ऐल्कोहॉल (R−OH), फिनॉल (Ar−OH), ईथर (R−O−R)
वर्गीकरण
(A) −OH समूह के आधार पर ये मोनोहाइड्रिक, डाइहाइड्रिक तथा ट्राइहाइड्रिक होते हैं।
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| मोनोहाइड्रिक | C2H5OH |
| डाइहाइड्रिक | CH2OH−CH2OH |
| ट्राइहाइड्रिक | CH2OH−CHOH−CH2OH |
फिनॉल भी मोनोहाइड्रिक, डाइहाइड्रिक तथा ट्राइहाइड्रिक हो सकते हैं।
मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉलों का वर्गीकरण
(i) वे यौगिक जिनमें (C−OH) sp3 आबद्ध उपस्थित हो।
मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल
| प्रकार | सामान्य सूत्र |
|---|---|
| प्राथमिक (1°) | R−CH2OH |
| द्वितीयक (2°) | R−CH(OH)−R |
| तृतीयक (3°) | R3C−OH |
ऐलिलिक ऐल्कोहॉल (प्राथमिक, द्वितीयक तथा तृतीयक)
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| प्राथमिक | CH2=CH−CH2OH |
| द्वितीयक | CH2=CH−CH(OH)−R |
| तृतीयक | CH2=CH−C(OH)(R)−R |
बेंज़िलिक ऐल्कोहॉल
| प्रकार | उदाहरण |
|---|---|
| प्राथमिक | C6H5−CH2OH |
| द्वितीयक | C6H5−CH(OH)−R |
| तृतीयक | C6H5−C(OH)(R)−R |
(ii) वे यौगिक जिनमें (C−OH) sp2 आबद्ध उपस्थित हो।
वाइनिलिक ऐल्कोहॉल : CH2=CH−OH
फिनॉल : C6H5OH
ऐल्कोहॉल का नामकरण
सामान्य नाम → ऐल्किल ऐल्कोहॉल
| Structure | Common name | IUPAC name |
|---|---|---|
| CH3 – OH | मेथिल ऐल्कोहॉल | मेथेनॉल |
| CH3 – CH2 – CH2 – OH | n – प्रोपिल ऐल्कोहॉल | प्रोपेन–1–ऑल |
| CH3 – CHOH – CH3 | आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल | प्रोपेन–2–ऑल |
| CH3 – CH2 – CH2 – CH2 – OH | n – ब्यूटिल ऐल्कोहॉल | ब्यूटेन–1–ऑल |
| CH3 – CHOH – CH2 – CH3 | द्वितीयक–ब्यूटिल ऐल्कोहॉल | ब्यूटेन–2–ऑल |
|
CH3 – CH – CH2 – OH
| CH3 |
आइसोब्यूटिल ऐल्कोहॉल | 2–मेथिलप्रोपेन–1–ऑल |
|
CH3
| CH3 – C – OH | CH3 |
तृतीयक–ब्यूटिल ऐल्कोहॉल | 2–मेथिलप्रोपेन–2–ऑल |
|
CH2 – CH – CH2
| | | OH OH OH |
ग्लिसरॉल | प्रोपेन–1, 2, 3–ट्राइऑल |
फिनॉल का नामकरण
| Structure | Common name | IUPAC name |
|---|---|---|
| ⌬–OH | फिनॉल | फिनॉल |
| o–CH3C6H4OH | o – क्रेसॉल | 2–मेथिल फिनॉल |
| m–CH3C6H4OH | m – क्रेसॉल | 3–मेथिल फिनॉल |
| p–CH3C6H4OH | p – क्रेसॉल | 4–मेथिल फिनॉल |
| 1,2–C6H4(OH)2 | कैटेकॉल | बेंजीन 1, 2–डाइऑल |
| 1,3–C6H4(OH)2 | रिसॉर्सिनॉल | बेंजीन 1, 3–डाइऑल |
| 1,4–C6H4(OH)2 | हाइड्रोक्विनोन अथवा क्विनॉल | बेंजीन 1, 4–डाइऑल |
ऐल्कोहॉलों के बनाने की विधियाँ
-
ऐल्कीन्स से
- अम्ल उत्प्रेरित जलयोजन द्वारा
- हाइड्रोबोरेशन-ऑक्सीकरण के द्वारा
-
कार्बोनिल यौगिकों से
- ऐल्डिहाइड व कीटोन के अपचयन द्वारा
- कार्बोक्सिलिक अम्लों तथा एस्टरों के अपचयन द्वारा
- ग्रीन्यार अभिकर्मकों से
1. ऐल्कीनों से
(i) अम्ल उत्प्रेरित जलयोजन द्वारा
अभिक्रिया : CH3CH=CH2 + H2O / H+ ⇌ CH3−CH(OH)−CH3
प्रोपीन → प्रोपेन-2-ऑल
क्रियाविधि
Step − 1 : H3O+ के इलेक्ट्रॉनस्नेही आक्रमण के द्वारा ऐल्कीन के प्रोटोनीकरण से कार्बोकैटायन का निर्माण होता है।
H2O + H+ → H3O+
CH3CH=CH2 + H+ → CH3−C+H−CH3
Step − 2 : कार्बोकैटायन पर जल का आक्रमण होता है।
CH3−C+H−CH3 + H2O → CH3−CH(OH2+)−CH3
Step − 3 : प्रोटॉन का त्याग किया जाता है, जिससे ऐल्कोहॉल बनता है।
CH3−CH(OH2+)−CH3 + H2O → CH3−CH(OH)−CH3 + H3O+
(ii) हाइड्रोबोरेशन-ऑक्सीकरण के द्वारा
डाइबोरेन (BH3)2 ऐल्कीन से अभिक्रिया करके ट्राइऐल्किल बोरेन बनाता है, जो जलीय सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में हाइड्रोजन पेरॉक्साइड द्वारा ऑक्सीकरण होकर ऐल्कोहॉल देता है।
यह अभिक्रिया प्रतिमार्कोनिकोफ के नियम का पालन करती है।
डाइबोरेन इलेक्ट्रॉन न्यून यौगिक होता है। यह इलेक्ट्रॉनस्नेही की तरह कार्य करता है।
CH3–CH=CH2 + H–BH2
⟶ CH3–CH–CH2
|
BH2
CH3–CH=CH2
⟶ (CH3CH2CH2)2BH
डाइऐल्किल बोरेन
CH3–CH=CH2
⟶ (CH3CH2CH2)3B
ट्राइऐल्किल बोरेन
(CH3CH2CH2)3B
H2O + H2O2
⟶ 3CH3CH2CH2OH + B(OH)3
प्रोपेन-1-ऑल
2. कार्बोनिल यौगिकों से ऐल्कोहॉल
(i) ऐल्डिहाइड व कीटोन के अपचयन द्वारा
ऐल्डिहाइड के अपचयन द्वारा प्राथमिक ऐल्कोहॉल प्राप्त होते हैं, जबकि कीटोन के अपचयन द्वारा द्वितीयक ऐल्कोहॉल प्राप्त होते हैं।
RCHO + H2 Pd / LiAlH4 → RCH2OH
RCOR′ + H2 NaBH4 / Ni / Pt → R-CH(OH)-R′
(ii) कार्बोक्सिलिक अम्लों तथा एस्टरों के अपचयन द्वारा
R-COOH (i) LiAlH4 (ii) H2O → RCH2OH
RCOOR′ H2 / उत्प्रेरक → RCH2OH + R′OH
3. ग्रिग्नार्ड अभिकर्मकों से
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक मेथेनॉल के साथ प्राथमिक ऐल्कोहॉल, किसी अन्य ऐल्डिहाइड के साथ द्वितीयक ऐल्कोहॉल तथा कीटोन के साथ तृतीयक ऐल्कोहॉल बनाते हैं।
सामान्य अभिक्रिया :
R−MgX + R′−C(=O)−R″
→
अल्कॉक्साइड
(O−MgX)
&xrightarrow{H2O / H+}
ऐल्कोहॉल
(i) मेथेनॉल / फॉर्मेल्डिहाइड के साथ
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक जब मेथेनॉल / फॉर्मेल्डिहाइड के साथ अभिक्रिया करता है, तब 1° या प्राथमिक ऐल्कोहॉल बनता है।
HCHO + R−MgX → R−CH2−OMgX &xrightarrow{H2O / H+} R−CH2OH
(ii) अन्य ऐल्डिहाइड के साथ
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक जब अन्य ऐल्डिहाइड के साथ अभिक्रिया करता है, तब 2° या द्वितीयक ऐल्कोहॉल बनता है।
R′CHO + R−MgX → R′−CH(OMgX)−R &xrightarrow{H2O / H+} R′−CH(OH)−R
(iii) कीटोन के साथ
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक जब कीटोन के साथ अभिक्रिया करता है, तब 3° या तृतीयक ऐल्कोहॉल बनता है।
R′−CO−R″ + R−MgX → R′−C(OMgX)(R)−R″ &xrightarrow{H2O / H+} R′−C(OH)(R)−R″
फिनॉलों को बनाने की विधियाँ
- हैलोएरीनों से
- बेंजीन सल्फोनिक अम्लों से
- डाइऐज़ोनियम लवणों से
- क्यूमीन से
फिनॉल बनाने की विधियाँ
(1) क्लोरोबेंजीन से
क्लोरोबेंजीन को जलीय NaOH के साथ 623 K तथा 300 atm दाब पर गरम करने से सोडियम फेनॉक्साइड बनता है, जो HCl से अभिक्रिया करके फिनॉल देता है।
C6H5Cl NaOH / 623 K / 300 atm → C6H5ONa HCl → C6H5OH
(2) बेंजीन सल्फोनिक अम्ल से
बेंजीन सल्फोनिक अम्ल को 2NaOH के साथ 573 K पर गरम करने से सोडियम फेनॉक्साइड प्राप्त होता है। इस पर H2SO4 की अभिक्रिया कराने पर फिनॉल प्राप्त होता है।
C6H5SO3H + 2NaOH 573 K → C6H5ONa + Na2SO3 + H2O
2C6H5ONa + H2SO4 → 2C6H5OH + Na2SO4
(3) क्यूमीन प्रक्रम
क्यूमीन का ऑक्सीकरण करने पर क्यूमीन हाइड्रोपेरॉक्साइड बनता है। इसका अम्लीय जल अपघटन करने पर फिनॉल तथा एसीटोन प्राप्त होते हैं।
C6H5CH(CH3)2 O2 → C6H5C(CH3)2OOH H+ / H2O → C6H5OH + CH3COCH3
भौतिक गुणधर्म
क्वथनांक
कार्बन संख्या बढ़ने के साथ-साथ क्वथनांक भी बढ़ता है। तथा ऐल्कोहॉलों में पार्श्व शृंखला बढ़ने के साथ-साथ क्वथनांक का मान घटता है।
क्वथनांक ∝ 1 / पार्श्व शृंखला की संख्या
ऐल्कोहॉलों तथा फिनॉलों के क्वथनांक अंतराअणुक हाइड्रोजन बन्ध की उपस्थिति के कारण, हाइड्रोकार्बनों, ईथरों, हेलोऐल्केनों तथा हेलोएरीनों के क्वथनांकों से अधिक होते हैं।
क्वथनांक का क्रम : ऐल्कोहॉल > ईथर > एल्केन
| यौगिक | आणविक द्रव्यमान | क्वथनांक |
|---|---|---|
| एथेनॉल | 46 | 351 K |
| मेथॉक्सीमेथेन | 46 | 248 K |
| प्रोपेन | 44 | 231 K |
ऐल्कोहॉलों और फिनॉलों में −OH समूह अंतराअणुक हाइड्रोजन बन्ध बनाते हैं। इसलिए इनके क्वथनांक उच्च होते हैं।
क्वथनांक ∝ H−बन्ध की संख्या
विलेयता
जल में ऐल्कोहॉल और फिनॉल आसानी से घुल जाते हैं, क्योंकि ये जल के अणुओं के साथ हाइड्रोजन बन्ध बनाते हैं।
R−O−H .......... H−O−H
जल में विलेयता ऐल्किल / एरिल (जलविरागी) समूहों के आकार बढ़ने के साथ घटती है।
विलेयता ∝ 1 / ऐल्किल समूह का आकार
रासायनिक अभिक्रियाएँ
ऐल्कोहॉल नाभिकस्नेही एवं इलेक्ट्रॉनस्नेही दोनों की तरह कार्य करते हैं।
(i) जब ऐल्कोहॉल नाभिकस्नेही के रूप में अभिक्रिया करती है, तब O-H के मध्य बंध टूटता है।
वे अभिक्रियाएँ जिनमें O-H बंध का विखंडन होता है :
-
ऐल्कोहॉलों एवं फिनॉलों की
अम्लता
- धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ
- ऐल्कोहॉलों की अम्लता
- फिनॉलों की अम्लता
- एस्टरीकरण
(ii) जब ऐल्कोहॉल इलेक्ट्रॉनस्नेही के रूप में अभिक्रिया करती है, तब C-O के मध्य बंध टूटता है।
वे अभिक्रियाएँ जिनमें कार्बन-ऑक्सीजन (C-O) बंध टूटता है :
- हाइड्रोजन हैलाइडों के साथ अभिक्रिया
- फॉस्फोरस ट्राइहैलाइडों के साथ अभिक्रिया
- निर्जलीकरण
- ऑक्सीकरण या विहाइड्रोजनीकरण
(iii) फिनॉल की अभिक्रियाएँ :
-
ऐरोमैटिक इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
- नाइट्रोकरण
- हैलोजनीकरण
- कोल्बे अभिक्रिया
- रीमर-टीमैन अभिक्रिया
- फिनॉल की यशद (Zn) के साथ अभिक्रिया
- ऑक्सीकरण
अल्कोहॉलों एवं फिनॉलों की अम्लता
(i) जब अल्कोहॉल नाभिकस्नेही के रूप में अभिक्रिया करते हैं
जब अल्कोहॉल नाभिकस्नेही के रूप में अभिक्रिया करते हैं, तो O-H के मध्य बन्ध टूटता है।
वे अभिक्रियाएँ जिनमें O-H बन्ध का विखण्डन होता है, निम्न हैं।
1. अल्कोहॉलों एवं फिनॉलों की अम्लता
(i) धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ
अल्कोहॉल तथा फिनॉल, सक्रिय धातुओं जैसे सोडियम, पोटैशियम तथा ऐलुमिनियम के साथ अभिक्रिया करके अल्कॉक्साइड / फिनॉक्साइड एवं हाइड्रोजन देते हैं।
2R-O-H + 2Na → 2R-O−Na+ + H2
6(CH3)3COH + 2Al → 2[(CH3)3CO]3Al + 3H2
2C6H5OH + 2Na → 2C6H5O−Na+ + H2
(ii) अल्कोहॉलों की अम्लता
- अल्कोहॉलों की अम्लीय प्रकृति O-H बन्ध के टूटने के कारण होती है।
- अतः जिनमें इलेक्ट्रॉन दाता समूह (-CH3, -C2H5) होंगे, उनमें O-H बन्ध का टूटना उतना ही कम होगा। इससे अम्लीय क्षमता कम हो जाती है।
अल्कोहॉलों की अम्ल-सामर्थ्य घटता क्रम :
प्राथमिक > द्वितीयक > तृतीयक
(iii) फिनॉलों की अम्लता
फिनॉल में हाइड्रॉक्सिल समूह बेंजीन वलय के sp2 संकरित कार्बन से सीधे जुड़ा रहता है। जिस कारण अनुनाद के कारण ऑक्सीजन पर ऋणावेश का विस्थानीकरण हो जाता है। अतः H+ आयन आसानी से त्याग दिए जाते हैं।
प्रश्न
फिनॉल अल्कोहॉलों की तुलना में अधिक अम्लीय क्यों होते हैं?
उत्तर: अल्कॉक्साइड आयनों तथा फिनॉक्साइड आयनों में फिनॉक्साइड आयन अधिक स्थायी होता है, क्योंकि फिनॉक्साइड आयन में अनुनाद के कारण O पर ऋणावेश π बन्धों में विस्थानीकृत हो जाता है।
अनुनादी संरचन = स्थायित्व
2. एस्टरीकरण
ऐल्कोहॉल एवं फिनॉल कार्बोक्सिलिक अम्लों, अम्ल क्लोराइडों एवं अम्ल ऐनहाइड्राइडों के साथ अभिक्रिया करके एस्टर बनाते हैं।
(i) कार्बोक्सिलिक अम्ल के साथ अभिक्रिया
सामान्य अभिक्रिया :
RCOOH + H−O−R′ / Ar
/ H2SO4
⇌
RCOOR′ / Ar
+ H2O
यह अभिक्रिया उत्क्रमणीय होती है, अतः इसमें बने जल को तुरंत निष्कासित कर दिया जाता है।
(ii) अम्ल क्लोराइड के साथ अभिक्रिया
CH3COCl + HO−CH2CH3 / पाइरीडीन → CH3COOCH2CH3 + HCl
एथेनॉयल क्लोराइड + एथेनॉल → एथिल एथेनोएट (एथिल एसीटेट)
अम्ल क्लोराइड के साथ यह अभिक्रिया प्रायः क्षारक (पाइरीडीन) की उपस्थिति में की जाती है, जिससे कि अभिक्रिया से बने HCl को उदासीन किया जा सके।
(iii) एसीटिक ऐनहाइड्राइड के साथ अभिक्रिया
(CH3CO)2O + HO−CH2CH3 → CH3COOCH2CH3 + CH3COOH
एसीटिक ऐनहाइड्राइड + एथेनॉल → एथिल एथेनोएट + एसीटिक अम्ल
जब सैलिसिलिक अम्ल की अभिक्रिया एसीटिक ऐनहाइड्राइड के साथ कराते हैं, तो एसीटिलसैलिसिलिक अम्ल (एस्पिरिन) प्राप्त होता है।
अभिक्रिया :
सैलिसिलिक अम्ल
+ (CH3CO)2O
/ H+
→
एसीटिलसैलिसिलिक अम्ल
(एस्पिरिन)
+ CH3COOH
(ii) जब ऐल्कोहॉल इलेक्ट्रॉनस्नेही के रूप में अभिक्रिया करती है
जब ऐल्कोहॉल इलेक्ट्रॉनस्नेही के रूप में अभिक्रिया करती है, तब C-O के मध्य बंध टूटता है।
वे अभिक्रियाएँ जिनमें कार्बन-ऑक्सीजन (C-O) बंध टूटता है :
- हाइड्रोजन हैलाइडों के साथ अभिक्रिया
- फॉस्फोरस ट्राइहैलाइडों के साथ अभिक्रिया
- निर्जलीकरण
- ऑक्सीकरण या विहाइड्रोजनीकरण
(iii) फिनॉल की अभिक्रियाएँ
- ऐरोमैटिक इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
- कोल्बे अभिक्रिया
- रीमर-टीमैन अभिक्रिया
- फिनॉल की यशद (Zn) के साथ अभिक्रिया
- ऑक्सीकरण
वे अभिक्रियाएँ जिनमें कार्बन−ऑक्सीजन (C−O) बन्ध टूटता है
(1) हाइड्रोजन हैलाइडों के साथ अभिक्रिया
यह अभिक्रिया ल्यूकास परीक्षण तथा ल्यूकास अभिकर्मक (सांद्र HCl एवं ZnCl2) से संबंधित है।
ऐल्कोहॉल ल्यूकास अभिकर्मक में विलेय होते हैं, जबकि उनके हैलाइड अविलेय होते हैं। इसलिए विलयन में धुंधलापन (अविलेयता) उत्पन्न हो जाता है।
सामान्य अभिक्रिया :
ROH + HX
/ निर्जल ZnCl2, Δ
→
R−X + H2O
ल्यूकास अभिकर्मक = सांद्र HCl + निर्जल ZnCl2
अभिक्रिया :
R−OH + HCl
/ निर्जल ZnCl2, Δ
→
R−Cl + H2O
ल्यूकास परीक्षण में धुंधलापन का क्रम
| ऐल्कोहॉल का प्रकार | धुंधलापन आने का समय | बनने वाला हैलाइड |
|---|---|---|
| 1° ऐल्किल ऐल्कोहॉल | लगभग 30 मिनट बाद | 1° ऐल्किल हैलाइड |
| 2° ऐल्किल ऐल्कोहॉल | लगभग 5 मिनट बाद | 2° ऐल्किल हैलाइड |
| 3° ऐल्किल ऐल्कोहॉल | तुरन्त | 3° ऐल्किल हैलाइड |
क्रियाशीलता का क्रम : 3° > 2° > 1°
तृतीयक ऐल्कोहॉल सबसे तेजी से अभिक्रिया करते हैं, इसलिए धुंधलापन तुरन्त दिखाई देता है। द्वितीयक ऐल्कोहॉल कुछ समय बाद, जबकि प्राथमिक ऐल्कोहॉल सबसे धीरे अभिक्रिया करते हैं।
2. फॉस्फोरस ट्राइहैलाइडों के साथ अभिक्रिया
3R-OH + PCl3 → 3R-Cl + H3PO3
अल्कोहॉल ऐल्किल क्लोराइड फॉस्फोरस अम्ल
3. निर्जलीकरण — जल का निकलना
ऐल्कोहॉल के साथ H2SO4 या H3PO4 जैसे प्रोटिक अम्लों अथवा निर्जल ZnCl2 / ऐलुमिना जैसे उत्प्रेरकों के द्वारा जल के अणु के निकलने पर एथीन बनते हैं।
–C–C–
| |
H OH
H+, गर्म
⟶ >C=C< + H2O
443 K ताप पर सांद्र H2SO4 के साथ गर्म करने पर एथेनॉल के निर्जलीकरण से ऐल्कीन प्राप्त होता है। द्वितीयक तथा तृतीयक ऐल्कोहॉलों का निर्जलीकरण मध्यम परिस्थितियों में किया जाता है।
C2H5OH H2SO4, 443 K ⟶ CH2=CH2 + H2O
CH3CH(OH)CH3 85% H3PO4, 440 K ⟶ CH3–CH=CH2 + H2O
(CH3)3C–OH 20% H3PO4, 358 K ⟶ CH2=C(CH3)2 + H2O
ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण की दर : 30 > 20 > 10
प्रश्न : प्रोपेन-2-ऑल के निर्जलीकरण की क्रियाविधि लिखिए
हल : प्रोपेन-2-ऑल के निर्जलीकरण की क्रियाविधि निम्न प्रकार है।
Step − 1 : प्रोटॉनीकृत ऐल्कोहॉल का बनना
इस चरण में प्रोपेन-2-ऑल पर H+ का आक्रमण होता है और प्रोटॉनीकृत ऐल्कोहॉल (ऑक्सोनियम आयन) बनता है।
CH3−CH(OH)−CH3 + H+ ⇌ CH3−CH(OH2+)−CH3
Step − 2 : कार्बोकैटायन का बनना
यह सबसे धीमा पद होता है। अतः यह अभिक्रिया का वेग-निर्धारक पद है। इस चरण में जल अणु निकल जाता है और कार्बोकैटायन बनता है।
CH3−CH(OH2+)−CH3 → CH3−C+H−CH3 + H2O
Step − 3 : प्रोटॉन (H+) के निकल जाने से प्रोपीन का बनना
अंतिम चरण में β-कार्बन से प्रोटॉन निकल जाता है, जिससे द्विबन्ध बनता है और प्रोपीन प्राप्त होता है।
CH3−C+H−CH3 → CH3−CH=CH2 + H+
4. ऑक्सीकरण या विहाइड्रोजनीकरण
ऐल्कोहॉलों के ऑक्सीकरण में O–H एवं C–H आबंधों का विखंडन होता है तथा कार्बोनिल-ऑक्सीजन द्वि-बंध बनता है।
H C O–H
↑ ↑
आबंध विखंडन
⟶ >C=O
प्राथमिक ऐल्कोहॉल, एल्डिहाइड में ऑक्सीकृत हो जाती है जो बाद में कार्बोक्सिलिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाता है।
R–CH2–OH
ऑक्सीकरण
⟶ R–CHO
ऑक्सीकरण
⟶ R–COOH
एल्डिहाइड
कार्बोक्सिलिक अम्ल
ऐल्कोहॉलों से सीधे कार्बोक्सिलिक अम्लों को प्राप्त करने के लिए प्रबल ऑक्सीकारक, जैसे अम्लीकृत KMnO4 का उपयोग किया जाता है।
R–CH2–OH + [O] ⟶ R–COOH
कार्बोक्सिलिक अम्ल
एल्डिहाइडों को पृथक करने के लिए CrO3 का निर्जल माध्यम में ऑक्सीकारक की तरह उपयोग किया जाता है।
R–CH2–OH
CrO3
⟶ R–CHO
एल्डिहाइड
प्राथमिक ऐल्कोहॉलों के ऑक्सीकरण से एल्डिहाइड प्राप्त करने के लिए शुद्ध अक्रिय क्रोमियम-पाइरिडिनियम क्लोरोक्रोमेट (PCC) का उपयोग किया जाता है।
CH3–CH=CH–CH2–OH PCC ⟶ CH3–CH=CH–CHO
द्वितीयक ऐल्कोहॉलों के ऑक्सीकरण से कीटोन प्राप्त होता है।
R–CH(OH)–R′
[O]
⟶ R–CO–R′
कीटोन
तृतीयक ऐल्कोहॉल सामान्यतः ऑक्सीकरण अभिक्रिया नहीं दर्शाती।
(CH3)3C–OH
[O]
⟶ No reaction
तृतीयक ऐल्कोहॉल
Note : तृतीयक ऐल्कोहॉल का सामान्य ऑक्सीकरण नहीं होता है, किन्तु प्रबल ऑक्सीकारक लेने पर यह कीटोन बनाती है।
R3C–OH
4[O]
⟶ R–CO–R
4[O]
⟶ R–COOH + CO2 + H2O
कीटोन
(C-परमाणुओं की संख्या 1 कम)
कार्बोक्सिलिक अम्ल
(C-परमाणुओं की संख्या 1 कम)
Cu/573K या Ag/573K की उपस्थिति में विहाइड्रोजनीकरण
जब प्राथमिक अथवा द्वितीयक ऐल्कोहॉलों के वाष्प को 573 K पर तप्त कॉपर के ऊपर से प्रवाहित किया जाता है, तो विहाइड्रोजनीकरण होता है तथा एल्डिहाइड अथवा कीटोन बनते हैं, जबकि तृतीयक ऐल्कोहॉलों का निर्जलीकरण से ऐल्कीन का निर्माण होता है।
(a) 1° alcohol ⟶ aldehyde
CH3–CH2–OH
Cu, 573K
⟶ CH3–CHO + H2
एथेनॉल
एथेनल (एसीटैल्डिहाइड)
(b) 2° alcohol ⟶ ketone
CH3–CH(OH)–CH3
Cu, 573K
⟶ CH3–CO–CH3 + H2
प्रोपेन-2-ऑल
प्रोपेनोन या एसीटोन
(c) 3° ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण से ऐल्कीन प्राप्त होती है।
(CH3)3C–OH
Cu, 573K
⟶ CH2=C(CH3)2 + H2O
2–मेथिलप्रोपेन–2–ऑल
2–मेथिल प्रोपीन
(iii) फिनॉल की अभिक्रियाएँ
1. ऐरोमैटिक इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन : फिनॉल (C6H5OH) में बेंजीन वलय पर जुड़ा –OH समूह अनुनाद द्वारा ऑर्थो एवं पैरा स्थिति पर e−–घनत्व बढ़ाता है। इसलिए यह ऑर्थो एवं पैरा निर्देशक होता है और इन्हीं स्थानों पर इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया करता है।
(i) नाइट्रीकरण
C6H5OH HNO3 / H2SO4, 5–10°C ⟶ o-नाइट्रोफिनॉल + p-नाइट्रोफिनॉल
प्रश्न : ऑर्थो-नाइट्रो फिनॉल को वाष्पीय आसवन द्वारा पृथक किया जा सकता है, लेकिन पैरा नाइट्रो फिनॉल को नहीं। कारण दीजिए?
हल : ऑर्थो-नाइट्रो फिनॉल में अंतराअणुक H–बंध (एक ही अणु में बनने वाला बंध) उपस्थित होता है, जिससे यह ध्रुवीय परमाणुओं के साथ कम बंधन बना पाता है। अतः इसका क्वथनांक कम हो जाता है और यह आसानी से वाष्पित हो जाता है।
लेकिन पैरा-नाइट्रो फिनॉल में अंतराअणुक H–बंध (दो अणुओं के बीच बनने वाला बंध) उपस्थित होता है, जिससे इसके अणु संगठित हो जाते हैं। अतः इन बंधों को तोड़ने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसलिए इसका क्वथनांक अधिक हो जाता है और यह आसानी से वाष्पित नहीं होता।
इस कारण नाइट्रो फिनॉल को वाष्पीय आसवन द्वारा पृथक किया जा सकता है, लेकिन पैरा नाइट्रो फिनॉल को नहीं।
प्रश्न : फिनॉल से पिक्रिक अम्ल बनाने का समीकऱण लिखिए?
हल : जब फिनॉल को सान्द्र HNO3 तथा सान्द्र H2SO4 की उपस्थिति में अभिक्रिया करवाने पर 2,4,6–ट्राइनाइट्रोफिनॉल (पिक्रिक अम्ल) प्राप्त होता है।
C6H5OH
HNO3 (सान्द्र), H2SO4 (सान्द्र)
⟶ 2,4,6–ट्राइनाइट्रोफिनॉल
(पिक्रिक अम्ल)
(ii) हैलोजनीकरण
(a) ब्रोमीन के साथ अभिक्रिया
फिनॉल कम ताप पर कार्बन डाइसल्फाइड (CS2) या क्लोरोफॉर्म (CHCl3) में घुले ब्रोमीन के साथ अभिक्रिया करके ऑर्थो एवं पैरा-ब्रोमोफिनॉल का मिश्रण देता है।
अभिक्रिया :
फिनॉल + Br2
/ CS2 या CHCl3
→
o-ब्रोमोफिनॉल
+
p-ब्रोमोफिनॉल
(b) ब्रोमीन जल के साथ अभिक्रिया
जब फिनॉल की अभिक्रिया ब्रोमीन जल के साथ की जाती है, तब 2,4,6-ट्राइब्रोमोफिनॉल श्वेत अवक्षेप के रूप में प्राप्त होता है।
अभिक्रिया :
फिनॉल + 3Br2
→
2,4,6-ट्राइब्रोमोफिनॉल
+ 3HBr
2.कोल्बे अभिक्रिया
फिनॉल को NaOH के साथ क्रिया कराने पर फिनॉक्साइड आयन बनता है, जो फिनॉल की तुलना में अधिक इलेक्ट्रॉन-स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया दर्शाता है।
अतः यह CO2 जैसे दुर्बल इलेक्ट्रॉन-स्नेही के साथ इलेक्ट्रॉन-स्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया करता है। इससे ऑर्थो हाइड्रॉक्सी-बेंजोइक अम्ल मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
C6H5OH + NaOH → C6H5ONa + H2O
C6H5ONa (i) CO2 (ii) H+ → o-HOC6H4COOH
2-हाइड्रॉक्सी-बेंजोइक अम्ल (सैलिसिलिक अम्ल)
3. रीमर-टीमैन अभिक्रिया
फिनॉल को सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म के साथ अभिक्रिया कराने पर बेंजीन वलय में –CHO समूह ऑर्थो स्थिति पर प्रवेश कर जाता है। इस अभिक्रिया को रीमर-टीमैन अभिक्रिया कहते हैं।
फिनॉल CHCl3 + aq NaOH ⟶ मध्यवर्ती NaOH ⟶ o-सोडियम सैलिसिलएल्डिहाइड H+ ⟶ सैलिसिलएल्डिहाइड
4. फिनॉल की यशदूर (Zn) के साथ अभिक्रिया
अभिक्रिया : फिनॉल + Zn → बेंजीन + ZnO
इस अभिक्रिया में फिनॉल का ऑक्सीजन युक्त समूह हट जाता है और बेंजीन प्राप्त होता है।
5. ऑक्सीकरण
फिनॉल के क्रोमिक अम्ल द्वारा ऑक्सीकरण से संयुग्म डायकेटोन बनता है, जिसे बेंज़ोक्विनोन कहते हैं।
C6H5OH Na2Cr2O7 / H2SO4 → C6H4O2
फिनॉल बेंज़ोक्विनोन
ईथर
ईथर का सामान्य सूत्र : R – O – R
- सममित ईथर : R – O – R जैसे — CH3 – O – CH3
- असममित ईथर : R – O – R′ जैसे — CH3 – O – CH2 – CH3
नामकरण
सामान्य नामकरण में, यदि R = R हो, तो डाइऐल्किल ईथर कहते हैं।
यदि R ≠ R हो, तो ऐल्किल ऐरिल ईथर कहते हैं।
IUPAC : ऐल्कॉक्सी ऐल्केन
| यौगिक | साधारण नाम | आईयूपीएसी नाम |
|---|---|---|
| CH3OCH3 | डाइमेथिल ईथर | मेथॉक्सीमेथेन |
| C2H5OC2H5 | डाइएथिल ईथर | एथॉक्सीएथेन |
| CH3OCH2CH2CH3 | मिथाइल n-प्रोपाइल ईथर | 1-मेथॉक्सीप्रोपेन |
| C6H5OCH3 | मिथाइल फिनिल ईथर (ऐनीसोल) | मेथॉक्सीबेंजीन (ऐनीसोल) |
| C6H5OCH2CH3 | एथाइल फिनिल ईथर (फिनेटोल) | एथॉक्सीबेंजीन |
| C6H5O(CH2)6CH3 | हेप्टिल फिनिल ईथर | 1-फिनॉक्सीहेप्टेन |
| CH3O−CH(CH3)−CH3 | मिथाइल आइसोप्रोपाइल ईथर | 2-मेथॉक्सीप्रोपेन |
| C6H5−O−CH2−CH2−CH(CH3)−CH3 | फिनिल आइसोएमाइल ईथर | 3-मेथिल ब्यूटॉक्सीबेंजीन |
| CH3O−CH2−CH2−OCH3 | — | 1,2-डाइमेथॉक्सीएथेन |
| 2-एथॉक्सी-1,1-डाइमेथिल साइक्लोहेक्सेन | — | 2-एथॉक्सी-1,1-डाइमेथिल साइक्लोहेक्सेन |
ईथर को बनाने की विधियाँ
- ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण द्वारा
- विलियमसन संश्लेषण
1. ऐल्कोहॉलों के निर्जलीकरण द्वारा
अभिक्रिया :
CH3CH2OH
/ H2SO4, 443 K
→
CH2=CH2
अभिक्रिया :
CH3CH2OH
/ H2SO4, 413 K
→
C2H5OC2H5
क्रियाविधि : ईथर का निर्माण एक SN2 अभिक्रिया है, जिसमें ऐल्कोहॉल अणु एक प्रोटॉनीकृत ऐल्कोहॉल अणु पर आक्रमण करता है।
Step − 1
CH3CH2OH + H+ → CH3CH2OH2+
Step − 2
CH3CH2OH + CH3CH2OH2+ → CH3CH2−O+H−CH2CH3 + H2O
Step − 3
CH3CH2−O+H−CH2CH3 → CH3CH2−O−CH2CH3 + H+
2. विलियमसन संश्लेषण
इस विधि से सममित और असममित दोनों प्रकार के ईथर बनाए जाते हैं। इस विधि में ऐल्किल हैलाइड की सोडियम ऐल्कॉक्साइड के साथ अभिक्रिया करायी जाती है, जिससे ईथर प्राप्त होता है।
सामान्य अभिक्रिया :
R−O−Na+ + R′−X
→
R−O−R′ + NaX
Note
यदि प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड (1°) पर ऐल्कॉक्साइड आयन का आक्रमण होता है, तो यह SN2 अभिक्रिया होती है।
(CH3)3CO−Na+ + CH3Br → CH3−O−C(CH3)3 + NaBr
यदि तृतीयक ऐल्किल हैलाइड पर ऐल्कॉक्साइड आयन का आक्रमण होता है, तो तृतीयक ऐल्किल हैलाइड की त्रिविम बाधा के कारण ऐल्कॉक्साइड आयन आक्रमण नहीं कर पाता। इसलिए यह अभिक्रिया SN1 की तरह न होकर प्रायः विलोपन अभिक्रिया देती है और ऐल्कीन बनता है, ईथर नहीं बनती।
(CH3)3CBr + NaOCH3 → CH2=C(CH3)2 + NaBr + CH3OH
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऐल्कॉक्साइड न केवल नाभिकरागी होते हैं, बल्कि प्रबल क्षारक भी होते हैं। अतः तृतीयक ऐल्किल हैलाइड के साथ विलोपन अभिक्रिया होती है।
इस विधि से फिनॉलों को भी ईथरों में परिवर्तित किया जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम फिनॉल की NaOH से अभिक्रिया कराकर सोडियम फिनॉक्साइड प्राप्त किया जाता है। जब सोडियम फिनॉक्साइड की अभिक्रिया ऐल्किल हैलाइड से कराई जाती है, तो फिनॉक्सीऐल्केन ईथर प्राप्त होते हैं।
C6H5OH + NaOH → C6H5ONa + H2O
C6H5ONa + R−X → C6H5−O−R + NaX
भौतिक गुणधर्म
ईथर में C-O बंध ध्रुवीय होते हैं, अतः ईथरों का नेट द्विध्रुव आघूर्ण होता है।
R ↘
O ⟶ net μ
R′ ↗
इस कारण ईथरों की अल्प ध्रुवता उनके क्वथनांकों को बहुत अधिक प्रभावित नहीं करती, इसलिए ये समान आण्विक द्रव्यमान वाले ऐल्केनों के क्वथनांकों के लगभग समान होते हैं।
लेकिन ईथरों के क्वथनांक ऐल्कोहॉलों के क्वथनांकों से बहुत कम होते हैं।
रासायनिक अभिक्रियाएँ
-
ईथरों में C−O बन्ध का टूटना
HX के साथ अभिक्रिया
- इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
1. ईथरों में C–O बंध का टूटना
याद रखें : अम्ल की उपस्थिति में C–O बंध का टूटना होता है।
HX के साथ अभिक्रिया
R–O–R + HX ⟶ R–X + R–OH
ईथर
ऐल्किल हैलाइड
ऐल्कोहॉल
R–OH + HX ⟶ R–X + H2O
ऐल्कोहॉल
ऐल्किल हैलाइड
अम्ल की क्रियाशीलता का क्रम : HI > HBr > HCl
Note : असममित ईथर में हैलोजन परमाणु हमेशा छोटे ऐल्किल समूह से जुड़ता है।
CH3CH2CH2–O–CH3 + HI ⟶ CH3CH2CH2–OH + CH3–I
प्रश्न :
आप एनीसोल को
फिनॉल में कैसे परिवर्तित करेंगे?
अथवा
फिनाइल मेथिल ईथर या
एनीसोल,
HI के साथ अभिक्रिया करके
फिनॉल तथा
मेथिल आयोडाइड देता है,
लेकिन आयोडोबेंजीन तथा
मेथेनॉल नहीं देता।
हल : अभिक्रिया के प्रथम पद में फिनाइल मेथिल ईथर का प्रोटोनीकरण होकर ऑक्सोनियम आयन बनता है। यह फिनाइल समूह के अनुनाद के कारण स्थायी होता है। इसलिए बंध का विखंडन मेथिल समूह पर अधिक होता है और इससे आसानी से मेथिल कार्बधनायन / मेथिल आयोडाइड के रूप में विखंडन हो जाता है।
C6H5–O–CH3 + HI
⟶ C6H5–OH + CH3I
एनीसोल
फिनॉल
प्रश्न : निम्न अभिक्रिया के लिए अभिक्रिया की क्रियाविधि लिखिए?
(CH3)3C–O–CH3 + HI
⟶ (CH3)3C–I + CH3OH
2–मेथॉक्सी–2–मेथिलप्रोपेन
2–आयोडो–2–मेथिलप्रोपेन
मेथेनॉल
हल : अभिक्रिया की क्रियाविधि
पद–1 : ईथर को सांद्र HI के साथ अभिक्रिया कराने पर, ईथर के ऑक्सीजन का प्रोटोनीकरण हो जाता है।
(CH3)3C–O–CH3 + HI
⟶ (CH3)3C+ + CH3OH + I−
3° कार्बधनायन
मेथेनॉल
नाभिकस्नेही
पद–2 : नाभिकस्नेही (I−) का 3° कार्बधनायन पर आक्रमण
(CH3)3C+ + I−
⟶ (CH3)3C–I
3° कार्बधनायन
3° ऐल्किल हैलाइड
2. इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन
ऐल्कॉक्सी समूह (−OR) ऑर्थो एवं पैरा निर्देशक होता है, तथा ऐरोमैटिक वलय में ऑर्थो तथा पैरा स्थिति पर e− घनत्व को बढ़ाता है। इसलिए इलेक्ट्रॉनस्नेही आयन ऑर्थो तथा पैरा स्थिति पर आक्रमण करता है।
- हैलोजनीकरण
- फ्राइडेल क्राफ्ट अभिक्रिया
- नाइट्रीकरण
(i) हैलोजनीकरण
अभिक्रिया :
एनीसोल
+ Br2
/ CS2
→
o-ब्रोमोएनीसोल
+
p-ब्रोमोएनीसोल
(ii) फ्राइडेल क्राफ्ट अभिक्रिया
(a) फ्राइडेल क्राफ्ट ऐल्किलीकरण
अभिक्रिया :
एनीसोल
+ CH3Cl
/ AlCl3
→
ऑर्थो-मेथिल एनीसोल
+
पैरा-मेथिल एनीसोल
(b) फ्राइडेल क्राफ्ट ऐसिलीकरण
अभिक्रिया :
एनीसोल
+ CH3COCl
/ निर्जल AlCl3
→
o-मेथॉक्सी एसीटोफिनोन
+
p-मेथॉक्सी एसीटोफिनोन
(iii) नाइट्रीकरण
अभिक्रिया :
मेथाइल फिनाइल ईथर
(एनीसोल)
/ HNO3, H2SO4
→
मेथॉक्सी-2-नाइट्रोबेंजीन
(o-नाइट्रोएनीसोल)
+
मेथॉक्सी-4-नाइट्रोबेंजीन
(p-नाइट्रोएनीसोल)
प्रश्न
प्रश्न : 1-मेथॉक्सी-4-नाइट्रोबेंजीन के निर्माण के लिए निम्नलिखित अभिकारकों में से कौन-सा युग्म उपयुक्त है और क्यों?
हल : (ii) उपयुक्त है। क्योंकि (i) में C−Br में आंशिक द्विबन्ध जैसा बन्ध होने के कारण उसका टूटना आसान नहीं होता, जबकि (ii) से 1-मेथॉक्सी-4-नाइट्रोबेंजीन आसानी से बनाया जा सकता है।
प्रश्न
प्रश्न : निम्नलिखित अभिक्रियाओं से प्राप्त उत्पादों का अनुमान लगाइए।
(i) CH3−CH2−CH2−O−CH3 + HBr
उत्पाद : CH3Br + CH3CH2CH2OH
(ii) C6H5OC2H5 + HBr
उत्पाद : C6H5OH + C2H5Br
(iii) एनीसोल / सांद्र H2SO4, सांद्र HNO3
उत्पाद : o-नाइट्रोएनीसोल + p-नाइट्रोएनीसोल
(iv) (CH3)3C−OC2H5 / HI
उत्पाद : (CH3)3CI + C2H5OH
