लवण एवं यौगिक
लवण अम्ल तथा क्षार की अभिक्रिया से प्राप्त होते हैं।
- साधारण लवण
- योगात्मक लवण
योगात्मक यौगिक वे होते हैं, जो दो या दो से अधिक लवणों से बने होते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं।
- द्विलवण
- उपसहसंयोजक या संकुल यौगिक
(1) द्विलवण
उदाहरण :
| द्विलवण | आयन |
|---|---|
| मोहर लवण : FeSO4.(NH4)2SO4.6H2O | Fe+2, 2SO4−2, 2NH4+ |
| कार्नेलाइट : KCl.MgCl2.6H2O | K+, Mg+2, 2Cl− |
| पोटाश ऐलम : K2SO4.Al2(SO4)3.24H2O | 2K+, 2Al+3, 4SO4−2 |
(2) उपसहसंयोजक या संकुल यौगिक
ये विलयन में आयनों में वियोजित नहीं होते हैं।
उदाहरण : K4[Fe(CN)6] में संकुल आयन [Fe(CN)6]4− होता है। इसमें Fe2+ तथा CN− आयनों में वियोजन नहीं होता।
संकुल यौगिकों के प्रकार
(1) धनायनिक संकुल यौगिक
ये जल में धनायनिक संकुल आयन तथा साधारण ऋणायन में टूट जाते हैं।
[Fe(NH3)6](NO3)3 → [Fe(NH3)6]3+ + 3NO3−
धनायनिक संकुल आयन साधारण ऋणायन
(2) ऋणायनिक संकुल यौगिक
ये जल में ऋणायनिक संकुल आयन तथा साधारण धनायन में टूट जाते हैं।
K4[Fe(CN)6] → 4K+ + [Fe(CN)6]4−
साधारण धनायन ऋणायनिक संकुल
(3) आयनिक संकुल यौगिक
ये जल में धनायनिक संकुल तथा ऋणायनिक संकुल आयन में टूट जाते हैं।
[Fe(NH3)6][Cr(CN)6] → [Fe(NH3)6]3+ + [Cr(CN)6]3−
धनायनिक संकुल ऋणायनिक संकुल
(4) उदासीन संकुल यौगिक
ये यौगिक जल में आयनों में नहीं टूटते हैं। तथा ये विद्युत अनअपघट्य होते हैं।
[Co(NH3)3Cl3] → कोई आयन नहीं
समन्वय यौगिकों की शब्दावली
(1) केंद्रीय धातु परमाणु या आयन (Central metal atom or ion, CMA)
किसी संकुल आयन में उपस्थित धातु परमाणु या आयन को केंद्रीय धातु परमाणु या आयन कहते हैं।
इन केंद्रीय परमाणुओं / आयनों को लुईस अम्ल कहा जाता है।
ये सामान्यतः d-block के तत्व होते हैं तथा इनमें रिक्त कक्षक होते हैं। ये तत्व लिगैण्ड से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करते हैं, जिसके कारण CMA तथा लिगैण्ड के मध्य समन्वय बन्ध का निर्माण होता है।
CMA ⟵ लिगैण्ड
अपवाद : क्लोरोफिल भी एक समन्वय यौगिक है, परंतु इसमें उपस्थित Mg2+ d-block का तत्व नहीं है।
(2) लिगैण्ड (Ligands)
वे उदासीन अणु या आयन, जो CMA से समन्वय बन्ध द्वारा जुड़े रहते हैं, लिगैण्ड कहलाते हैं।
लिगैण्ड का दाता परमाणु केंद्रीय धातु परमाणु को एक, दो या अधिक इलेक्ट्रॉन युग्म दे सकता है।
लिगैण्ड के प्रकार
आवेश के आधार पर -
- ऋणायन लिगैण्ड : Cl−, CN−, OH−, C2O42− (ऑक्सेलेट आयन)
- उदासीन लिगैण्ड : NH3, H2O, en = NH2−CH2−CH2−NH2 (एथेन-1,2-डायमीन)
- धनायन लिगैण्ड : NO2+ (नाइट्रोनियम आयन), NH2NH3+ (हाइड्राजिनियम आयन)
लिगैण्ड में उपस्थित दाता परमाणुओं की संख्या के आधार पर -
- एकदंती लिगैण्ड : एक दाता परमाणु वाले Cl−, CN−, OH−, NH3, H2O
- बहुदंती लिगैण्ड : एक से अधिक दाता परमाणु वाले
- द्विदंती लिगैण्ड : दो दाता परमाणु वाले C2O42− (ऑक्सेलेट आयन), en
- त्रिदंती लिगैण्ड : तीन दाता परमाणु वाले
- चतुर्दंती लिगैण्ड : चार दाता परमाणु वाले
- षट्दंती लिगैण्ड : छह दाता परमाणु वाले
कुछ बहुदंती लिगैण्ड
| प्रकार | सूत्र | नाम |
|---|---|---|
| त्रिदंती | NH2−(CH2)2−NH−(CH2)2−NH2 | डाइएथिलीन ट्राइएमीन (dien) |
| चतुर्दंती | NH2−(CH2)2−NH−(CH2)2−NH−(CH2)2−NH2 | ट्राइएथिलीन टेट्रामीन (trien) |
| षट्दंती | EDTA4− | एथिलीन डायमीन टेट्रा एसीटिक अम्ल |
उभयदंती लिगैण्ड
उभयदंती लिगैण्ड वह लिगैण्ड है, जिसमें दो दाता परमाणु होते हैं, लेकिन संकुल बनाते समय यह केवल एक परमाणु अपना e−-युग्म CMA को देता है।
Example 1:
CMA ⟵ C≡N
कार्बन परमाणु द्वारा :
सायनो
CMA ⟵ N≡C
नाइट्रोजन परमाणु द्वारा :
आइसोसाइनो
Example 2:
CMA ⟵ NO2
नाइट्रोजन परमाणु द्वारा :
नाइट्रो
CMA ⟵ O-N=O
ऑक्सीजन परमाणु द्वारा :
नाइट्रिटो
Example 3:
CMA ⟵ SCN
सल्फर परमाणु द्वारा :
थायोसाइनेटो
CMA ⟵ NCS
नाइट्रोजन परमाणु द्वारा :
आइसोथायोसाइनेटो
कीलेट लिगेण्ड
बहुदन्ती लिगेण्ड एक साथ दो या दो से अधिक दाता परमाणुओं द्वारा केन्द्रीय धातु आयन से जुड़ते हैं व चक्रीय संरचना बनाते हैं, जिसे कीलेट कहते हैं। ऐसे लिगेण्ड को कीलेट लिगेण्ड कहते हैं।
कीलेट लिगेण्ड के कारण कीलेट संकुल का स्थायीपन, एक तदंती संकुल यौगिक से अधिक होता है।
उदाहरण
| संकुल | सूत्र |
|---|---|
| कॉपर के साथ एथिलीन डायमीन संकुल | [Cu(en)2]2+ |
| प्लैटिनम के साथ एथिलीन डायमीन संकुल | [PtCl2(en)] |
CMA की ऑक्सीकरण संख्या
उदाहरण : [Cr(H2O)4Cl2]+
माना Cr की ऑक्सीकरण संख्या x है।
H2O एक उदासीन लिगैण्ड है, इसलिए इसका आवेश 0 होगा।
Cl− एक ऋणायनिक लिगैण्ड है, इसलिए प्रत्येक Cl का आवेश −1 होगा।
अतः,
x + (4 × 0) + (2 × −1) = +1
x + 0 − 2 = +1
x = +3
इसलिए Cr की ऑक्सीकरण संख्या +3 है।
अतः Cr = Cr+3
होमोलेप्टिक तथा हेटरोलेप्टिक संकुल
होमोलेप्टिक संकुल : वे संकुल जिनमें धातु परमाणु केवल एक प्रकार के दाता समूह से जुड़ा रहता है, होमोलेप्टिक संकुल कहलाते हैं।
उदाहरण : [Co(NH3)6]3+
हेटरोलेप्टिक संकुल : वे संकुल जिनमें धातु परमाणु एक से अधिक प्रकार के दाता समूहों से जुड़ा रहता है, हेटरोलेप्टिक संकुल कहलाते हैं।
उदाहरण : [Co(NH3)4Cl2]+
समन्वय बहुफलक
केन्द्रीय परमाणु/आयन से सीधे जुड़े लिगेण्ड परमाणुओं की व्यवस्था के कारण बनी ज्यामिति को समन्वय बहुफलक कहते हैं।
जैसे अष्टफलकीय, वर्ग समतलीय तथा चतुष्फलकीय आदि।
उदाहरण
| संकुल | समन्वय बहुफलक |
|---|---|
| [Co(NH3)6]3+ | अष्टफलकीय |
| [Ni(CO)4] | चतुष्फलकीय |
समन्वय यौगिकों का IUPAC नामकरण
Step-1
संकुल यौगिक को धनायन भाग तथा ऋणायन भाग में विभाजित करते हैं।
Step-2 : धनायन भाग का नामकरण
साधारण धनायन के नाम में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता।
उदाहरण : K+ = Potassium, Na+ = Sodium
यदि धनायन संकुल हो, तो उसका नामकरण इस क्रम में किया जाता है :
- लिगैण्ड का नाम
- CMA का English name
- CMA की oxidation number को Roman numeral में लिखते हैं
उदाहरण :
- Fe = Iron
- Ag = Silver
- Cr = Chromium
- Au = Gold
Oxidation number को Roman में लिखते हैं। जैसे : Fe+3 = (III), Cr+3 = (III)
Step-3 : ऋणायन भाग का नाम
साधारण ऋणायन के नाम में भी कोई परिवर्तन नहीं किया जाता।
उदाहरण : Cl− = Chloride, SO42− = Sulphate, Br− = Bromide
यदि ऋणायन संकुल हो, तो उसका नामकरण इस क्रम में किया जाता है :
- लिगैण्ड का नाम
- CMA का Latin name + ate
- Oxidation number को Roman numeral में लिखते हैं
धातु तथा उनके Latin नाम
| धातु | Latin नाम | ऋणायन संकुल में नाम |
|---|---|---|
| Fe | Ferrum | Ferrate |
| Cu | Cuprum | Cuprate |
| Pb | Plumbum | Plumbate |
| Ag | Argentum | Argentate |
| Au | Aurum | Aurate |
| Sn | Stannum | Stannate |
| Co | Cobaltum | Cobaltate |
Oxidation number of CMA : Roman numeral में लिखते हैं
लिगैण्ड का नामकरण
आवेश के आधार पर लिगैण्ड का नामकरण किया जाता है।
ऋणात्मक आवेश वाले लिगैण्ड
| Ligand | Suffix / नाम |
|---|---|
| Cl− | क्लोरो |
| F− | फ्लोरो |
| OH− | हाइड्रॉक्सो |
| CH3COO− | एसीटेटो |
| ONO− | नाइट्रिटो |
| SO42− | सल्फेटो |
| C2O42− | ऑक्सालेटो |
| CN− | सायनिडो |
| SCN− | थायोसायनेटो |
| NCS− | आइसोथायोसायनेटो |
| NC− | आइसोसाइनिडो |
उदासीन लिगैण्ड
| Ligand | नाम |
|---|---|
| H2O | एक्वा |
| NH3 | एमीन |
| CO | कार्बोनिल |
| NO | नाइट्रोसिल |
| CS | थायोकार्बोनिल |
| NH2-CH2-CH2-NH2 | en (एथिलीनडायएमीन) |
| O2 | dioxygen |
| C5H5N | पिरिडीन (py) |
धनात्मक (+ve) लिगैण्ड
| Ligand | Prefix (ium) / नाम |
|---|---|
| NO2+ | नाइट्रोनियम |
| NO+ | नाइट्रोसोनियम |
| NH2-NH3+ | हाइड्राजीनियम |
लिगैण्ड संख्या एक से अधिक होने पर
Alphabetical क्रम से लिगैण्ड का नाम लिखा जाता है।
उनकी संख्या दर्शाने के लिए नाम के पहले डाइ, ट्राइ आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
Note : जब लिगैण्ड के नाम में पहले से ही डाइ, ट्राइ आदि जुड़े हों, तब ऐसे लिगैण्डों की संख्या बताने के लिए बिस, ट्रिस, टेट्राकिस आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।
उभयदन्तु लिगैण्ड युक्त यौगिक
| यौगिक | IUPAC नाम |
|---|---|
| (NH4)3[Cr(SCN)6] | अमोनियम हेक्साथायोसायनेटो-S-क्रोमेट(III) या अमोनियम हेक्साथायोसायनेटोक्रोमेट(III) |
| [Cr(NH3)3(H2O)3]Cl3 | ट्राइऐमीन ट्राइएक्वा क्रोमियम(III) क्लोराइड |
| [Co(en)3]2(SO4)3 | ट्रिस(एथेन-1,2-डायमीन) कोबाल्ट(III) सल्फेट |
उदाहरण
निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र लिखिए —
- टेट्राऐमीनएक्वाक्लोरिडोकोबाल्ट (III) क्लोराइड
- पोटैशियम टेट्राहाइड्रॉक्सिडोजिंकेट (II)
- पोटैशियम ट्राइऑक्सेलेटोएलुमिनेट (III)
- डाइक्लोरिडोबिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) कोबाल्ट (III)
- टेट्राकार्बोनिल निकेल (0)
हल
- [Co(NH3)4(H2O)Cl]Cl2
- K2[Zn(OH)4]
- K3[Al(C2O4)3]
- [CoCl2(en)2]+
- [Ni(CO)4]
उदाहरण
निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए —
- [Pt(NH3)2Cl(NO2)]
- K3[Cr(C2O4)3]
- [CoCl2(en)2]Cl
- [Co(NH3)5(CO3)]Cl
- Hg[Co(SCN)4]
हल
- डाइऐमीनक्लोरिडोनाइट्रिटो-N-प्लैटिनम (II)
- पोटैशियम ट्राइऑक्सेलेटोक्रोमेट (III)
- डाइक्लोरिडोबिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) कोबाल्ट (III) क्लोराइड
- पेंटा ऐमीन कार्बोनेटोकोबाल्ट (III) क्लोराइड
- मरकरी टेट्राथायोसाइनेटोकोबाल्टेट (III)
उपसहसंयोजन यौगिक: हल सहित प्रश्न
प्रश्न 1: निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र लिखिए
-
टेट्राऐमीनडाइक्वाकोबाल्ट (III) क्लोराइड
सूत्र: [Co(NH3)4(H2O)2]Cl3
-
पोटैशियम टेट्रासायनिडोनिकलेट (II)
सूत्र: K2[Ni(CN)4]
-
ट्रिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) क्रोमियम (III) क्लोराइड
सूत्र: [Cr(en)3]Cl3
-
ऐमीनब्रोमीडोक्लोरीडोनाइट्रेटो-N-प्लैटिनेट (II)
सूत्र: [Pt(NH3)BrCl(NO2)]−
-
डाइक्लोरोबिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) प्लैटिनम (IV) नाइट्रेट
सूत्र: [PtCl2(en)2](NO3)2
-
आयरन (III) हेक्सासायनिडोफेरेट (II)
सूत्र: Fe4[Fe(CN)6]3
प्रश्न 2: निम्नलिखित उपसहसंयोजन यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए
-
[Co(NH3)6]Cl3
IUPAC नाम: हेक्साऐमीनकोबाल्ट (III) क्लोराइड
-
[Co(NH3)5Cl]Cl2
IUPAC नाम: पेन्टाऐमीनक्लोरीडोकोबाल्ट (III) क्लोराइड
-
K3[Fe(CN)6]
IUPAC नाम: पोटैशियम हेक्सासायनिडोफेरेट (III)
-
K3[Fe(C2O4)3]
IUPAC नाम: पोटैशियम ट्राइऑक्सालेटोफेरेट (III)
-
K2[PdCl4]
IUPAC नाम: पोटैशियम टेट्राक्लोरीडोपैलेडेट (II)
-
[Pt(NH3)2Cl(NH2CH3)]Cl
IUPAC नाम: डाइऐमीनक्लोरीडो(मेथिलऐमीन)प्लैटिनम (II) क्लोराइड
समन्वय यौगिकों में समावयवता
वे यौगिक जिनके अणु सूत्र समान होते हैं, परंतु उनकी संरचनात्मक व्यवस्था अथवा त्रिविम विन्यास भिन्न होता है, ऐसे यौगिक समावयवी कहलाते हैं।
इस घटना को समावयवता कहते हैं।
समावयवता के प्रकार
| मुख्य प्रकार | उपप्रकार |
|---|---|
| संरचनात्मक समावयवता |
आयनीकरण समावयवता समन्वय समावयवता लिंकेज समावयवता हाइड्रेट समावयवता |
| त्रिविम समावयवता |
ज्यामितीय समावयवता प्रकाशीय समावयवता |
संरचनात्मक समावयवता (Structural Isomerism)
इस समावयवता में केंद्रीय धातु परमाणु के चारों ओर लिगैण्डों की व्यवस्था भिन्न होती है।
(i) आयनन समावयवता
उपसहसंयोजक यौगिक जिनका संघटन या आण्विक सूत्र समान होता है, लेकिन विलयन में ये भिन्न आयन देते हैं, आयनन समावयवी कहलाते हैं।
उदाहरण :
[CoBr(NH3)5]SO4
पेन्टाऐमीनब्रोमिडोकोबाल्ट (III) सल्फेट
[CoSO4(NH3)5]Br
पेन्टाऐमीनसल्फेटोकोबाल्ट (III) ब्रोमाइड
SO42− आयनन मंडल में उपस्थित है, इसलिए यह BaCl2 के साथ सफेद अवक्षेप देता है।
Br− आयनन मंडल में उपस्थित है, इसलिए यह AgNO3 के साथ हल्का पीला अवक्षेप देता है।
(ii) उपसहसंयोजक समावयवता
इसमें यौगिक धनायन संकुल एवं ऋणायन संकुल दोनों से बना होता है। यह समावयवता धनायन संकुल तथा ऋणायन संकुल के बीच लिगैण्डों के अंतर्विनिमय के कारण आती है।
उदाहरण :
[Co(NH3)6][Cr(CN)6]
हेक्साऐमीनकोबाल्ट (III) हेक्सासायनिडोक्रोमेट (III)
[Cr(NH3)6][Co(CN)6]
हेक्साऐमीनक्रोमियम (III) हेक्सासायनिडोकोबाल्टेट (III)
(iii) बंधनी अथवा लिंकेज समावयवता
इस प्रकार की समावयवता में केंद्रीय धातु आयन से लिगैण्ड के जुड़ने का तरीका भिन्न होता है।
उदाहरण :
[Co(ONO)(NH3)5]Cl2 तथा [Co(NO2)(NH3)5]Cl2
पेन्टाऐमीननाइट्रिटोकोबाल्ट (III) क्लोराइड
पेन्टाऐमीननाइट्रोटोकोबाल्ट (III) क्लोराइड
O-NO− में ऑक्सीजन परमाणु इलेक्ट्रॉन युग्म दान करता है, इसलिए इसे नाइट्रिटो कहते हैं।
NO2− में नाइट्रोजन परमाणु इलेक्ट्रॉन युग्म दान करता है, इसलिए इसे नाइट्रोटो कहते हैं।
(iv) विलायकयोजन अथवा हाइड्रेट समावयवता
इस समावयवता में लिगैण्ड के रूप में जल के अणुओं की संख्या भिन्न होती है। इस घटना को हाइड्रेट समावयवता कहते हैं।
उदाहरण :
(a) [Cr(H2O)6]Cl3
हेक्साएक्वाक्रोमियम (III) क्लोराइड
(b) [Cr(H2O)5Cl]Cl2.H2O
पेन्टाएक्वाक्लोरिडोक्रोमियम (III) क्लोराइड मोनोहाइड्रेट
(c) [Cr(H2O)4Cl2]Cl.2H2O
टेट्राएक्वाडाइक्लोरिडोक्रोमियम (III) क्लोराइड डाइहाइड्रेट
त्रिविम समावयवता
त्रिविम समावयवता में समावयवों के रासायनिक सूत्र व रासायनिक बन्ध समान होते हैं, परन्तु उनके केन्द्रीय धातु के चारों ओर त्रिविम विन्यास भिन्न होता है। यह दो प्रकार की होती है।
- ज्यामितीय या सिस-ट्रांस समावयवता
- प्रकाशीय समावयवता
(i) ज्यामितीय या सिस-ट्रांस समावयवता
cis- सिस समावयवी वह है, जिसमें समान समूह एक-दूसरे के पास-पास होते हैं, अर्थात इनके मध्य का कोण 90° होता है।
trans- ट्रांस समावयवी में समान समूह एक-दूसरे से विपरीत स्थिति में होते हैं, अर्थात इनके मध्य का कोण 180° होता है। इस प्रकार की समावयवता 4 तथा 6 समन्वय संख्या वाले संकुलों द्वारा दर्शायी जाती है।
चतुष्फलकीय संकुल
इस प्रकार में सभी चार लिगेण्ड एक-दूसरे की सापेक्ष स्थितियाँ आपस में एक जैसी होती हैं। अतः चतुष्फलकीय संकुलों में ज्यामितीय समावयवता नहीं होती है।
वर्ग समतलीय संकुल
चार लिगेण्ड चारों कोनों पर होते हैं और धातु परमाणु/आयन केन्द्र में होता है तथा समान तल में पाए जाते हैं। अतः इसमें ज्यामितीय समावयवता पायी जाती है।
वर्ग समतलीय संकुल के प्रकार:
- MA2B2
- Mabcd
(a) MA2B2 प्रकार : [PtCl2(NH3)2]
(b) Mabcd प्रकार :
[Pt(NH3)(Py)(Cl)(Br)]
इसमें
तीन समावयवी
बनेंगे।
समन्वय संख्या 6 के संकुल: अष्टफलकीय संकुल
यहाँ धातु परमाणु या आयन केन्द्र में पाया जाता है और 1 से 6 तक की स्थितियाँ लिगेण्डों द्वारा भरी जाती हैं।
अष्टफलकीय संकुल के प्रकार:
- MA4B2
- M(aa)2b2
- [Ma3b3]
(a) MA4B2 : [CoCl2(NH3)4]+
(b) M(aa)2b2 : [Co(en)2Cl2]+
(c) [Ma3b3] : [Co(CN)3Cl3]3−
इनमें एक अन्य प्रकार की ज्यामितीय समावयवता भी पायी जाती है।
फेशियल समावयवी (fac)
यदि एक ही लिगेण्ड के तीन निकटवर्ती दाता परमाणु अष्टफलकीय फलक के कोनों पर स्थित हों, तो फेशियल (fac) समावयवी प्राप्त होते हैं।
इस समावयवी में तीनों लिगेण्ड cis-स्थिति में होते हैं।
मेरिडियोनल समावयवी (mer)
यदि ये तीन दाता परमाणु अष्टफलकीय के एक तल पर स्थित हों, तो मेरिडियोनल (mer) समावयवी प्राप्त होते हैं।
इस समावयवी में तीनों लिगेण्ड cis व trans दोनों स्थितियों में होते हैं।
ध्रुवण अथवा प्रकाशिक समावयवता
प्रकाशिक समावयवी एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब होते हैं, जिन्हें एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किया जा सकता। इन्हें प्रतिबिम्ब रूप या एनैन्टियोमर कहा जाता है।
काइरल अणु / आयन वे अणु या आयन हैं, जिन्हें एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किया जा सकता। ऐसे अणु या आयन काइरल (Chiral) कहलाते हैं।
वे समावयवी, जो ध्रुवित प्रकाश तल को दायीं दिशा में घुमाते हैं, दक्षिणावर्ती (d) कहलाते हैं।
तथा वे समावयवी, जो ध्रुवित प्रकाश तल को बायीं दिशा में घुमाते हैं, वामावर्ती (l) कहलाते हैं।
इनमें सममिति का तल नहीं पाया जाता।
अष्टफलकीय संकुलों में प्रकाशिक समावयवता
(a) [M(aa)3]
उदाहरण : [Co(en)3]3+
(b) [M(aa)2b2]
उदाहरण : cis-[Co(en)2Cl2]+
Note
[M(aa)2b2] का केवल cis-रूप ही प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित करता है, जबकि इसके trans-रूप के दर्पण प्रतिबिम्ब एक-दूसरे पर अध्यारोपित हो जाते हैं, इसलिए वह प्रकाशिक समावयवता प्रदर्शित नहीं करता।
उपसहसंयोजक यौगिकों का वर्नर का सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के अनुसार CMA दो प्रकार की संयोजकता दर्शाता है।
- प्राथमिक संयोजकता (Oxidation number) : यह आयनित होती है। यह धातु आयन पर उपस्थित धनात्मक आवेश अर्थात ऑक्सीकरण अवस्था होती है।
- द्वितीयक संयोजकता (Coordination number) : यह अनायनित होती है। यह धातु से जुड़े लिगेण्ड परमाणुओं की संख्या अर्थात उपसहसंयोजक संख्या के बराबर होती है।
प्रश्न
जलीय विलयनों में किए गए निम्नलिखित प्रेक्षणों के आधार पर निम्नलिखित यौगिकों में धातुओं की प्राथमिक तथा द्वितीयक संयोजकता बताइए।
| सूत्र | अधिक्य में मिलाने पर 1 मोल से अवक्षेपित Cl− के मोलों की संख्या | प्राथमिक संयोजकता | द्वितीयक संयोजकता |
|---|---|---|---|
| [Co(NH3)6]Cl3 | 3 | 3 | 6 |
| [Co(NH3)5Cl]Cl2 | 2 | 3 | 6 |
| [Co(NH3)4Cl2]Cl | 1 | 3 | 6 |
| [Co(NH3)3Cl3] | 0 | 3 | 6 |
प्रश्न
दिए गए संकुल यौगिकों में निम्नलिखित प्रेक्षणों के मान लिखिए।
| संकुल यौगिक | आयनों की संख्या | चालक्ता अनुपात | AgNO3 के अधिक्य के साथ क्रिया कराने पर प्राप्त AgCl के मोल |
|---|---|---|---|
| A. [Co(NH3)6]Cl3 | 4 | अधिकतम | 3 |
| B. [Co(NH3)5Cl]Cl2 | 3 | A से कम | 2 |
| C. [Co(NH3)4Cl2]Cl | 2 | B से कम | 1 |
| D. [Co(NH3)3Cl3] | 0 | न्यूनतम | 0 |
A, B, C विद्युत अपघट्य हैं, जबकि D विद्युत अनअपघट्य है।
मोलर चालकता का क्रम : A > B > C > D
A, B, C की AgNO3 से अभिक्रिया कराने पर AgCl का श्वेत अवक्षेप प्राप्त होता है, परन्तु D कोई भी अवक्षेप नहीं देता।
उपसहसंयोजक यौगिकों में बन्धन सिद्धान्त
उपसहसंयोजक यौगिकों में बन्धन को समझाने के लिए मुख्यतः दो सिद्धान्त दिए गए हैं।
- संयोजकता बन्ध सिद्धान्त (Valence Bond Theory, VBT)
- लिगेण्ड क्षेत्र सिद्धान्त (Ligand Field Theory)
संयोजकता बन्ध सिद्धान्त
सर्वप्रथम धातु परमाणु अपनी संयोजकता के अनुसार e− त्याग कर धातु आयन (Mn+) बनाते हैं।
केंद्रीय धातु आयन के परमाण्विक कक्षक (s, p, d) उचित संख्या में संकरित होकर रिक्त संकरित कक्षक बनाते हैं।
ये संकरित कक्षक लिगैण्ड से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करते हैं और समन्वय बन्ध बनाने में भाग लेते हैं।
समन्वय संख्या, ज्यामिति एवं संकरण
| समन्वय संख्या | ज्यामितीय आकृति | संकरण का प्रकार |
|---|---|---|
| 4 | चतुष्फलकीय | sp3 |
| 4 | वर्ग समतलीय | dsp2 |
| 6 | अष्टफलकीय | d2sp3 या sp3d2 |
प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड एवं दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड
प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड
प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड धातु परमाणु / आयन के इलेक्ट्रॉनों को युग्मित करने के लिए बल लगाते हैं। इसलिए जब अन्तः d-कक्षक, अर्थात् (n−1)d कक्षक संकरण में प्रयुक्त होते हैं, तब संकुल को अन्तः d-कक्षक संकुल अथवा निम्न चक्रण संकुल कहते हैं।
प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड : NH3, en, CN−, CO, NO2−
दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड
दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड धातु परमाणु / आयन के इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं करा पाते हैं। इसलिए जब बाह्य d-कक्षक, अर्थात् nd कक्षक संकरण में प्रयुक्त होते हैं, तब संकुल को बाह्य d-कक्षक संकुल अथवा उच्च चक्रण संकुल कहते हैं।
दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड : I−, Br−, Cl−, F−, OH−, C2O42−, H2O
अनुचुम्बकत्व की गणना
अनुचुम्बकत्व की गणना निम्न सूत्र द्वारा की जाती है।
μ = √(n(n+2)) BM
जहाँ
μ =
चुम्बकीय आघूर्ण
तथा
n =
अयुग्मित e− की संख्या
VBT के आधार पर [Ni(CN)4]2− तथा [NiCl4]2−
प्रश्न: संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त (VBT) द्वारा [Ni(CN)4]2− तथा [NiCl4]2− के सम्बन्ध में निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए : संकरण का प्रकार, अन्तः अथवा बाह्य कक्षक, चुम्बकीय व्यवहार, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या, चुम्बकीय आघूर्ण तथा ज्यामिति।
हल
Ni का परमाणु क्रमांक 28 है। इसका बाह्य विन्यास 3d84s2 होता है। Ni2+ के लिए विन्यास 3d8 होगा।
| संकुल आयन | संकरण | अन्तः / बाह्य कक्षक | चुम्बकीय व्यवहार | अयुग्मित e− | चुम्बकीय आघूर्ण | ज्यामिति |
|---|---|---|---|---|---|---|
| [Ni(CN)4]2− | dsp2 | अन्तः d-कक्षक संकुल | प्रतिचुम्बकीय | 0 | 0 BM | वर्ग समतलीय |
| [NiCl4]2− | sp3 | बाह्य कक्षक संकुल | अनुचुम्बकीय | 2 | μ = √(2(2+2)) = √8 BM | चतुष्फलकीय |
[Ni(CN)4]2− का वर्णन
CN− एक प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड है। यह 3d-इलेक्ट्रॉनों का युग्मन करा देता है। इसलिए एक 3d कक्षक रिक्त हो जाता है और 1d + 1s + 2p कक्षक मिलकर dsp2 संकरण बनाते हैं।
अतः [Ni(CN)4]2− एक अन्तः d-कक्षक संकुल, प्रतिचुम्बकीय तथा वर्ग समतलीय होता है।
[NiCl4]2− का वर्णन
Cl− एक दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड है। यह 3d-इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं करा पाता। इसलिए भीतरी d-कक्षक संकरण में भाग नहीं लेते। बाहरी 4s और 4p कक्षक मिलकर sp3 संकरण बनाते हैं।
अतः [NiCl4]2− एक बाह्य कक्षक संकुल, अनुचुम्बकीय तथा चतुष्फलकीय होता है। इसमें 2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं।
दूसरा प्रश्न
संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त के आधार पर वर्ग समतलीय संरचना वाला [Ni(CN)4]2− आयन प्रतिचुम्बकीय है, क्योंकि CN− प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड होने से 3d-इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कराता है। इस कारण कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं बचता।
जबकि [NiCl4]2− आयन चतुष्फलकीय तथा अनुचुम्बकीय है, क्योंकि Cl− दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड होने से इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं कराता। इसलिए इसमें 2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित रहते हैं।
VBT के आधार पर [Co(NH3)6]3+ तथा [CoF6]3−
प्रश्न: संयोजकता आबन्ध सिद्धान्त (VBT) द्वारा [Co(NH3)6]3+ तथा [CoF6]3− के सम्बन्ध में संकरण का प्रकार, अन्तः अथवा बाह्य कक्षक, चुम्बकीय व्यवहार, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या, चुम्बकीय आघूर्ण तथा ज्यामिति स्पष्ट कीजिए।
हल
Co का परमाणु क्रमांक 27 है। इसका बाह्य विन्यास 3d74s2 होता है। Co3+ के लिए विन्यास 3d6 होगा।
| संकुल आयन | लिगेण्ड | संकरण | अन्तः / बाह्य कक्षक | चुम्बकीय व्यवहार | अयुग्मित e− | चुम्बकीय आघूर्ण | ज्यामिति |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| [Co(NH3)6]3+ | NH3 (प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड) | d2sp3 | अन्तः d-कक्षक संकुल / निम्न चक्रण | प्रतिचुम्बकीय | 0 | μ = 0 BM | अष्टफलकीय |
| [CoF6]3− | F− (दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड) | sp3d2 | बाह्य कक्षक संकुल / उच्च चक्रण | अनुचुम्बकीय | 4 | μ = √(n(n+2)) = √(4(4+2)) = 4.90 BM | अष्टफलकीय |
[Co(NH3)6]3+ का वर्णन
NH3 प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड होने के कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कराता है। अतः Co3+ में दो 3d कक्षक रिक्त हो जाते हैं और 2d + 1s + 3p कक्षक मिलकर d2sp3 संकरण बनाते हैं।
- संकरण: d2sp3
- प्रकृति: अन्तः कक्षक संकुल अथवा निम्न चक्रण संकुल
- चुम्बकीय व्यवहार: प्रतिचुम्बकीय (अयुग्मित e− अनुपस्थित)
- n = 0, μ = 0
- ज्यामिति: अष्टफलकीय
[CoF6]3− का वर्णन
F− दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड होने के कारण इलेक्ट्रॉनों का युग्मन नहीं कर पाता। इसलिए भीतरी 3d कक्षक संकरण में भाग नहीं लेते। बाहरी 1s + 3p + 2d कक्षक मिलकर sp3d2 संकरण बनाते हैं।
- संकरण: sp3d2
- प्रकृति: बाह्य कक्षक संकुल या उच्च चक्रण संकुल
- चुम्बकीय व्यवहार: अनुचुम्बकीय (अयुग्मित e− उपस्थित)
- n = 4, μ = √(n(n+2)) = √(4(4+2)) = 4.90 BM
- ज्यामिति: अष्टफलकीय
(2) क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त (Crystal Field Theory)
इस सिद्धान्त के अनुसार जब लिगैण्ड धातु परमाणु या आयन के नजदीक आता है, तो एक क्षेत्र निर्मित होता है। यह क्षेत्र धातु परमाणु के समान ऊर्जा के d-कक्षकों को विभिन्न ऊर्जा स्तरों में विभाजित कर देता है।
इस सिद्धान्त के अनुसार दो प्रकार के बल कार्य करते हैं -
- केंद्रीय धातु आयन तथा लिगैण्ड के e− के मध्य आकर्षण बल
- धातु आयन के e− तथा लिगैण्ड के e− के मध्य प्रतिकर्षण बल
d-कक्षकों का अभिविन्यास
| कक्षक समूह | कक्षक | स्थिति | ऊर्जा |
|---|---|---|---|
| t2g कक्षक | dxy, dyz, dxz | अक्षों के मध्य स्थित होते हैं | अक्षीय कक्षक नहीं होते |
| eg kक्षक | dx2−y2, dz2 | अक्षों के अनुदिश स्थित होते हैं | अक्षीय कक्षक होते हैं |
t2g कक्षक : dxy, dyz, dxz
eg कक्षक : dx2−y2, dz2
अष्टफलकिय उपसहसंयोजन समूहों में क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन
धातु आयन Mn+ अष्टफलक के केंद्र में होता है तथा लिगैण्ड उसके 6 कोनों पर स्थित होते हैं।
लिगैण्ड x, y, z अक्षों के अनुदिश धातु आयन की ओर आते हैं। इसलिए वे धातु के d-कक्षकों के e− को प्रतिक्षेपित करते हैं। इस प्रतिकर्षण के कारण d-कक्षकों की ऊर्जा बढ़ जाती है।
eg कक्षक (dx2−y2 तथा dz2) अक्षों के साथ सीधे लिगैण्ड की दिशा में होते हैं। इसलिए इन कक्षकों में उपस्थित e− अधिक प्रतिकर्षण अनुभव करते हैं।
जबकि t2g कक्षक (dxy, dyz, dzx) अक्षों के बीच स्थित होते हैं, इसलिए इनमें उपस्थित e− कम प्रतिकर्षण अनुभव करते हैं।
अतः eg कक्षकों (dx2−y2 तथा dz2) की ऊर्जा अधिक हो जाती है, जबकि t2g कक्षकों (dxy, dyz, dzx) की ऊर्जा कम हो जाती है।
अतः लिगैण्ड की उपस्थिति में धातु आयन के d-कक्षकों का t2g तथा eg कक्षकों में विभाजित हो जाना क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन कहलाता है।
क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा का मापन t2g तथा eg कक्षकों की ऊर्जाओं के अंतर द्वारा किया जाता है। इसे ∆0 से दर्शाते हैं।
इस प्रकार दो eg कक्षकों की ऊर्जा में (3/5)∆0 के बराबर वृद्धि होती है तथा तीन t2g कक्षकों की ऊर्जा में (2/5)∆0 के बराबर कमी आती है।
स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी
प्रश्न: स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी क्या है? दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड तथा प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
लिगेण्ड को उनकी बढ़ती हुई प्रबलता अर्थात क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन की क्षमता के क्रम में रखने पर जो श्रेणी प्राप्त होती है, उसे स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी कहते हैं।
दो प्रकार के लिगेण्ड क्षेत्र होते हैं।
(1) प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड
प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन अधिक करते हैं, अर्थात Δo > p होता है। ये इलेक्ट्रॉनों को बलपूर्वक युग्मित कर देते हैं और निम्न चक्रण संकुल बनाते हैं।
उदाहरण : NH3, en, CN−, CO, NO2−
(2) दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड
दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन कम करते हैं, अर्थात Δo < p होता है। ये इलेक्ट्रॉनों को बलपूर्वक युग्मित नहीं कर पाते और उच्च चक्रण संकुल बनाते हैं।
उदाहरण : I−, Br−, Cl−, F−, OH−, C2O42−, H2O
युग्मन ऊर्जा वह आवश्यक ऊर्जा है, जो एक कक्षक में इलेक्ट्रॉन युग्मन के लिए चाहिए होती है।
स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी का क्रम
I− < Br− < SCN− < Cl− < S2− < F− < OH− < C2O42− < H2O < NCS− < EDTA4− < NH3 < en < CN− < CO
| प्रबल क्षेत्र लिगेण्ड | दुर्बल क्षेत्र लिगेण्ड |
|---|---|
| NH3, en, CN−, CO, NO2− | I−, Br−, Cl−, F−, OH−, C2O42−, H2O |
अष्टफलकीय संरचना में धातु आयन के d-कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का वितरण
(a) d1, d2, d3 विन्यास
धातु आयन में यदि d-कक्षकों का विन्यास d1, d2, d3 हो, तो
d1 = t2g1, d2 = t2g2, d3 = t2g3
(b) d4, d5, d6, d7, d8 विन्यास
धातु आयन में यदि d-कक्षकों का विन्यास d4, d5, d6, d7, d8 हो, तो दो प्रकार के विन्यास होते हैं।
दुर्बल लिगेण्ड क्षेत्र के कारण e− का युग्मन नहीं होगा।
d4 = t2g3eg1, d5 = t2g3eg2, d6 = t2g4eg2, d7 = t2g5eg2
प्रबल लिगेण्ड क्षेत्र के कारण e− का युग्मन होगा।
d4 = t2g4eg0, d5 = t2g5eg0, d6 = t2g6eg0, d7 = t2g6eg1, d8 = t2g6eg2
(c) d9, d10 विन्यास
धातु आयन में यदि d-कक्षकों का विन्यास d9, d10 होता है, तो उदाहरण के लिए
d9 = t2g6eg3, d10 = t2g6eg4
चतुष्फलकीय उपसहसंयोजन समूहों में क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन
चतुष्फलकीय ज्यामिति में धातु धनायन एक क्षेत्र के मध्य में स्थित होता है। तथा लिगैण्ड घन के चार कोनों की ओर से आते हैं। अर्थात वे x, y, z अक्षों के मध्य से प्रवेश करते हैं।
अतः d-कक्षकों का विपाटन अष्टफलकीय की तुलना में उल्टा तथा कम होता है।
| ज्यामिति | उच्च ऊर्जा कक्षक | निम्न ऊर्जा कक्षक | विभाजन |
|---|---|---|---|
| चतुष्फलकीय | t2g = dxy, dyz, dxz | eg = dx2−y2, dz2 | Δt |
Δoct > Δtet [ΔEtet = 4/9 ΔEoct]
अतः कक्षकों की विपाटन ऊर्जा इतनी अधिक नहीं होती कि इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कर सके। इसलिए निम्न चक्रण (low spin) विन्यास कम ही होता है।
संकुल यौगिकों की रंगीन प्रकृति
संक्रमण तत्व के वे आयन जिनके d-कक्षकों में अयुग्मित e− होते हैं, रंग प्रदर्शित करते हैं।
d-कक्षक में उपस्थित e− ऊर्जा प्राप्त करके उत्तेजित हो जाते हैं और उच्च ऊर्जा स्तर में चले जाते हैं। इस संक्रमण के दौरान वे दृश्य क्षेत्र के किसी उपयुक्त भाग से ऊर्जा अवशोषित करते हैं। इसके कारण जो रंग दिखाई देता है, वह अवशोषित प्रकाश के रंग का पूरक रंग होता है।
Note :
संक्रमण तत्वों के जिन आयनों में e− की संख्या समान होगी, उनके रंग भी प्रायः समान होते हैं।
अयुग्मित e− की संख्या कम होने पर गहरा रंग प्राप्त होता है।
अयुग्मित e− की संख्या zero होने पर आयन रंगहीन होगा।
उदाहरण : [Ti(H2O)6]3+ यौगिक बैंगनी रंग का होता है। क्योंकि इसके t2g कक्षक में एक e− होता है, जो दृश्य क्षेत्र के पीले भाग से ऊर्जा अवशोषित करता है और उच्च ऊर्जा स्तर में चला जाता है। इसलिए हमें उसका पूरक रंग (बैंगनी) दिखाई देता है।
d-d संक्रमण : वह घटना जिसमें e− विशिष्ट तरंगदैर्ध्य के प्रकाश को अवशोषित करके t2g से eg कक्षक में चला जाता है, d-d संक्रमण कहलाती है।
धातु कार्बोनिलों में बन्धन
धातु कार्बोनिलों में धातु-कार्बन बन्ध के बीच σ तथा π दोनों प्रकार के बन्ध पाए जाते हैं।
धातु तथा कार्बन मोनोऑक्साइड या कार्बोनिल के मध्य बने बन्ध में σ-बन्धन एवं π-बन्धन दोनों होते हैं।
धातु तथा कार्बोनिल समूह के कार्बन के बीच σ-बन्ध, कार्बोनिल समूह के कार्बन पर उपस्थित इलेक्ट्रॉन युग्म को धातु के रिक्त कक्षक में दान करने से बनता है।
धातु तथा कार्बोनिल समूह के कार्बन के बीच π-बन्ध, धातु के पूर्णित d-कक्षकों में से एक इलेक्ट्रॉन युग्म को CO के रिक्त प्रतिबन्धी π* कक्षक में दान करने से बनता है। इसे पश्च आबन्धन कहते हैं।
इसी कारण धातु से लिगेण्ड का आबन्ध अधिक प्रबल हो जाता है।
इन्हें π-अम्ल लिगेण्ड भी कहा जाता है।
विलयन में उपसहसंयोजक यौगिकों का स्थायित्व
उपसहसंयोजन यौगिक के विलयन में स्थायित्व से तात्पर्य है कि धातु-लिगेण्ड बन्ध जितना प्रबल होगा, विलयन में वियोजन उतना ही कम होगा। इसलिए उपसहसंयोजक यौगिक का स्थायित्व भी अधिक होगा।
संकुल आयन [Cu(NH3)4]2+ के लिए स्थायित्व स्थिरांक का अर्थ है
[Cu(NH3)4]2+ ⇌ Cu2+ + 4NH3
Ki = [Cu2+][NH3]4 [Cu(NH3)4]2+ ; Ki = अस्थायी अथवा वियोजन स्थिरांक
यदि वियोजन के स्थान पर संकुल के बनने को दर्शाया जाए, तो संकुल का स्थायित्व स्थिरांक अर्थात
Cu2+ + 4NH3 → [Cu(NH3)4]2+
K = [Cu(NH3)4]2+ [Cu2+][NH3]4 ; K = स्थायित्व स्थिरांक
K = [Cu(NH3)4]2+ [Cu2+][NH3]4 = 1 / Ki
स्थायित्व स्थिरांक (K) जितना अधिक बड़ा होगा, उतना ही प्रबल धातु-लिगेण्ड बन्ध होता है।
स्थायित्व को प्रभावित करने वाले कारक
- CMA की प्रकृति : CMA पर धनावेश अधिक होने के कारण लिगेण्ड के e− युग्म को आसानी से आकर्षित किया जाता है, जिससे स्थायित्व बढ़ता है।
- लिगेण्ड की प्रकृति : लिगेण्ड के e− युग्म को आसानी से देने की प्रवृत्ति के कारण स्थायित्व बढ़ता है। जैसे [Cu(CN)4]2−, [Cu(NH3)4]2+ से अधिक स्थायी होगा, क्योंकि CN− का आकार NH3 की तुलना में छोटा होने के कारण CN− की e− युग्म देने की प्रवृत्ति अधिक होती है।
- कीलेट वलय की उपस्थिति : कीलेट वलय की उपस्थिति के कारण स्थायित्व बढ़ता है।
समन्वय यौगिकों के अनुप्रयोग
- जल की कठोरता की जाँच में EDTA का उपयोग किया जाता है, क्योंकि Ca2+ तथा Mg2+ आयन EDTA के साथ संकुल बनाते हैं।
- वनस्पति में क्लोरोफिल Mg2+ का संकुल है, तथा जन्तुओं में हीमोग्लोबिन Fe2+ का संकुल है। इसी प्रकार विटामिन B12 भी Co का संकुल है।
- विल्किन्सन उत्प्रेरक एक उत्प्रेरक है, जो एल्कीनों के हाइड्रोजनीकरण में उपयोग में आता है।
- धातुओं के निष्कर्षण में भी समन्वय यौगिकों का उपयोग होता है। उदाहरण के लिए, ऑक्सीजन तथा जल की उपस्थिति में स्वर्ण सायनाइड आयन से संयोग करके जलीय विलयन में समन्वय यौगिक बनाता है। इस विलयन से बाद में स्वर्ण को पृथक किया जाता है।
- औषधि के रूप में भी समन्वय यौगिकों का उपयोग होता है। जैसे सिस-प्लैटिन अर्थात cis-[PtCl2(NH3)2] का उपयोग कैंसर के उपचार में किया जाता है।
- पौधों तथा जीव-जन्तुओं में विषैली मात्रा में उपस्थित धातुओं के उपचार में भी समन्वय यौगिकों का उपयोग किया जाता है।
- EDTA का उपयोग लेड (Pb) की विषाक्तता के उपचार में किया जाता है।
- ब्रिटिश एण्टि-ल्यूसाइट का उपयोग आर्सेनिक की विषाक्तता के उपचार में किया जाता है।
