्थों को बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखते हैं, तो बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता को कम कर देते हैं। ये चुम्बकीय बल रेखाएँ पदार्थ में प्रवेश नहीं करती हैं तथा उन्हें प्रत्याकर्षित करती हैं। ऐसे पदार्थों को प्रतिचुम्बकीय पदार्थ कहते हैं तथा इस गुण को प्रतिचुम्बकत्व कहते हैं।
- इस आयनों में युग्मित e− उपस्थित होते हैं।
- उदाहरण : Zn+2, Ti+4, Cu+1
Note: बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र से प्रतिचुम्बकीय पदार्थों का भार कम जाता है।
(iii) लौहचुम्बकत्व
ऐसे पदार्थ जिनमें अनुचुम्बकीय गुण अत्यधिक मात्रा में हो, अतः ये चुम्बकीय क्षेत्र में प्रबल आकर्षित होते हैं और चुम्बकीय क्षेत्र हटाने पर भी ये चुम्बकित बने रहते हैं। ऐसे पदार्थ लौहचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। उदाहरण Fe, Co, Ni व Mn को मिश्र धातु।
Note: ताप बढ़ाने या चोट करने पर चुम्बकीय गुण नष्ट हो जाता है।
अंतराकाशी यौगिक
प्रश्न : अंतराकाशी यौगिक क्या हैं?
संक्रमण धातुओं के क्रिस्टल में परमाणुओं के पास-पास व्यवस्थित होने के बाद भी इनके मध्य छोटे-छोटे रिक्त स्थान शेष रह जाते हैं, जिन्हें अंतराकाश कहते हैं।
जब इन अंतराकाशों में छोटे आकार के अधातु परमाणु जैसे H, B, C, N आ जाते हैं, तो उनसे बने यौगिकों को अंतराकाशी यौगिक कहते हैं।
(i) अंतराकाशी यौगिकों के गलनांक उच्च होते हैं, जो शुद्ध धातुओं से भी अधिक होते हैं।
(ii) ये अति कठोर होते हैं। यहाँ तक कि कुछ बोराइडों की कठोरता लगभग हीरे की कठोरता के समान होती है।
(iii) इन यौगिकों की धात्विक चालकता सुरक्षित रहती है।
(iv) रासायनिक रूप से अंतराकाशी यौगिक निष्क्रिय होते हैं।
मिश्र धातु (Alloy)
संक्रमण धातुओं के आकार लगभग समान होने के कारण, ये क्रिस्टल जालक में एक-दूसरे का स्थान ग्रहण कर लेते हैं।
इसी कारण ये ठोस विलयन या मिश्र धातु बनाते हैं।
उदाहरण : पीतल (Cu, Zn), कांसा (Cu, Sn)
पोटैशियम डाइक्रोमेट K2Cr2O7
पोटैशियम डाइक्रोमेट को तीन पदों में बनाया जाता है।
- क्रोमाइट अयस्क को सोडियम कार्बोनेट के साथ वायु की उपस्थिति में गर्म करने पर सोडियम क्रोमेट प्राप्त होता है।
4FeCr2O4 + 8Na2CO3 + 7O2 Δ→ 8Na2CrO4 + 2Fe2O3 + 8CO2
- सोडियम क्रोमेट का अम्लीय माध्यम में सोडियम डाइक्रोमेट में परिवर्तन।
Na2CrO4 + H2SO4 Δ→ Na2Cr2O7 + Na2SO4 + H2O
- सोडियम डाइक्रोमेट का पोटैशियम डाइक्रोमेट में परिवर्तन।
Na2Cr2O7 + 2KCl Δ→ K2Cr2O7 + 2NaCl
Note: डाइक्रोमेट आयन (Cr2O72−) विलयन में क्रोमेट (CrO42−) आयनों के साथ साम्य में रहते हैं।
CrO42− ⇌ Cr2O72−
- pH कम करने पर (H+ सान्द्रता बढ़ाने पर) :
2CrO42− + 2H+ ⇌ Cr2O72− + H2O
- pH बढ़ाने पर (OH− सान्द्रता बढ़ाने पर) :
Cr2O72− + 2OH− ⇌ 2CrO42− + H2O
ऑक्सीकारक गुण
अम्लीय माध्यम में K2Cr2O7 एक अच्छा ऑक्सीकारक होता है।
| K2Cr2O7 + H2SO4 + Reacting species ⟶ K2SO4 + Cr2(SO4)3 + H2O + [O] |
Or
| Cr2O72− + 2H+ + Reacting species ⟶ Cr3+ + H2O + [O] |
Note:
| Reacting species | Oxidized product |
|---|---|
| C | CO and CO2 |
| Fe2+ | Fe3+ |
| I− | I2 |
| Br− | Br2 |
| I2 + H2O | HIO3 |
| H2S | S |
| Cu+ | Cu2+ |
| CaS | CaSO4 |
| NO2− | NO3− |
| SO32− | SO42− |
| S2O32− | 2SO42− |
| C2O42− | 2CO2 |
| Sn2+ | Sn4+ |
उदाहरण
यह फेरस आयन (Fe+2) को फेरिक आयन (Fe+3) में ऑक्सीकरण करता है।
Fe+2 + Cr2O7−2 + 2H+ ⟶ Cr+3 + H2O + Fe+3
अन्य उदाहरण
K2Cr2O7 + 7H2SO4 + 6KI ⟶ 4K2SO4 + Cr2(SO4)3 + 3I2 + 7H2O
K2Cr2O7 + 7H2SO4 + 6FeSO4 ⟶ K2SO4 + Cr2(SO4)3 + 3Fe2(SO4)3 + 7H2O
K2Cr2O7 + 4H2SO4 + 3H2S ⟶ K2SO4 + Cr2(SO4)3 + 7H2O + 3S
K2Cr2O7 + H2SO4 + 3SO2 ⟶ K2SO4 + Cr2(SO4)3 + 3H2O
पोटैशियम परमैंगनेट [KMnO4]
- मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2) तथा (KOH) के मिश्रण को वायु की उपस्थिति में गर्म किया जाता है, जिससे पोटैशियम मैंगनेट K2MnO4 बनता है।
2MnO2 + 4KOH + O2 → 2K2MnO4 + 2H2O
- पोटैशियम मैंगनेट K2MnO4 का विद्युत अपघटन करने पर मैंगनेट, परमैंगनेट में ऑक्सीकरण हो जाता है।
2K2MnO4 ⇌ 2K+ + MnO42−
H2O ⇌ H+ + OH−
ऐनोड पर: MnO42− → MnO4− + e− ऑक्सीकरण
कैथोड पर: H+ का मान K+ से अधिक होता है, इसलिए H+ का अपचयन होगा।
H+(aq) + e− → ½ H2(g)
प्रक्रिया के पूर्ण होने पर बैंगनी रंग का यौगिक (KMnO4) प्राप्त होता है।
ऊष्मा का प्रभाव
गर्म करने पर पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4), पोटैशियम मैंगनेट (K2MnO4) में परिवर्तित हो जाता है।
2KMnO4 ⟶ 513 K K2MnO4 + MnO2 + O2
ऑक्सीकारक गुण
पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4) अम्लीय, क्षारीय तथा उदासीन माध्यम में प्रबल ऑक्सीकारक होता है।
अम्लीय माध्यम में इसका अपचयन Mn+2 में होता है।
KMnO4 की रासायनिक अभिक्रिया
KMnO4 + H2SO4 + [A] → K2SO4 + MnSO4 + H2O + [O]
or
MnO4− + 2H+ + [A] → Mn2+ + H2O + [O]
- आयोडाइड आयन का आयोडीन में परिवर्तन
10I− + 2MnO4− + 16H+ → 2Mn2+ + 8H2O + 5I2
- फेरस लवण (Fe+2) का फेरिक लवण (Fe+3) में परिवर्तन
5Fe2+ + MnO4− + 8H+ → Mn2+ + 4H2O + 5Fe3+
- H2S का S में ऑक्सीकरण
5S2− + 2MnO4− + 16H+ → 2Mn2+ + 8H2O + 5S
- सल्फ्यूरस अम्ल (सल्फाइट) व सल्फ्यूरिक अम्ल (सल्फेट) में ऑक्सीकरण
SO32− → SO42−
- नाइट्राइट का नाइट्रेट में परिवर्तन
NO2− → NO3−
Note: अम्लीय माध्यम के लिए HCl के स्थान पर H2SO4 का उपयोग किया जाता है, क्योंकि KMnO4 द्वारा HCl(aq) का ऑक्सीकरण Cl2(g) में हो जाता है।
f-Block तत्व
वे तत्व जिनमें आने वाला अंतिम e− (n−2)f कक्षक में प्रवेश करता है, f-block तत्व कहलाते हैं।
इनके परमाणुओं में बाह्य तीन कक्षक (n−2), (n−1) तथा n अपूर्ण होते हैं तथा अंतिम इलेक्ट्रॉन (n−2)f कक्षक में भरा जाता है। इसी कारण इन्हें f-block तत्व कहते हैं।
इन तत्वों की दो श्रेणियाँ होती हैं :
- लैंथेनॉयड : लैंथेनम के बाद के 14 तत्व (Ce58 से Lu71)
- ऐक्टिनॉयड : ऐक्टिनियम के बाद के 14 तत्व (Th90 से Lr103)
सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास : (n−2)f1−14 (n−1)d0−1 ns2
लैंथेनॉयड
सीरियम (Ce58) से ल्यूटीशियम (Lu71) तक के 14 तत्व लैंथेनॉयड तत्व कहलाते हैं। इन्हें सामान्य रूप से Ln से दर्शाते हैं।
प्रोमेथियम (Pm61) एकमात्र संश्लेषित (मानव निर्मित) रेडियोधर्मी लैंथेनॉयड है।
इन तत्वों को दुर्लभ मृदा तत्व भी कहा जाता है।
सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास :
(n−2)f1−14 (n−1)d0−1 ns2
(यहाँ n = 6)
| परमाणु क्रमांक | नाम | संकेत | Ln | Ln2+ | Ln3+ | Ln4+ | Ln3+ त्रिज्या (pm) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 57 | लैंथेनम | La | 5d16s2 | 5d1 | 4f0 | — | 106 |
| 58 | सीरियम | Ce | 4f15d16s2 | 4f2 | 4f1 | 4f0 | 103 |
| 59 | प्रैजियोडिमियम | Pr | 4f36s2 | 4f3 | 4f2 | 4f1 | 101 |
| 60 | नियोडिमियम | Nd | 4f46s2 | 4f4 | 4f3 | 4f2 | 99 |
| 61 | प्रोमेथियम | Pm | 4f56s2 | 4f5 | 4f4 | — | 98 |
| 62 | सैमेरियम | Sm | 4f66s2 | 4f6 | 4f5 | — | 96 |
| 63 | यूरोपियम | Eu | 4f76s2 | 4f7 | 4f6 | — | 95 |
| 64 | गैडोलिनियम | Gd | 4f75d16s2 | 4f75d1 | 4f7 | — | 94 |
| 65 | टर्बियम | Tb | 4f96s2 | 4f9 | 4f8 | 4f7 | 92 |
| 66 | डिस्प्रोसियम | Dy | 4f106s2 | 4f10 | 4f9 | 4f8 | 91 |
| 67 | होल्मियम | Ho | 4f116s2 | 4f11 | 4f10 | — | 89 |
| 68 | एर्बियम | Er | 4f126s2 | 4f12 | 4f11 | — | 88 |
| 69 | थुलियम | Tm | 4f136s2 | 4f13 | 4f12 | — | 87 |
| 70 | इटर्बियम | Yb | 4f146s2 | 4f14 | 4f13 | — | 86 |
| 71 | ल्यूटीशियम | Lu | 4f145d16s2 | 4f145d1 | 4f14 | — | — |
ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
सभी लैन्थेनाइड सामान्यतः +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।
अपवाद
कुछ लैन्थेनाइड +2 तथा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी प्रदर्शित करते हैं। ये अवस्थाएँ सामान्यतः कम स्थायी होती हैं।
ये ऑक्सीकरण अवस्थाएँ रिक्त, अर्धपूर्ण तथा पूर्ण भरे 4f-उपकोश की स्थायित्व के कारण प्राप्त होती हैं।
- रिक्त विन्यास : Ce+4 (4f0)
- अर्धपूर्ण भरा f-उपकोश : Eu+2 (4f7)
- पूर्ण भरा f-उपकोश : Yb+2 (4f14)
रासायनिक अभिक्रियाशीलता
लैन्थेनाइड तत्वों की प्रथम तीन आयनन ऊर्जाएँ (Ip) कम होने के कारण ये अत्यधिक विद्युतधनात्मक होते हैं। इसलिए ये +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं।
लैन्थेनाइडों की सामान्य अभिक्रियाएँ
- जल के साथ अभिक्रिया
2Ln + 3H2O → 2Ln(OH)3 + 3H2(g) ↑
ये जल को अपघटित कर हाइड्रोजन गैस छोड़ते हैं।
ये जल में CO2 की उपस्थिति में कार्बोनेट बनाते हैं।
2Ln + 3H2O + 3CO2 → 2Ln2(CO3)3 + 3H2(g) ↑
- वायु के साथ अभिक्रिया कर ऑक्साइड का निर्माण करते हैं।
4Ln + 3O2 → 2Ln2O3
- हैलोजन के साथ अभिक्रिया
2Ln + 3X2 → 2LnX3
- N, S & C के साथ गर्म करने पर
2Ln + N2 1000°C → 2LnN
2Ln + 3S → Ln2S3
Ln + 2C → LnC2
धन विद्युत गुण
इनमें प्रबल धन विद्युत गुण पाया जाता है, क्योंकि इनके I.P. का मान कम होता है।
रंगीन आयन
अधिकांश लैंथेनाइड आयन रंगीन होते हैं। यह इनमें उपस्थित अयुग्मित e− के f-f संक्रमण के कारण होता है।
चुंबकीय व्यवहार
इन तत्वों के M+3 आयन अनुचुंबकीय व्यवहार प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि इनमें अयुग्मित e− उपस्थित होते हैं।
परमाणु त्रिज्या व आयनिक त्रिज्या (लैंथेनाइड संकुचन)
लैंथेनाइड श्रेणी में बाएँ से दाएँ चलने पर परमाण्वीय व आयनिक त्रिज्या दोनों ही घटती हैं।
प्रभावी नाभिकीय आवेश : परमाणु क्रमांक बढ़ते रहने के कारण बाह्यतम e− पर नाभिकीय आकर्षण बढ़ता है। अतः आकार घटता जाता है।
लैन्थेनाइड संकुचन
सामान्यतः यदि परमाणु क्रमांक बढ़ने पर आने वाला अतिरिक्त e− अन्दर के कक्षकों में जाता है, तो वह बाह्यतम कोश के e− पर परिरक्षण प्रभाव डालता है और नाभिकीय आकर्षण को कम करता है। इस कारण सामान्यतः आकार बढ़ता है।
लेकिन लैन्थेनाइड तत्वों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर आने वाला अतिरिक्त e− (n−2)f कक्षकों में प्रवेश करता है, जो अन्दर की ओर स्थित होते हैं।
इसलिए ये बाह्य e− पर परिरक्षण प्रभाव बहुत कम डालते हैं। अतः लैन्थेनाइडों में परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ नाभिकीय आकर्षण तो बढ़ता जाता है, पर उसे संतुलित करने वाला परिरक्षण प्रभाव उतना नहीं बढ़ता।
इसी कारण इनके आकार में धीरे-धीरे कमी होती जाती है और इनके परमाणु संकुचित हो जाते हैं।
लैन्थेनाइड श्रेणी में इस प्रकार आकार में होने वाली क्रमिक कमी को लैन्थेनाइड संकुचन कहते हैं।
Note
Eu तथा Yb की परमाण्विक त्रिज्याएँ सामान्यतः अपेक्षाकृत अधिक होती हैं।
इसका कारण यह है कि Eu तथा Yb में बन्ध बनाने में केवल दो इलेक्ट्रॉनों का योगदान होता है। यह क्रमशः स्थायी 4f7 तथा 4f14 संरचनाओं के कारण होता है, जबकि शेष अधिकांश लैन्थेनाइडों में तीन इलेक्ट्रॉन धात्विक बन्ध बनाने में योगदान देते हैं।
प्रश्न : लैन्थेनाइडों का पृथक्करण कठिन क्यों होता है?
उत्तर : लैन्थेनाइडों की आयनी त्रिज्या में बहुत कम अन्तर होता है, जिसके कारण इनके रासायनिक गुणों में बहुत अधिक समानता पाई जाती है। इसी कारण इन तत्वों का पृथक्करण कठिन होता है।
लैन्थेनाइडों के उपयोग
लैन्थेनाइड तत्वों से बने मिश्र धातु को मिश्र धातु कहा जाता है। मिश्र धातु में 95% लैन्थेनाइड धातु, लगभग 5% Fe तथा अल्प मात्रा में S, C, Ca व Al होता है।
मिश्र धातु व Mg मिश्र धातु का उपयोग बन्दूक की गोली व खोल (कवच) बनाने में होता है।
पेट्रोलियम पदार्थों के भंजन में भी इनका उपयोग होता है।
लैन्थेनाइड के ऑक्साइडों का उपयोग स्फुरदीप्त (फॉस्फर) के रूप में TV पर्दे पर किया जाता है।
फोटोग्राफी में AgBr का उपयोग होता है।
Ni का उपयोग तेल के हाइड्रोजनीकरण में होता है।
ऐक्टिनॉयड
ऐक्टिनॉयड भी आंतरिक संक्रमण तत्व हैं। इनके परमाणुओं में भी अंतिम तीन कक्षक अपूर्ण होते हैं और अंतिम e− (n−2)f कक्षक में भरा जाता है। इसी कारण इन्हें f-block तत्व कहते हैं।
ये सातवें आवर्त में आते हैं।
ऐक्टिनॉयड या ऐक्टिनॉन श्रेणी (An) : तत्वों की वह श्रेणी जिसमें अंतिम e− 5f-कक्षकों में भरे जाते हैं, ऐक्टिनॉयड या ऐक्टिनॉन श्रेणी कहलाती है।
सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास :
(n−2)f1−14 (n−1)d0−1 ns2
(यहाँ n = 7)
ये ऐक्टिनियम (Ac89) के तुरंत बाद आते हैं।
यूरेनियम (U92) के बाद आने वाले तत्व कृत्रिम तथा अस्थायी होते हैं। ये प्रकृति में नहीं पाए जाते। इन्हें परायूरेनियम तत्व कहते हैं।
| परमाणु क्रमांक | नाम | संकेत | M | M3+ | M4+ | M3+ त्रिज्या (pm) | M4+ त्रिज्या (pm) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| 89 | ऐक्टिनियम | Ac | 6d17s2 | 5f0 | — | 111 | — |
| 90 | थोरियम | Th | 6d27s2 | 5f1 | 5f0 | — | 99 |
| 91 | प्रोटैक्टिनियम | Pa | 5f26d17s2 | 5f2 | 5f1 | — | 96 |
| 92 | यूरेनियम | U | 5f36d17s2 | 5f3 | 5f2 | 103 | 93 |
| 93 | नेप्टूनियम | Np | 5f46d17s2 | 5f4 | 5f3 | 101 | 92 |
| 94 | प्लूटोनियम | Pu | 5f67s2 | 5f5 | 5f4 | 100 | 90 |
| 95 | अमेरीशियम | Am | 5f77s2 | 5f6 | 5f5 | 99 | 89 |
| 96 | क्यूरियम | Cm | 5f76d17s2 | 5f7 | 5f6 | 99 | 88 |
| 97 | बर्केलियम | Bk | 5f97s2 | 5f8 | 5f7 | 98 | 87 |
| 98 | कैलिफोर्नियम | Cf | 5f107s2 | 5f9 | 5f8 | 98 | 86 |
| 99 | आइंस्टाइनियम | Es | 5f117s2 | 5f10 | 5f9 | — | — |
| 100 | फर्मियम | Fm | 5f127s2 | 5f11 | 5f10 | — | — |
| 101 | मेंडेलीवियम | Md | 5f137s2 | 5f12 | 5f11 | — | — |
| 102 | नोबेलियम | No | 5f147s2 | 5f13 | 5f12 | — | — |
| 103 | लॉरेन्सियम | Lr | 5f146d17s2 | 5f14 | 5f13 | — | — |
लैन्थेनाइड तथा एक्टिनाइड में समानताएँ
- दोनों ही f-block के तत्व हैं।
- दोनों की मुख्य ऑक्सीकरण अवस्था सामान्यतः +3 होती है।
- दोनों का घनत्व उच्च होता है।
- जैसे लैन्थेनाइड संकुचन होता है, वैसे ही एक्टिनाइड संकुचन भी होता है। दोनों ही श्रेणियों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर आकार में थोड़ी कमी होती है।
- दोनों ही श्रेणियों के परमाणुओं में तीन आंशिक रूप से भरे बाह्यतम कक्षक पाए जाते हैं।
- समान विन्यास वाले लैन्थेनाइड तथा एक्टिनाइड आयनों के रंग लगभग समान होते हैं।
लैन्थेनाइड व ऐक्टिनाइड में अन्तर
| लैन्थेनाइड | ऐक्टिनाइड |
|---|---|
| सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था +3 के अलावा कुछ तत्व +2 एवं +4 भी प्रदर्शित करते हैं। | सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था +3 के अलावा +4, +5, +6 एवं +7 भी प्रदर्शित करते हैं। |
| संकुल बनाने की प्रवृत्ति कम होती है। ये केवल आयनिक यौगिक बनाते हैं। | संकुल बनाने की प्रवृत्ति उच्च होती है। |
| लैन्थेनाइड यौगिक कम क्षारीय होते हैं। | ऐक्टिनाइड यौगिक अधिक क्षारीय होते हैं। |
| प्रोमेथियम (Pm61) के अलावा कोई तत्व रेडियोऐक्टिव नहीं है। | सभी तत्व रेडियोऐक्टिव होते हैं। |
| अधिकतर M+3 आयन रंगहीन होते हैं। | अधिकतर M+3, M+4 आयन रंगीन होते हैं। |
| ये ऑक्सो आयन नहीं बनाते हैं। | ये ऑक्सो आयन जैसे UO2+, UO22+, PuO22+ बनाते हैं। |
एक्टिनाइड संकुचन लैन्थेनाइड संकुचन से अधिक क्यों?
प्रश्न : लैन्थेनाइड संकुचन की तुलना में एक तत्त्व से दूसरे तत्त्व के बीच एक्टिनाइड संकुचन अधिक होता है। क्यों?
उत्तर : लैन्थेनाइड संकुचन में 4f-उपकोश उपस्थित होता है, जबकि एक्टिनाइड संकुचन में 5f-उपकोश उपस्थित होता है।
5f-उपकोश के इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव, 4f-उपकोश के इलेक्ट्रॉनों की तुलना में बहुत कम होता है।
अतः एक्टिनाइड संकुचन, लैन्थेनाइड संकुचन की अपेक्षा अधिक होता है।
कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न : Zn, Cd एवं Hg के गलनांक कम तथा ये कोमल होते हैं। क्यों?
हल : Zn, Cd एवं Hg में पूर्ण भरे d-कक्षक होने के कारण ये सहसंयोजक बंध बनाते नहीं माने जाते, इसलिए इनके गलनांक कम होते हैं और ये कोमल होते हैं।
प्रश्न : संक्रमण तत्वों की 3d श्रेणी में कौन-सा तत्व बड़ी संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है? और क्यों?
हल : Mn
Mn का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास : 3d5 4s2
अतः d-कक्षकों में अधिकतम 5 अयुग्मित e− उपस्थित होने के कारण यह +2, +3, +4, +5, +6, +7 तक ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है।
प्रश्न : La(OH)3 ज्यादा क्षारीय है Lu(OH)3 से। क्यों?
हल : La के बाद आने वाले तत्वों में लैंथेनाइड संकुचन के कारण नाभिकीय आवेश में वृद्धि होती है, जिससे Lu(OH)3 की OH− आयन देने की प्रवृत्ति कम हो जाती है। अतः Lu(OH)3 की अपेक्षा La(OH)3 अधिक क्षारीय है।
प्रश्न : Mn+2 अधिक स्थायी होती है, जबकि Fe+2 नहीं। क्यों?
Mn+2 : [Ar] 3d5 4s0 अधिक स्थायी
Fe+2 : [Ar] 3d6 4s0 कम स्थायी
प्रश्न : Cd+2 लवण सफेद क्यों होते हैं?
हल : पूर्ण भरे d-कक्षक के कारण 4d10
प्रश्न : कौन-से तत्व सिक्का धातु के नाम से जाने जाते हैं?
हल : Cu, Ag एवं Au (Gold)
प्रश्न : Cu+1 व Cu+2 में से कौन अधिक स्थायी होता है?
हल : Cu+1 यौगिक जलीय विलयन में अस्थायी होते हैं, क्योंकि Cu+1 असमानुपातन होकर Cu+2 में बदल जाते हैं। इसलिए जलीय विलयन में Cu+2 का स्थायित्व अधिक होता है।
2Cu+1 ⟶ Cu+2 + Cu(s)
प्रश्न : Ti+4 आयन रंगहीन होता है? समझाइए।
हल : Ti = 3d2 4s2
Ti+4 = 3d0 4s0
अतः अयुग्मित e− की संख्या (n = 0) होने के कारण यह दृश्य प्रकाश को अवशोषित नहीं कर पाता, अतः Ti+4 आयन रंगहीन होता है।
प्रश्न : क्रोमेट आयन की संरचना बनाइए।
हल : CrO42− आयन
Zn, Cd, Hg संक्रमण तत्व क्यों नहीं हैं?
प्रश्न : Zn, Cd, Hg d-ब्लॉक के तत्व तो हैं, लेकिन संक्रमण तत्व नहीं कहलाते हैं। क्यों?
उत्तर : संक्रमण तत्व वे d-ब्लॉक के तत्व होते हैं, जिनके परमाणुओं अथवा उनके आयनों में d-कक्षक आंशिक रूप से भरे होते हैं।
परंतु Zn, Cd, Hg में किसी भी अवस्था में d-कक्षक आंशिक रूप से भरे नहीं होते, बल्कि पूर्ण भरे होते हैं।
अतः ये d-ब्लॉक के तत्व तो हैं, लेकिन संक्रमण तत्व नहीं कहलाते।
Ni2+ आयन का चुंबकीय आघूर्ण
प्रश्न : Ni2+ आयन का चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए।
हल :
Ni (Z = 28) = 3d8 4s2
Ni2+ = 3d8 4s0
चुंबकीय आघूर्ण का सूत्र : μ = √[n(n+2)] BM
यहाँ अयुग्मित e− की संख्या n = 2 है।
अतः μ = √[2(2+2)] BM
μ = √8 BM = 2.83 BM
M(aq)2+ (Z = 27) का चुंबकीय आघूर्ण
प्रश्न : M(aq)2+ (Z = 27) के लिए स्पिन-ओनली चुंबकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।
हल : Z = 27 होने पर तत्व Co है।
Co = 3d7 4s2
Co2+ = 3d7 4s0
3d7 में 3 अयुग्मित e− होते हैं।
अतः μ = √[n(n+2)] BM में n = 3
μ = √[3(3+2)] BM = √15 BM
μ = 3.87 BM
कारण दीजिए
प्रश्न : कारण देकर समझाइए -
- संक्रमण तत्वों की करण एन्थैल्पी उच्च होती है।
- संक्रमण धातु तथा उनके यौगिक उत्तम उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।
हल :
(a) संक्रमण तत्वों में बड़ी संख्या में अयुग्मित e− होते हैं। अतः परमाणुओं के बीच प्रबल बन्ध बनते हैं, इसलिए करण एन्थैल्पी का मान उच्च होता है।
(b) संक्रमण तत्वों में रिक्त d-कक्षक होते हैं। ये अपने रिक्त कक्षकों को अभिकारकों को उपलब्ध कराकर मध्यवर्ती यौगिक बनाते हैं, जो बाद में टूटकर उत्पाद देते हैं। इसी कारण ये उत्तम उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।
कारण सहित स्पष्ट कीजिए
प्रश्न : कारण देते हुए स्पष्ट कीजिए -
- संक्रमण धातुएँ तथा उनके अधिकांश यौगिक अनुचुंबकीय होते हैं।
- संक्रमण धातुएँ सामान्यतः रंगीन यौगिक बनाती हैं।
- संक्रमण धातुएँ तथा उनके अनेक यौगिक उत्तम उत्प्रेरक का कार्य करते हैं।
हल :
(i) संक्रमण धातुओं तथा उनके अधिकांश यौगिकों में अयुग्मित e− उपस्थित होते हैं, इसलिए वे अनुचुंबकीय होते हैं।
(ii) संक्रमण धातुओं में अयुग्मित e− उपस्थित होने के कारण वे रंगीन यौगिक बनाती हैं।
(iii) संक्रमण तत्वों में रिक्त d-कक्षक होने के कारण ये अपने रिक्त कक्षकों को अभिकारकों को उपलब्ध कराकर मध्यवर्ती यौगिक बनाते हैं। ये मध्यवर्ती यौगिक बाद में टूटकर उत्पाद दे देते हैं। इसलिए ये उत्तम उत्प्रेरक होते हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1: Cr2+ अपचायक है जबकि Mn3+ ऑक्सीकारक है, जबकि दोनों का d4 विन्यास है। क्यों?
उत्तर: Cr2+ एक अपचायक है, क्योंकि इसका विन्यास d4 से d3 में परिवर्तित होता है, जिसमें अर्ध-भरा t2g स्तर प्राप्त होता है।
दूसरी ओर Mn3+ से Mn2+ में परिवर्तन से अर्ध-भरा d5 विन्यास प्राप्त होता है, जो इसे अतिरिक्त स्थायित्व प्रदान करता है।
प्रश्न 2: कोई धातु अपनी उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्था केवल ऑक्साइड अथवा फ्लोराइड में ही क्यों प्रदर्शित करती है?
उत्तर: छोटे आकार एवं उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण ऑक्सीजन अथवा फ्लोरीन, धातु को उसकी उच्च ऑक्सीकरण अवस्था तक ऑक्सीकारित कर सकते हैं।
प्रश्न 3: Cr2+ और Fe2+ में से कौन प्रबल अपचायक है और क्यों?
उत्तर: Fe2+ की तुलना में Cr2+ एक प्रबल अपचायक पदार्थ है।
कारण: Cr2+ से Cr3+ बनने में d4 → d3 परिवर्तन होता है, जबकि Fe2+ से Fe3+ में d6 → d5 परिवर्तन होता है।
जल जैसे माध्यम में d3, d5 की तुलना में अधिक स्थायी होता है।
प्रश्न 4: संक्रमण तत्व संकुल यौगिक बनाते हैं। दो कारण दीजिए।
उत्तर:
- इनके धनायनों का आकार अत्यधिक छोटा होता है।
- रिक्त 3d, 4s, 4p कक्षक की उपस्थिति के कारण ये लिगैण्ड से e− युग्म ग्रहण कर लेते हैं।
प्रश्न 5: निम्न में से प्रतिचुम्बकीय कौन है? Zn2+, Cu2+, Cr2+, Cr3+
उत्तर: Zn2+ आयन।
कारण: इसमें अयुग्मित e− नहीं होते, इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय होता है।
प्रश्न 6: लैन्थेनाइड व ऐक्टिनाइड में कोई दो समानताएँ लिखिए।
उत्तर:
- दोनों ही f-block के तत्व हैं।
- दोनों की मुख्य ऑक्सीकरण अवस्था +3 होती है।
- लैन्थेनाइड संकुचन की तरह ऐक्टिनाइड संकुचन भी होता है।
- दोनों श्रेणियों में परमाणु क्रमांक बढ़ने पर आकार में थोड़ी कमी होती है।
प्रश्न 7: लैन्थेनाइड व ऐक्टिनाइड में कोई दो अन्तर लिखिए।
उत्तर:
- लैन्थेनाइड सामान्यतः +3 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करते हैं, जबकि ऐक्टिनाइड +3, +4, +5, +6, +7 तक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित कर सकते हैं।
- लैन्थेनाइड की संकुल बनाने की प्रवृत्ति कम होती है, जबकि ऐक्टिनाइड में यह अधिक होती है।
प्रश्न 8: मिश्रधातुएँ क्या हैं? लैन्थेनाइड धातुओं से युक्त एक प्रमुख मिश्रधातु का उल्लेख कीजिए। इसके उपयोग भी बताइए।
उत्तर: संक्रमण धातु के आकार लगभग समान होने के कारण ये क्रिस्टल जालक में एक-दूसरे को प्रतिस्थापित करके ठोस विलयन या मिश्रधातु बनाते हैं।
उदाहरण: पीतल (Cu, Zn), कांसा (Cu, Sn)
लैन्थेनाइड तत्वों से बनी मिश्रधातु को मिश्र धातु कहा जाता है। मिश्र धातु में 95% लैन्थेनाइड धातु, लगभग 5% Fe तथा अल्प मात्रा में S, C, Ca व Al होते हैं।
उपयोग: मिश्र धातु व Mg मिश्र धातु का उपयोग बन्दूक की गोली व खोल (कवच) बनाने में होता है।
प्रश्न 9: लैन्थेनाइड श्रेणी के एक सदस्य का नाम बताइए जो +4 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाता है।
उत्तर: Ce (सीरियम)
