आवर्त सारणी की उत्पत्ति
डोबेराइनर का त्रिक नियम (1829) : यह तीन तत्वों का समूह है जिसमें बीच वाला तत्व का परमाणु भार शेष दोनों तत्वों के औसत के लगभग बराबर होता है।
| तत्व | परमाणु भार | तत्व | परमाणु भार | तत्व | परमाणु भार |
|---|---|---|---|---|---|
| Li | 7 | Ca | 40 | Cl | 35.5 |
| Na | (7 + 39) / 2 = 23 | Sr | (40 + 137) / 2 = 88 | Br | (35.5 + 127) / 2 = 80 |
| K | 39 | Ba | 137 | I | 127 |
न्यूलैण्ड का अष्टक नियम (1864) : तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु-भार के क्रम में व्यवस्थित करने पर प्रत्येक आठवें तत्व का गुण पहले तत्व के गुणों के समान होता है। इसे संगीत के सप्तक स्वर प्रणाली से तुलना की गई।
मेण्डलीफ की आवर्त सारणी (1869) :
- मेण्डलीफ ने तत्वों की आवर्त सारणी प्रस्तुत की। तत्वों के भौतिक एवं रासायनिक गुण उनके परमाणु भार के आवर्ती फलन होते हैं।
- मेण्डलीफ की आवर्त सारणी में तत्वों को बढ़ते हुए परमाणु भार के क्रम में समान गुणों वाले तत्वों को एक ही समूह में रखा गया।
- मेण्डलीफ की आवर्त सारणी में ऊर्ध्वाधर स्तम्भों को समूह कहा गया। ये 1 से 7 तक तथा शून्य समूह में विभाजित हैं।
- मेण्डलीफ की आवर्त सारणी में क्षैतिज पंक्तियों को आवर्त कहते हैं। इसमें कुल 7 आवर्त हैं।
- प्रत्येक समूह को दो उपसमूहों A तथा B में बाँटा गया। केवल VIII समूह में 9 तत्व होते हैं, जो तीन-तीन तत्वों के त्रिक के रूप में व्यवस्थित हैं।
दोष
- समस्थानिकों का स्थान : समस्थानिकों के परमाणु भार अलग-अलग होने पर भी उन्हें एक ही स्थान पर रखा गया।
- हाइड्रोजन का स्थान : हाइड्रोजन का स्थान निश्चित नहीं है, क्योंकि इसमें क्षार धातुओं तथा हैलोजन दोनों के गुण पाए जाते हैं।
- कुछ तत्व जैसे Co और Ni तथा Te और I में परमाणु भार के क्रम का पालन नहीं हुआ, फिर भी उनके रासायनिक गुणों के आधार पर उन्हें उचित स्थान दिया गया।
- लैन्थेनाइड तथा ऐक्टिनाइड तत्वों के लिए उचित स्थान नहीं दिया गया।
आवर्त सारणी (Periodic Table)
यह मोसले द्वारा दिया गया आधुनिक आवर्त नियम है। जिसमें तत्वों को उनके बढ़ते परमाणु क्रमांक के क्रम में वर्गीकृत किया गया है। इसमें 4 खण्ड (s, p, d एवं f) तथा 18 समूह एवं 7 आवर्त (1 से 7 तक) में बाँटा गया है।
ब्लॉक (Blocks) : परमाणु के अंतिम e− जिस उपकोश में प्रवेश करते हैं, वह उपकोश उनका ब्लॉक कहलाता है। आवर्त सारणी को चार ब्लॉकों (s, p, d एवं f) में विभाजित किया गया है।
- समूह 1 एवं 2 के तत्व s-ब्लॉक तत्व (सामान्य अथवा प्रतिनिधि तत्व) हैं।
- समूह 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 के तत्व d-ब्लॉक तत्व (संक्रमण तत्व) हैं।
- समूह 13, 14, 15, 16, 17, 18 के तत्व p-ब्लॉक तत्व (सामान्य अथवा प्रतिनिधि तत्व) हैं।
- f-ब्लॉक (अन्तःसंक्रमण तत्व) को अलग भी नीचे की क्षैतिज पंक्तियों में आवर्त सारणी के तल पर रखा जाता है।
समूह (Groups) : 18 ऊर्ध्व स्तम्भों को समूह कहते हैं।
- समूह 1 के तत्वों को क्षार धातु कहा जाता है।
- समूह 2 के तत्वों को क्षारीय मृदा धातु कहा जाता है।
- समूह 15 के तत्वों को नाइट्रोजन कुल कहते हैं।
- समूह 16 के तत्वों को ऑक्सीजन कुल कहते हैं।
- समूह 17 के तत्वों को हैलोजन कहते हैं।
- समूह 18 के तत्वों को उत्कृष्ट गैसें अथवा निष्क्रिय गैसें कहते हैं।
आवर्त (Periods) : क्षैतिज पंक्तियों को आवर्त कहते हैं।
- प्रथम आवर्त (H → He) में 2 तत्व होते हैं। इसे सबसे छोटा आवर्त एवं अतिलघु आवर्त कहते हैं।
- द्वितीय आवर्त (Li → Ne) में 8 तत्व होते हैं। इसे लघु आवर्त कहते हैं।
- तृतीय आवर्त (Na → Ar) में 8 तत्व होते हैं। इसे लघु आवर्त कहते हैं।
- चतुर्थ आवर्त (K19 → Kr36) में 18 तत्व होते हैं। इसे दीर्घ आवर्त कहते हैं।
- पंचम आवर्त (Rb37 → Xe54) में 18 तत्व होते हैं। इसे दीर्घ आवर्त कहते हैं।
- षष्ठ आवर्त (Cs55 → Rg86) में 32 तत्व होते हैं। इसे अति दीर्घ आवर्त कहा जाता है।
- सप्तम आवर्त (Fr87 → आगे) में 32 तत्व होते हैं। यह अपूर्ण आवर्त है एवं इसमें 19 तत्व होते हैं।
आवर्त में इलेक्ट्रॉनों का विन्यास : आवर्त संख्या मुख्य क्वाण्टम संख्या के लिए n का मान बताती है। जैसे —
1s2
—
प्रथम आवर्त
1s2 2s2 2p5
—
द्वितीय आवर्त
1s2 2s2 2p6 3s2 3p6
—
तृतीय आवर्त
1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s1
—
चतुर्थ आवर्त
वर्गों में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास : एक ही वर्ग में तत्वों का संयोजक कोश में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होता है।
Note: तत्व की संयोजकता का उच्चारण बाहरी कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या होती है।
| आवर्त | परमाणु संख्या | प्रतीक | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास |
|---|---|---|---|
| 2 | 3 | Li | 1s2 2s1 या [He] 2s1 |
| 3 | 11 | Na | 1s2 2s2 2p6 3s1 या [Ne] 3s1 |
| 4 | 19 | K | 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s1 या [Ar] 4s1 |
| 5 | 37 | Rb | [Kr]36 5s1 |
| 6 | 55 | Cs | [Xe]54 6s1 |
| 7 | 87 | Fr | [Rn]86 7s1 |
s-उपकोश के लिए वर्ग संख्या = संयोजकता कोश में e− की संख्या
p-उपकोश के लिए वर्ग संख्या = 10 + संयोजकता कोशों में e− की संख्या
d-उपकोश के लिए वर्ग संख्या = (n − 1)d + ns संयोजकता कोशों में e− की संख्या
उदाहरण
प्रश्न — आवर्त तथा वर्ग के पदों से Z = 14 वाले तत्व को स्थापित करेंगे?
हल — Z = 14 तत्व के लिए इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2 2s2 2p6 3s2 3p2
अतः यह तत्व आवर्त सारणी में तीसरे आवर्त तथा 14वें वर्ग का तत्व है। Si14
आवर्त सारणी
| s-ब्लॉक तत्व | p-ब्लॉक तत्व |
|---|---|
|
|
| d-ब्लॉक तत्व | f-ब्लॉक तत्व |
|---|---|
|
f-ब्लॉक के दो भाग -
|
प्रश्न : मेण्डेलीफ के आवर्त नियम और आधुनिक आवर्त नियम में मौलिक अन्तर क्या है?
हल : मेण्डेलीफ का आवर्त नियम तत्वों के परमाणु भारों पर आधारित है, जबकि आधुनिक आवर्त नियम तत्वों के परमाणु क्रमांकों पर आधारित है। इस प्रकार मौलिक अन्तर वर्गीकरण के आधार में है।
प्रश्न : एक ही वर्ग में उपस्थित तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुणधर्म समान क्यों होते हैं?
हल : एक ही वर्ग में उपस्थित तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होते हैं, अर्थात उनके संयोजी कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है। इसी कारण से एक ही वर्ग में उपस्थित तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म समान होते हैं।
प्रश्न : आवर्त सारणी में अक्रिय गैसों के स्थान की विवेचना कीजिए।
हल : उत्कृष्ट (अक्रिय) गैसों के बाह्यकोश और आन्तरिक कोश पूर्ण भरे होते हैं। हीलियम (He) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2 तथा अन्य उत्कृष्ट गैसों का बाह्यकोश का विन्यास ns np है।
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में समानता, रासायनिक निष्क्रियता और मिलते-जुलते अन्य लक्षणों के कारण उत्कृष्ट गैसों को एक साथ आवर्त सारणी के शून्य वर्ग (18th) में रखा गया है।
आवर्त में भरे जाने वाले e− तथा तत्वों की कुल संख्या
| आवर्त | भरे जाने वाले कक्षकों के पद | कक्षकों की संख्या | तत्वों की संख्या (कक्षकों की संख्या × 2) |
|---|---|---|---|
| 1 | 1s (2 e−) | 1 | 2 |
| 2 | 2s(2) 2p(6) | 4 | 8 |
| 3 | 3s(2) 3p(6) | 4 | 8 |
| 4 | 4s(2) 3d(10) 4p(6) | 9 | 18 |
| 5 | 5s(2) 4d(10) 5p(6) | 9 | 18 |
| 6 | 6s(2) 4f(14) 5d(10) 6p(6) | 16 | 32 |
| 7 | 7s(2) 5f(14) 6d(10) 7p(6) | 16 | 32 |
उदाहरण
प्रश्न — आवर्त सारणी के पाँचवें आवर्त में 18 तत्वों के होने की व्याख्या आप किस प्रकार करेंगे?
हल — पाँचवें आवर्त में e− 5s कक्षक में सबसे प्रथम भरेंगे। उसके बाद 4d के पाँचों कक्षक भरेंगे तथा अन्त में 5p के तीनों कक्षक भरेंगे।
कुल कक्षक = 1 + 5 + 3 = 9
अतः पाँचवें आवर्त में = (9 × 2) = 18 तत्व होंगे।
एक और उदाहरण
प्रश्न — निम्न तत्वों के बाह्यतम कोश का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखो : 50Sn, 78Pt, 17Cl, 37Rb
हल — सबसे पहले बाह्यतम कोश में e− की संख्या (x) ज्ञात करते हैं।
x = Z − इससे पहले वाले आवर्त में अक्रिय गैस का Z
- 17Cl में x = 17 − 10 = 7 (10Ne → 2nd आवर्त) अतः 17Cl में आवर्त Ne के आवर्त से 1 अधिक होगा।
3rd आवर्त में ⇒ 3s2 3p5
गुणों में आवर्तिता "एक निश्चित आवर्त के बाद समान इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की पुनरावृत्ति के कारण तत्वों के गुणों में आवर्तिता पाई जाती है।"
परमाणु त्रिज्या (Atomic radius)
किसी परमाणु की त्रिज्या उसके नाभिक के केन्द्र एवं बाहरी कोश इलेक्ट्रॉन के बीच की दूरी है। परमाणु त्रिज्या को चार भागों में बाँटा जाता है -
- आयनिक त्रिज्या (Ionic radius)
- धात्विक त्रिज्या (Metallic radius)
- सहसंयोजक त्रिज्या (Covalent radius)
- वान्डरवाल त्रिज्या (Vander waal’s Radius)
(i) आयनिक त्रिज्या
- जब परमाणु e− त्यागकर धनायन बनाता है तथा परमाणु द्वारा e− ग्रहण करने पर ऋणायन बनता है।
- एक धनायन हमेशा अपने संगत परमाणु से बहुत अधिक छोटा होता है तथा जितने अधिक इलेक्ट्रॉन निकलने से बनने वाला धनायन, उतना ही अधिक छोटा होता जाएगा।
आकार ∝ 1/प्रभावी नाभिकीय आवेश
आकार ∝ 1/धनावेश पर आवेशों की संख्या
जैसे → Na > Na+ तथा Fe > Fe2+ > Fe3+ (आकार का घटना कम)
- एक ऋणायन सदैव समान परमाणु से बड़ा होता है क्योंकि ऋणायन के निर्माण में एक या अधिक इलेक्ट्रॉन जुड़ते हैं, जिससे आयनिक आकार बढ़ता है।
- ऋणायन के निर्माण में प्रभावी नाभिकीय आवेश घटता है, इसके परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर जाते हैं और इस तरह ऋणायन अपने संगत परमाणु की अपेक्षा बड़ा हो जाता है।
आकार ∝ ऋण आवेशों की संख्या
जैसे → F < F− तथा Cl < Cl− तथा O < O− < O2−
- समइलेक्ट्रॉनी स्पीशीज में आकार का क्रम धन आवेश बढ़ने पर घटता है।
C4− > N3− > O2− > F− > Ne > Na+ > Mg2+ > Al3+ > Si4+ > P5+ > S6+ > Cl7+
आवर्त में परमाण्विक त्रिज्या बाएँ से दायीं ओर घटती है। अतः किसी आवर्त में क्षारीय धातु के सबसे बड़े एवं हैलोजन के सबसे छोटे परमाणु होते हैं।
कारण:
- आवर्त के साथ आकार में कमी, नए कोश न जुड़ने किन्तु नाभिकीय आवेश के क्रमिक वृद्धि के कारण होती है। उदाहरण के लिये, द्वितीय आवर्त में सभी परमाणु Li से F तक n = 2 वाले स्तर में भरे हुए हैं। हुआ नाभिकीय आवेश इलेक्ट्रॉनों को नाभिक की ओर अधिक प्रबलता से आकर्षित करता है और इस तरह परमाणु का आकार घटता है।
समूह या वर्ग में परमाण्विक त्रिज्या सामान्यतः ऊपर से नीचे आने पर बढ़ती है।
उदाहरण, समूह 1 में परमाणु का आकार लिथियम से सीजियम तक निश्चित रूप से बढ़ता है अर्थात् rCs > rRb > rK > rNa > rLi
कारण:
समूह में नीचे आने पर आकार में वृद्धि अतिरिक्त कोशों के योग के कारण होती है जो बढ़े हुए नाभिकीय आवेश के प्रभाव को कम करता है।
Li = 1s2 2s1 या [He] 2s1
Na = 1s2 2s2 2p6 3s1 या [Ne] 3s1
Note:
He
सबसे छोटा परमाणु है।
Fr
सबसे बड़ा परमाणु है।
त्रिज्या के प्रकार
(ii) धात्विक त्रिज्या (Metallic radius)
- धातु में दो पास-पास के परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी के आधे मान को धात्विक त्रिज्या कहते हैं।
- धात्विक त्रिज्या का मान सहसंयोजी त्रिज्या के मान से अधिक होता है।
(iii) सहसंयोजी त्रिज्या (Covalent radius)
ये एकल बन्ध द्वारा बंधित दो समान परमाणुओं के नाभिकों के बीच की दूरी का आधा मान है।
dA-A = rA + rA
dA-A = नाभिकों के बीच की दूरी
rA = सहसंयोजी त्रिज्या
अतः rA = dA-A / 2
जैसे — Cl — Cl अणु में दो Cl परमाणुओं के बीच की दूरी = 1.98 A0
अतः Cl परमाणु की सहसंयोजी त्रिज्या = 1.98 / 2 = 0.99 A0
(iv) वाण्डरवाल त्रिज्या (Vander waal's radius)
दो समान निकटतम परमाणुओं के पड़ोसी परमाणु के नाभिकों की दूरी के आधे मान को वाण्डरवाल त्रिज्या कहते हैं।
उत्कृष्ट गैसों की परमाणु त्रिज्या, वाण्डरवाल त्रिज्या होती है। और चूँकि सहसंयोजी त्रिज्या की अपेक्षा वाण्डरवाल त्रिज्या का मान अधिक होता है, अतः निष्क्रिय गैसों की परमाणु त्रिज्या आवर्त में सबसे अधिक बढ़ती है।
Note: वाण्डरवाल त्रिज्या > धात्विक त्रिज्या > सहसंयोजी त्रिज्या
परमाणु त्रिज्या को प्रभावित करने वाले कारक
(a.)
प्रभावी नाभिकीय आवेश
(Zeff)
(b.)
कक्षाओं की संख्या
(c.)
परिरक्षण प्रभाव
(a.) प्रभावी नाभिकीय आवेश (Zeff)
1 / Size ∝ नाभिकीय आकर्षण बल ∝ प्रभावी नाभिकीय आवेश (Zeff)
- किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ चलने पर आकार ↓ तथा प्रभावी नाभिकीय आवेश ↑ होता है।
(b.) कक्षाओं की संख्या
आकार ∝ कक्षाओं की संख्या
- वर्ग में ऊपर से नीचे चलने पर कक्षाओं की संख्या ↑, आकार ↑, बाह्यतम e− पर नाभिकीय आकर्षण ↓ होता है।
(c.) परिरक्षण प्रभाव
- यह प्रभाव संक्रमण तत्वों में पाया जाता है। [(n − 1)d1−10 ns1−2]
- संक्रमण तत्वों के e− की कक्षकों में भरने का क्रम यह है : d-कक्षक के e− भर जाते हैं, अतः ये अन्तः d-कक्षक के e− ns कक्षक के e− को प्रतिरक्षित करते हैं। जिससे नाभिक का ns के e− पर आकर्षण बल कम हो जाता है। इसी प्रभाव को परिरक्षण प्रभाव कहते हैं।
- नाभिकीय आवेश > परिरक्षण प्रभाव → आकार घटता जाता है। (Sc से Mn तक आकार में कमी होती है)
- नाभिकीय आवेश = परिरक्षण प्रभाव → आकार लगभग समान रहता है। Mn, Fe, Co, Ni के आकार समान हैं।
- नाभिकीय आवेश < परिरक्षण प्रभाव → आकार बढ़ता है। Cu व Zn के आकार बड़े होते हैं।
आयनन विभव अथवा आयनन ऊर्जा (Ionisation potential, IP)
- किसी विलगित गैसीय परमाणु के बाह्य कोश से एक इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिये आवश्यक ऊर्जा को आयनन विभव अथवा आयनन ऊर्जा कहते हैं।
- इसे इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) अथवा किलो कैलोरी प्रति ग्राम परमाणु में व्यक्त करते हैं।
A → A+ + e−
(प्रथम आयनन ऊर्जा IP1)
A+ → A2+ + e−
(द्वितीय आयनन ऊर्जा IP2)
A2+ → A3+ + e−
(तृतीय आयनन ऊर्जा IP3)
अतः IP1 < IP2 < IP3
आयनन ऊर्जा को प्रभावित करने वाले कारक
(i) परमाणु का आकार
आयनन ऊर्जा ∝ प्रभावी नाभिकीय आवेश ∝ 1 / आकार
| Li | Be | B | C | N | O | F |
| ⟶ | ||||||
किसी आवर्त में बाएँ से दाएँ चलने पर आकार ↓, नाभिकीय आवेश ↑, IP ↑
परमाणु आकार में वृद्धि के साथ आयनन विभव घटता है, क्योंकि बाह्य इलेक्ट्रॉन की नाभिक से दूरी बढ़ती है और इसलिए आकर्षण बल घटता है।
Li
Na
K
Rb
Cs
वर्ग में ऊपर से नीचे चलने पर आकार ↑, बाह्यतम e− पर नाभिकीय आकर्षण ↓, IP ↓
(ii) प्रभावी नाभिकीय आवेश Zeff
नाभिकीय आवेश में वृद्धि से इलेक्ट्रॉनों पर आकर्षण बल बढ़ जाता है, जिससे इन्हें निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अतः आयनन विभव का मान अधिक होगा।
आयनन ऊर्जा ∝ प्रभावी नाभिकीय आवेश ∝ 1 / आकार
(iii) सम्मिलित इलेक्ट्रॉनों के प्रकार
किसी परमाणु में कक्षक नाभिक के जितने पास होते हैं, उन पर आकर्षण बल उतना ही अधिक होता है। अतः उन कक्षकों से इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए अधिक आयनन विभव की आवश्यकता होती है।
आयनन ऊर्जा का क्रम s > p > d > f
उदाहरण : Be(2s2) का IP, B(2s2 2p1) से अधिक है।
(iv) पूर्ण भरे अथवा अर्द्ध भरे उपकोश
हुंड नियम के अनुसार पूर्ण भरे (p6, d10, f14) अथवा अर्द्ध भरे उपकोश (p3, d5, f7) अधिक स्थायी होते हैं। अतः इन कक्षाओं से इलेक्ट्रॉन निकालना मुश्किल है।
- अक्रिय गैसों की आयनन ऊर्जा अत्यधिक उच्च होती है, क्योंकि इनके अष्टक (ns2np6) पूर्ण होते हैं।
- आवर्त में बाएँ से दाएँ चलने पर आकार ↓, नाभिकीय आवेश ↑, IP ↑
N (2s22p3) का IP > O (2s22p4) के IP
इसी तरह Al की अपेक्षा Mg का आयनन ऊर्जा अधिक होती है, तथा S की अपेक्षा P की अधिक होती है।
प्रश्न : निम्न में प्रथम IP का बढ़ते क्रम से लिखिये ? (Mg, Al, P, S, Cl, Ne)
हल : P > P उपकोश की तुलना में अर्द्ध भरे उपकोश हैं, तथा Mg > Al क्योंकि S उपकोश की भेदन क्षमता अधिक है। अतः सही क्रम : Ne > Cl > P > S > Mg > Al
प्रश्न
आप इस तथ्य की व्याख्या किस प्रकार करेंगे कि सोडियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी से कम है, किन्तु इसकी द्वितीय आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक है?
हल
Na का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
Na (Z = 11): 1s2 2s2 2p6 3s1
Mg का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
Mg (Z = 12): 1s2 2s2 2p6 3s2
चूँकि सोडियम (Z = 11) और मैग्नीशियम (Z = 12) की संयोजकता कोश समान है, तथा नाभिकीय आवेश मैग्नीशियम में अधिक है, इसलिए सोडियम से प्रथम इलेक्ट्रॉन निकालना मैग्नीशियम की तुलना में आसान होता है।
अतः सोडियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की प्रथम आयनन एन्थैल्पी से कम होती है।
प्रथम इलेक्ट्रॉन निकलने के बाद, सोडियम Na+ आयन में परिवर्तित हो जाता है, जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास होता है:
Na+ : 1s2 2s2 2p6
जबकि मैग्नीशियम से एक इलेक्ट्रॉन निकलने पर Mg+ बनता है, जिसका विन्यास होता है:
Mg+ : 1s2 2s2 2p6 3s1
Na+ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निष्क्रिय गैस के समान अधिक स्थायी होता है। इसलिए Na+ से दूसरा इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
इसी कारण सोडियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी मैग्नीशियम की द्वितीय आयनन एन्थैल्पी से अधिक होती है।
IP के उपयोग
(i) धातुओं की क्रियाशीलता
आयनन एन्थैल्पी या आयनन विभव / आयनिक गुण (क्रियाशीलता) (e− त्यागने की प्रवृत्ति)
- किसी आवर्त में बाएँ से दायीं ओर चलने पर IP बढ़ता है। अतः e− त्यागकर धनायन बनाने की प्रवृत्ति घटती जाती है। अतः क्रियाशीलता घटती है। अर्थात् धात्विक गुण घटता है।
- वर्ग में ऊपर से नीचे चलने पर IP घटता है। अतः e− त्यागकर धनायन बनाने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। अतः क्रियाशीलता बढ़ती है। अर्थात् धात्विक गुण बढ़ता है।
Li
Na
K
Rb
Cs ↓
वर्ग में ऊपर से नीचे चलने पर -
- ✓ आकार ↑, बाहरी e− पर नाभिकीय आकर्षण ↓, IP ↓
- ✓ क्रियाशीलता बढ़ती है।
(ii) धातुओं के हाइड्रॉक्साइड की प्रबलता ज्ञात करने में
प्रबलता ∝ 1 / IP
- यदि तत्व के IP का मान कम होगा तो हाइड्रॉक्साइड क्षारीय होगा क्योंकि वह तत्व अपना e− OH को देकर OH− बना देगा। अतः ऐसे तत्व का हाइड्रॉक्साइड प्रबल क्षारीय होता है।
उदाहरण NaOH क्षार है।
- यदि तत्व के IP का मान अधिक होगा तो उसका हाइड्रॉक्साइड अम्लीय होगा क्योंकि वह तत्व अपना e− OH को नहीं दे सकेगा। अतः तत्व व ऑक्सीजन दोनों मिलकर O − H बन्धित e− को अपनी ओर आकर्षित कर H+ देगा। उदाहरण ClOH अम्लीय है।
आवर्त में बाएँ से दायीं ओर जाने पर IP ↑ अतः हाइड्रॉक्साइड प्रबलता घटती जाती है।
- LiOH > Be(OH)2
- NaOH > Mg(OH)2
वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर IP ↓ अतः क्रियाशीलता बढ़ती है। अतः हाइड्रॉक्साइड प्रबलता बढ़ती जाती है।
LiOH < NaOH < KOH < CsOH
(LiOH दुर्बल क्षार व CsOH प्रबलतम क्षार)
प्रश्न — तत्वों के द्वितीय आयनन विभव का मान सदैव प्रथम आयनन विभव से अधिक क्यों होता है?
हल — परमाणु से प्रथम इलेक्ट्रॉन निकलने के बाद उसमें धनावेश उत्पन्न हो जाता है। इस धनायन से दूसरा इलेक्ट्रॉन निकालना अधिक कठिन होता है क्योंकि शेष बचे इलेक्ट्रॉनों पर नाभिकीय आकर्षण बढ़ जाता है। अतः द्वितीय आयनन विभव का मान प्रथम आयनन विभव से अधिक होता है।
प्रश्न — अक्रिय गैसों के आयनन विभव बहुत ऊँचे होते हैं, क्यों?
हल — आवर्त में उच्चतम आयनन विभव अक्रिय गैसों का होता है क्योंकि इनके अष्टक (ns2 np6) पूर्ण होते हैं। जिससे इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास बहुत स्थायी होता है। ये आसानी से इलेक्ट्रॉन नहीं लगाते हैं।
इलेक्ट्रॉन बन्धुता (Electron affinity)
- जब एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन का उदासीन गैसीय परमाणु में जोड़ा जाता है, तो उत्सर्जित हुई ऊर्जा को इलेक्ट्रॉन बन्धुता कहते हैं।
- जब एक इलेक्ट्रॉन को एक उदासीन परमाणु में जोड़ा जाता है, तो वह ऊर्जा उत्सर्जित होती है एवं ऋणायन बनता है।
- किन्तु द्वितीय इलेक्ट्रॉन बन्धुता के प्रक्रम में इलेक्ट्रॉनीय प्रतिकर्षण के कारण ऊर्जा अवशोषित होगी।
X(g) + e− → X−(g) + EA1 (ऊर्जा उत्सर्जित)
X−(g) + e− → X2−(g) − EA2 (ऊर्जा अवशोषित)
- इलेक्ट्रॉन बन्धुता ∝ 1 / आकार
- इलेक्ट्रॉन बन्धुता ∝ प्रभावी नाभिकीय आवेश
- इलेक्ट्रॉन बन्धुता ∝ 1 / परिरक्षण प्रभाव
→ किसी भी तत्व की इलेक्ट्रॉन बन्धुता का मान जितना अधिक होता है, उतना ही अधिक उसके ऋणायन में बदलने की प्रवृत्ति होती है।
→ अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है क्योंकि इनके कक्षों में इलेक्ट्रॉन कक्षक पूर्णतया भरे (स्थायी ns2p6) होने के कारण इनमें अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन ग्रहण नहीं कर पाते हैं।
→ Be एवं Mg की इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है क्योंकि इनमें पूर्ण अभिन्यास ns2 होता है, जो अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन जोड़ने नहीं देता।
→ इसी तरह N एवं P के लिए इसका मान बहुत कम होता है क्योंकि इनमें भी अर्द्धपूर्ण p कक्षक (ns2p3) होते हैं, जो अधिक स्थायी होते हैं।
प्रश्न — इलेक्ट्रॉन बन्धुता की परिभाषा दीजिए। क्लोरीन की इलेक्ट्रॉन बन्धुता फ्लोरीन से अधिक क्यों है? स्पष्ट कीजिए।
हल — Cl की इलेक्ट्रॉन बन्धुता F से अधिक होती है। इसका कारण यह है कि Cl की अपेक्षा F का आकार छोटा होता है, जिससे F पर उच्च इलेक्ट्रॉन घनत्व होता है और उसमें अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करने पर प्रतिकर्षण उत्पन्न हो जाता है।
जबकि Cl का आकार अपेक्षाकृत बड़ा होने से अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन को ग्रहण करने पर उस पर ज्ञात नाभिकीय आकर्षण उचित रूप से कार्य करता है और इसलिए इलेक्ट्रॉन बन्धुता का मान अधिक होता है।
प्रश्न — अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉन बन्धुता शून्य होती है। क्यों? समझाइए।
हल — अक्रिय गैसों के संयोजक कक्षक पूर्णतया भरे होते हैं (ns2p6), इसलिए उनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास अत्यन्त स्थायी होता है। इसी कारण वे अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन ग्रहण नहीं करतीं, अतः उनकी इलेक्ट्रॉन बन्धुता का मान शून्य माना जाता है।
प्रश्न
आप क्या सोचते हैं कि O की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी प्रथम इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी के समान धनात्मक, अधिक ऋणात्मक या कम ऋणात्मक होगी? अपने हल की पुष्टि कीजिए।
हल
ऑक्सीजन (O) की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी प्रथम इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी से धनात्मक होती है। अर्थात ऑक्सीजन परमाणु में प्रथम इलेक्ट्रॉन के जुड़ने पर ऊर्जा का विमोचन होता है, जबकि दूसरे इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी ऋणात्मक होती है।
O(g) + e− → O−(g)
(ΔegHe = −141.0 kJ)
लेकिन जब दूसरा इलेक्ट्रॉन O− आयन में जोड़ा जाता है, तब इस प्रक्रिया में ऊर्जा का अवशोषण होता है।
O−(g) + e− → O2−(g)
(ΔegHe = +780.0 kJ)
कारण : इसका कारण यह है कि ऋण आवेशित O− आयन तथा आने वाले इलेक्ट्रॉन के बीच प्रबल वैद्युत स्थैतिक प्रतिकर्षण होता है। इस प्रतिकर्षण से दूसरे इलेक्ट्रॉन के लिए ऊर्जा देनी पड़ती है जो वैद्युत स्थैतिक प्रतिकर्षण बल को पार कर जोड़ जाता है। इसी कारण से ऑक्सीजन की द्वितीय इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी धनात्मक होती है।
एक और प्रश्न
P, S, Cl तथा F में किसकी ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन-लब्धि एन्थैल्पी अधिकतम तथा किसकी न्यूनतम है? समझाइए।
हल — सामान्यतः आवर्त में दाएँ जाने पर इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती जाती है, परन्तु F की अपेक्षा Cl की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक है। इसका कारण है कि 3p-उपकोश का इलेक्ट्रॉन ग्रहण करना 2p-उपकोश की तुलना में अधिक सरल होता है।
चूँकि 2p-उपकोश में इलेक्ट्रॉन जाने पर प्रतिकर्षण अधिक होता है, अतः अधिकतम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन-लब्धि एन्थैल्पी Cl की होगी तथा सबसे कम ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन-लब्धि एन्थैल्पी P की होगी।
विद्युतऋणता
- किसी यौगिक में परमाणु की बंधित इलेक्ट्रॉनों के युग्मों को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता को उस परमाणु की विद्युतऋणता कहलाती है।
- जिस परमाणु की विद्युतऋणता अधिक होगी उस पर आंशिक ऋणावेश तथा जिस परमाणु की विद्युतऋणता कम होगी उस पर आंशिक धनावेश आ जायेगा।
δ+
δ−
A ⟶ B
ध्रुवीय अणु
(1) विद्युतऋणता के मान को प्रभावित करने वाले कारक
(i) परमाणु का आकार
विद्युतऋणता ∝ 1 / आकार ∝ प्रभावी नाभिकीय आवेश
किसी आवर्त में बाएँ से दायें और चलने पर आकार में कमी होती है तथा प्रभावी नाभिकीय आवेश में वृद्धि होती है, जिससे विद्युतऋणता बढ़ती है।
Li < Be < B < C < N < O < F
Li
Na
K
Rb
Cs
वर्ग में
ऊपर से
नीचे चलने पर
✓ आकार ↑, जिससे विद्युतऋणता ↓
- क्षारकीय धातुओं में विद्युतऋणता का मान न्यूनतम होता है।
- हैलोजनों में उच्च मान होती है।
- अक्रिय गैसों की विद्युतऋणता शून्य होती है।
Note:
अधिकतम विद्युतऋणी तत्व
F
न्यूनतम विद्युतऋणी तत्व
Cs & Fr
संक्रमण तत्वों में विद्युतऋणता ऊपर से नीचे आने पर बढ़ती है। ये परमाणु आकार में वृद्धि के कारण होता है। लेकिन संक्रमण तत्वों में ऊपर से नीचे आने पर पहले 4d तथा 5d श्रेणी में परिरक्षण प्रभाव का मान बहुत कम होने के कारण पहले 5d की अपेक्षा 4d के बराबर होता है। अतः 5d तत्वों की विद्युतऋणता अधिक होती है।
ऑक्सीकरण अवस्था बढ़ने पर विद्युतऋणता
O− < O < O+
(विद्युतऋणता का क्रम)
Mn2+ < Mn3+ < Mn4+ < Mn6+ < Mn7+ (विद्युतऋणता का क्रम)
अतः ऑक्सीकरण अवस्था बढ़ने से आकार में कमी एवं नाभिकीय आवेश में वृद्धि तथा विद्युतऋणता बढ़ती है।
तत्वों के ऑक्साइडों की अम्लीय व क्षारीय प्रकृति
कोई ऑक्साइड अम्लीय अथवा क्षारीय होगा, यह जाने पर उसका आयनन निम्न प्रकार से होता है।
AOH → AO− + H+ अम्ल (A की विद्युतऋणात्मकता > O की विद्युतऋणात्मकता)
AOH → A+ + OH− क्षारीय (A की विद्युतऋणात्मकता < O की विद्युतऋणात्मकता)
जैसे — NaOH क्षार है। (NaOH → Na+ + OH−)
जबकि HClO4 अम्ल है। (HClO4 → ClO4− + H+)
उदाहरण
प्रश्न — जल से रासायनिक अभिक्रिया द्वारा दर्शाइए कि Na2O एक क्षारीय एवं Cl2O7 एक अम्लीय ऑक्साइड है।
हल — Na2O जल से अभिक्रिया करके क्षार देता है।
Na2O → 2Na+ + O2−
O2− + H2O → 2OH− (क्षारीय)
जबकि Cl2O7 जल से अम्ल देता है।
Cl2O7 + H2O → 2HClO4 (अम्लीय)
क्षारीय या अम्लीय का परीक्षण हम लिटमस पत्र से भी कर सकते हैं।
विकर्ण सम्बन्ध
द्वितीय आवर्त के कुछ तत्व तृतीय आवर्त में अपने विकर्ण तत्वों के साथ समानताएँ दर्शाते हैं। इसे विकर्ण सम्बन्ध कहते हैं।
| समूह 1 | समूह 2 | समूह 13 | समूह 14 |
|---|---|---|---|
| Li | Be | B | C |
| Na | Mg | Al | Si |
- Li की समानता Mg से है।
- Be की समानता Al से है।
- B की समानता Si से है।
द्वितीय आवर्त के तत्व प्रतिनिधि तत्व कहलाते हैं।
100 से अधिक परमाणु संख्या वाले तत्वों का IUPAC नामकरण
| संख्या | 0 | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मूल | निल | अन | बाई | ट्राई | क्वाड | पेंट | हेक्स | सेप्ट | ऑक्ट | एन |
| nil | un | bi | tri | quad | pent | hex | sept | oct | enn |
| परमाणु संख्या | नाम | प्रतीक |
|---|---|---|
| 101 | un + nil + un + ium = unnilunium | Unu |
| 102 | Unnilbium | Unb |
| 103 | Unniltrium | Unt |
| 104 | Unnilquadium | Unq |
प्रश्न : 120 परमाणु क्रमांक वाले तत्व का IUPAC नाम तथा प्रतीक क्या होगा?
उत्तर :
120 के लिए
1 = un,
2 = bi,
0 = nil
अतः नाम होगा
Unbinilium
तथा प्रतीक होगा
Ubn
प्रश्न : परमाणु क्रमांक 117 एवं 120 वाले तत्वों की खोज अब तक नहीं हो पाई है। इसे बताइए कि इन तत्वों का स्थान आवर्त सारणी की किस आवर्त / वर्ग में होगा? साथ ही परमाणु क्रमांक 120 का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्या होगा?
हल : आधुनिक आवर्त सारणी के तत्वों के परमाणु क्रमांक वाले तत्वों का स्थान आवर्त सारणी में इलेक्ट्रॉन परिवार के अनुसार ज्ञात किया जाता है।
परमाणु क्रमांक 117 वाले तत्व का स्थान आवर्त सारणी में हैलोजन परिवार (वर्ग 17) में At के नीचे होगा। तथा इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Rn] 5f14 6d10 7s2 7p5 होगा।
परमाणु क्रमांक 120 वाले तत्व का स्थान वर्ग 2 (क्षारीय मृदा धातु) में Ra के नीचे होगा। तथा इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Uuo] 8s2 होगा।
प्रश्न : परमाणुओं की त्रिज्या और आयनन ऊर्जा में विलोम संबंध है। अतः P से S तक निम्नलिखित तत्वों को उनके बढ़ते हुए धात्विक लक्षण के क्रम में व्यवस्थित कीजिए। Si, Be, Mg, Na
हल : हम जानते हैं कि आवर्त सारणी में बाएँ से दाएँ जाने पर तत्वों के धात्विक गुणों में कमी होती है तथा वर्ग में ऊपर से नीचे जाने पर धात्विक गुण में वृद्धि होती है। अतः ऊपर दिये गए तत्वों का बढ़ते हुए धात्विक लक्षण का क्रम होगा :
P < Si < Be < Mg < Na
प्रश्न- :
निम्नलिखित स्पीशीजों में किसकी
त्रिज्या अधिकतम तथा
किसकी त्रिज्या न्यूनतम होगी?
Mg, Mg2+, Al, Al3+
हल :
अधिकतम आकार वाली स्पीशीज
= Mg
न्यूनतम आकार वाली स्पीशीज
= Al3+
याद रखें
- आवर्त में बाएँ से दाएँ बढ़ने पर परमाणु त्रिज्या का मान घटता है।
- धनायन का आकार उसके जनक परमाणु की तुलना में छोटा होता है।
तत्व की संयोजकता = बाह्यतम कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या
| समूह | 1 | 2 | 13 | 14 | 15 | 16 | 17 | 18 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| संयोजी e− की संख्या | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 |
| संयोजकता | 1 | 2 | 3 | 4 | 3, 5 | 2, 6 | 1, 7 | 0, 8 |
प्रश्न — निम्नलिखित युग्मों वाले तत्वों के संयोजन से बनने वाले यौगिकों के अणु-सूत्र की भविष्यवाणी कीजिए:
(a) सिलिकॉन एवं ब्रोमीन और
(b) ऐलुमिनियम तथा सल्फर
हल —
(a) सिलिकॉन आवर्त सारणी के 14वें वर्ग का तत्व है, जिसकी संयोजकता 4 है। ब्रोमीन, जो 17वें वर्ग (हैलोजन परिवार) का सदस्य है, की संयोजकता 1 है। अतः यौगिक का अणुसूत्र SiBr4 होगा।
(b) आवर्त सारणी के 13वें वर्ग का तत्व ऐलुमिनियम है, जिसकी संयोजकता 3 है। सल्फर 16वें वर्ग का तत्व है, जिसकी संयोजकता 2 है। अतः ऐलुमिनियम तथा सल्फर से बने यौगिक का अणु सूत्र Al2S3 होगा।
हल —
- लीथियम की संयोजकता 1 तथा ऑक्सीजन की संयोजकता 2 है। अतः बने यौगिक का सूत्र Li2O होगा।
- मैग्नीशियम की संयोजकता 2 तथा नाइट्रोजन की संयोजकता 3 है। अतः बने यौगिक का सूत्र Mg3N2 होगा।
- ऐलुमिनियम की संयोजकता 3 तथा ऑयोडीन की संयोजकता 1 है। अतः बने यौगिक का सूत्र AlI3 होगा।
- सिलिकॉन की संयोजकता 4 तथा ऑक्सीजन की संयोजकता 2 है। अतः बने यौगिक का सूत्र SiO2 होगा।
- फॉस्फोरस की संयोजकता 3 तथा फ्लुओरीन की संयोजकता 1 है। अतः बने यौगिक का सूत्र PF3 होगा।
- 17वाँ तत्व क्लोरीन (Cl) है, जिसकी संयोजकता 1 होती है। एल्यूमिनियम की संयोजकता 3 है। अतः बने यौगिक का सूत्र AlCl3 होगा।
उत्तर :
(i) Li2O
(ii) Mg3N2
(iii) AlI3
(iv) SiO2
(v) PF3
(vi) AlCl3
प्रश्न
किनी तत्व के समान परमाणुओं की प्रथम आयनन एन्थैल्पी समान होगी या भिन्न? आप क्या मानते हैं? अपने हल की पुष्टि कीजिए।
हल — एक तत्व के समान परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों की संख्या, परमाणु नाभिकीय आवेश तथा आकार समान होता है। इसलिए उनकी प्रथम आयनन एन्थैल्पी का मान समान होता है।
प्रश्न
धातुओं और अधातुओं में मुख्य अंतर क्या है?
हल
| धातु | अधातु |
|---|---|
| धातुएँ विद्युत धनात्मक तत्व हैं तथा एक या अधिक संयोजी इलेक्ट्रॉनों की त्यागकर धनायन बनने की प्रवृत्ति रखती हैं। | अधातुएँ विद्युत ऋणात्मक तत्व हैं तथा अपने संयोजी कोश में एक या अधिक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणायन बनने की प्रवृत्ति दिखाती हैं। |
| ये एक अपचायक के रूप में कार्य करती हैं। | ये ऑक्सीकारक के रूप में कार्य करती हैं। |
| इनका आयनीकरण एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा विद्युत ऋणात्मकता का मान कम होता है। | इनका आयनीकरण एन्थैल्पी, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी तथा विद्युत ऋणात्मकता का मान अधिक होता है। |
| ये क्षारीय ऑक्साइड बनाती हैं। | ये अम्लीय ऑक्साइड बनाती हैं। |
