Class 11 Chemistry Chapter 4 Notes – Chemical Bonding and Molecular Structure (रासायनिक आबन्धन एवं आण्विक संरचना) (Hindi Medium)

रासायनिक बंध

रासायनिक बंध –
किसी दो परमाणुओं के मध्य लगने वाले
आकर्षण बल को
रासायनिक बंध कहते हैं।
यह आकर्षण बल दोनों परमाणुओं को
एक साथ बाँधे रखता है,
जिससे अणु का निर्माण होता है।

सहसंयोजी आबंध —
यह वह आबंध है जो परमाणुओं के
संयोजकता e− के
साझे से बनते हैं।
इस बंध को सहसंयोजी आबंध कहते हैं।

रासायनिक आबंध की कॉन्सेल – लुईस अवधारणा

लुईस प्रतीक :
किसी अणु के बनने में
परमाणुओं के केवल बाह्य कोश इलेक्ट्रॉन
रासायनिक संयोजन में भाग लेते हैं।
ये इनके संयोजकता इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं।

लुईस प्रतीक

Li •
   
• Be •
   
• B • •
   
• C • • •
   
• N • • • •
   
• O • • • • •
   
• F • • • • • •
   
• Ne • • • • • • •

अणु / आयन लुईस संरचना निरूपण
H2 H : H H — H
O2 : O :: O : O = O
O3 : O : O : O : O → O ← O
NF3 N के साथ तीन F सहसंयोजित F — N — F तथा एक अन्य F
CO32− [ O : C : O ]2− [ O — C(=O) — O ]2−
HNO3 O : N : O : H O = N — O — H

अष्टक नियम

इस सिद्धांत के अनुसार,
परमाणु अपने
बाह्यतम कोश अथवा
संयोजकता कोश में
अष्टक पूर्ण करने के लिए
e− लगाते हैं,
या ग्रहण करते हैं, या साझा करते हैं।
इसे अष्टक नियम कहते हैं।

उदाहरण —
CO2 अणु में
कार्बन तथा
ऑक्सीजन
परमाणुओं के मध्य
दो द्वि-आबंध उपस्थित होते हैं।

:O = C = O:

एथीन के अणु में दो
कार्बन परमाणु
एक द्वि-आबंध द्वारा
बंधित होते हैं।

H2C = CH2

  • जब दो परमाणुओं के मध्य
    तीन इलेक्ट्रॉन युग्मों का
    सहभाजन होता है,
    तब उनके मध्य एक त्रि-आबंध बनता है।
  • N2 अणु के दो
    नाइट्रोजन परमाणुओं के मध्य
    तथा एथाइन में दो
    कार्बन परमाणुओं के मध्य
    एक त्रि-आबंध बनता है।

:N ≡ N:

H — C ≡ C — H

प्रश्न —
CO के अणु की
लुईस बिंदु संरचना लिखें।

हल —

:C ≡ O:

फॉर्मल आवेश


(लुईस बिंदु संरचना में किसी परमाणु पर फॉर्मल आवेश)
=
(मुक्त परमाणु में संयोजकता अथवा बाह्यतम कोश के e− की संख्या)
−
(अवबंधी e− की कुल संख्या)
−
1/2
(बंधी e− की कुल संख्या)

O3 की लुईस संरचना

ऑक्सीजन के
परमाणुओं को
1, 2 तथा 3 द्वारा
चिह्नित करें।

1 द्वारा चिह्नित केंद्रीय O परमाणु पर
फॉर्मल आवेश
= 6 − 2 − 1/2 (6) = 1

2 द्वारा चिह्नित टर्मिनल O परमाणु पर
फॉर्मल आवेश
= 6 − 4 − 1/2 (4) = 0

3 द्वारा चिह्नित टर्मिनल O परमाणु पर
फॉर्मल आवेश
= 6 − 6 − 1/2 (2) = −1

अतः O3 के अणु पर फॉर्मल आवेश

O3 पर फॉर्मल आवेश की संरचना

अष्टक नियम के अपवाद

अनेक स्थायी यौगिकों में
अष्टक नियम की पालना नहीं होती है।

(1) केन्द्रीय परमाणु का
अपूर्ण अष्टक

(2) विषम इलेक्ट्रॉन
(Odd-Electron) अणु

(3) प्रसारित
(Expanded) अष्टक

(1) केन्द्रीय परमाणु का अपूर्ण अष्टक
  • यौगिकों में
    केन्द्रीय परमाणु के चारों ओर
    उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या
    आठ से कम होती है।
  • यह मुख्यतः ऐसे यौगिकों में होता है
    जिनमें संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की संख्या
    चार से कम होती है।

उदाहरण :
LiCl, BeH2 तथा BCl3

(2) विषम इलेक्ट्रॉन (Odd-Electron) अणु
  • उन अणुओं में
    इलेक्ट्रॉनों की
    कुल संख्या
    विषम होती है।
    परिणामस्वरूप ऐसे अणु
    अष्टक नियम का
    पालन नहीं करते।

उदाहरण :
नाइट्रिक ऑक्साइड, NO
तथा नाइट्रोजन डाई-ऑक्साइड, NO2

(3) प्रसारित (Expanded) अष्टक
  • आवर्त सारणी के
    तीसरे आवर्त के बाद आने वाले
    तत्वों के संयोजन के लिए
    3s तथा 3p
    कक्षकों के अतिरिक्त
    3d कक्षक भी उपलब्ध होते हैं।
  • इन तत्वों के यौगिकों में
    केन्द्रीय परमाणु के चारों ओर
    आठ से अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं।
    इसे प्रसारित अष्टक कहते हैं।
    अतः इन यौगिकों पर अष्टक नियम
    लागू नहीं होता है।

उदाहरण :
PF5, SF6, H2SO4

PF5 में
P परमाणु के चारों ओर
10 इलेक्ट्रॉन हैं।

SF6 में
S परमाणु के चारों ओर
12 इलेक्ट्रॉन हैं।

H2SO4 में
S परमाणु के चारों ओर
12 इलेक्ट्रॉन हैं।

आयनिक या वैद्युत संयोजी आबंध

किसी दो विपरीत आवेशित आयनों
(धनायन व ऋणायन) के मध्य बनने वाले बंध को
आयनिक बंध कहते हैं।
जब किसी धातु तथा
अधातु के मध्य
e− का पूर्ण स्थानान्तरण
हो जाता है, तब इसे
आयनिक संयोजी बंध कहते हैं।

उदाहरण

धातु + अधातु = आयनिक यौगिक

Na(g) → Na+(g) + e−

[Ne]3s1
  →  
[Ne]

धातु

Cl(g) + e− → Cl−(g)

[Ne]3s23p5
  →  
[Ne]3s23p6 या [Ar]

अधातु

Na+(g) + Cl−(g) → NaCl(s)
 या 
Na+Cl−

आयनिक यौगिक

  • आयनिक ठोस
    उच्च गलनांक व
    कठोर होते हैं।
  • ये ठोस अवस्था में
    विद्युत का चालन नहीं करते,
    परन्तु द्रव अवस्था में
    आयनों के कारण विद्युत का चालन करते हैं।
जालक एन्थैल्पी (जालक ऊर्जा)
  • किसी आयनिक ठोस के
    एक मोल यौगिक को
    गैसीय अवस्था में आयनों में तोड़ने के लिए
    आवश्यक ऊर्जा को उस यौगिक की
    जालक एन्थैल्पी कहते हैं।
    इसका मात्रक kJ mol−1 होता है।
  • उदाहरण —
    NaCl की
    जालक एन्थैल्पी
    788 kJ mol−1 है।
    इसका अर्थ यह है कि
    एक मोल ठोस NaCl को
    एक मोल Na+(g)
    तथा
    एक मोल Cl−(g)
    में तोड़ने के लिए
    788 kJ ऊर्जा की आवश्यकता होगी।
आयनिक यौगिक बनने की अनुकूलतम शर्तें
  • कम आयनन एन्थैल्पी
  • अधिक e− बन्धुता
  • अधिक जालक एन्थैल्पी

आबन्ध एन्थैल्पी या बन्ध वियोजन ऊर्जा

  • एक गैसीय अणु में उपस्थित
    दो परमाणुओं के बीच
    बंध को तोड़ने के लिए
    आवश्यक ऊर्जा को
    आबन्ध एन्थैल्पी कहते हैं।
    आबन्ध एन्थैल्पी का मात्रक
    kJ mol−1 होता है।
  • इसका मान परमाणुओं के मध्य बनने वाले
    आकर्षण बल पर निर्भर करता है।
  • आकर्षण बल व
    बंध वियोजन ऊर्जा
    समानुपाती होते हैं।
  • आबन्ध वियोजन एन्थैल्पी अधिक है,
    तो आबन्ध अधिक प्रबल होगा।
  • बन्धों की संख्या ∝
    आबन्ध एन्थैल्पी

उदाहरण —
हाइड्रोजन के अणु में
H — H आबन्ध की
आबन्ध एन्थैल्पी
435.8 kJ mol−1 होती है।

H2(g) → H(g) + H(g)
ΔaH⊖ = 435.8 kJ mol−1

बन्ध कोटि (Bond order)

किसी अणु में दो
परमाणुओं के मध्य
आबन्धों की संख्या को
आबन्ध कोटि कहते हैं।

Bond order diagram

बन्ध-कोण (Bond Angle, θ)
  • किसी अणु में
    केंद्रीय परमाणु के आसपास उपस्थित
    परमाणुओं के मध्य बनने वाले
    कोण को
    बन्ध-कोण कहते हैं।
  • बन्ध-कोण का मान परमाणु के
    e− युग्मों तथा
    बन्ध युग्मों
    (lp & bp) की संख्या पर निर्भर करता है।
  • जैसे —
    H2O अणु में
    बन्ध-कोण

H2O bond angle 104.5 degree

H — O — H = 104.5°

अनुनाद (Resonance)

  • किसी यौगिक की
    एक संरचना के आधार पर
    उसकी सभी गुणों की
    व्याख्या नहीं की जा सकती।
    इसलिए यौगिक की
    एक से अधिक संरचनाएँ बनाकर
    जब उसे अच्छी प्रकार से
    व्यक्त किया जाता है, तब उसे
    अनुनाद कहते हैं।
  • अनुनादी संरचनाओं के मध्य में
    ↔ तीर लगाया जाता है।

जैसे :
CO32−
आयन की
अनुनादी संरचना

I    ↔    II    ↔    III

CO2 अणु की
अनुनादी संरचना

I    ↔    II    ↔    III

द्विध्रुव आघूर्ण

किसी द्विध्रुव की
ध्रुवता को
द्विध्रुव आघूर्ण द्वारा मापा जाता है।

  • ध्रुवीय अणु में ध्रुवों पर उपस्थित
    धनात्मक और
    ऋणात्मक आवेश
    (q) के मान तथा आवेशों के बीच की दूरी (r)
    के गुणनफल को द्विध्रुव आघूर्ण
    (μ) कहते हैं।
  • द्विध्रुव आघूर्ण
    (μ) =
    आवेश (Q) ×
    आवेश के बीच की दूरी (r)
  • द्विध्रुव आघूर्ण का मात्रक
    डिबाई (Debye) है।

μ = Q × r

1D = 3.33564 × 10−30 C.m
जहाँ पर C कूलॉम तथा m मीटर है।

  • जब किसी अणु का
    μ = 0 हो
    तो उसे अध्रुवीय अणु कहते हैं।
  • जब किसी अणु का
    μ का मान
    0 से अधिक हो
    तो उसे ध्रुवीय अणु कहते हैं।

द्विध्रुव आघूर्ण से किसी
अणु की प्रकृति व
ज्यामिति की व्याख्या की जा सकती है।
इसके निम्न नियम हैं –

  • सममितीय अणुओं का
    द्विध्रुव आघूर्ण का मान
    शून्य होता है।
    उदाहरण –
    H2, Cl2
  • सममितीय अणुओं का
    द्विध्रुव आघूर्ण का मान
    शून्य होता है जैसे –
    CO2 तथा
    द्विध्रुव आघूर्ण की दिशा
    एक-दूसरे के विपरीत होती है,
    जो परस्पर निरस्त हो जाती है।
    अतः उदाहरण –
    BeF2, BF3, CCl4

O = C = O

μ = 0

F ⟶ Be ⟵ F

μ = 0


F
  
   B—F
  /
F


μ = 0


   Cl
    |
Cl — C — Cl
    |
   Cl


μ = 0

  • असममित अणुओं के
    द्विध्रुव आघूर्ण का मान
    शून्य नहीं होता है क्योंकि
    दो परमाणुओं के मध्य
    विद्युत ऋणात्मकता का अंतर अधिक होता है,
    तो बंध उतना ही अधिक ध्रुवीय होता है।

प्रश्न

NH3 तथा
NF3 में
किस अणु का
द्विध्रुव-आघूर्ण अधिक है और
क्यों?

हल

NF3 में
N — F बन्ध की
ध्रुवीय प्रकृति
NH3 के
N — H बन्ध से
अधिक होती है, लेकिन
NH3 का
द्विध्रुव-आघूर्ण
NF3 से अधिक होता है।

इसका कारण यह है कि
NH3 में
एकाकी e− युग्म से उत्पन्न
द्विध्रुव-आघूर्ण की दिशा एवं
बंध द्विध्रुव-आघूर्ण की दिशा
एक ही दिशा में होती है,
इसलिए परिणामी द्विध्रुव-आघूर्ण अधिक हो जाता है।

लेकिन
NF3 में
एकाकी e− युग्म से उत्पन्न
द्विध्रुव-आघूर्ण की दिशा
बंध द्विध्रुव-आघूर्ण की दिशा के
विपरीत होती है,
इसलिए परिणामी द्विध्रुव-आघूर्ण कम हो जाता है।

अतः NH3 का द्विध्रुव-आघूर्ण NF3 से अधिक होता है।

NH3 और NF3 का द्विध्रुव आघूर्ण

प्रश्न

CO2 तथा
H2O
दोनों त्रिपरमाणुक अणु हैं,
परन्तु H2O अणु की
आकृति विकृत होती है,
जबकि CO2 की
रैखिक आकृति होती है।
द्विध्रुव आघूर्ण के आधार पर
इसकी व्याख्या कीजिए।

हल
CO2 अणु H2O अणु
CO2 अणु का
द्विध्रुव आघूर्ण
का मान शून्य है।
इसका अर्थ है कि इसकी
रैखिक संरचना में
दोनों बन्ध कोण 180° हैं
और दोनों (C=O) बन्धों के
द्विध्रुव-आघूर्ण
एक-दूसरे के विपरीत दिशा में
बराबर होते हैं, इसलिए
वे एक-दूसरे के द्विध्रुव आघूर्ण को
निरस्त कर देते हैं।
H2O अणु का
द्विध्रुव आघूर्ण
1.84 D होता है।
H2O अणु में दो
O—H आबन्ध होते हैं,
दोनों आबन्धों के मध्य
बंध-कोण लगभग
104.5° होता है।
इसमें एकाकी e− युग्म
उपस्थित होने के कारण
H2O अणु
CO2 अणु की तरह
रैखिक नहीं हो सकता।
अतः यह एक
वक्र अणु होता है।

CO2 और H2O का द्विध्रुव आघूर्ण

संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण सिद्धांत
वी. एस. ई. पी. आर.

  • अणु की
    आकृति
    केंद्रीय परमाणु के
    आसपास उपस्थित
    संयोजी कोश इलेक्ट्रॉन युग्मों
    (संयोजी अथवा असंयोजी)
    की संख्या पर निर्भर करती है।
  • केंद्रीय परमाणु के
    संयोजकता कोश में उपस्थित
    इलेक्ट्रॉन युग्म एक-दूसरे को
    प्रतिरोधित करते हैं क्योंकि
    उनके इलेक्ट्रॉन
    इलेक्ट्रॉन मेघ
    (Electron Cloud) पर
    ऋणावेश आवेश होता है।

इलेक्ट्रॉन युग्मों के
प्रतिरोधन का क्रम :

एकाकी e− युग्म (lp) − एकाकी e− युग्म (lp)
>
एकाकी e− युग्म (lp) − बंधित e− युग्म (bp)
>
बंधित e− युग्म (bp) − बंधित e− युग्म (bp)

वी. एस. ई. पी. आर. की अवधारणा से
अणुओं की
ज्यामिति का पता लगाया जाता है।
इसमें दो श्रेणियाँ हैं :

(i) वे अणु,
जिनके केंद्रीय परमाणु पर कोई भी
एकाकी e− युग्म उपस्थित नहीं होता है।

(ii) वे अणु,
जिनके केंद्रीय परमाणु पर एक या एक से अधिक
एकाकी युग्म उपस्थित होते हैं।

(i) वे अणु, जिनके केंद्रीय परमाणु पर कोई भी एकाकी e− युग्म उपस्थित नहीं होता है
इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या इलेक्ट्रॉन युग्मों की व्यवस्था आणविक ज्यामिति उदाहरण
2 180°
रेखीय
रेखीय BeCl2, HgCl2
3 120°
त्रिकोणीय समतलीय
त्रिकोणीय समतलीय BF3
4 109.5°
चतुष्फलकीय
चतुष्फलकीय CH4, NH4+
5 90° / 120°
त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी
त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी PCl5
6 90°
अष्टफलकीय
अष्टफलकीय SF6
(ii) वे अणु
जिनके केन्द्रीय परमाणु पर
एक या एक से अधिक
एकाकी युग्म उपस्थित होते हैं
अणु के प्रकार आबंधी युग्मों की संख्या एकाकी युग्मों की संख्या इलेक्ट्रॉनों युग्मों की व्यवस्था आकृति उदाहरण
AB2E 2 1 त्रिकोणीय समतली मुड़ी हुई SO2, O3
AB3E 3 1 चतुष्फलकीय त्रिकोणीय पिरामिडी NH3
AB2E2 2 2 चतुष्फलकीय मुड़ी हुई H2O
AB4E 4 1 त्रिकोणीय द्विबिपिरामिडी झूलकी SF4
AB3E2 3 2 त्रिकोणीय द्विबिपिरामिडी T-आकृति ClF3
AB5E 5 1 अष्टफलकिय वर्ग-पिरामिडी BrF5
AB4E2 4 2 अष्टफलकिय वर्ग समतली XeF4

बंधी e− युग्म (bp) तथा एकाकी e− युग्म (lp) वाले कुछ अणुओं की आकृति

अणु के प्रकार आबंधी युग्मों की संख्या एकाकी युग्मों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की व्यवस्था आकृति आकृति की व्याख्या
AB2E 2 1 त्रिकोणीय समतली मृदु हुई अथवा V-आकृति यदि इस अणु में एक एकाकी युग्म हो जाए, तब
आबंधी युग्म पर अधिक प्रतिकर्षण पड़ता है।
इस कारण इसकी आकृति त्रिकोणीय समतली न रहकर
V-आकृति हो जाती है।

एकाकी युग्म (lp) का प्रतिकर्षण
आबंधी युग्म (bp) के प्रतिकर्षण से अधिक होता है।
फलस्वरूप आबंध कोण का मान 120° से घटकर 119.5° रह जाता है।

AB3E 3 1 चतुष्फलकीय त्रिकोणीय पिरामिडी यदि एक एकाकी युग्म (lp) के स्थान पर
तीन आबंधी युग्म (bp) हों,
तो अणु की आकृति चतुष्फलकीय होती है।
परन्तु यहाँ एक एकाकी युग्म उपस्थित होने के कारण
(lp-bp) का प्रतिकर्षण
(bp-bp) की अपेक्षा अधिक होता है।
इससे बंध कोण 109.5° से घटकर 107° हो जाता है।
AB2E2 2 2 चतुष्फलकीय मृदु हुई अथवा विकृत चतुष्फलकीय यदि दो एकाकी युग्म (lp) और
दो आबंधी युग्म (bp) हों,
तो अणु की आकृति चतुष्फलकीय से विकृत हो जाती है।

चूँकि (lp-lp) का प्रतिकर्षण
(bp-bp) की अपेक्षा अधिक होता है,
इसलिए बंध कोण और घटकर 104.5° रह जाता है।

AB4E 4 1 त्रिकोणीय द्विबिपिरामिडी विकृत त्रिकोणीय द्विबिपिरामिडी, अथवा झूला आकृति ज्यामिति में एकाकी युग्म (lp)
मध्यवर्ती स्थिति में न जाकर उस स्थिति में जाता है जहाँ
उसे 90° वाले कम
(lp-bp) प्रतिकर्षण सहन करने पड़ें।

इस कारण एकाकी युग्म विषुवतीय स्थिति ग्रहण करता है और
अणु की आकृति झूला आकृति या
मुड़ी हुई आकृति हो जाती है।

AB3E2 3 2 त्रिकोणीय द्विबिपिरामिडी T-आकृति ज्यामिति में दो एकाकी युग्म (lp)
विषुवतीय स्थिति में रहते हैं,
क्योंकि इस व्यवस्था में उन्हें न्यूनतम
(lp-bp) प्रतिकर्षण सहन करना पड़ता है।

फलस्वरूप तीसरा आबंध अक्षीय दिशा में रह जाता है और अणु की आकृति
T-आकृति बनती है।

इसलिए ClF3 की वास्तविक संरचना
T-आकृति होती है।

प्रश्न —
यद्यपि NH3 तथा
H2O दोनों अणुओं की
ज्यामिति
विकृत चतुष्फलकीय होती है,
तथापि जल में
आबंध कोण
अमोनिया की अपेक्षा
कम होता है।
विवेचना कीजिए।

हल —

NH3 अणु में
नाइट्रोजन परमाणु पर
एक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित है,
जबकि H2O अणु में
ऑक्सीजन परमाणु पर
दो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित हैं।

VSEPR सिद्धान्त के अनुसार
यह ज्ञात है कि इलेक्ट्रॉन युग्मों के बीच
प्रतिकर्षण का क्रम निम्नलिखित होता है –

(lp-lp) > (lp-bp) > (bp-bp)

ऑक्सीजन परमाणु पर
दो असाझा इलेक्ट्रॉन युग्म होने के कारण
H2O में
O−H आबंध-युग्म,
NH3 में
N−H आबंध-युग्मों की अपेक्षा
अधिक निकट खिंच जाते हैं।

अतः NH3 का
आबंध कोण
(107°),
H2O के
आबंध कोण
(104.5°) से अधिक होता है।

अंतिम निष्कर्ष :
H2O में
दो lone pair होने के कारण
प्रतिकर्षण अधिक होता है,
इसलिए उसका आबंध कोण
104.5° रह जाता है।

जबकि NH3 में
केवल एक lone pair होने से
प्रतिकर्षण कम होता है, इसलिए उसका
आबंध कोण
107° होता है।

प्रश्न

निम्नलिखित अणुओं की आकृति की व्याख्या वी.एस.ई.पी.आर. सिद्धान्त के अनुसार कीजिए :
ClF3, BrF5 और IF7

हल
ClF3 अणु की आकृति

केंद्रीय परमाणु
Cl के
संयोजी कोश में
इलेक्ट्रॉन युग्मों की कुल संख्या


= (बाह्यतम कोश में e− की संख्या + केंद्रीय परमाणु से जुड़े परमाणुओं की संख्या) / 2

= (7 + 3) / 2 = 10 / 2 = 5

अतः

  • बंधित युग्म (bp) की संख्या = 3
  • एकाकी युग्म (lp) की संख्या = 5 − 3 = 2
  • अणु का प्रकार = AB3E2
  • अणु की आकृति = T-आकृति

ClF3 molecule shape

BrF5 अणु की आकृति

केंद्रीय परमाणु
Br के
संयोजी कोश में
इलेक्ट्रॉन युग्मों की कुल संख्या


= (बाह्यतम कोश में e− की संख्या + केंद्रीय परमाणु से जुड़े परमाणुओं की संख्या) / 2

= (7 + 5) / 2 = 12 / 2 = 6

अतः

  • बंधित युग्म (bp) की संख्या = 5
  • एकाकी युग्म (lp) की संख्या = 6 − 5 = 1
  • अणु का प्रकार = AB5E
  • अणु की आकृति = वर्गाकार पिरैमिडीय

BrF5 molecule shape

IF7 अणु की आकृति

केंद्रीय परमाणु
I के
संयोजी कोश में
इलेक्ट्रॉन युग्मों की कुल संख्या


= (बाह्यतम कोश में e− की संख्या + केंद्रीय परमाणु से जुड़े परमाणुओं की संख्या) / 2

= (7 + 7) / 2 = 14 / 2 = 7

अतः

  • बंधित युग्म (bp) की संख्या = 7
  • एकाकी युग्म (lp) की संख्या = 7 − 7 = 0
  • अणु का प्रकार = AB7
  • अणु की आकृति = पंचभुजी द्विपिरैमिडीय

IF7 molecule shape

संयोजकता बंध सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के अनुसार
किसी अणु की जितनी
संयोजकता होती है,
उतने ही बंध बन सकते हैं।

उदाहरण —
हाइड्रोजन के परमाणु
A व B लिए गये हैं।
जब दो हाइड्रोजन परमाणु
एक-दूसरे के पास आते हैं, तब
रासायनिक बंध बनता है।
प्रत्येक परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन होता है,
तथा उसके दो अंश होते हैं।

जैसे-जैसे दोनों परमाणु
एक-दूसरे के पास आते जाते हैं,
उनके बीच आकर्षण तथा
प्रतिकर्षण बल उत्पन्न होते जाते हैं।

  1. एक परमाणु के
    नाभिक तथा उसके
    इलेक्ट्रॉनों के बीच बल
    NA − eA,
    तथा NB − eB
  2. एक परमाणु के
    नाभिक तथा दूसरे परमाणु के
    इलेक्ट्रॉनों के बीच बल
    NA − eB तथा
    NB − eA

    आकर्षण बल
    दोनों परमाणुओं को एक-दूसरे के पास लाते हैं।

प्रतिकर्षण बल निम्नलिखित में उत्पन्न होते हैं –

  1. दोनों परमाणुओं के
    इलेक्ट्रॉनों के बीच
    eA − eB
  2. दोनों परमाणुओं के
    नाभिकों के बीच
    NA − NB

आकर्षण बल
प्रतिकर्षण बल से अधिक होने पर
परमाणु आपस में जुड़ जाते हैं।

अतः आकर्षण बल
दोनों परमाणुओं को एक-दूसरे के पास लाते हैं तथा
उनकी स्थितिज ऊर्जा
कम हो जाती है।

परन्तु जब दोनों की स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम हो जाती है,
तब प्रतिबलन या
प्रतिकर्षण बल बढ़ने लगते हैं,
जिससे वे और अधिक पास नहीं आ पाते।

इस अवस्था में हाइड्रोजन के परमाणु
बंधित कण बनाते हैं और
एक स्थायी अणु बनता है,
जिसकी आबंध लंबाई
74 pm होती है तथा
इस प्रक्रिया में ऊर्जा मुक्त होती है।

अंतिम निष्कर्ष :
जब दो H परमाणु पास आते हैं तो
आकर्षण और
प्रतिकर्षण दोनों बल कार्य करते हैं।

न्यूनतम स्थितिज ऊर्जा पर
H2 अणु बनता है,
जिसकी आबंध लंबाई 74 pm होती है।

परमाणु कक्षकों का अतिव्यापन

जो दो या
दो से अधिक
परमाणु कक्षक आपस में
अपनी ऊर्जाओं का
पुनर्वितरण कर
अणु कक्षक बनाते हैं।
इस प्रक्रिया को
अतिव्यापन कहते हैं।

परमाणु कक्षक + परमाणु कक्षक = अणु कक्षक

प्रकार —

  1. समाक्षीय अतिव्यापन
  2. समपार्श्विक अतिव्यापन
(1.) समाक्षीय अतिव्यापन

जब दो या
दो से अधिक
लगभग समान आकृति तथा
लगभग समान ऊर्जा वाले
कक्षक
एक ही अक्ष पर अतिव्यापन करते हैं,
तो इसे समाक्षीय अतिव्यापन कहते हैं।

समाक्षीय अतिव्यापन से बनने वाले बन्ध को सिग्मा (σ) कहते हैं

तीन प्रकार —

  1. s − s अतिव्यापन
  2. s − p अतिव्यापन
  3. p − p अतिव्यापन

(a.) s − s अतिव्यापन —
इस प्रकार के अतिव्यापन में
दो
अर्ध-भरे s-कक्षक
अंतर्नाभिकीय अक्ष पर
अतिव्यापन करते हैं।

s-s overlapping

उदाहरण — H2 अणु

(b.) s − p अतिव्यापन —
इस प्रकार के अतिव्यापन में
एक परमाणु के
अर्ध-भरे s-कक्षक तथा
दूसरे परमाणु के
अर्ध-भरे p-कक्षक
अंतर्नाभिकीय अक्ष पर
अतिव्यापन करते हैं।

s-p overlapping

उदाहरण — HCl अणु

(c.) p − p अतिव्यापन —
इस प्रकार के अतिव्यापन में
दो
अर्ध-भरे p-कक्षक
अंतर्नाभिकीय अक्ष पर
अतिव्यापन करते हैं।

p-p overlapping sigma bond

(2.) समपार्श्विक अतिव्यापन

जब दो या
दो से अधिक
लगभग समान आकृति तथा
लगभग समान ऊर्जा वाले
कक्षक
पार्श्व से अतिव्यापन कर
अणु कक्षक बनाते हैं,
तो इसे समपार्श्विक अतिव्यापन कहते हैं।

जैसे कि Cl2 अणु

p − p अतिव्यापन —
समपार्श्विक अतिव्यापन से बनने वाले बन्ध को
पाई (π) कहते हैं।

p-p lateral overlapping pi bond

Note — सिग्मा बन्ध (σ) पाई बन्ध (π) से अधिक प्रबल होता है

क्योंकि सिग्मा बन्ध में
कक्षकों का अतिव्यापन,
पाई बन्ध के अतिव्यापन से
अधिक होता है।

संकरण

  • लगभग समान ऊर्जा वाले
    कक्षकों के
    आपस में मिश्रित होकर
    ऊर्जा के पुनर्वितरण द्वारा
    समान ऊर्जा तथा आकार वाले
    कक्षकों को बनाने की प्रक्रिया को
    संकरण कहते हैं।
  • संकरण में
    रिक्त,
    अर्धभरे तथा
    पूर्ण भरे
    कक्षकों भाग लेते हैं।

संकरण के
प्रकार —

  1. sp संकरण
  2. sp2 संकरण
  3. sp3 संकरण
(i) sp संकरण

एक s तथा एक
p कक्षक संकरित होकर
दो समान sp संकर कक्षकों
का निर्माण करते हैं।

ज्यामिति —
रैखिक

उदाहरण —
BeCl2 में
Be का संकरण

निम्न अवस्था में
  
Be = 1s2 2s2 2p0

उत्तेजित अवस्था में
  
Be = 1s2 2s1 2p1

एक 2s कक्षक तथा एक
2p कक्षक संकरित होकर
दो sp संकर कक्षक बनाते हैं।
ये 180° का कोण बनाते हैं।
प्रत्येक sp संकर कक्षक
क्लोरीन के 2p कक्षक के
अर्धभरे ऑर्बिटल द्वारा
Be − Cl सिग्मा आबन्ध बनाते हैं।

ज्यामिति : रैखिक
Cl − Be − Cl = 180°

(ii) sp2 संकरण

एक s कक्षक तथा दो
p कक्षक संकरित होकर
तीन समान sp2 संकर कक्षकों
का निर्माण करते हैं।

उदाहरण —
BCl3

BCl3 में
B का संकरण —

निम्न अवस्था में
  
B = 1s2 2s2 2p1

उत्तेजित अवस्था में
  
B = 1s2 2s1 2p2

तीन संकर कक्षक
त्रिकोणीय समतली
व्यवस्था में होते हैं
तथा ये तीन क्लोरीन परमाणुओं के
2p कक्षकों से
अतिव्यापन द्वारा
तीन B − Cl आबन्ध बनाते हैं।

ज्यामिति : त्रिकोणीय समतली
Cl − B − Cl = 120°

(iii) sp3 संकरण

एक s कक्षक तथा
p कक्षकों के संकरण से
चार समान sp3 संकर कक्षक
बनते हैं।

NH3 में संकरण

NH3 के अणु में
नाइट्रोजन परमाणु के
एक 2s तथा तीन
2p कक्षक
संकरण द्वारा चार sp3 संकरित कक्षक
बनाते हैं।

इनमें से एक संकर कक्षक में
एक e− युग्म होता है।

7N
(मूल अवस्था)

2s     2p

↑↓
   
↑   ↑   ↑

संकरण
  ⟶  
sp3

↑↓   ↑   ↑   ↑

चार sp3 संकर कक्षक

H    H    H

1s1

NH3 में
e− युग्म का प्रतिकर्षण,
बंधी e− युग्म से अधिक होने के कारण
NH3 के अणु में
आबंध कोण
109.5° से घटकर 107° हो जाता है।
तथा ज्यामिति विकृत होकर पिरामिडी हो जाती है।

H2O में संकरण

जल के अणु में
ऑक्सीजन परमाणु के
एक 2s तथा तीन
2p कक्षक
संकरण द्वारा चार sp3 संकरित कक्षक
बनाते हैं।
इनमें से दो संकर कक्षकों में
एक-एक e− युग्म होता है।

8O

2s     2p

↑↓
   
↑↓   ↑   ↑

संकरण
  ⟶  
sp3

↑↓   ↑↓   ↑   ↑

चार sp3 संकर कक्षक

H    H

1s1

ये चार sp3 संकर कक्षक
चतुष्फलकीय ज्यामिति बनाते हैं,
परन्तु e− युग्मों के कारण
बंध कोण
109.5° से घटकर 104.5° हो जाता है
तथा अणु V-आकृति अथवा
कोणीय हो जाता है।

अंतिम निष्कर्ष :
NH3 में sp3 संकरण,
1 lone pair, आबंध कोण = 107°,
आकृति = त्रिकोणीय पिरामिडी

H2O में sp3 संकरण,
2 lone pair, आबंध कोण = 104.5°,
आकृति = V-आकृति / कोणीय

d-कक्षकों वाले तत्वों में संकरण

(i) PCl5 का बनना (sp3d संकरण)

निम्न अवस्था में —
P = 3s2 3p3 3d0

उत्तेजित अवस्था में —
3s1 3p3 3d1

PCl5 sp3d hybridization diagram

ज्यामिति — द्वि-पिरामिडीय
  • PCl5 में
    फॉस्फोरस के पाँच
    sp3d संकर कक्षक
    क्लोरीन से अतिव्यापन कर
    पाँच P — Cl सिग्मा-आबन्ध बनाते हैं।
  • इनमें से तीन P — Cl आबन्ध
    एक तल में होते हैं तथा
    परस्पर 120° का कोण बनाते हैं।
    इन्हें विषुवतीय आबन्ध कहते हैं।
  • अन्य दो P — Cl आबन्ध
    उसी तल के विपरीत दिशा में
    ऊपर और नीचे होते हैं तथा तल से
    90° का कोण बनाते हैं।
    इन्हें अक्षीय आबन्ध कहते हैं।
  • अक्षीय आबन्ध इलेक्ट्रॉन युग्मों के
    विकर्षण प्रभावों के
    योगात्मक प्रभाव के कारण
    विषुवतीय बन्ध की तुलना में
    अधिक लंबे होते हैं।
    इसके परिणामस्वरूप
    PCl5
    अत्यधिक क्रियाशील होता है।

PCl5 trigonal bipyramidal geometry

(ii) SF6 का बनना (sp3d2 संकरण)

निम्न अवस्था में —
S = 3s2 3p4 3d0

उत्तेजित अवस्था में —
S = 3s1 3p3 3d2

SF6 sp3d2 hybridization diagram

ज्यामिति — अष्टफलकिय
  • SF6 में
    सल्फर के
    छह sp3d2 संकर कक्षक
    बनते हैं।
  • ये सभी संकर कक्षक
    फ्लोरीन के
    अर्ध-भरे कक्षकों से
    अतिव्यापन करके
    छह S — F सिग्मा आबन्ध बनाते हैं।
  • इन छहों बन्धों की व्यवस्था
    अष्टफलकिय (Octahedral) होती है।
  • इसमें सभी S — F बन्ध
    समतुल्य होते हैं और
    बन्ध-कोण 90° तथा
    180° होता है।
  • चूँकि केंद्रीय S परमाणु पर
    कोई एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म नहीं होता,
    इसलिए SF6 का अणु
    पूर्णतः सममित होता है।

SF6 octahedral geometry

आण्विक कक्षक सिद्धान्त MOT (Molecular Orbital Theory)

  • परमाणु कक्षक आपस में
    अतिव्यापन कर
    अणु कक्षक बनाते हैं।
    इस प्रक्रिया में परमाणु कक्षक अपनी
    पहचान खो देते हैं।
  • दो परमाणु कक्षकों के संयोग से
    दो अणु कक्षक बनते हैं।
    जिनमें अधिक ऊर्जा वाला अणु कक्षक
    ABMO तथा
    कम ऊर्जा वाला अणु कक्षक
    BMO कहलाता है।
  • सभी अणु कक्षकों (BMO) की ऊर्जा
    उन दोनों से बने हुए परमाणु कक्षकों से
    अधिक स्थायी होती है,
    जबकि प्रतिबन्धी अणु कक्षक (ABMO)
    की ऊर्जा अधिक होती है।
  • जब दो e− समान प्रचक्र
    के कारण किसी बन्ध में जुड़ते हैं, तब
    निम्नतम ऊर्जा स्तर की प्राप्ति होती है।
  • यदि अणु कक्षकों में
    अयुग्मित e− उपस्थित होते हैं,
    तो अणु की प्रकृति अनुचुम्बकीय होगी।
    लेकिन अणु कक्षकों में युग्मित e−
    उपस्थित होने पर पदार्थ की प्रकृति
    प्रतिचुम्बकीय होगी।

NBMO > NABMO = अणु स्थायी

NBMO < NABMO
या
NBMO = NABMO = अणु अस्थायी

जहाँ

NBMO =
बन्धी अणु कक्षक में
e− की संख्या

NABMO =
प्रतिबन्धी अणु कक्षक में
e− की संख्या

1s
        
σ* 1s
        
1s

  
  

╲
     
╱

╱
     
╲

σ 1s

  
  

परमाणु कक्षक
    
अणु कक्षक
    
परमाणु कक्षक

आबंध कोटि (Bond Order) :
B.O = 1/2 (Nb − Na)

Nb =
आबंधक कक्षकों में उपस्थित
इलेक्ट्रॉनों की संख्या

Na =
प्रतिआबंधक कक्षकों में संख्या

चुम्बकीय प्रकृति

प्रतिचुम्बकीय —

  • यदि किसी अणु के सभी
    आण्विक कक्षकों में
    युग्मित e− हों,
    तो पदार्थ प्रतिचुम्बकीय (Diamagnetic)
    होता है।
  • ऐसे अणु चुम्बकीय क्षेत्र से
    प्रतिकर्षित होते हैं।

अनुचुम्बकीय —

  • यदि किसी अणु के एक या अधिक
    आण्विक कक्षकों में
    अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हों,
    तो वह अणु अनुचुम्बकीय होता है।
  • ऐसे अणु चुम्बकीय क्षेत्र से
    आकर्षित होते हैं।

1. हाइड्रोजन अणु (H2)

  • हाइड्रोजन के
    दो परमाणुओं से
    H2 अणु बनता है।
    प्रत्येक हाइड्रोजन में
    1s कक्षक में
    एक इलेक्ट्रॉन होता है।
  • अतः हाइड्रोजन के
    अणु में
    कुल दो इलेक्ट्रॉन होंगे,
    जो σ1s आबन्धिक कक्षक में
    उपस्थित होंगे।

Hydrogen molecule molecular orbital diagram

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास —
H2 = (σ1s)2


B.O =
1/2
(Nb − Na)

  या  

B.O =
1/2
(2 − 0) = 1

(H — H) एकल बन्ध

चुम्बकीय प्रकृति —
हाइड्रोजन अणु में
कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है,
इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय है।

2. हीलियम अणु (He2)

  • हीलियम परमाणु का
    इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
    1s2 है।
    प्रत्येक हीलियम परमाणु में
    दो इलेक्ट्रॉन होते हैं,
    अर्थात He2 अणु में
    4 इलेक्ट्रॉन होंगे।
  • ये इलेक्ट्रॉन σ1s तथा
    σ*1s
    आण्विक कक्षकों में भरे जाएंगे।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास —
He2 = (σ1s)2 (σ*1s)2

He2 molecular orbital diagram

B.O = 1/2 (2 − 2) = 0

He2 के लिए
आबन्ध कोटि शून्य है।
अतः यह अस्थायी होगा तथा
इसका अस्तित्व नहीं होगा।

3. लिथियम अणु (Li2)

  • लिथियम का
    इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
    1s2 2s1 है।
    प्रत्येक लिथियम परमाणु में
    3 इलेक्ट्रॉन होते हैं,
    अर्थात Li2 अणु में
    कुल 6 इलेक्ट्रॉन होंगे।

Li2 molecular orbital diagram

इनमें चार इलेक्ट्रॉन
आबन्धी आण्विक कक्षक में जाते हैं तथा
दो इलेक्ट्रॉन
प्रतिआबन्धी आण्विक कक्षक में उपस्थित हैं।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास —
Li2 = (σ1s)2 (σ*1s)2 (σ2s)2

B.O = 1/2 (4 − 2) = 1
 ⇒  एकल बन्ध

चुम्बकीय प्रकृति —
लिथियम अणु में
कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है,
इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय है।

4. कार्बन अणु (C2)

कार्बन का
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
1s2 2s2 2p2 है।
अतः C2 के अणु में
कुल 12 इलेक्ट्रॉन होंगे।

C2 molecular orbital diagram

C2 अणु का
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास —


C2 =
(σ1s)2(σ*1s)2
(σ2s)2(σ*2s)2
(π2px2 = π2py2)

अथवा

KK(σ2s)2(σ*2s)2
(π2px2 = π2py2)


B.O = 1/2 (8 − 4) = 2

  
द्वि-बन्ध
 
(C = C)

Note:
दोनों आबन्ध
π-आबन्ध होते हैं,
क्योंकि दो π (π2px = π2py)
आबन्धी आण्विक कक्षकों में
चार इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं।

चुम्बकीय प्रकृति —
C2 अणु में
कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है,
इसलिए यह प्रतिचुम्बकीय है।

5. ऑक्सीजन अणु (O2)

ऑक्सीजन परमाणु का
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
1s2 2s2 2p4 है।
चूँकि प्रत्येक ऑक्सीजन परमाणु में
8 e− होते हैं,
अतः ऑक्सीजन अणु में
कुल 16 e− इलेक्ट्रॉन होंगे।

O2 molecular orbital diagram

O2 अणु का
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास


O2 =
(σ1s)2(σ*1s)2
(σ2s)2(σ*2s)2
(σ2pz)2
(π2px2 = π2py2)
(π*2px1 = π*2py1)


B.O = 1/2 (10 − 6) = 2

  
द्वि-बन्ध
 
(O = O)

चुम्बकीय प्रकृति —
ऑक्सीजन अणु के
π*2px तथा
π*2py
आण्विक कक्षकों में
एक-एक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन
उपस्थित होने के कारण
यह अनुचुम्बकीय होता है।

प्रश्न —
निम्नलिखित स्पीशीज की
आपेक्षिक स्थायित्व की तुलना कीजिए तथा
उनके चुम्बकीय गुण ज्ञात कीजिए —
O2,
O2+,
O2−
(सुपर ऑक्साइड),
O22−
(पेरॉक्साइड)

हल —

दी गई स्पीशीज की
आबंध कोटि इस प्रकार है —
O2 (2.0),
O2+ (2.5),
O2− (1.5),
O22− (1.0)

इनका स्थायित्व क्रम इस प्रकार होगा —

O2+ (2.5) > O2 (2.0) > O2− (1.5) > O22− (1.0)

इनके चुम्बकीय गुण इस प्रकार हैं —

  1. O2
    अनुचुम्बकीय है।
  2. O2+
    अनुचुम्बकीय है।
  3. O2−
    अनुचुम्बकीय है।
  4. O22−
    प्रतिचुम्बकीय है।

अंतिम उत्तर :
स्थायित्व क्रम :
O2+ > O2 > O2− > O22−

चुम्बकीय गुण :
O2 = अनुचुम्बकीय
O2+ = अनुचुम्बकीय
O2− = अनुचुम्बकीय
O22− = प्रतिचुम्बकीय

हाइड्रोजन बंध
(Hydrogen Bonding)

  • जब आंशिक धनावेशित हाइड्रोजन परमाणु
    किसी विद्युतऋणी परमाणु
    (F, O, N) के साथ
    बंध बनाता है,
    तो इस बंध को हाइड्रोजन बंध कहते हैं।
  • उदाहरण :
    HF में
    हाइड्रोजन बंध
हाइड्रोजन बंध के प्रकार

(i) अंतर-आणुक हाइड्रोजन आबंध

(ii) अंतर-अणुक हाइड्रोजन आबंध

(i) अंतर-आणुक हाइड्रोजन आबंध

जब H-बंध समान अथवा
भिन्न यौगिकों के
दो अलग-अलग अणुओं के बीच बनते हैं,
तो इसे अंतर-आणुक हाइड्रोजन आबंध कहते हैं।

उदाहरण :
HF अणु एक-दूसरे के अणुओं के बीच
हाइड्रोजन बंध बनाते हैं।

(ii) अंतर-अणुक हाइड्रोजन आबंध

जब हाइड्रोजन बंध
एक ही अणु में उपस्थित
हाइड्रोजन परमाणु तथा
अधिक विद्युतऋणी परमाणु
(F, O, N) के बीच बनता है,
तो इसे अंतर-अणुक हाइड्रोजन आबंध कहते हैं।

उदाहरण :
o-नाइट्रो फिनोल में
हाइड्रोजन और
ऑक्सीजन के मध्य बनने वाला
हाइड्रोजन आबंध

प्रश्न —
आयनिक बंध कुछ
सहसंयोजक लक्षण प्राप्त कर लेता है।
स्पष्टाइए?

हल —

आयनिक बंध में
धनायन द्वारा
ऋणायन के
e− मेघ को अपनी ओर
आकर्षित करने की प्रवृत्ति होती है,
जिससे ऋणायन का e− मेघ
विकृत हो जाता है।

सामान्यतः ऋणायन का
e− मेघ
धनायन की ओर खिंच जाता है,
जिससे वे विकृत आयन प्राप्त हो जाते हैं।
इनके आवेशों में वृद्धि हो जाती है।
अतः आयनिक बंध में
सहसंयोजक लक्षण प्राप्त कर लेता है।

आयनिक आबंधों के आंशिक सहसंयोजी लक्षण की
विवेचना फाजान के नियमों के द्वारा की जाती है।

फाजान के नियम
  • धनायन का आकार
    ∝ 1 / ध्रुवण क्षमता
    ∝ सहसंयोजक लक्षण
  • ऋणायन का आकार
    ∝ ध्रुवणता
    ∝ सहसंयोजक लक्षण
  • आयन पर आवेश
    ∝ सहसंयोजक लक्षण

प्रश्न —
निम्न यौगिकों में से
कौन-सा यौगिक अधिक सहसंयोजक है,
और क्यों?

  1. CuO या CuS
  2. AgCl या AgI
  3. PbCl2 या PbCl4
  4. BeCl2 या MgCl2

हल —

(i)
CuO या
CuS में
CuS अधिक सहसंयोजक है क्योंकि
S2− आयन
अपने बड़े आकार के कारण
O2− की अपेक्षा
अधिक ध्रुवित हो जाता है।

(ii)
AgCl या
AgI में
AgI अधिक सहसंयोजक है क्योंकि
I− आयन
अपने बड़े आकार के कारण
Cl− की अपेक्षा
अधिक ध्रुवित हो जाता है।

(iii)
PbCl2 या
PbCl4 में
PbCl4 अधिक सहसंयोजक है क्योंकि
Pb4+ आयन
अपने उच्च आवेश व
अधिक घनत्व के कारण
Pb2+ की अपेक्षा
अधिक ध्रुवित करता है।

(iv)
BeCl2 या
MgCl2 में
BeCl2 अधिक सहसंयोजक है क्योंकि
Be2+ आयन
अपने छोटे आकार के कारण
Mg2+ की अपेक्षा
अधिक ध्रुवित करता है।

प्रश्न —
सहसंयोजी लक्षण का
बढ़ता क्रम है —

  1. LiCl < NaCl < BeCl2
  2. BeCl2 < NaCl < LiCl
  3. NaCl < LiCl < BeCl2
  4. BeCl2 < LiCl < NaCl

सही उत्तर :
(iii) NaCl < LiCl < BeCl2


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