जैव अणु
वे अणु जो जैव तंत्र का निर्माण करते हैं तथा जीवन क्रियाओं के लिए आवश्यक होते हैं, जैव अणु कहलाते हैं।
(1.) कार्बोहाइड्रेट (2.) प्रोटीन (3.) एन्जाइम (4.) विटामिन (5.) न्यूक्लिक अम्ल
(1.) कार्बोहाइड्रेट
कार्बोहाइड्रेट में > C = O एवं −OH समूह पाया जाता है। कार्बोनिल यौगिक एल्कोहॉल से क्रिया कर ऐसीटिल बनाते हैं।
- सरलतम कार्बोहाइड्रेट के नाम के अन्त में ओस लगता है।
- एल्डिहाइड संरचना वाले कार्बोहाइड्रेट को एल्डोज कहा जाता है।
- कीटोन संरचना वाले कार्बोहाइड्रेट को कीटोज कहलाते हैं।
वर्गीकरण
✓ रासायनिक प्रकृति के आधार पर —
- एल्डोज – (−CHO) समूह उपस्थित जैसे – ग्लूकोज (C6H12O6)
- कीटोज – (−CO−) समूह उपस्थित जैसे – फ्रक्टोज (C6H12O6)
कार्बन परमाणुओं की संख्या के आधार पर —
| अणु में कार्बन परमाणुओं की संख्या | एल्डोज | कीटोज |
|---|---|---|
| 3 | एल्डोट्रायोज | कीटोट्रायोज |
| 4 | एल्डोटेट्रोज | कीटोटेट्रोज |
| 5 | एल्डोपेंटोज | कीटोपेंटोज |
| 6 | एल्डोहेक्सोज | कीटोहेक्सोज |
| 7 | एल्डोहेप्टोज | कीटोहेप्टोज |
✓ जल अपघटन के आधार पर —
(i) मोनोसैकेराइड
- इनका जल अपघटन नहीं किया जा सकता है।
- लगभग 20 मोनोसैकेराइड प्रकृति में ज्ञात हैं।
- इसके कुछ सामान्य उदाहरण – ग्लूकोज, फ्रक्टोज, राइबोस आदि हैं।
(ii) ओलिगोसैकेराइड – वे कार्बोहाइड्रेट जिनके जलअपघटन से मोनोसैकेराइड की दो से दस इकाइयाँ प्राप्त होती हैं। ओलिगोसैकेराइड शर्कराओं के जलअपघटन से प्राप्त मोनोसैकेराइडों की संख्या के आधार पर इन्हें पुनः डाइसैकेराइड, ट्राइसैकेराइड आदि में बाँटा जाता है।
उदाहरण – सुक्रोज डाइसैकेराइड होता है जो जल अपघटन पर ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज देता है।
C12H22O11 + H2O ⟶ C6H12O6 + C6H12O6
सुक्रोज D-(+)-ग्लूकोज D-(−)-फ्रक्टोज
(iii) पॉलीसैकेराइड – वे कार्बोहाइड्रेट जिनके जल अपघटन पर अधिक संख्या में मोनोसैकेराइड इकाइयाँ प्राप्त होती हैं।
उदाहरण – स्टार्च, सेल्यूलोज, ग्लाइकोजन तथा गोंद आदि।
जैसे – स्टार्च के जल अपघटन पर ग्लूकोज प्राप्त होता है।
(C6H10O5)n · nH2O H+, 393 K, 2–3 atm ⟶ nC6H12O6
स्टार्च ग्लूकोज
अनअपचायी शर्करा एवं अपचायी शर्करा
Note —
- अनअपचायी शर्करा — यदि डाइसैकेराइड में मोनोसैकेराइडों के अपचायी समूह जैसे ऐल्डिहाइड (−CHO) अथवा कीटोन (> C = O) बंधित हों, तो इनका ऑक्सीकरण नहीं होने से ये अनअपचायी शर्करा कहलाती हैं। उदाहरण — सुक्रोज।
- अपचायी शर्करा — यदि शर्करा में (−CHO) अथवा कीटोन (> C = O) क्रियात्मक समूह मुक्त हों, तो यह अपचायी शर्करा कहलाती है।
अपचयित शर्करा टॉलन अभिकर्मक तथा फेलिंग विलयन (ऑक्सीकारक) के साथ क्रिया कर आसानीपूर्वक ऑक्सीकृत हो जाती है।
उदाहरण — ग्लूकोज, फ्रक्टोज, लैक्टोज तथा माल्टोज आदि
प्रश्न — अपचायी शर्करा क्या होती है ?
ग्लूकोज
- ग्लूकोज — स्वादिष्ट एक ऐल्डोहेक्सोज है तथा इसे डेक्सट्रोज कहते हैं।
- ग्लूकोज को बनाने की विधियाँ — सुक्रोज के जल अपघटन पर ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज प्राप्त होते हैं।
C12H22O11 + H2O → C6H12O6 + C6H12O6
सुक्रोज D-(+)- ग्लूकोज + D-(-)- फ्रक्टोज
स्टार्च से — औद्योगिक स्तर पर स्टार्च के जल अपघटन से ग्लूकोज प्राप्त किया जाता है।
(C6H10O5)n + nH2O H+ → nC6H12O6
स्टार्च 393 K, 2-3 atm ग्लूकोज
ग्लूकोज की संरचना (C6H12O6)
(a.) ग्लूकोज की चक्रीय संरचना
ग्लूकोज से निम्न क्रिस्टलीय रूपों में प्राप्त होता है जिन्हें α तथा β कहते हैं।
- α रूप ग्लूकोज के सांद्र विलयन से 419 K ताप पर जल क्रिस्टलीकरण द्वारा प्राप्त किया जाता है।
- β रूप 423 K पर ग्लूकोज के गर्म एवं संतृप्त विलयन से इसके क्रिस्टलीकरण से प्राप्त किया जाता है।
प्रश्न — एनोमेरिक कार्बन क्या होता है ?
हल — समूहों की दोनों स्थितियाँ चक्राकार मोनोसैकेराइड यौगिकों में C1 कार्बन पर होती हैं। यदि −OH समूह दायीं तरफ (Right side) हो और H बायीं ओर या −OH समूह बायीं तरफ (Left side) हो तथा H दायीं तरफ हो, तब इस कार्बन को एनोमेरिक कार्बन कहते हैं।
प्रश्न — ग्लूकोज की कौनसी अभिक्रियाएँ बताती हैं ?
हल — एल्डिहाइड समूह उपस्थित होते हुए भी ग्लूकोज निम्न-प्रदर्शन नहीं देता एवं यह NaHSO3 के साथ अभिक्रिया नहीं करता है।
- ग्लूकोज का एसिटिलेशन, हाइड्रॉक्सिलअमीन (NH2OH) के साथ अभिक्रिया नहीं करता, जो मुक्त (−CHO) समूह की अनुपस्थिति को दर्शाता है।
ग्लूकोज की अभिक्रियाएँ
- HI के साथ गर्म करने पर यह n-हेक्सेन देता है, जो यह प्रदर्शित करता है कि इसमें छः कार्बन परमाणु एक सीधी श्रृंखला में जुड़े हैं।
CHO
|
(CHOH)4
|
CH2OH
HI, Δ
⟶
CH3–CH2–CH2–CH2–CH2–CH3
ग्लूकोज (n-हेक्सेन)
कार्बोनिल समूह (> C = O) की उपस्थिति की पुष्टि —
- ग्लूकोज, हाइड्रॉक्सिल अमीन के साथ अभिक्रिया करके ग्लूकोज ऑक्साइम देता है।
CHO
|
(CHOH)4
|
CH2OH
NH2OH
⟶
CH=N–OH
|
(CHOH)4
|
CH2OH
ग्लूकोज ऑक्साइम
प्रश्न → वे दो रासायनिक गुण बताइये जिससे सिद्ध हो सके कि ग्लूकोज में मुक्त रूप में कार्बोनिल समूह उपस्थित है ?
- HCN के साथ योग से संयोजन कर सायनोहाइड्रिन देता है।
CHO
|
(CHOH)4
|
CH2OH
HCN
⟶
CH(OH)CN
|
(CHOH)4
|
CH2OH
ग्लूकोज ग्लूकोज सायनोहाइड्रिन
ग्लूकोज में एल्डिहाइड समूह (−CHO) की पुष्टि —
CHO
|
(CHOH)4
|
CH2OH
Br2, जल
⟶
COOH
|
(CHOH)4
|
CH2OH
ग्लूकोज ग्लूकोनिक अम्ल
- इस परीक्षण से यह सिद्ध होता है कि ग्लूकोज का कार्बोनिल समूह, एल्डिहाइड समूह के रूप में उपस्थित होता है।
ग्लूकोज में पाँच –OH समूहों एवं प्राथमिक ऐल्कोहॉलिक समूह की पुष्टि
- ग्लूकोज में पाँच –OH समूहों की उपस्थिति की पुष्टि
यह अभिक्रिया ग्लूकोज में पाँच –OH समूहों की उपस्थिति की पुष्टि करता है।
- ग्लूकोज में प्राथमिक ऐल्कोहॉलिक समूह (–OH) की पुष्टि —
इस अभिक्रिया से ग्लूकोज में प्राथमिक ऐल्कोहॉलिक समूह की उपस्थिति की पुष्टि होती है।
ग्लूकोज की संरचना
(i) खुली शृंखला संरचना : फिशर सूत्र
| α – D – (+) – ग्लूकोज | β – D – (+) – ग्लूकोज |
|---|---|
|
H | C — OH | H — C — OH | HO — C — H | H — C — OH | H — C — OH | CH2OH |
HO — C — H | H — C — OH | HO — C — H | H — C — OH | H — C — OH | CH2OH |
ग्लूकोज की चक्रीय संरचना
प्रश्न → ग्लूकोज का चक्रीय रूप कैसे बनता है ?
| पाइरान | α – D – (+) – ग्लूकोपाइरानोज़ | β – D – (+) – ग्लूकोपाइरानोज़ |
|---|---|---|
| षट्-सदस्यीय ऑक्सीजन युक्त वलय | α रूप | β रूप |
प्रश्न — ग्लूकोज की पाइरानोज़ संरचना
हल — पाइरान संरचना से समानता होने के कारण ग्लूकोज की छः सदस्यीय वलय वाली संरचना को पाइरानोज़ संरचना कहते हैं।
- पाइरान एक विषमचक्रीय यौगिक है। यह एक प्राणवायु युक्त चक्रीय संरचना है।
प्रश्न — ग्लूकोज एक अपचायी शर्करा है कैसे ?
हल — ग्लूकोज एक अपचायी शर्करा है क्योंकि वलीय निर्माण में ग्लूकोज का C1 मुक्त −CHO समूह देने के कारण अपचायक गुण प्रदर्शित करता है।
फ्रक्टोज (C6H12O6)
फ्रक्टोज कीटोहेक्सोज शर्करा होती है। यह ग्लूकोज के जलअपघटन पर सुक्रोज के साथ प्राप्त होता है।
प्रश्न — फ्रक्टोज की फ्यूरेनोज संरचना क्या होती है ?
हल — फ्रक्टोज में फ्यूरेन वलय होने के कारण इसे फ्यूरेनोज कहा जाता है। फ्यूरान एक पाँच सदस्यीय वलय संरचना है जिसमें एक ऑक्सीजन परमाणु तथा चार कार्बन परमाणु होते हैं।
- फ्रक्टोज के चतुर्थ संरचना —
प्रश्न — फ्रक्टोज एक अपचायी शर्करा है कैसे ?
हल — फ्रक्टोज एक अपचायी शर्करा है क्योंकि विलयन में फ्रक्टोज का C2 समूह > C = O समूह रहने के कारण अपचायक समूह प्रदर्शित करता है।
डाइसैकेराइड
वे कार्बोहाइड्रेट जो जल अपघटन पर दो मोनोसैकेराइड अणु बनाते हैं, वे डाइसैकेराइड कहलाते हैं। ये दोनों मोनोसैकेराइड एक-दूसरे से ग्लाइकोसाइडिक बंध द्वारा जुड़े रहते हैं।
प्रश्न — ग्लाइकोसाइडिक बंध से आप क्या समझते हैं ?
हल — ग्लाइकोसाइड बंध वह सहसंयोजी बंध है जो विभिन्न मोनोसैकेराइड, डाइसैकेराइड व पॉलीसैकेराइड के अणुओं में उपस्थित होता है।
- सुक्रोज (G + F)
- माल्टोज (G + G)
- लैक्टोज (Glucose + Galactose)
सुक्रोज — जलअपघटन पर ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज देता है।
प्रश्न — सुक्रोज का जल अपघटन से प्राप्त शर्करा उत्पादों के नाम लिखिये।
C12H22O11 + H2O → C6H12O6 + C6H12O6
सुक्रोज D-(+)- ग्लूकोज + D-(-)- फ्रक्टोज
सुक्रोज की संरचना
प्रश्न — सुक्रोज एक अनअपचायी शर्करा है, कारण लिखिये?
हल — सुक्रोज में दोनों मोनोसैकेराइड α-D-ग्लूकोज के C1 तथा β-D-फ्रक्टोज के C2 के मध्य ग्लाइकोसाइड बंध द्वारा जुड़े रहते हैं। अतः ग्लूकोज तथा फ्रक्टोज के अपचयन समूह ग्लाइकोसाइड बंध निर्माण में उपयुक्त हो जाते हैं। इसलिए मुक्त अवस्था में −CHO अथवा > C = O समूह नहीं होते हैं। इस कारण सुक्रोज एक अनअपचायी शर्करा है।
प्रश्न — अपघट शर्करा किसे कहते हैं।
हल — सुक्रोज (+) ध्रुवण होता है। जब सुक्रोज का जल अपघटन किया जाता है तब (+)- ध्रुवित ग्लूकोज तथा (−)- ध्रुवित फ्रक्टोज प्राप्त होते हैं। क्योंकि फ्रक्टोज का (−) ध्रुवण मान (−92.4°) होता है, जो ग्लूकोज के (+ ध्रुवण मान) (+52.5°) से अधिक होता है, इसलिए कुल ध्रुवण मान [(+52.5°) + (−92.4°)] = −39.7° प्राप्त होता है। अर्थात जल अपघटन पर सुक्रोज के ध्रुवण के चिह्न में परिवर्तन हो जाता है। इसी कारण इसे अपघट शर्करा या इनवर्ट शुगर कहते हैं।
C12H22O11 + H2O → C6H12O6 + C6H12O6
(+ ) ध्रुवित सुक्रोज (+)- ध्रुवित ग्लूकोज (+52.5°) + (−)- ध्रुवित फ्रक्टोज (−92.2°)
कुल ध्रुवण (−39.7°)
उत्पाद — अपघट शर्करा
प्रश्न — ग्लूकोज तथा सुक्रोज जल में विलेय हैं जबकि साइक्लोहेक्सेन अथवा बेंजीन (सामान्यतः सहसंयोजी बंध युक्त यौगिक) जल में अविलेय होते हैं। समझाइए।
हल — जल में घुलने के लिए वे कार्बनिक यौगिक जिनमें H− बंध उपस्थित होते हैं, वे जल में मिलने पर जल के साथ H−बंध बनाकर घुलने लग जाते हैं। अतः ग्लूकोज व सुक्रोज कार्बन समूह उपस्थित होने के कारण जल में विलेय हैं, जबकि बहुध्रुवीय प्रकृति न होने के कारण वे जल में अविलेय होते हैं।
(2.) माल्टोज (G + G)
यह α−D−ग्लूकोज की दो इकाइयों से बना होता है। जिसमें एक ग्लूकोज इकाई का C1 दूसरी ग्लूकोज इकाई के C4 के साथ जुड़ा रहता है।
प्रश्न — माल्टोज एक अपचायी शर्करा है। कारण दीजिये?
हल — माल्टोज के विलयन में ग्लूकोज की दूसरी इकाई के C1 मुक्त ऐल्डिहाइड समूह होता है। जो अपचायक गुण दर्शाती है। अतः यह अपचायी शर्करा है।
(3.) लैक्टोज
- लैक्टोज दूध में पायी जाती है।
- यह β−[D]−लैक्टोज तथा β−[D]−ग्लूकोज से बना होता है। लैक्टोज के C1 तथा ग्लूकोज के C4 के मध्य बंध होता है। अतः यह भी एक अपचायी शर्करा है।
प्रश्न — दूध में उपस्थित डाइसैकेराइड की संरचना लिखिये।
प्रश्न — लैक्टोज के जलअपघटन से किन उत्पादों के बनने की अपेक्षा करते हैं?
हल — लैक्टोज एक डाइसैकेराइड है और जल अपघटन से दो मोनोसैकेराइड देते हैं जिन्हें β−D−ग्लूकोज एवं β−D−गैलेक्टोज कहते हैं।
प्रश्न — लैक्टोज एक अपचायी शर्करा है। कारण दीजिये?
हल — लैक्टोज के विलयन में ग्लूकोज का C1 मुक्त ऐल्डिहाइड समूह होता है। यह अपचायक गुण दर्शाती है। अतः यह एक अपचायी शर्करा है।
पॉलीसेकेराइड
असंख्य मोनोसैकेराइड अणु आपस में ग्लाइकोसाइडिक बंध द्वारा जुड़कर पॉलीसेकेराइड का निर्माण करते हैं।
- स्टार्च
- सेलुलोज
- ग्लाइकोजन
(i) स्टार्च
- पौधों में प्रमुख संचित मोनोसैकेराइड है।
- यह मनुष्यों के लिए आहार का मुख्य स्रोत है। दाल, गेहूँ तथा कुछ सब्जियों में स्टार्च प्रचुर मात्रा में मिलता है।
- यह α−D−ग्लूकोज का बहुलक है तथा दो घटकों एमाइलोज तथा एमाइलोपेक्टिन से मिलकर बनता है।
(a) एमाइलोज
- जल में घुलनशील अपघट्य है तथा यह स्टार्च का 15–20% भाग निर्मित करता है।
- प्रायः यह लगभग 200–1000 α−D−(+)-ग्लूकोज इकाइयों की अशाखित शृंखला होती है जो C1 − C4 ग्लाइकोसाइड बंध द्वारा जुड़ी रहती हैं।
(b) एमाइलोपेक्टिन
- जल में अघुलनशील होती है तथा यह स्टार्च का 80–85% भाग बनाती है।
- इसमें α−D−ग्लूकोज की शाखित शृंखला होती है।
ग्लाइकोसाइड बंध = C1 − C4
शाखित ग्लाइकोसाइड बंध = C1 − C6
(ii) सेलुलोज
- केवल पौधों में।
- यह β−D−ग्लूकोज से बना होता है। जिसमें एक ग्लूकोज इकाई के C1 तथा दूसरी ग्लूकोज इकाई के C4 के मध्य ग्लाइकोसाइड बंध बनता है।
(iii) ग्लाइकोजन
पशुओं की यकृत में कार्बोहाइड्रेट, ग्लाइकोजन के रूप में संग्रहीत रहता है। यह यकृत, मांसपेशियों तथा मस्तिष्क में उपस्थित रहता है। जब शरीर को ग्लूकोज की आवश्यकता होती है, एन्जाइम्स ग्लाइकोजन को ग्लूकोज में बदल देते हैं।
प्रोटीन
- प्रोटीन α−एमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं जो आपस में पेप्टाइड बंध द्वारा जुड़े रहते हैं।
- पेप्टाइड बंध — प्रोटीन का एक एमीनो अम्ल के –COOH समूह तथा दूसरे एमीनो अम्ल के –NH2 समूह के मध्य बनता है। जिसे फॉस्फरस युक्त जल का अणु पृथक होता है।
- पेप्टाइड बंध –CO – NH– दर्शायी जाता है।
- डाइपेप्टाइड — दो एमीनो अम्लों के द्वारा बनता है।
- ट्राइपेप्टाइड — जब तीसरा एमीनो अम्ल, डाइपेप्टाइड से जुड़ता है तो उत्पाद ट्राइपेप्टाइड कहलाता है।
- इसी प्रकार दो या चार, पाँच, छह एवं n एमीनो अम्लों द्वारा बने उत्पादों को टेट्रापेप्टाइड, पेन्टापेप्टाइड अथवा हेक्सापेप्टाइड कहते हैं।
- जब पॉलीपेप्टाइड में 10 से अधिक एमीनो अम्ल पेप्टाइड बंध द्वारा जुड़े होते हैं तो उत्पाद पॉलीपेप्टाइड कहलाते हैं।
प्रश्न — प्रोटीन के विलयन पर कौनसा पदार्थ प्राप्त होता है ?
हल — एमीनो अम्ल (Amino acids)
प्रश्न — आवश्यक तथा अनावश्यक एमीनो अम्ल क्या होते हैं ? प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिये।
हल —
- आवश्यक एमीनो अम्ल — वे एमीनो अम्ल जो शरीर में संश्लेषित नहीं हो सकते तथा जिनको भोजन से लेना आवश्यक है, आवश्यक एमीनो अम्ल कहलाते हैं। उदाहरण — वेलीन व ल्यूसीन
- अनावश्यक एमीनो अम्ल — वे होते हैं जो शरीर द्वारा संश्लेषित होते हैं जैसे ग्लाइसिन, एलेनिन
प्रश्न — एमीनो अम्लों की उभयधर्मी प्रकृति को समझाइए ?
अथवा
प्रश्न — ज्विटर आयन क्या होता है ?
अथवा
प्रश्न — एमीनो अम्ल क्षारीय अथवा कार्बोक्सिलिक अम्ल की बजाय लवण के समान व्यवहार करते हैं। स्पष्ट कीजिए क्यों?
हल — एमीनो अम्ल एक ही अणु में अम्लीय (–COOH) तथा क्षारीय (–NH2) क्रियात्मक समूह उपस्थित रखते हैं। जलीय विलयन में –COOH समूह प्रोटॉन (H+) मुक्त करता है जबकि एमीनो (–NH2) समूह उसे ग्रहण कर प्रोटॉनित हो जाता है। जिस कारण एक द्विध्रुवीय आयन बनता है जिसे ज्विटर आयन कहा जाता है। यह उभयधर्मी होता है क्योंकि इसमें धनायन तथा ऋणायन दोनों की उपस्थिति होती है।
प्रोटीन
प्रोटीन की परिभाषा — एक पॉलीपेप्टाइड जिसमें 100 से अधिक एमीनो अम्ल होते हैं तथा जिनका आणविक द्रव्यमान 10,000 u से अधिक होता है, प्रोटीन कहलाता है।
आकृति के आधार पर प्रोटीनों का वर्गीकरण —
- रेशेदार प्रोटीन
- गोलिकाकार प्रोटीन
प्रश्न — रेशेदार तथा गोलिकाकार प्रोटीन को विभेदित कीजिए।
हल
| रेशेदार प्रोटीन | गोलिकाकार प्रोटीन |
|---|---|
| पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ एक-दूसरे के समानान्तर होती हैं। | पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ कुण्डली के रूप में व्यवस्थित होती हैं। |
| ये जल में अविलेय होती हैं। | ये गोलिकाकार संरचना होती है। |
| ये जल में अघुलनशील होती हैं। | ये जल में घुलनशील होती हैं। |
| उदाहरण — केरोटिन (बाल, ऊन तथा रेशम में उपस्थिति) तथा मायोसिन (मांसपेशियों में उपस्थित) | उदाहरण — इन्सुलिन तथा एल्बुमिन |
प्रोटीन की संरचनाएँ
(i.) प्रोटीन की प्राथमिक संरचना
- प्रोटीन की प्राथमिक संरचना उसकी पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में एमीनो अम्लों की संख्या एवं उनके क्रम की जानकारी देती है।
(ii.) प्रोटीन की द्वितीयक संरचना
- द्वितीयक संरचना में विभिन्न पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं के मध्य H−बंध रहता है।
- प्रोटीन की द्वितीयक संरचना मुख्यतः दो प्रकार की होती है।
(i) α-हेलिक्स (α-helix)
- जब α−एमीनो अम्लों की श्रृंखला सीधे यक्ष की ओर घुमते हुए कुण्डलित होती है (α-हेलिक्स) कहते हैं क्योंकि एक ही पेप्टाइड श्रृंखला में समान्तर समूहों के बीच हाइड्रोजन बंध का निर्माण होता है।
- एक छोर का −NH समूह दूसरी इकाई के > C = O से हाइड्रोजन बंध द्वारा जुड़ता है।
- इस तरह का प्रोटीन को ताना जा सकता है तो ताने पर खुले हाइड्रोजन बंध टूट जाते हैं एवं पेप्टाइड श्रृंखला खिंच के समान कार्य करती है। तनाव हटाने पर ये हाइड्रोजन बंध पुनः बन जाते हैं।
- उदाहरण — ऊन में पाये जाने वाले α-केरोटिन संरचना होती है।
(ii) β-प्लेटेड चादर (β-pleated sheet)
- जब पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं की परतें एक समान व्यवस्थित करने पर β-प्लेटेड संरचना बनती है।
- ये β चादर एक दूसरे पर विकर्ण प्रभाव के साथ द्वितीयक संरचना बनाती हैं जिसे शील-प्लेटेड चादर कहते हैं।
- सिल्क या रेशम में β-प्लेटेड संरचना होती है।
(iii.) प्रोटीन की तृतीयक संरचना
- पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला विशिष्ट स्थान पर मुड़ कर वृत्त बनाकर परस्पर आंतरिक बंध बना लेती है तथा समूहों के समान (गोलाकार) दिखाई देते हैं।
- उदाहरण — Hb हीमोग्लोबिन
प्रोटीन का विकृतीकरण
प्रोटीन को गर्म करने पर एवं इनमें अम्ल या क्षार मिलने पर प्राकृतिक प्रोटीन की संरचना नष्ट हो जाती है। इसे प्रोटीन का विकृतीकरण कहते हैं।
विकृतीकरण प्रक्रिया में प्रोटीन की द्वितीयक संरचना व तृतीयक संरचना नष्ट हो जाती है।
विकृतीकरण के प्रकार —
- उत्क्रमणीय विकृतीकरण
- अनुउत्क्रमणीय विकृतीकरण
(i.) उत्क्रमणीय विकृतीकरण
- इसमें प्रोटीन के इंट्रा H−बंध टूट जाते हैं तथा पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ खुल जाती हैं।
- विकृतीकरण का हेतु हटाने पर पुनः H−बंध बन जाने से प्रोटीन पुनः अपनी पूर्व अवस्था में आ जाता है।
(ii.) अनुउत्क्रमणीय विकृतीकरण
- यह विकृतीकरण प्रबल विकृतिकारक जैसे प्रबल अम्ल या क्षार अथवा ताप पर होता है।
- इस प्रक्रिया में विकृतप्रोटीन अपनी मूल रूप में वापस नहीं लौटता।
- उदाहरण के लिये, अण्डे की सफेदी (अण्ड एल्ब्युमिन प्रोटीन) को गर्म करने पर (जल में विलेय) यह कठोर एवं रबड़ जैसा जल में अघुलनशील पदार्थ में बदल जाता है।
प्रश्न — अण्डे को उबालने पर उसमें उपस्थित जल कहाँ जाता है?
हल — अण्डे को उबालने पर, उसमें उपस्थित गोलाकार प्रोटीन का विकृतीकरण हो जाने के कारण, जल शोषित हो जाता है।
एन्जाइम
एन्जाइम गोलाकार जटिल प्रोटीन अणु होते हैं, जिनका अणुभार उच्च होता है। ये स्वयं परिवर्तित हुए बिना जीव में होने वाली विभिन्न जैविक अभिक्रियाओं में वेग का कारण हैं। इसलिए एन्जाइम कहलाते हैं।
एन्जाइम के गुण
- एन्जाइम प्रोटीन से बने होते हैं।
- एन्जाइम अभिक्रिया में कभी भी समाप्त नहीं होते हैं। वे निरन्तर क्रियाकारक के उत्पाद में बदलते रहते हैं।
- एन्जाइम किसी अभिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा को कम करके, अभिक्रिया के वेग को 1020 गुना तक बढ़ाते हैं।
- एन्जाइम केवल विषमांगी अभिक्रिया के वेग को बढ़ा सकते हैं। अभिक्रिया का दिशा व साम्य पर कोई प्रभाव नहीं डालते हैं।
- एन्जाइम विशिष्ट प्रकृति के होते हैं। अर्थात एक एन्जाइम एक ही प्रकार का कार्य करता है। जैसे — एमाइलेज एन्जाइम केवल स्टार्च को जल अपघटित करता है, सेलुलोज को नहीं।
अब उदाहरण —
C12H22O11(aq) + H2O(l) इन्वर्टेज → C6H12O6(aq) + C6H12O6(aq)
(सुक्रोज) (ग्लूकोज) + (फ्रक्टोज)
C12H22O11(aq) + H2O(l) स्वतः → कोई उत्पाद नहीं
- एन्जाइम शरीर के 310 K ताप तथा सामान्य pH (6–8) पर अधिक सक्रिय होते हैं।
- उच्च ताप, प्रकाशीय विकिरण, क्षार आदि एन्जाइम की संरचना को विकृतिकार कर देते हैं जिससे एन्जाइम की सक्रियता समाप्त हो जाती है।
एन्जाइम का नामकरण तथा वर्गीकरण
एन्जाइम का नामकरण — एन्जाइम जिस क्रियाकारक पर अभिक्रिया करता है उस क्रियाकारक के नाम के अन्तिम रूप में -ase जोड़कर एन्जाइम का नाम दिया जाता है।
जैसे —
लाइपेज प्रोटिएज माल्टेज
लिपिड + जल प्रोटीन + जल माल्टोज → 2 (ग्लूकोज)
कुछ एन्जाइम के गुण
| क्र. सं. | एन्जाइम | उद्गम स्थल | क्रियाधार | उत्पाद |
|---|---|---|---|---|
| 1. | माल्टेज | आंतरस | माल्टोज | ग्लूकोज |
| 2. | एमाइलेज | उदर-जठर रस | कार्बोहाइड्रेट | ग्लूकोज |
| 3. | लाइपेज | उदर-जठर रस | वसा | ग्लिसरॉल एवं वसीय अम्ल |
| 4. | ट्रिप्सिन | अग्नाशयी रस | प्रोटीन | एमीनो अम्ल |
| 5. | रेनिन | अग्नाशयी रस | दूध | दूध फट जाता है |
| 6. | टायलिन | मुख रस | पॉली सैकेराइड | डेक्स्ट्रिन |
| 7. | पेप्सिन | उदर-जठर रस | प्रोटीन | प्रोटीन-पेप्टाइड |
| 8. | डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिएज तथा राइबोन्यूक्लिएज | आंत अग्नाशयी रस | DNA तथा RNA | ओलिगो मोनो न्यूक्लियोटाइड |
एन्जाइम उत्प्रेरण की क्रियाविधि
(ताला–चाबी सिद्धान्त)
- एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रियाएँ दो पदों में सम्पन्न होती हैं।
- पद 1 — सर्वप्रथम एन्जाइम क्रियाधार (सब्सट्रेट) से अभिक्रिया करके मध्यवर्ती सक्रिय संकुल बनाता है।
E + S → [ES]
E = एन्जाइम S = क्रियाधार [ES] = सक्रिय संकुल
- पद 2 — यह मध्यवर्ती सक्रिय संकुल विघटित होकर एन्जाइम तथा उत्पाद बना लेता है।
[ES] → E + P
[ES] = सक्रिय संकुल E = एन्जाइम P = उत्पाद
एन्जाइम के उपयोग
- पाचन क्रिया में सहायक।
- एन्जाइम रेनिन का उपयोग पनीर उद्योगों में।
- शराब बनाने की प्रक्रिया में।
-
रोगों के रोकथाम में जैसे —
- एन्जाइम ट्रायप्सिनेज की कमी से यक्ष्मारोग रोग होता है। अतः इस रोग के लिए यह दवा के साथ दिया जाता है।
- एन्जाइम स्ट्रेप्टोकाइनेज का उपयोग रक्त फैसे में रक्त के थक्के को हटाने में किया जाता है।
न्यूक्लिक अम्ल (Nucleic acids)
- न्यूक्लिक अम्ल कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस का जटिल यौगिक है।
- ये अनुवांशिक गुणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाते हैं तथा प्रोटीन के जैवसंश्लेषण में आवश्यक रूप से भाग लेते हैं।
-
ये दो प्रकार के
न्यूक्लिक अम्ल हैं :
- डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल (DNA)
- राइबोन्यूक्लिक अम्ल (RNA)
प्रश्न — न्यूक्लिक अम्ल क्या होते हैं? इनके दो महत्वपूर्ण गुण लिखिए।
(1) संघटन (Composition)
-
(i) नाइट्रोजन युक्त क्षार :
- (a) प्यूरीन — A (एडेनिन), G (ग्वानिन)
- (b) पिरीमिडीन — C (साइटोसिन), T (थाइमीन), U (यूरेसिल)
-
(ii) पाँच कार्बन शर्करा (पेंटोज) :
RNA में शर्करा — राइबोज
DNA में शर्करा — डीऑक्सीराइबोज - (iii) फॉस्फोरिक अम्ल, H3PO4
न्यूक्लिक अम्ल का निर्माण
पेंटोज शर्करा
(राइबोज या डीऑक्सीराइबोज)
+
क्षार
(प्यूरीन या पिरीमिडीन)
↓
न्यूक्लियोसाइड
फॉस्फोरिक अम्ल
↓
न्यूक्लियोटाइड
(पॉली न्यूक्लियोटाइड)
(न्यूक्लिक अम्ल)
प्रश्न — न्यूक्लियोसाइड तथा न्यूक्लियोटाइड में क्या अंतर होता है?
Note:
| DNA | V/S | RNA |
|---|---|---|
| A, G, C, T | V/S | A, G, C, U |
प्रश्न — DNA में उपस्थित चारों क्षारों के नाम लिखिये। ये उनमें से कौनसा क्षार RNA में नहीं होता?
हल —
- एडेनिन (A), ग्वानिन (G), साइटोसिन (C), थाइमीन (T)
- RNA में थाइमीन (T) के स्थान पर यूरेसिल (U) होता है।
DNA व RNA में बंध
| DNA | RNA |
|---|---|
|
A − T and G − C डीऑक्सीराइबोज — फॉस्फेट n C, A, G या T |
A − U and G − C राइबोज — फॉस्फेट n C, A, G या U |
DNA की द्विकुण्डलित हेलीकल संरचना
RNA की एकल कुण्डलित संरचना
प्रश्न — डीएनए तथा आर. एन. ए. में चार प्रमुख अन्तर लिखिए।
DNA एवं RNA में अन्तर
| DNA | RNA |
|---|---|
| इसकी दोहरी कुण्डलित संरचना होती है। | इसकी एकल कुण्डलित संरचना होती है। |
| शर्करा इकाई डीऑक्सीराइबोज है। | शर्करा इकाई राइबोज है। |
| क्षार इकाइयाँ एडेनिन, ग्वानिन, साइटोसिन एवं थाइमीन हैं। | इसमें थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल क्षार होता है। अन्य क्षार समान होते हैं जो DNA में होते हैं। |
| गुणों की अनुवांशिकता के लिए उत्तरदायी है। | प्रोटीन संश्लेषण के लिए उत्तरदायी है। |
न्यूक्लिक अम्ल के जैव महत्वपूर्ण कार्य
- रेप्लीकेशन (Replication) या द्विगुणन
- प्रोटीन संश्लेषण (Protein synthesis)
विटामिन (Vitamines)
- वे कार्बनिक यौगिक जो स्वास्थ्य व शारीरिक वृद्धि एवं पाचन क्षमता को बनाये रखने में अल्प मात्रा में आवश्यक होते हैं, विटामिन कहलाते हैं।
- विटामिन के आधार पर, ये दो प्रकार के होते हैं —
(1) वसा में विलेय
विटामिन A, D, E एवं K
(2) जल में विलेय
विटामिन B — समूह (Complex) एवं विटामिन C
Note: जल में विलेय विटामिन हमारे शरीर में संचित नहीं हो सकते क्योंकि यह जल में आसानी से विलेय होने के कारण मूत्र के साथ आसानी से उत्सर्जित होते रहते हैं। अतः विटामिन C एवं पानी में विलेय सभी विटामिनों को प्रतिदिन लेना आवश्यक है।
अपवाद: विटामिन B12 (सायनोकोबालामीन) जल में विलेय होता है तथा यह यकृत में संचित होता है।
जल में विलेय (Water soluble)
| Name of Vitamins | Sources | Deficiency Diseases (कमी के प्रभाव) |
|---|---|---|
|
1. Vitamin B1 (थायमीन) |
चावल, गेहूँ का आटा, जई का आटा, मक्खन, यीस्ट, मूंगफली आदि | बेरी-बेरी, हृदय का कम होना, फैलन, दुर्बल हृदय स्पन्दन, मांसपेशी शिथिल होना एवं स्नायु-तंत्रशोथ |
|
2. Vitamin B2 (राइबोफ्लेविन) |
पनीर, अण्डे, यीस्ट, टमाटर, हरी सब्जियाँ, यकृत, मांस, प्याज, आदि। | रिबोफ्लेविन — पाचन असामान्यता, ओंठों एवं त्वचा में जलन, सूजन, मानसिक अवसाद, स्नायुओं के कोण पर रक्त जमना, कॉर्निया ओपेसिटी आदि। |
|
3. Vitamin B6 (पाइरीडॉक्सिन) |
दूध, अनाज, मछली, मांस, यकृत, यीस्ट जो क्षीण के विलयन रूप में सम्मिलित होती है। | डर्मेटाइटिस, एनीमिया, मार्धव, निवर्ता, तीव्रता, उलटी, मानसिक विकार, रक्त में कमी |
|
4. Vitamin B12 (सायनोकोबालामीन) |
मांस, मछली, यकृत, अण्डा, दूध, वनस्पति जीवाणु द्वारा संश्लेषित | वृद्धि को रोकते हैं, हानिकारक एनीमिया |
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5. Vitamin C (एस्कॉर्बिक अम्ल) |
नींबू, संतरा एवं अन्य खट्टे फल। | दाँत के मसूड़ों एवं मुँह का फूलना, स्कर्वी, प्रतिरोधक तंत्र का दुर्बल, मसूड़ों में जख्म एवं रक्त बहना, त्वचा व श्लेष्मकाओं एवं हड्डियों का सूख जाना, थकावट, संक्रमण का बढ़ना, ज्वर |
वसा में विलेय (Fat soluble)
|
1. Vitamin A रेटिनॉल |
दूध, मक्खन, चुकन्दर, अण्डे की जर्दी, कैंसर, मछली की तैलीय वसा से प्राप्त होता है। |
जीरोफ्थैल्मिया रतौंधी, नेत्र वृद्धि रुकना, त्वचा एवं प्रजनन को कम करते हैं |
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2. Vitamin D (कैल्सीफेरॉल) |
सूर्य प्रकाश में ये समावय रूपान्तरित, अण्डे का तेल, मछली का तेल आदि | सूखी अस्थियाँ रोग के साथ रिकेट्स, दाँतों एवं मृदु एवं मुग्ध अस्थियाँ |
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3. Vitamin E (टोकोफेरॉल) |
हरी सब्जियाँ, तेल, अण्डे की जर्दी, गेहूँ, ज्वार आदि | फर्टिलिटी (गर्भक्षमता) एवं मांसपेशी में क्षीणता |
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4. Vitamin K (फाइलोक्विनोन) |
गाजर, चुकन्दर, गोभी, टमाटर, चुकन्दर, अण्डे की जर्दी, पनीर | हेमरेज, चोटें होने पर अत्यधिक रक्त का बहना, रक्त का कम स्कन्दन (रक्त जमाने के लिए जिम्मेदार) |
प्रश्न — विटामिन A व विटामिन C की कमी से होने वाले रोग लिखिए।
प्रश्न — विटामिनों की कमी किस प्रकार वर्णित किया जाता है? रक्त जमाने के लिए जिम्मेदार विटामिन का नाम लिखिए।
प्रश्न — DNA तथा RNA में पायी जाने वाली शर्करा की संरचना बताइए?
हल — DNA में β-D-2-डिऑक्सीराइबोज होती है जबकि RNA में β-D-राइबोज शर्करा होती है।
प्रश्न — हमारे शरीर में विटामिन C संचित क्यों नहीं होता?
हल — विटामिन C में संरचना एक एस्कॉर्बिक अम्ल होता है जो जल में घुलनशील होता है। ये मूत्र के साथ शरीर से उत्सर्जित हो जाता है। अतः विटामिन C शरीर में संचित नहीं होता।
प्रश्न — यदि DNA के थाइमीनयुक्त न्यूक्लियोटाइड का जलअपघटन किया जाए तो कौन-कौन से उत्पाद बनेंगे?
हल — DNA H2O के साथ थाइमीन + डिऑक्सीराइबोज शर्करा + फॉस्फोरिक अम्ल
प्रश्न — निम्नलिखित को मोनोसैकेराइड तथा डाइसैकेराइड में वर्गीकृत कीजिए-
राइबोज, 2-डिऑक्सीराइबोज, माल्टोज, गैलेक्टोज, फ्रक्टोज तथा लैक्टोज
प्रश्न — (a) सुक्रोज तथा (b) लैक्टोज के जलअपघटन से कौन से उत्पाद प्राप्त होते हैं?
प्रश्न — क्या राति के जल पर (i) उष्मा की अभिक्रिया निम्नलिखित अभिकर्मकों से करते हैं?
(i) HI (ii) बेनेडिक्ट जल (iii) HNO3
हार्मोन
- कोशिकाओं तथा अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से निकलने वाले वे रासायनिक पदार्थ जो शरीर की विभिन्न जैव रासायनिक अभिक्रियाओं, वृद्धि, विकास तथा जनन के लिए आवश्यक होते हैं।
- रासायनिक दूत — जोनों को रासायनिक दूत भी कहा जाता है क्योंकि ये स्रावित स्थान से निकल कर दूर स्थित कोशिकाओं तथा ऊतकों पर प्रभाव करते हैं।
हार्मोन के उदाहरण
- इन्सुलिन रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रित रखता है। रक्त में ग्लूकोज की मात्रा तेज़ी से बढ़ने पर इन्सुलिन निकल कर आती है।
- पैराथायरॉइड ग्रन्थि बनाने वाले पैराथायरॉइड हार्मोन की मात्रा असंतुलन से मधुमेह होने पर हाइपरपैराथायरॉइडिज़्म हो जाती है, जिससे अकर्मण्यता और मानसिक संतुलन हीनता (स्नायुतंत्र की उत्तेजना) हो जाती है।
- थायरॉइड ग्रन्थि को थायरॉक्सिन बनाने की मात्रा असंतुलन से कम होने पर हाइपोथायरॉइडिज़्म हो जाती है जिसके कारण बौनापन हो सकता है।
- इससे एडीनेल कॉर्टेक्स से निकलने वाले हॉर्मोन शारीरिक कार्यकलापों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उदाहरणार्थ
- ग्लूकोकार्टिकॉइड कार्बोहाइड्रेट उपापचय को नियंत्रित करते हैं।
- मिनरलोकॉर्टिकॉइड पानी व लवण का उत्सर्जन होता है। यदि जल की लवण के स्तर को नियंत्रित करते हैं।
- यदि एडीनल कॉर्टेक्स ठीक से कार्य न करे तो इसके कारण एडीसन्स डिजीज़ हो सकती है जिसके लक्षण हैं हाइपोग्लाइसीमिया, दुर्बलता और रक्तचाप में गिरावट।
- यदि ग्लूकोकार्टिकॉइड और मिनरलोकॉर्टिकॉइड से बढ़ावा न हो तो ये शॉक रोग कारक हो सकता है।
गोनैड्स से निकलने वाले जननांग ग्रन्थि हार्मोन के लिए उत्तरदायी होते हैं। टेस्टोस्टेरोन एवं एस्ट्रोजन में शारीरिक गठन, शरीर पर बाल और सामान्य शारीरिक व्यवहार के लिए उत्तरदायी होते हैं।
प्रोजेस्टेरोन मांसपेशियों का प्रमुख हार्मोन है यह मांसपेशियों के मोच खोलने के लिए उत्तरदायी होता है और ये रक्तचाप के नियंत्रण में भागीदार होता है।
प्रोजेस्टेरोन, निषेचित अंडे को गर्भाशय में स्थित करने के लिए आवश्यक होता है।
