Class 11 Chemistry Chapter 5 Notes – Thermodynamics (ऊष्मागतिकी) (Hindi Medium)

उष्मागतिकी

“उष्मा के प्रवाह का अध्ययन”
विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत
ऊर्जाओं के अन्तःपरिवर्तन व
रूपान्तरण का अध्ययन किया जाता है।
इसे उष्मागतिकी कहलाता है।

(i) निकाय (System) —
ब्रह्माण्ड का वह भाग जिसे
उष्मागतिकी अध्ययन के लिए चुना जाता है,
निकाय कहलाता है।
अर्थात् जिस पर ताप, दाब व अन्य कारकों का अध्ययन किया जाता है।

(ii) परिवेश (Surroundings) —
निकाय के अलावा
शेष भाग परिवेश कहलाता है।

निकाय + परिवेश = ब्रह्माण्ड

निकाय के प्रकार
  1. खुला निकाय (Open System)
  2. बन्द निकाय (Closed System)
  3. विलगित निकाय (Isolated System)

(a) खुला निकाय —
वह निकाय जिसमें
परिवेश से
ऊर्जा व
द्रव्य
अथवा पदार्थ दोनों का
आदान-प्रदान किया जाता है,
खुला निकाय कहलाता है।
उदाहरण —
खुले पात्र में रखा गर्म पानी

(b) बन्द निकाय —
वह निकाय जिसमें
परिवेश से केवल
ऊर्जा का
आदान-प्रदान होता है,
लेकिन द्रव्य का
आदान-प्रदान नहीं किया जाता है,
बन्द निकाय कहलाता है।
उदाहरण —
बन्द पात्र में रखा गर्म पानी

(c) विलगित निकाय —
वह निकाय जिसमें
परिवेश से
ऊर्जा व
द्रव्य दोनों का
आदान-प्रदान नहीं किया जाता है,
विलगित निकाय कहलाता है।
उदाहरण —
थर्मस में रखा गर्म दूध

अंतिम सार :
खुला निकाय → ऊर्जा + द्रव्य दोनों का आदान-प्रदान
बन्द निकाय → केवल ऊर्जा का आदान-प्रदान
विलगित निकाय → न ऊर्जा, न द्रव्य का आदान-प्रदान

अवस्था परिवर्ती (State variable) या अवस्था फलन (State function)

वह गुण जिसका मान
निकाय की
अवस्था पर निर्भर करता है,
न कि उसको प्राप्त करने के
तरीके पर,
अवस्था परिवर्ती या
अवस्था फलन कहलाता है।

उष्मागतिकी प्रक्रम

वे प्रक्रम जो
निकाय व
परिवेश के मध्य
ऊर्जाओं के अन्तःपरिवर्तन व
स्थानान्तरण के कारण पूर्ण होते हैं,
उष्मागतिकी प्रक्रम कहलाते हैं।

  1. समतापी प्रक्रम
  2. समदाबी प्रक्रम
  3. समआयतनी प्रक्रम
  4. ऊष्मीय प्रक्रम

    • उष्माक्षेपी प्रक्रम
    • उष्माशोषी प्रक्रम
  5. चक्रीय प्रक्रम
  6. उत्क्रमणीय प्रक्रम
  7. अनुत्क्रमणीय प्रक्रम
(a) समतापी प्रक्रम

वह प्रक्रम जिसमें प्रत्येक पद पर
निकाय का
ताप स्थिर रहता है,
समतापी प्रक्रम कहलाता है।
इस प्रक्रम में तंत्र निकाय व परिवेश के मध्य
ऊष्माओं का आदान-प्रदान
निकाय का ताप स्थिर करने के लिए किया जाता है।

जैसे —
उष्माक्षेपी प्रक्रम —
निकाय से परिवेश की ओर
उष्मा का स्थानान्तरण

उष्माशोषी प्रक्रम —
परिवेश से निकाय की ओर
उष्मा का स्थानान्तरण

समतापी प्रक्रम में (ΔT = 0)

(b) समदाबी प्रक्रम

वह प्रक्रम जिसमें
प्रत्येक पद पर
सम्पूर्ण निकाय का
दाब स्थिर
(ΔP = 0) रहता है,
समदाबी प्रक्रम कहलाता है।

(c) समआयतनी प्रक्रम

वह प्रक्रम जिसमें
प्रत्येक पद पर
निकाय का
आयतन नियत रहता है,
समआयतनी प्रक्रम कहलाता है।
(ΔV = 0)

(d) ऊष्मीय प्रक्रम

वह प्रक्रम जिसमें
विभिन्न पदों पर
एक निकाय व परिवेश के मध्य
उष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता है,
ऊष्मीय प्रक्रम कहलाता है।

इस प्रक्रम में ताप परिवर्तित होगा।

उष्माक्षेपी प्रक्रम —
तंत्र या निकाय के ताप में वृद्धि

उष्माशोषी प्रक्रम —
निकाय के ताप में कमी

(e) चक्रीय प्रक्रम

वह प्रक्रम जिसमें
निकाय विभिन्न प्रावस्थाओं से गुजरकर
पुनः अपनी प्रारम्भिक अवस्था में आ जाता है,
चक्रीय प्रक्रम कहलाता है।

(f) उत्क्रमणीय प्रक्रम

वह प्रक्रम जो दोनों दिशाओं में
बहुत धीरे-धीरे तथा
कभी पूर्ण नहीं होता है,
उत्क्रमणीय प्रक्रम कहलाता है।
इस आदर्श प्रक्रम में
अनन्तवर्ती होते हैं तथा
निकाय द्वारा अधिकतम कार्य
उत्क्रमणीय प्रक्रम द्वारा ही प्राप्त किया जाता है।

उदाहरण —

  • पतली नली में जल के प्रवाह की दिशा स्थिर से उच्च दाब की ओर
  • गेंद का बहुत बल लगाकर भिन्न से उच्च दाब कोष्ठक
  • स्प्रिंग को फैलाने में
(g) अनुत्क्रमणीय प्रक्रम

वह प्रक्रम जो
एक दिशा में चलकर पूर्ण हो जाता है,
अनुत्क्रमणीय प्रक्रम कहलाता है।
ये वास्तविक व अस्थायी प्रक्रम होते हैं तथा
निकाय का प्रक्रम द्वारा
अधिकतम कार्य प्राप्त नहीं होता है।

सामान्यतः अनुत्क्रमणीय प्रक्रम से
कम कार्य होता है।

उदाहरण —

  • जल का प्रवाह उच्च दाब से निम्न दाब की ओर
  • वस्तु का प्रवाह उच्च ताप से निम्न ताप की ओर
  • गैसों का विसरण उच्च दाब से निम्न दाब की ओर

अंतिम सार :
समतापी → ΔT = 0
समदाबी → ΔP = 0
समआयतनी → ΔV = 0
चक्रीय → अंतिम अवस्था = प्रारम्भिक अवस्था
उत्क्रमणीय → धीमा, आदर्श, अधिकतम कार्य
अनुत्क्रमणीय → एक दिशा में, वास्तविक, कम कार्य

आंतरिक ऊर्जा : एक अवस्था-फलन

“प्रत्येक तंत्र के अंदर ऊर्जा की कुछ निश्चित मात्रा होती है जिसे आंतरिक ऊर्जा कहते हैं।”

  • यह उस पर्यावरण पर या
    बाह्य वस्तु से
    सम्बन्धित नहीं होती है।
    इस समग्र ऊर्जा को
    ऊष्मागतिकी में
    आंतरिक ऊर्जा
    U कहते हैं।
  • इस आंतरिक ऊर्जा (U) को
    निम्न प्रकार से परिवर्तित किया जा सकता है —

    • ऊष्मा का निकाय में प्रवेश या निकास द्वारा
    • निकाय पर या निकाय के द्वारा कार्य करके
    • निकाय के आयतन का घटना या बढ़ना
कार्य
  • निकाय पर कार्य करके
    उसकी आंतरिक ऊर्जा में
    परिवर्तन करते हैं।
  • माना कि किसी निकाय की प्रारम्भिक अवस्था
    A है
    तथा इसका ताप
    TA
    तथा आंतरिक ऊर्जा
    UA है।
  • माना कि छोटे पिस्टन से उस पर
    1 kJ कार्य करते हैं,
    जिससे निकाय की नई अवस्था
    B बनती है
    एवं उसका ताप
    TB हो जाता है।
    देखा गया कि
    TB > TA
    अतः ताप में परिवर्तन
    ΔT = TB − TA है।
  • माना अवस्था B में
    आंतरिक ऊर्जा UB है,
    तो आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन
    ΔU = UB − UA
  • चूँकि पहले से ज्ञात था कि कार्य
    Wad के कारण
    ऊष्मागतिकी में U परिवर्तक के बराबर
    आंतरिक ΔU = U2 − U1 = Wad है।

अतः निकाय की आंतरिक ऊर्जा
एक अवस्था-फलन है।

ΔU = +ve होता कार्य (Wad) निकाय पर किया गया हो
ΔU = −ve होता कार्य (Wad) निकाय द्वारा किया गया हो

कार्य की इकाई (Unit of work)
  • CGS unit = erg
  • SI unit = Joule (J)
ऊष्मा (q)
  • इस तंत्र या पर्यावरण से कोई वस्तु केवल या पर्यावरण को
    ऊष्मा देकर
    एक निकाय की आंतरिक ऊर्जा में
    परिवर्तन कर सकते हैं।
  • यह ऊर्जा-विनिमय,
    जो तापान्तर का परिणाम है,
    ऊष्मा (q) कहलाता है।
  • इसके लिए हम ऊष्माक्षेपी निकाय में रखे पानी की एक पात्र
    (जिसकी दीवारें ऊष्मा की कुचालक हैं) में
    TA ताप पर जल लिया गया हो,
    इसे एक बंद पात्र, नियंत्रित ताप
    TB में रखते हैं।
  • निकाय (जल) द्वारा पर्यावरण को ऊष्मा का तापान्तर
    TB − TA द्वारा मापा जा सकता है।
  • यहाँ पर भी आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन
    ΔU = q है,
    क्योंकि स्थिर आयतन पर कोई कार्य नहीं किया गया है।

q = +ve होगा यदि निकाय में पर्यावरण से ऊष्मा का स्थानांतरण होता है।
q = −ve होगा यदि निकाय से पर्यावरण में ऊष्मा का स्थानांतरण होता है।

कार्य तथा ऊष्मा के सामान्य स्थिति — ΔU = q + w
विलगित निकाय के लिए: w = 0, q = 0, ΔU = 0

ऊष्मा की इकाई (Unit of Heat)
  • CGS unit = Calorie (Cal.)
  • SI unit = Joule (J)

याद रखें —

(1) 1 कैलोरी = 4.18 J ≈ 4.2 J

(2) 1 L atm = 101.3 ≈ 100 J = 24.2 ≈ 24 Cal

प्रश्न :
एक निकाय की
आंतरिक ऊर्जा में
परिवर्तन बताइए, यदि –

(i)
निकाय द्वारा
परिवेश से
ऊष्मा अवशोषित नहीं हो,
परंतु निकाय पर
(w) कार्य किया जाए।
निकाय की दशाएँ किस प्रकार की होंगी?

(ii)
निकाय पर कोई
कार्य नहीं किया जाए,
परंतु ऊष्मा की मात्रा
q निकाय से
परिवेश को दे दी जाए।
निकाय की दशाएँ किस प्रकार की होंगी?

(iii)
निकाय द्वारा
w मात्रा का
कार्य किया जाए
एवं q मात्रा की
ऊष्मा निकाय को दी जाए।
यह किस प्रकार का निकाय होगा?

हल

(i) ΔU = w
द्वारे हुए,
बंद निकाय होगा।

(ii) ΔU = − q,
द्वारे उष्मा सुचालक होगी।

(iii) ΔU = q − w
यह बंद निकाय है।

प्रश्न :
एक प्रक्रम में
निकाय द्वारा
701 J ऊष्मा
अवशोषित होती है एवं
394 J कार्य किया जाता है।
इस प्रक्रम में
आंतरिक ऊर्जा में
कितना परिवर्तन होगा?

हल

दिया है,
q = +701 J,
w = −394 J,
ΔU = ?

ऊष्मागतिकी के
प्रथम नियम अनुसार

ΔU = q + w = +701 J + (−394 J) = +307 J

अतः निकाय की
आंतरिक ऊर्जा
307 J बढ़ती है।

प्रश्न :
यदि किसी निकाय को
40 J ऊष्मा दी जाए
एवं उस पर निकाय द्वारा
8 J कार्य किया गया।
निकाय की आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि
ज्ञात कीजिए।

हल :
आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि =
दी गयी ऊष्मा −
किया गया कार्य

ΔU = q − w

ΔU = 40 − 8 = 32 J

दाब-आयतन कार्य

  • माना एक घर्षणरहित पिस्टन युक्त
    सिलेंडर है जिसमें एक मोल
    आदर्श गैस भरी हुई है।
    गैस का कुल आयतन Vi
    (प्रारम्भिक आयतन)
    एवं सिलेंडर में गैस का दाब P है।
  • यदि बाह्य दाब Pex,
    जो P से अधिक हो, तो पिस्टन अन्दर की ओर तब तक गति करेगा,
    जब तक कि आन्तरिक दाब
    Pex के बराबर न हो जाए।
    इस स्थिति में गैस का आयतन Vf हो जाएगा।

मान कि इस संपीडन में
पिस्टन l दूरी तक हटा है एवं पिस्टन का
अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A है।

आयतन में परिवर्तन = l × A = ΔV = (Vf − Vi)
 →  (i)

हम जानते हैं कि
P = F/A या F = P.A

यदि पिस्टन चलाने से
निकाय पर किया गया कार्य w हो, तो

W = बल (F) × विस्थापन (l)

W = Pext. A . l

समीकरण (i) से —

w = Pext (−ΔV)
 या 
w = −Pext ΔV

w = −Pext (Vf − Vi)

Note:
संपीडन प्रक्रम में पिस्टन पर बल द्वारा कार्य
धनात्मक होगा।
परन्तु आयतन में परिवर्तन
(Vf − Vi)
ऋणात्मक होने से
w का मान −ve प्राप्त होता है,
जो कि सही नहीं है।
अतः w का मान +ve करने के लिए
−1 से गुणा करते हैं।

∴ w = −Pext ΔV

हम जानते हैं कि —

W = −Pext × ΔV

W = −∫ViVf Pext × dV

आदर्श गैस के लिए

PV = nRT
;
P = nRT / V

W = −∫ViVf (nRT/V) dV

W = −nRT ln (Vf / Vi)
  
(∵ ln x = 2.303 log x)

W = −2.303 nRT log (Vf / Vi)

नियत ताप पर

P1V1 = P2V2
 ⇒ 
P1 / P2 = V2 / V1

अतः

W = −2.303 nRT log (P1 / P2)

Note:
मुक्त प्रसारण जैसे
निर्वात में प्रसारण
(Pex = 0)
मुक्त प्रसारण कहलाता है।
आदर्श गैसों के मुक्त प्रसारण में कोई कार्य नहीं होता
और प्रक्रिया ऊष्मारोधी या
अनुत्क्रमणीय होती है।
अतः w = 0

हम जानते हैं कि

−ΔU = q + W
  
(∵ W = −PextΔV)

अतः

ΔU = q − PextΔV

यदि प्रक्रम
स्थिर आयतन पर होता है
(ΔV = 0)
तब

ΔU = qv
(qv = स्थिर आयतन पर)

हम जानते हैं कि —

ΔU = q + W

  1. समतापीय उत्क्रमणीय प्रक्रम के लिए :

    q = −W = −Pext × (V2 − V1)

  2. समतापीय उत्क्रमणीय प्रक्रम के लिए :

    q = −W = 2.303 nRT log (V2 / V1)

  3. उष्णरोधी प्रक्रम के लिए :

    q = 0,
    ΔU = wad

प्रश्न

एक आदर्श गैस के एक मोल को
298 K ताप पर
उत्क्रमणीय प्रसार
10 लीटर से
20 लीटर तक किया जाता है।
किये गये कार्य की गणना कीजिए।

हल

यह समतापीय उत्क्रमणीय प्रसार है।

W = −2.303 nRT log (V2 / V1)

दिया गया है :
n = 1 मोल,
R = 8.314 J K−1 mol−1,
V1 = 10 लीटर,
V2 = 20 लीटर

W = −2.303 × 1 × 8.314 × 298 × log (20 / 10)

W = −2.303 × 1 × 8.314 × 298 × log 2

(∵ log 2 = 0.3)

W = −2.303 × 1 × 8.314 × 298 × 0.3

W = −1711.46 J

प्रश्न

5 वायुमंडल दाब पर
एक आदर्श गैस के
2 लीटर को
निर्वात में
15 लीटर तक
प्रसारित होने दिया जाता है।
किये गये कार्य का
मान ज्ञात कीजिए।

हल

इस प्रसार में किया गया कार्य

W = −Pext × ΔV

क्योंकि प्रसारण निर्वात में हो रहा है,
अतः Pext = 0 है।

W = −0 (15 − 2) = 0

अर्थात इस प्रसारण में
कोई कार्य नहीं किया जाता,
यही उष्मा प्रसार कहलाती है।

ऊष्मागतिकी के नियम

(1.) उष्मागतिकी का शून्यकोटी नियम

(2.) उष्मागतिकी का प्रथम नियम

(a) उष्मागतिकी का शून्यकोटी नियम

इस नियम के अनुसार यदि
वस्तुएँ (A व B)
किसी तीसरी वस्तु (C) के साथ
अलग-अलग तापीय साम्य अवस्था में हों
तो वे आपस में भी
तापीय साम्य अवस्था में होती हैं।

(b) उष्मागतिकी का प्रथम नियम

इस नियम के अनुसार
ऊर्जा को न तो
नष्ट किया जा सकता है
और न ही उत्पन्न किया जा सकता है।
इसे केवल एक रूप से
दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।
जब ऊर्जा अवशोषण का नियम हो
तो केवल उस निकाय की
आंतरिक ऊर्जा की वृद्धि को
संबंधित है।

गणितीय व्यंजक :
ΔU = q + w

  • यदि निकाय द्वारा
    ऊष्मा ली जाती है तो
    q का मान धनात्मक होगा।
    यदि निकाय द्वारा ऊष्मा उत्सर्जित होती है,
    तो q का मान ऋणात्मक होगा।
  • यदि निकाय द्वारा
    परिवेश पर कार्य किया जाता है,
    तो w का मान ऋणात्मक होता है।
    जबकि यदि निकाय पर
    परिवेश द्वारा कार्य किया जाता है,
    तो w का मान धनात्मक होगा।

सीमाएँ :

  • ऊष्मा के
    प्रवाह की दिशा का
    पता नहीं लगाया जा सकता।
  • प्रक्रम के
    स्वतः या
    अस्वतः होने की जानकारी नहीं मिलती है।

प्रश्न :
जब निकाय को
ऊष्मा (q) दे दी जाए तथा
निकाय के द्वारा
w कार्य किया जाए
तो उष्मागतिकी के प्रथम नियम का
गणितीय रूप क्या होगा?

(i) ΔU = q + w

(ii) ΔU = q – w

(iii) ΔU = -q + w

(iv) ΔU = – q – w

हल :
(ii) ΔU = q – w

एन्थैल्पी (H)

किसी क्रिया या
तंत्र की
संयोजित या
उत्सर्जित की गयी
उष्मा की मात्रा को
एन्थैल्पी कहते हैं।
इसे H से व्यक्त करते हैं।

  • स्थिर आयतन पर
    उष्मा परिवर्तन को
    आन्तरिक ऊर्जा परिवर्तन
    ΔU से व्यक्त करते हैं।
  • प्रायः अधिकांश
    रासायनिक अभिक्रियाएँ
    खुले पात्र (फ्लास्क, परखनली)
    में स्थिर दाब
    (वायुमण्डलीय दाब) पर होती हैं।
    अतः उष्मा परिवर्तन पर केवल
    आंतरिक परिवर्तन ही नहीं होता,
    अपितु स्थिर दाब पर निकाय के होने वाले
    उष्मा परिवर्तन की
    परिकलना करने हेतु
    एन्थैल्पी (H) का उपयोग किया गया।

अतः स्थिर दाब पर
ΔH = q − PΔV

यदि प्रक्रम
स्थिर दाब पर होता है
(P = 0) तब:

ΔH = qp

qp = स्थिर दाब पर

Important point:
स्थिर आयतन पर उष्मा परिवर्तन
ΔU = qv
लेकिन
स्थिर दाब पर
उष्मा परिवर्तन
ΔH = qp

U2 − U1 = qp − P(V2 − V1)

अथवा

qp = ΔU + PΔV

स्थिर दाब पर
qp, ΔH के बराबर होगा।
अतः

ΔH = ΔU + PΔV

ΔH = −ve होने वाली अभिक्रिया में
उष्मा उत्सर्जित होती है,
अर्थात्
उष्माक्षेपी अभिक्रिया

ΔH = +ve होने वाली अभिक्रिया में
उष्मा अवशोषित होती है,
अर्थात्
उष्माशोषी अभिक्रिया

ठोस या
द्रव के लिए

ΔV = 0
(आयतन में परिवर्तन नहीं होता)

अतः ΔH = ΔU + 0

ΔH = ΔU

गैसीय अवस्था के लिए

स्थिर दाब पर —

  • अभिकारकों का आयतन व मोल
    = V1 तथा n1
  • उत्पादों का आयतन व मोल
    = V2 तथा n2

आदर्श गैस समीकरण से —

PV1 = n1RT
 →  (i)

PV2 = n2RT
 →  (ii)

समीकरण (ii) − (i)

PV2 − PV1 = n2RT − n1RT

P(V2 − V1) = (n2 − n1)RT

PΔV = ΔngRT

हम जानते हैं कि
Δng =
गैसीय उत्पादों के मोलों की संख्या
−
गैसीय अभिकारकों के मोलों की संख्या

ΔH = ΔU + PΔV

ΔH = ΔU + ΔngRT

प्रश्न

अभिक्रिया
C2H4(g) + 3O2(g) ⟶ 2CO2(g) + 2H2O(l)
के लिए ΔH = −1200 kJ है।
इस अभिक्रिया के लिए ΔU का मान ज्ञात कीजिए।

हल

C2H4(g) + 3O2(g) ⟶ 2CO2(g) + 2H2O(l)

nr = (1 + 3 = 4 mol)
    
np = 2 mol

Δng = 2 − 4 = −2

ΔH = ΔU + ΔngRT

ΔU = ΔH − ΔngRT
  
(∵ R = 8.314 × 10−3 kJ K−1 mol−1)

ΔU = −1200 kJ − (−2 × 8.314 × 10−3 kJ K−1 mol−1 × 300 K)

ΔU = −1200 kJ − (−4.98 kJ)

ΔU = −1195 kJ

प्रश्न

स्थिर दाब एवं 17°C पर
एथिलीन की
उत्पादन ऊष्मा
−2.71 किलो कैलोरी है।
स्थिर आयतन पर इसकी उत्पादन ऊष्मा
ज्ञात कीजिए।

R = 0.002 Kcal तथा
2C(s) + 2H2(g) ⟶ C2H4(g)

हल

C2H4 के
उत्पादन अभिक्रिया की
समीकरण निम्नलिखित है —

2C(s) + 2H2(g) ⟶ C2H4(g)

ΔH = −2710 कैलोरी

ΔH = ΔU + ΔnRT
  
अथवा
  
ΔU = ΔH − ΔnRT

Δn = 1 − 2 = −1

R = 2 कैलोरी प्रति मोल प्रति डिग्री सेंटीग्रेड

T = 273 + 17 = 290°K
, ΔH = −2710 कैलोरी

ΔU = −2710 − 2 × (−1) × (290) = −2130 कैलोरी

प्रश्न

उष्माक्षेपी तथा
उष्माशोषी अभिक्रियाओं का
उदाहरण देकर समझाइए।

हल

उन रासायनिक अभिक्रियाओं में
जिनमें ऊष्मा उत्पन्न होती है,
उन्हें उष्माक्षेपी अभिक्रियाएँ
कहते हैं।

उदाहरण —
C(s) + O2(g) ⟶ CO2(g); ΔH = −94.3 kcal (25°C)

यह एक उष्माक्षेपी अभिक्रिया है
जिसमें 25°C और 1 वायुमण्डलीय दाब पर
94.3 kcal ऊष्मा उत्सर्जित होती है।

उष्माशोषी अभिक्रिया —
जिन रासायनिक अभिक्रियाओं में
ऊष्मा अवशोषित होती है,
उन्हें उष्माशोषी अभिक्रियाएँ कहते हैं।

उदाहरण —
N2(g) + O2(g) ⟶ 2NO(g); ΔH = +43.2 kcal (25°C)

यह एक उष्माशोषी अभिक्रिया है
जिसमें 25°C तथा 1 वायुमण्डलीय दाब पर
43.2 kcal ऊष्मा अवशोषित होती है।

विस्तीर्ण एवं गहन गुण

प्रश्न :
विस्तीर्ण गुण तथा
गहन गुण से
आप क्या समझते हैं?

हल

(1.)
विस्तीर्ण गुण :
वे गुण जो निकाय में उपस्थित
पदार्थ (पदार्थों) की
मात्रा पर निर्भर करते हैं,
वे विस्तीर्ण गुण कहलाते हैं।

उदाहरण :
ताप,
आयतन,
द्रव्यमान,
घनत्व,
आण्विक ऊर्जा,
एन्थैल्पी,
मिश्रण ऊष्मा,
वाष्प दाब,
क्वथनांक आदि में यदि
मिश्रण में उपस्थित
पदार्थों की मात्रा
दोगुनी कर दें, तो
आयतन भी
दोगुना हो जाता है।

(2.)
गहन गुण :

  • वे गुण जो निकाय में उपस्थित
    पदार्थ (पदार्थों) की
    मात्रा पर निर्भर नहीं करते,
    वे गहन गुण कहलाते हैं।
    ये वे केवल पदार्थों की प्रकृति पर निर्भर करते हैं।
    ताप एवं दबाव को नियत रखने पर
    चाहे पदार्थ अल्पमात्रा में हो
    या अधिक मात्रा में,
    गहन गुण अपरिवर्तित रहते हैं।
  • यदि विस्तीर्ण गुणों का मान
    आधे या
    दोगुने हो जाए
    तो गहन गुणों के मान में
    परिवर्तन नहीं होता है।
  • उदाहरण :
    द्रव्यमान ह्रास की मात्रा पर निर्भर करता है
    अर्थात यह एक विस्तीर्ण गुण है।
    परंतु घनत्व का मान
    पदार्थ की मात्रा पर निर्भर न होकर
    पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है।
    अतः गहन गुण वे हैं जो
    पदार्थों की मात्रा पर निर्भर नहीं करते हैं।

उष्माधारिता (Heat Capacity)

किसी अभिक्रिया के ताप में
प्रति इकाई वृद्धि द्वारा
अवशोषित की गयी
उष्मा की मात्रा कहलाती है।
अर्थात् निकाय द्वारा अवशोषित की गयी उष्मा
(q) ताप में परिवर्तन (ΔT) के
समानुपाती होती है।

q ∝ ΔT

q = C ΔT

C = q / ΔT

C =
उष्माधारिता गुणांक

  • किसी निकाय की
    उष्माधारिता अधिक है
    तो ताप में वृद्धि ΔT कम होगी।
    अतः किसी निकाय के ताप को बढ़ाने के लिए
    जितनी उष्मा की आवश्यकता होती है,
    उसे उस निकाय की उष्माधारिता कहते हैं।

प्रश्न —
60.0 g एल्यूमिनियम का ताप
35°C से 55°C करने के लिए
कितनी kJ उष्मा की आवश्यकता होगी?
Al की मोलर उष्माधारिता
24 J mol−1 K−1 है।

हल —

(i)
Al के मोलों की संख्या

60 g / 27 g mol−1 = 2.22 mol

(ii)
Al की
मोलर उष्माधारिता
24 J mol−1 K−1
(Given)

(iii)
ताप में परिवर्तन
ΔT = (T2 − T1)

ΔT = (273 + 55) − (273 + 35) = 20 K

अतः

आवश्यक उष्मा की मात्रा =

q = n × Cm × ΔT

q = 2.22 mol × 24 J mol−1 K−1 × 20 K

q = 1065 J = 1.07 kJ

1 मोल आदर्श गैस के लिए Cp व Cv में सम्बन्ध

(a)
स्थिर आयतन पर निकाय द्वारा
अवशोषित उष्मा (qv),
निकाय की आन्तरिक ऊर्जा में वृद्धि
(ΔU) के बराबर होती है अर्थात्

qv = Cv ΔT = ΔU

ΔU = Cv ΔT
 →  (i)

(b)
स्थिर दाब पर निकाय द्वारा
अवशोषित उष्मा (qp)
निकाय के एन्थैल्पी परिवर्तन (ΔH)
के बराबर होती है।

qp = Cp ΔT = ΔH

ΔH = Cp ΔT
 →  (ii)

अतः 1 मोल आदर्श गैस के लिए
Cp व Cv में सम्बन्ध —

हम जानते हैं कि

ΔH = ΔU + PΔV

ΔH = ΔU + Δ(PV)

1 मोल आदर्श गैस के लिए

PV = nRT
   (n = 1)

PV = RT

ΔH = ΔU + Δ(RT)
 या 

ΔH = ΔU + RΔT

समीकरण (i) तथा (ii) से —

Cp ΔT = Cv ΔT + RΔT

Cp ΔT = (Cv + R) ΔT

Cp − Cv = R

ΔU एवं ΔH का मापन : कैलोरीमिति

  • कैलोरीमिति एक मात्र ऐसे विधि है
    जिसके द्वारा ऊष्मा का मापन करते हैं।
    कैलोरीमीटर एक युक्ति है
    जहाँ आयतन में जल रहता है।
  • कैलोरीमीटर से मापन दो स्थितियों में किया जाता है —

    (a.) स्थिर-आयतन पर, qv

    (b.) स्थिर दाब पर, qp
ΔU का मापन

रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए
स्थिर आयतन पर
उत्सर्जित ऊष्मा का मापन
बम कैलोरीमीटर (Bomb calorimeter) में
किया जाता है।

विधि —
एक स्टील का पात्र
(बम कैलोरीमीटर) जल में डुबोया जाता है।
स्टील बम में
ऑक्सीजन भरकर
ज्वलनशील पदार्थों को जलाया जाता है।
अभिक्रिया में उत्पन्न ऊष्मा
जल में संचारित हो जाती है।

उसके बाद जल का ताप ज्ञात कर लिया जाता है।
क्योंकि बम कैलोरीमीटर का
आयतन स्थिर है,
अतः इसमें आयतन में कोई परिवर्तन नहीं होगा और
कोई कार्य नहीं किया जाता है।

ΔU = CV ΔT

की सहायता से कैलोरीमीटर को उष्माक्षेपित या
ताप-परिवर्तन द्वारा ΔU तथा
qv का मान
ज्ञात कर लिया जाता है।

Bomb calorimeter diagram

ΔH का मापन
  • स्थिर दाब
    (सामान्यतः वायुमण्डलीय दाब) पर
    ऊष्मा-परिवर्तन
  • हम जानते हैं कि
    ΔH = qp
    (स्थिर दाब पर) ।
    अतः स्थिर दाब पर
    उत्सर्जित अथवा
    अवशोषित ऊष्मा
    qp
    अभिक्रिया ऊष्मा अथवा
    अभिक्रिया एन्थैल्पी ΔH
    कहलाती है।

उष्माक्षेपी अभिक्रियाओं में
ऊष्मा निकलती है,
अतः निकाय से परिवेश में ऊष्मा का प्रवाह होता है।
इसलिए qp = −ve तथा
ΔH = −ve होगा।

उष्माशोषी अभिक्रियाओं में
ऊष्मा अवशोषित लगती है तथा
निकाय में परिवेश से ऊष्मा का प्रवाह होता है।
इसलिए qv = +ve तथा
ΔH = +ve होगा।

Calorimeter at constant pressure

उदाहरण

प्रश्न —
एक बम कैलोरीमीटर में
NH4CN (s) की
मानक ऊष्मागतिकीय दशा में
ज्वलन से ΔU का मान
−742.7 kJ mol−1 प्राप्त किया गया
(298 K पर) ।
इस अभिक्रिया के लिए
298 K पर
एन्थैल्पी परिवर्तन का मान ज्ञात कीजिए।

हल

दिए गए समीकरणों के लिए,

Δn = (1 + 1) − (3/2) = +1/2 mol

ΔH = ΔU + ΔnRT

ΔH = −742.7 + (1/2 × 8.314 × 10−3 × 298)

(∵ R = 8.314 × 10−3 kJ mol−1 K−1)

= −741.5 kJ mol−1

एन्थैल्पी के प्रकार

मानक गलन एन्थैल्पी
(ΔfusH0) :
298 K ताप तथा
1 Bar दाब पर
1 मोल शुद्ध ठोस पदार्थ का
द्रव में परिवर्तन होने से
होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन को
मानक गलन एन्थैल्पी परिवर्तन कहते हैं।

ठोस जब गलता है, तो
द्रव अवस्था में बदलता है और
इसमें ऊष्मा अवशोषण होता है, जैसे –

H2O (बर्फ) → H2O (द्रव)
   
ΔfusH0 = − 6.02 kJ mol−1

और जब द्रव बदलता है, तो
ठोस बनता है
अर्थात जम जाता है, इस प्रकार
इस प्रक्रम में उत्सर्जित ऊष्मा
को गलन की ऊष्मा कहते हैं।

H2O (द्रव) → H2O (बर्फ)
   
ΔfusH0 = − 6.02 kJ mol−1

वाष्पन एन्थैल्पी
(ΔvapH0) :
298 K ताप व
1 Bar दाब पर
1 मोल शुद्ध द्रव का
गैस में परिवर्तन में
होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन को
वाष्पन एन्थैल्पी कहते हैं।

जल का
वाष्पीकरण एवं संघनन –

H2O (l) → H2O (g)
   
ΔvapH0 = + 4.79 kJ mol−1

H2O (g) → H2O (l)
   
ΔvapH0 = − 40.79 kJ mol−1

उर्ध्वपातन एन्थैल्पी
(ΔsubH0) :
1 मोल ठोस पदार्थ के
स्थिर ताप व
मानक दाब (1 Bar) पर
उर्ध्वपातित होने से
हुए एन्थैल्पी परिवर्तन को
उर्ध्वपातन एन्थैल्पी कहते हैं।

CO2 (s) → CO2 (g)
   
ΔsubH0 = +25.2 kJ mol−1

विघटन की एन्थैल्पी
(ΔfH0) :
298 K ताप व
1 Bar दाब पर
दो या दो से अधिक पदार्थों के
आपस में जुड़ने से एक पदार्थ का
निर्माण होने पर इस प्रक्रम में
होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन को
विघटन की एन्थैल्पी कहते हैं।

H2 (g) + 1/2 O2 (g) → H2O (l)
   
ΔH = −285.8 kJ mol−1

बंधन एन्थैल्पी
(ΔaH0) :
गैसीय अणुओं में
एक मोल पदार्थ में
उपस्थित आवेशों को पूर्णतः तोड़कर परमाणुओं में बदलने पर
होने वाले एन्थैल्पी परिवर्तन को
बंधन एन्थैल्पी कहते हैं।

H2 (g) → 2H (g)
   
ΔaH0 = 435.0 kJ mol−1

दहन एन्थैल्पी
(ΔcH0) :
1 मोल पदार्थ के
पूर्ण दहन पर होने वाले
एन्थैल्पी परिवर्तन को
दहन एन्थैल्पी कहते हैं।

उष्माक्षेपी अभिक्रिया में

LPG (C4H10) के एक मोल के दहन से
2658 kJ ऊष्मा मुक्त होती है।

C4H10 (g) + 13/2 O2 (g) → 4CO2 (g) + 5H2O (l)
   
ΔcH0 = −2658.0 kJ mol−1

प्रश्न :
CO2 की
दहन एन्थैल्पी
− 393.5 kJ mol−1 है।
कार्बन एवं ऑक्सीजन से
35.2 g CO2 बनने पर
उत्सर्जित ऊष्मा की गणना कीजिए।

हल :
प्रश्नानुसार

C(s) + O2(g) → CO2(g)
   
ΔH = −393.5 kJ mol−1

1 mol = 44 g

अतः
44 g CO2 से
उत्सर्जित ऊष्मा = 393.5 kJ

1 g CO2 से उत्सर्जित ऊष्मा होगी

= 393.5 kJ / 44 g

∴ 35.2 g CO2 से उत्सर्जित ऊष्मा होगी

= (393.5 kJ / 44 g) × 35.2 g = 314.8 kJ

आबंध एन्थैल्पी
(ΔbondH0) :
रासायनिक अभिक्रियाओं में
रासायनिक बंध टूटते व बनते हैं।
बंध टूटने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है,
तो नए बंध बनने से ऊर्जा उत्सर्जित होती है।
इस तरह हर प्रकार होने वाले
एन्थैल्पी परिवर्तन के लिये दो पद होते हैं –

(i) आबंध वियोजन एन्थैल्पी

(ii) माध्य आबंध एन्थैल्पी

(i)
आबंध वियोजन एन्थैल्पी :
वह एन्थैल्पी परिवर्तन जिसमें
किसी गैसीय सहसंयोजक यौगिक के
एक मोल आबंध टूटकर
गैसीय परमाणु बने।

H2 (g) → 2H (g)
   
ΔH-HH0 = 435.0 kJ mol−1

(ii)
माध्य आबंध एन्थैल्पी :
एन्थैल्पी परिवर्तन का
मध्यम / औसत ज्ञात किया जाता है,
जैसे CH4 में चार मोल
C − H बंध को विस्थापित
1665 kJ है, अतः
1 मोल C − H बंध की
आबंध एन्थैल्पी

CH4 (g) → C(g) + 4H(g)
   
ΔaH0 = +1665.0 kJ mol−1

मेथेन में सभी
C − H आबंध समान हैं।
इसलिए मेथेन अणु में
C − H आबंध को तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा –

CH4 (g) → CH3 (g) + H(g)
   
ΔbondH0 = + 427.0 kJ mol−1

CH3 (g) → CH2 (g) + H(g)
   
ΔbondH0 = + 439.0 kJ mol−1

CH2 (g) → CH (g) + H(g)
   
ΔbondH0 = + 452.0 kJ mol−1

CH (g) → C (g) + H(g)
   
ΔbondH0 = + 347.0 kJ mol−1

net reaction

CH4 (g) → C (g) + 4H(g)
   
ΔaH0 = +1665.0 kJ mol−1

अतः
CH4 में
C − H की
औसत आबंध एन्थैल्पी =

1665.0 kJ mol−1 / 4 = 416.0 kJ mol−1

विलयन-एन्थैल्पी (ΔsolH0)

किसी पदार्थ की
विलयन-एन्थैल्पी वह
एन्थैल्पी-परिवर्तन है,
जो उसके एक मोल को
विलायक की निर्दिष्ट मात्रा में
घोलने पर होता है।

जलन एन्थैल्पी
(ΔhydH0) —
किसी पदार्थ के 1 मोल को
जल में विलय करने के लिए
आवश्यक उष्मा परिवर्तन को
जलन एन्थैल्पी कहते हैं।

जालक एन्थैल्पी
(ΔlatticeH0) —
जब एक मोल आयनिक यौगिक
गैसीय अवस्था में अपने आयनों में
विभाजित होता है, तो एन्थैल्पी में हुआ परिवर्तन
उस आयनिक यौगिक की जालक एन्थैल्पी कहलाता है।

जब एक आयनिक पदार्थ को
विलायक में घोला जाता है, तब इसके आयन
क्रिस्टल जालक से अपनी
निश्चित स्थिति को छोड़ देते हैं।
तब वे विलयन में अधिक स्वतंत्र रूप से
उपस्थित होते हैं।

अतः जल में AB(s) की
विलयन एन्थैल्पी
ΔsolH0 एवं
जलनकरण एन्थैल्पी
ΔhydH0 के मानों द्वारा
इस प्रकार ज्ञात की जा सकती है —

ΔsolH0 = ΔlatticeH0 + ΔhydH0

हेस का नियम

इस नियम के अनुसार
यदि कोई अभिक्रिया
एक से अधिक पदों में पूर्ण होती है,
तो अभिक्रिया का कुल एन्थैल्पी परिवर्तन
सभी पदों के एन्थैल्पी परिवर्तनों
के योग के बराबर होता है।

A ⟶ B + ΔH1
B ⟶ C + ΔH2
C ⟶ D + ΔH3

कुल अभिक्रिया — A ⟶ D + ΔH1 + ΔH2 + ΔH3

ΔH = ΔH1 + ΔH2 + ΔH3

उदाहरण —

C(s) + O2(g) ⟶ CO2(g), ΔH = −393 kJ mol−1

हल —
यह अभिक्रिया दो पदों में सम्पन्न होती है।

Step – 1:
C(s) + 1/2 O2(g) ⟶ CO(g),
ΔH = −110 kJ mol−1

Step – 2:
CO(g) + 1/2 O2(g) ⟶ CO2(g),
ΔH = −283 kJ mol−1

कुल अभिक्रिया ऊष्मा का मान =
ΔH = ΔH1 + ΔH2
ΔH = (−110.5) + (−283) = −393 kJ mol−1

हेस के नियम का महत्वपूर्ण निष्कर्ष :
किसी अभिक्रिया में उत्सर्जित या
अवशोषित उष्मा केवल
अभिकारकों व
अंतिम उत्पादों पर निर्भर करती है।
यह उन पदों पर निर्भर नहीं करती जिनसे अभिक्रिया सम्पन्न होती है।

हेस के नियम के अनुप्रयोग —

  1. यौगिकों की उत्पत्ति एन्थैल्पी की गणना करने में।
  2. यौगिकों की दहन एन्थैल्पी की गणना करने में।
  3. अभिक्रियाओं की संक्रमण एन्थैल्पी की गणना करने में।
  4. आयनों की जालक ऊर्जा की गणना करने में।
  5. बंध ऊर्जाओं व अनुनाद ऊर्जा की गणना करने में।

याद रखें —
If a reaction is reversed then heat of reaction is also reversed.

A ⟶ B ; ΔH = −x kJ mol−1

B ⟶ A ; ΔH = +x kJ mol−1

अभिक्रिया की एन्थैल्पी में परिवर्तन की गणना —

ΔrH = उत्पादों की एन्थैल्पियों का योग − अभिकारकों की एन्थैल्पियों का योग

ΔrH = ∑ aHउत्पाद − ∑ bHअभिकारक
  
(a, b = no. of mol)

प्रश्न —
CO(g), CO2(g) और H2O(g)
की संयोजन ऊष्माएँ क्रमशः
−25.7, −93.2 तथा −56.4 kcal हैं।
निम्नलिखित अभिक्रिया की अभिक्रिया ऊष्मा की
गणना कीजिए —

CO2(g) + H2(g) ⟶ CO(g) + H2O(g)

हल —

C + 1/2 O2 ⟶ CO; ΔH = −25.7 kcal
C + O2 ⟶ CO2; ΔH = −93.2 kcal
H2 + 1/2 O2 ⟶ H2O; ΔH = −56.4 kcal

CO2(g) + H2(g) ⟶ CO(g) + H2O(g)

अभिक्रिया की अभिक्रिया ऊष्मा = (−25.7) + (−56.4) + 93.2 = +11.1 kcal

प्रश्न

CH4(g), C(s) और H2(g) की
25°C पर
दहन ऊष्माएँ क्रमशः
−212.8 kcal, −94.0 kcal और −68.4 kcal हैं।
मीथेन गैस की
संघटन ऊष्मा ΔfH
की गणना कीजिए।

हल

दहन अभिक्रिया समीकरण —


CH4(g) + 2O2(g) ⟶ CO2(g) + 2H2O(l)

; ΔH = −212.8 kcal    …… (i)


C(s) + O2(g) ⟶ CO2(g)

; ΔH = −94.0 kcal    …… (ii)


H2(g) + 1/2 O2(g) ⟶ H2O(l)

; ΔH = −68.4 kcal    …… (iii)

मीथेन गैस की
बनने का समीकरण:


C(s) + 2H2(g) ⟶ CH4(g)

; ΔfH = ? kcal    …… (iv)

(iv) = 1/(i) + (ii) + 2 × (iii)


CO2(g) + 2H2O(l) ⟶ CH4(g) + 2O2(g)

; ΔH = +212.8 kcal


C(s) + O2(g) ⟶ CO2(g)

; ΔH = −94.0 kcal


2H2(g) + O2(g) ⟶ 2H2O(l)

; ΔH = 2 × (−68.4) = −136.8 kcal


C(s) + 2H2(g) ⟶ CH4(g)

; ΔfH = −94.0 + (−136.8) + 212.8

ΔfH = −18.4 kcal
Ans

प्रश्न

C − H बंध की एन्थैल्पी की गणना कीजिए,
दिया गया है —

(i) C(s) + 2H2(g) ⟶ CH4(g) ; ΔfH° = −94.0 kJ mol−1

(ii) H2(g) ⟶ 2H(g) ; ΔbondH° = +433 kJ mol−1

(iii) C(s) ⟶ C(g) ; ΔsH° = +703 kJ mol−1

हल

दिया गया है —


C(s) + 2H2(g) ⟶ CH4(g)

; ΔfH° = −94.0 kJ mol−1
   …… (i)


H2(g) ⟶ 2H(g)

; ΔbondH° = +433 kJ
   …… (ii)


C(s) ⟶ C(g)

; ΔsH° = +703 kJ
   …… (iii)

ज्ञात करना है —


CH4(g) ⟶ C(g) + 4H(g)

; ΔH° = ?
   …… (iv)

(iv) = 1/(i) + [(ii) × 2] + 1/(iii)


CH4(g) ⟶ C(s) + 2H2(g)

; ΔH = +94.0 kJ


2H2(g) ⟶ 4H(g)

; ΔbondH = 2 × 433 = 866 kJ


C(s) ⟶ C(g)

; ΔsH = +703 kJ


CH4(g) ⟶ C(g) + 4H(g)

; ΔH = 94.0 + 866 + 703

ΔH = 1663 kJ
Ans

अतः मीथेन की
परमाणुकरण एन्थैल्पी का मान
1663 kJ mol−1 है।
अर्थात मीथेन में उपस्थित
चार C − H बंधों को तोड़ने के लिए
आवश्यक ऊष्मा 1663 kJ है।


अतः C − H बंध एन्थैल्पी =
1663 / 4 = 415.7 kJ mol−1

प्रश्न :
NaCl के लिए
बॉर्न-हैबर चक्र बनाइए?

हल

Na(s) + 1/2 Cl2(g) ⟶ NaCl(s)

ΔHf0
(विनिर्माण ऊर्जा)

Na(s) ⟶ Na(g)
   
ΔHsub = +108 kJ
(उर्ध्वपातन ऊर्जा)

Na(g) ⟶ Na+(g) + e−
   
IE = +496 kJ
(आयनन ऊर्जा)

1/2 Cl2(g) ⟶ Cl(g)
   
ΔHdiss = +122 kJ
(वियोजन ऊर्जा)

Cl(g) + e− ⟶ Cl−(g)
   
EA = −349 kJ
(e− बन्धुता)

Na+(g) + Cl−(g) ⟶ NaCl(s)
   
U = −788 kJ
(जालक ऊर्जा)

ΔHf0 = ΔHsub + IE + ΔHdiss + EA + U

ΔHf0 = 108 + 496 + 122 + (−349) + (−788)

= −411 kJ mol−1

स्वतःस्फूर्तता

  • यांत्रिक रूप से अपने आप होने वाली
    रासायनिक या
    भौतिक प्रक्रम
    स्वतःस्फूर्त प्रक्रम कहलाते हैं।
  • स्वतःस्फूर्त प्रक्रम एक
    ऊष्मागतिक प्रक्रम होता है।

जैसे :

  • ऊष्मा का प्रवाह
    उच्च ताप से
    निम्न ताप की ओर होगा।
  • कार्बन का
    ऑक्सीजन से जलकर
    कार्बन डाइऑक्साइड बनाना।

एंट्रॉपी

  • किसी निकाय की
    अव्यवस्था या
    अनियमितता के माप को
    एंट्रॉपी कहते हैं।
    इसे S से व्यक्त करते हैं।
  • जैसे —
    ठोस, द्रव व गैस की एंट्रॉपी

ठोस < द्रव < गैस में एंट्रॉपी बढ़ने के क्रम में

ठोस में कण व्यवस्थित रहते हैं। कम गतिशील होने के कारण
अव्यवस्था व गैस
में और भी ज्यादा।

  • किसी विलयन में अन्य पदार्थ मिलाने पर
    एंट्रॉपी बढ़ती है।
  • उष्मा (Q) से कार्य किए जाने व
    कणों की
    गतिज व्यवस्था बढ़ने से
    एंट्रॉपी बढ़ती है।

एंट्रॉपी परिवर्तन को ΔS द्वारा दर्शाया जाता है —

ΔS = Sउत्पाद − Sअभिकारक = qउत्क्रमणीय / T

यदि उष्मा अवशोषित होती है तब
ΔS = +ve होता है।
यदि उष्मा उत्सर्जित होती है तब
ΔS = −ve होता है।

प्रश्न —
बताइए कि निम्नलिखित में से किसमें
एंट्रॉपी बढ़ती या घटती है।

  1. एक द्रव का ठोस अवस्था में परिवर्तन होता है।
  2. एक क्रिस्टल को गरम कर ताप 0 K से 115 K तक बढ़ाया जाता है।
  3. 2NaHCO3 (s) ⟶ Na2CO3 (s) + CO2 (g) + H2O (g)

हल —

(i) द्रव अवस्था से परिवर्तन होने के बाद
अणु व्यवस्थित हो जाते हैं।
अतः एंट्रॉपी घटती है।

(ii) जब 0 K पर सभी अणु स्थिर होते हैं,
अतः एंट्रॉपी कम होती है।
यदि ताप 115 K तक बढ़ाया जाए, तब अणु गति करना आरम्भ कर देते हैं
व द्रव्य में अधिक अव्यवस्था हो जाती है।
अतः एंट्रॉपी बढ़ जाती है।

(iii) अभिकारक NaHCO3
ठोस है जबकि उत्पाद में
गैसें बनी हैं।
अतः उत्पाद की एंट्रॉपी अधिक होगी।

प्रश्न —
अभिक्रिया 2Cl(g) ⟶ Cl2(g) के लिए
ΔH एवं ΔS के चिह्न क्या होंगे?

हल —
दो Cl परमाणुओं के मिलने से
Cl2 अणु बनता है।
अतः ऊर्जा मुक्त होगी एवं अभिक्रिया
उष्माक्षेपी होगी।
पुनः 2 मोल परमाणुओं की अव्यवस्था 1 मोल अणुओं से अधिक होती है।
अतः अव्यवस्था घटती है।
अतः ΔS ऋणात्मक होगा।

प्रश्न —
जब 1.00 mol H2O(l) को
मानक परिस्थितियों में विसर्जित किया जाता है,
तब परिवेश के एंट्रॉपी-परिवर्तन की गणना कीजिए।
(ΔfH0 = −286 kJ mol−1)

हल —

H2(g) + 1/2 O2(g) ⟶ H2O(l); ΔfH0 = −286 kJ mol−1

समीकरण के अनुसार 1 mol H2O(l) निर्मित होती है तथा
286 kJ ऊर्जा निर्गत होती है।
यह उष्मा परिवेश द्वारा अवशोषित कर ली जाती है।

qsurr = +286 kJ mol−1

अतः परिवेश में एंट्रॉपी परिवर्तन,

ΔSsurr = qsurr / T = 286 / 298 = 0.9597 kJ K−1 mol−1

= 959.7 J K−1 mol−1

प्रश्न —
प्रावस्था रूपान्तरण में एंट्रॉपी किस प्रकार प्रभावित होती है?
एक उदाहरण देकर समझाइए।

हल —
किसी पदार्थ की एंट्रॉपी ठोस अवस्था से द्रव तथा गैस अवस्था में
अधिकतम बढ़ती जाती है।

Sठोस < Sद्रव < Sगैस

पानी की तीनों अवस्थाओं में एंट्रॉपी का क्रम इस प्रकार है।

प्रश्न —
एंट्रॉपी पर ताप का क्या प्रभाव पड़ता है?

हल —
नियम का ताप बढ़ने पर
एंट्रॉपी बढ़ जाती है।
एक निश्चित ताप पर एंट्रॉपी निश्चित होती है तथा ताप परिवर्तन पर
एंट्रॉपी परिवर्तित होती है।

उष्मागतिकी का द्वितीय नियम

ब्रह्माण्ड की एंट्रॉपी
स्वतः प्रक्रम के कारण
लगातार बढ़ती जा रही है।

ΔSनिकाय + ΔSपरिवेश > 0
अर्थात्
ΔSकुल > 0

एंट्रॉपी के आधार पर प्रक्रम की स्वतः प्रवर्तिता

गिब्स मुक्त ऊर्जा (G) —
किसी निकाय द्वारा प्राप्त ऊर्जा की वह मात्रा
जो उपयोगी कार्य करने में सक्षम होती है,
गिब्स मुक्त ऊर्जा कहलाती है।

गिब्स मुक्त ऊर्जा (G) एवं अवस्था-फलन है।

यदि निकाय की प्रारम्भिक अवस्था में मुक्त ऊर्जा
(G1), एन्थैल्पी (H1)
व एंट्रॉपी (S1) हो

G1 = H1 − T S1

निकाय की अंतिम अवस्था में मुक्त ऊर्जा (G2)

G2 = H2 − T S2

अतः निकाय की मुक्त ऊर्जा में परिवर्तन —

(G2 − G1) = (H2 − H1) − T(S2 − S1)

ΔG = ΔH − TΔS

मुक्त ऊर्जा परिवर्तन के आधार पर स्वतः प्रवर्तिता

  • साम्यावस्था पर ΔG = 0
  • स्वतः प्रक्रम के लिये ΔG = −ve
  • अस्वतः प्रक्रम के लिये ΔG = +ve
Case – 1 : अभिक्रिया के लिए

यदि ΔH = −ve एवं
ΔS = +ve तब
ΔG = −ve
(अभिक्रिया स्वतः अथवा अपने आप हो होगी)

Case – 2 : यदि ΔH = −ve एवं ΔS = −ve तब

(a) यदि ΔH > TΔS तब
ΔG = −ve
(अभिक्रिया स्वतः अथवा अपने आप हो होगी)

(b) यदि ΔH < TΔS तब
ΔG = +ve
(अभिक्रिया अस्वतः अथवा अपने आप नहीं होगी)

Case – 3 : यदि ΔH = +ve एवं ΔS = +ve तब

(a) यदि ΔH < TΔS तब
ΔG = −ve
(अभिक्रिया स्वतः अथवा अपने आप हो होगी)

(b) यदि ΔH > TΔS तब
ΔG = +ve
(अभिक्रिया अस्वतः अथवा अपने आप नहीं होगी)

Case – 4

वे अभिक्रिया जो हमेशा
अस्वतः अथवा अपने आप नहीं होंगी।
अभिक्रिया के लिए —

(1.) यदि ΔH = +ve & ΔS = −ve तब ΔG = +ve

(2.) यदि ΔH = TΔS तब ΔG = 0
(साम्य अवस्था)

प्रश्न

एक अभिक्रिया
A + B ⟶ C + D + q
के लिए एन्थॉपी परिवर्तन धनात्मक पाया गया।
यह अभिक्रिया सम्भव होगी —

  1. उच्च ताप पर
  2. निम्न ताप पर
  3. किसी भी ताप पर नहीं
  4. किसी भी ताप पर
हल

यहाँ ΔH = −ve तथा
ΔS = +ve,
इसलिए
ΔG = ΔH − TΔS

अभिक्रिया के
स्वतः प्रवर्तित होने के लिए
ΔG = −ve होना चाहिए,
जो किसी भी ताप पर हो सकती है।
अतः सही विकल्प (iv) है।

प्रश्न

ΔH एवं
ΔS को
ताप-निरपेक्ष स्थिर मानते हुए बताइए कि
किस ताप पर अभिक्रिया स्वतः होगी?

हल

उच्चतर ताप पर तथा
ΔS का धनात्मक मान होने के कारण
अभिक्रिया सम्भाव्य रूप से स्वतः होगी।
अर्थात ΔG = 0

ΔG = ΔH − TΔS

0 = ΔH − TΔS

T = ΔH / ΔS = 400 / 0.2 = 2000 K

अतः अभिक्रिया के
स्वतः प्रवर्तित होने के लिए
ΔG का मान
ऋणात्मक होना चाहिए।
अतः T, 2000 K से अधिक होना चाहिए।

प्रश्न

अभिक्रिया
2A(g) + B(g) ⟶ 2D(g)
के लिए
ΔU° = −10.5 kJ एवं
ΔS° = −44.1 JK−1 है।
अभिक्रिया के लिए
ΔG° का मान ज्ञात कीजिए
तथा बताइए कि क्या अभिक्रिया
स्वतन्त्रतापूर्वक हो सकती है?

हल

यहाँ Δn ज्ञात करने के लिए,

2A(g) + B(g) ⟶ 2D(g)

nr = (2+1 = 3) mol
   
np = 2 mol

Δng = 2 − (1 + 2) = −1

ΔH° = ΔU° + ΔnRT

ΔH° = −10.5 kJ + (−1 × 8.314 kJ mol−1 K−1 × 10−3 × 298 K)

= −12.98 kJ mol−1

ΔG° = ΔH° − TΔS

ΔG° = −12.98 − [298 × (−44.1 × 10−3)]

= 0.162 kJ

चूँकि ΔG° का मान
धनात्मक प्राप्त होता है,
अतः अभिक्रिया स्वतः नहीं होगी।

मिब्स ऊर्जा ΔG0, साम्यावस्था स्थिरांक K में संबंध

ΔG0 = −RT ln K

ΔG0 = −2.303 RT log K

प्रश्न :
300 K पर एक अभिक्रिया के लिए
साम्य स्थिरांक
10 है।
ΔG0 का मान क्या होगा?
(R = 8.314 JK−1 mol−1)

हल

ΔG0 = −2.303 RT log K

ΔG0 = −2.303 × 8.314 × 300 × log10

ΔG0 = −2.303 × 8.314 × 300 × 1

= −5744.1 J = −5.744 kJ

ऊष्मागतिकी का तृतीय नियम

प्रश्न :
ऊष्मागतिकी का
तृतीय नियम लिखिए?

हल :
यह नियम कहता है कि
शून्य ताप पर
किसी भी पूर्ण क्रिस्टलीय पदार्थ की
एंट्रॉपी ज्ञात नहीं की जा सकती है।
यह नियम वाल्टर नर्स्ट ने
सन् 1906 में दिया था।

पूर्ण रूप से शुद्ध एवं
क्रिस्टलीय पदार्थ में
कोई गति नहीं होती है और ये
पूर्ण रूप से व्यवस्थित होते हैं।

ऊष्मागतिकी के
तृतीय नियम का प्रयोग
शुद्ध पदार्थों की
विभिन्न तापों पर निरपेक्ष एंट्रॉपी की
गणना करने में किया जाता है।

प्रश्न :
ऊष्मा क्या है?
इसके मात्रक तथा इसके लिए
विभिन्न परिपाटियों के नियम लिखिए।

हल :
ऊष्मागतिकी में निकाय और
परिवेश की सीमा पर
उर्जा का जो आदान-प्रदान होता है,
वह ऊष्मा कहलाती है।
जब निकाय तथा
परिवेश में तापान्तर होता है,
तो यह विनिमय होता है।
अभिक्रिया का ताप परिवेश में होता है तथा
प्रक्रम होने पर
ऊष्मा ही ऊर्जा स्थानान्तरित करती है,
जिससे निकाय का ताप कम हो जाता है तथा परिवेश का ताप बढ़ जाता है।

यह केवल
ऊर्जा स्थानान्तरण का एक
रूप है।
इस रूप की विशेषता है कि
निकाय और
परिवेश का
ताप समान नहीं हो जाता।

यदि निकाय का ताप
परिवेश के ताप से कम होता है,
तो ऊष्मा के रूप में ऊर्जा
परिवेश से निकाय में स्थानान्तरित होती है,
जिससे निकाय का ताप बढ़ जाता है।
यदि प्रक्रम का ताप कम हो जाता है,
तो ऊर्जा का यह स्थानान्तरण
तब तक होता है जब तक प्रक्रम तथा निकाय का ताप
समान नहीं हो जाता।

मात्रक :
ऊष्मा का सामान्य मात्रक
कैलोरी माना जाता है।
SI पद्धति में
ऊष्मा का मात्रक जूल होता है।

चिह्न परिपाटी :
निकाय द्वारा अवशोषित ऊष्मा
धनात्मक होती है,
जबकि निकाय द्वारा निक्षेपित ऊष्मा
ऋणात्मक होती है।

प्रश्न :
परमशून्य ताप पर
किसी पदार्थ की
एंट्रॉपी कितनी होती है?

हल :
परमशून्य ताप पर
पदार्थ की एंट्रॉपी
शून्य होती है,
क्योंकि इस ताप पर पदार्थ के
अणु पूर्णरूप से स्थिर होते हैं।
अतः उनमें किसी प्रक्रम को
अग्रसरित नहीं किया जा सकता है।


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