उत्क्रमणीय अभिक्रियाएँ
(Reversible reactions)
-
वे अभिक्रियाएँ जिनमें
क्रियाकारक क्रिया करके
उत्पाद बनाते हैं तथा
उत्पाद पुनः क्रिया करके क्रियाकारक
बना देते हैं, उत्क्रमणीय अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। -
ये अभिक्रियाएँ
बन्द पात्र में होती हैं। -
इन अभिक्रियाओं को
क्रियाकारक तथा उत्पादों के मध्य
दो अर्थ तीर
(⇌) लगाकर दर्शाया जाता है।
उदाहरण
|
ऊष्मीय अपघटन
PCl5(g) ⇌ PCl3(g) + Cl2(g) |
बन्द पात्र में जल का वाष्पीकरण, उदाहरण
H2O(l) ⇌ H2O(g) |
अनुत्क्रमणीय अभिक्रियाएँ
-
ये अभिक्रियाएँ जिनमें
क्रियाकारक क्रिया करके
केवल उत्पाद ही बना पाते हैं तथा
उत्पाद वापस क्रियाकारक नहीं बना पाते हैं। -
ये अभिक्रियाएँ
खुले पात्र में होती हैं। -
इन अभिक्रियाओं को
क्रियाकारक तथा उत्पादों के मध्य
एक अर्थ तीर
(→) लगाकर दर्शाया जाता है।
उदाहरण
| NaOH + HCl → NaCl + H2O |
BaCl2(aq) + H2SO4(aq) → BaSO4(s) ↓ + 2HCl(aq) |
साम्यावस्था
-
किसी उत्क्रमणीय अभिक्रिया की वह
अवस्था जिसमें
अग्र अभिक्रिया वेग,
पश्च अभिक्रिया वेग के बराबर हो जाता है,
साम्यावस्था कहलाती है।
-
यह अवस्था वह है जिस पर
क्रियाकारकों और
उत्पादों की
सांद्रता
समय के साथ परिवर्तित नहीं होती,
अर्थात
क्रियाकारकों और
उत्पादों की
सांद्रता स्थिर हो जाती है।
ग्राफ में :
अग्र अभिक्रिया का वेग समय के साथ
घटता है, जबकि
पश्च अभिक्रिया का वेग
बढ़ता है।
जिस बिन्दु पर दोनों बराबर हो जाते हैं, वही
साम्यावस्था है।
माना एक
उत्क्रमणीय अभिक्रिया
किसी बन्द पात्र में हो रही है।
A + B ⇌ C + D
(निश्चित ताप पर)
A + B =
क्रियाकारक
C + D =
उत्पाद
-
प्रारम्भ में
क्रियाकारकों की
मात्रा (सांद्रता) अधिक होने से
अग्र अभिक्रिया वेग अधिक होता है।
जैसे-जैसे अभिक्रिया आगे बढ़ती है,
क्रियाकारकों की मात्रा घटती जाती है,
इसलिए अग्र अभिक्रिया का वेग भी
घटता जाता है। -
प्रारम्भ में
पश्च अभिक्रिया का वेग
शून्य होता है,
परन्तु जैसे-जैसे
क्रियाकारकों से
उत्पाद बनते हैं,
उत्पादों की मात्रा बढ़ती है और
पश्च अभिक्रिया का वेग भी
बढ़ता जाता है।
एक ऐसी स्थिति आयेगी जब
अग्र अभिक्रिया वेग और
पश्च अभिक्रिया वेग
दोनों बराबर हो जायेंगे।
वही अवस्था साम्यावस्था कहलाती है।
द्रव्यमान क्रिया का नियम तथा साम्यावस्था स्थिरांक (K)
द्रव्यमान क्रिया का नियम –
“रासायनिक अभिक्रिया का वेग दिए गए समय और
स्थिर ताप पर
क्रियाकारकों की मोलर सांद्रताओं के
समानुपाती होता है।”
इसे द्रव्यमान क्रिया का नियम कहते हैं।
-
मोलर सांद्रता अर्थात
प्रति लीटर में मोलों की संख्या जिसे
सक्रिय द्रव्यमान (active mass) भी कहते हैं। -
किसी सरल एवं प्रतिवर्ती अभिक्रिया को
प्रतीकात्मक रूप में इस प्रकार लिखा जाता है।
मान कि —
aA + bB ⇌ cC + dD
(निश्चित ताप पर)
क्रियाकारक
उत्पाद
द्रव्यमान क्रिया के नियम के अनुसार —
-
अग्र अभिक्रिया की दर
(Rf) ∝
[A]a [B]b
=
Kf [A]a [B]b -
पश्च अभिक्रिया की दर
(Rb) ∝
[C]c [D]d
=
Kb [C]c [D]d
साम्य पर,
अग्र अभिक्रिया की दर
(Rf)
=
पश्च अभिक्रिया की दर
(Rb)
Kf [A]a [B]b
=
Kb [C]c [D]d
Kc =
Kf
Kb
=
[C]c [D]d
[A]a [B]b
जहाँ, Kc
साम्य स्थिरांक है।
साम्य स्थिरांक (Kc) की इकाई
Kc =
[
मोल
लीटर
]Δn
[
Δn = उत्पाद के मोल − क्रियाकारकों के मोल
]
गैसीय अवस्था के लिए – Kp
जब क्रियाकारक तथा
उत्पाद
गैसीय अवस्था में हों, तो
मोलर सांद्रता के स्थान पर
आंशिक दाब का प्रयोग किया जाता है। अतः
Kp =
Pcc . Pdd
PAa . PBb
Kp = [वायुमण्डलीय दाब]Δn
Kp तथा Kc में सम्बन्ध
सामान्य अभिक्रिया के लिए,
aA + bB ⇌ cC + dD
क्रियाकारक
उत्पाद
जहाँ a, b, c तथा d
क्रियाकारक तथा
उत्पादों के मोल हैं।
अतः
Kc =
[C]c [D]d
[A]a [B]b
…. … … (i)
गैसीय क्रियाकारकों तथा
उत्पादों के लिए
PV = nRT
⇒
P =
n
V
RT
(P = आंशिक दाब)
PA = [A]RT,
PB = [B]RT,
PC = [C]RT,
PD = [D]RT
Kp =
(PC)c . (PD)d
(PA)a . (PB)b
Kp =
([C]RT)c . ([D]RT)d
([A]RT)a . ([B]RT)b
समीकरण (i) में →
Kp =
[C]c [D]d
[A]a [B]b
× (RT){(c+d) − (a+b)}
Δn = (c + d) − (a + b)
=
उत्पाद के मोल
−
क्रियाकारक के मोल
Kp = Kc . (RT)Δn
जब
Δn = 0, Kp = Kc
Δn > 0, Kp > Kc
Δn < 0, Kp < Kc
Note:
-
उत्क्रमणीय अभिक्रिया में
सक्रिय अभिक्रिया के लिए
प्राप्त साम्य स्थिरांक अन्य अभिक्रिया
के लिए प्राप्त साम्य स्थिरांक के व्युत्क्रमानुपाती
होता है।
A + B ⇌ C + D
अग्र अभिक्रिया के लिए →
Kc =
[C][D]
[A][B]
→ (i)
प्रतिगामी अभिक्रिया के लिए →
C + D ⇌ A + B
Kc‘ =
[A][B]
[C][D]
→ (ii)
समीकरण (i) तथा (ii) की तुलना करने पर →
Kc‘ =
1
Kc
-
समान रूप से, यदि
अभिक्रिया को
n मोल से गुणा करें,
तब नई अभिक्रिया का साम्य स्थिरांक
(K‘) का मान पहले वाले साम्य स्थिरांक (K) के
मान का n वाँ घात होगा अर्थात्
K‘ = Kn
H2 + I2 ⇌ 2HI
Kc =
[HI]2
[H2][I2]
→ (i)
2H2 + 2I2 ⇌ 4HI
Kc‘ =
[HI]4
[H2]2 [I2]2
→ (ii)
समीकरण (i) तथा (ii) की तुलना करने पर →
Kc‘ = Kc2
-
यदि अभिक्रिया को
n से भाग दिया जाता है,
तब नई अभिक्रिया का साम्य स्थिरांक
(K‘) का मान पहले वाले साम्य स्थिरांक (K) के
मान का 1/n वाँ घात होगा अर्थात्
K‘ = K1/n
H2 + I2 ⇌ 2HI
Kc =
[HI]2
[H2][I2]
→ (i)
1/2 H2 + 1/2 I2 ⇌ HI
Kc‘ =
[HI]
[H2]1/2 [I2]1/2
→ (ii)
समीकरण (i) तथा (ii) से →
Kc‘ = √Kc
विषमांगी साम्यावस्था
विषमांगी साम्य वह
साम्य अभिक्रियायें जिनमें
क्रियाकारक और
उत्पाद
विभिन्न अवस्थाओं में रहते हैं,
विषमांगी साम्य अभिक्रियायें
कहलाती हैं।
-
इस प्रकार की अभिक्रिया में
ठोस व
द्रवों की
सांद्रता स्थिर रहती है।
|
CaCO3 (s) ⇌ CaO(s) + CO2 (g)
Kc =
चूँकि
Kc = [CO2(g)] |
H2O (l) ⇌ H2O(g)
Kc =
चूँकि
Kc = [H2O(g)] |
अभिक्रिया भागफल
अभिक्रिया भागफल (Q) —
जब अभिक्रिया साम्य में न हो, तब किसी भी समय पर
क्रियाकारक और
उत्पाद की सांद्रताओं के अनुपात को
अभिक्रिया भागफल (Q) कहते हैं।
-
अभिक्रिया अग्र दिशा में चलेगी या
पश्च दिशा में, इसका पता लगाने के लिए
अभिक्रिया भागफल का उपयोग किया जाता है। -
साम्यावस्था स्थिरांक (K) की तरह
अभिक्रिया भागफल (Q) का मान ज्ञात किया जाता है।
किसी सामान्य अभिक्रिया के लिए
aA + bB ⇌ cC + dD
क्रियाकारक
उत्पाद
Qc =
[C]c [D]d
[A]a [B]b
जब अभिक्रिया साम्यावस्था पर होती है, तब
Q का मान
साम्यावस्था स्थिरांक (K) के बराबर हो जाता है।
अर्थात साम्यावस्था पर,
Q = K = Kc = Kp इत्यादि।
-
यदि Qc = Kc हो, तो
अभिक्रिया मिश्रण साम्यावस्था में है। -
यदि Qc > Kc हो, तो
अभिक्रिया अभिकारकों की ओर चलेगी
(पश्च दिशा में)। -
यदि Qc < Kc हो, तो
अभिक्रिया उत्पादों की ओर चलेगी
(अग्र दिशा में)।
उदाहरण
प्रश्न —
2A → B + C अभिक्रिया के लिए
Kc का मान
2 × 10−3 है।
यदि प्रारम्भ में
[A] = [B] = [C] = 3 × 10−4 M हैं,
तो अभिक्रिया किस दिशा में सम्पन्न होगी?
हल —
अभिक्रिया के लिए
अभिक्रिया भागफल
Qc =
[B] [C]
[A]2
[A] = [B] = [C] = 3 × 10−4 M
Qc =
[B] [C]
[A]2
=
3 × 10−4 × 3 × 10−4 M2
(3 × 10−4)2 M2
= 1
इस प्रकार से
Qc > Kc
इसलिए अभिक्रिया विपरीत दिशा (पश्च दिशा)
में चलेगी।
ली-शातालिये का सिद्धान्त
“यदि साम्य पर किसी अभिक्रिया में
दाब,
ताप या
सान्द्रता में कोई
परिवर्तन किया जाये तो
साम्यावस्था उस दिशा में अग्रसर होती है,
जिससे निकाय पर लगाया हुआ प्रभाव
कम अथवा
समाप्त हो जाये।”
साम्य को प्रभावित करने वाले कारक
aA + bB ⇌ cC + dD,
तथा Δn = (c + d) − (a + b)
| साम्य में निकाय में परिवर्तन | साम्य अवस्था | साम्य स्थिरांक के मान में |
|---|---|---|
|
A और B की सान्द्रता में वृद्धि |
दायीं ओर | परिवर्तित नहीं होता |
|
C और D की सान्द्रता में वृद्धि |
बायीं ओर | परिवर्तित नहीं होता |
| दाब में वृद्धि |
दायीं ओर यदि ( N2 + 3H2 ⇌ 2NH3 )
बायीं ओर यदि ( PCl5 ⇌ PCl3 + Cl2 )
परिवर्तन नहीं होता यदि ( H2 + I2 ⇌ 2HI ) |
परिवर्तित नहीं होता परिवर्तित नहीं होता परिवर्तित नहीं होता |
| ताप में वृद्धि |
बायीं ओर यदि
दायीं ओर यदि |
मान घटता है
मान बढ़ता है |
साम्य पर उत्प्रेरक का प्रभाव —
उत्प्रेरक किसी
अभिक्रिया के
साम्य स्थिरांक में परिवर्तन नहीं करता
किन्तु यह साम्य को
शीघ्र स्थापित करने में सहायता करता है।
विद्युत अपघट्य
ये पदार्थ
जलीय विलयन में
आयनित होकर
विद्युत धारा प्रवाहित करते हैं,
ये विद्युत अपघट्य कहलाते हैं।
आयनन के आधार से
ये दो प्रकार के होते हैं।
|
प्रबल विद्युत अपघट्य
वे पदार्थ जो
उदाहरण : |
दुर्बल विद्युत अपघट्य
वे पदार्थ जो
उदाहरण : |
वैद्युत अनापघट्य वे
पदार्थ जलीय विलयन में
आयनित नहीं होते, तथा
विद्युत धारा प्रवाहित नहीं करते हैं।
वे वैद्युत अनापघट्य कहलाते हैं।
अम्ल, क्षारक एवं लवण
- अम्ल तथा क्षारक की आर्हेनियस धारणा
- ब्रॉन्स्टेड लोरी अम्ल एवं क्षारक
- लुईस अम्ल एवं क्षारक
1. अम्ल तथा क्षारक की आर्हेनियस धारणा
-
वे पदार्थ जो
जल में घुलने पर
H+ आयन देते हैं,
अम्ल कहलाते हैं।
HCl(l) → H+(aq) + Cl−(aq)
अथवा
HCl(l) → H3O+(aq) + Cl−(aq)
H+
अत्यधिक क्रियाशील होता है तथा
जलीय विलयन में यह
जल अणु के
अविभाजित युग्म से बन्धित होकर
हाइड्रोनियम आयन,
H3O+(aq)
(जलयोजित प्रोटॉन) देता है।
| प्रबल अम्ल | दुर्बल अम्ल |
|---|---|
|
वे अम्ल जिनका जलीय विलयन में पूर्णतः आयनन होता है। उदाहरण: |
वे अम्ल जिनका जलीय विलयन में पूर्णतः आयनन नहीं होता है। उदाहरण: |
-
वे पदार्थ जो
जल में घुलने पर
OH− आयन देते हैं,
क्षार कहलाते हैं।
NaOH + H2O → Na+(aq) + OH−(aq)
| प्रबल क्षार | दुर्बल क्षार |
|---|---|
|
वे क्षार जिनका जलीय विलयन में पूर्ण आयनन होता है। उदाहरण: NaOH, KOH |
वे क्षार जिनका जलीय विलयन में पूर्ण आयनन नहीं होता है। उदाहरण: NH4OH |
2. ब्रॉन्स्टेड लोरी अम्ल एवं क्षार
|
ब्रॉन्स्टेड अम्ल
अम्ल ———→ H+ + संयुग्मी क्षार |
ब्रॉन्स्टेड क्षार
क्षार + H+ ———→ संयुग्मी अम्ल |
Note:
-
संयुग्मी अम्ल में
एक अतिरिक्त प्रोटॉन होता है तथा
प्रत्येक संयुग्मी क्षार में
एक प्रोटॉन कम होता है।
अर्थात्,संयुग्मी अम्ल ⇌ संयुग्मी क्षार + H+
-
प्रबल अम्ल का
संयुग्मी क्षार
एक दुर्बल क्षार होता है या उसके विपरीत होता है।
दुर्बल अम्ल का
संयुग्मी क्षार
प्रबल होता है या उसके विपरीत होती है।
H2O का संयुग्मी क्षार OH− है तथा
क्षार NH3 का संयुग्मी अम्ल
NH4+ है।
प्रश्न —
निम्नलिखित ब्रॉन्स्टेड अम्लों के लिए
संयुग्मी क्षार क्या है?
HF, H2SO4 तथा HCO3−
हल —
अम्लों से संयुग्मी क्षार बनाने के लिए
प्रत्येक से एक प्रोटॉन (H+)
कम करना होगा। अतः
संयुग्मी क्षार क्रमशः
F−, HSO4− तथा
CO32− हैं।
3. लुईस अम्ल एवं लुईस क्षार
लुईस क्षार
-
“लुईस क्षार वह पदार्थ होता है
जो उपसहसंयोजी बंध बनाने के लिये
एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म का
दान करता है।” -
लुईस क्षार को
इलेक्ट्रॉन युग्म दाता या
न्यूक्लियोफाइल भी कहते हैं।
उदाहरण —
H2O, NH3, OH−
लुईस क्षारों के प्रकार :
-
उदासीन यौगिक जिनमें किसी परमाणु पर
एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित हो,
जैसे NH3, H2O, R−O−H -
ऋणावेशित स्पीशीज या
ऋणायन
Cl−, CN−, OH−, F− आदि
लुईस अम्ल
-
“लुईस अम्ल वह पदार्थ होता है
जो एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म को
ग्रहण करता है।” -
अम्ल को
इलेक्ट्रॉन युग्म ग्राही या
इलेक्ट्रोफाइल कहते हैं।
उदाहरण — AlCl3, Mg2+
लुईस अम्लों के प्रकार :
-
अणु जिनके केन्द्रीय परमाणु में
इलेक्ट्रॉनों का अष्टक पूर्ण नहीं होता,
उदाहरण, BF3, AlCl3, MgCl2, BCl3 आदि। -
धनायन (cations) :
सभी धनात्मक लुईस अम्लों की भाँति व्यवहार करते हैं क्योंकि वे
इलेक्ट्रॉन युग्म लेने में सक्षम होते हैं। -
अणु जिनके केन्द्रीय परमाणु में
रिक्त d-कक्षक होते हैं,
अर्थात् SiF4, SnCl4, PF5 आदि।
उदाहरण —
BF3 का अष्टक अपूर्ण होने के कारण यह
एकाकी e− युग्म ग्रहण करता है तथा
NH3 के N के पास एकाकी e− युग्म होने के कारण,
अपना e− युग्म BF3 को देकर
उपसहसंयोजी बंध बनाता है।
BF3 + NH3 → BF3 ← NH3
लुईस अम्ल
लुईस क्षार
(उपसहसंयोजी बंध)
जल का आयतन स्थिरांक एवं इसका आयनिक गुणनफल
-
जल एक
दुर्बल विद्युत अपघट्य है, जो कि
थोड़ी सी मात्रा में स्वतः ही
आयनित हो जाता है। -
शुद्ध जल H2O एक
अम्ल तथा
क्षार दोनों की तरह व्यवहार करता है,
अर्थात जल का दूसरा अणु एक
प्रोटॉन ग्रहण करता है एवं उसी समय
क्षारक की तरह व्यवहार करता है।
H2O(l) + H2O(l)
→ H3O+(aq) या H+(aq)
+ OH−(aq)
अम्ल
क्षार
संयुग्मी अम्ल
संयुग्मी क्षार
H2O ⇌ H+ + OH−
K =
[H+][OH−]
[H2O]
K[H2O] = [H+] [OH−]
Kw = [H+] [OH−]
Kw = जल का आयनिक गुणनफल
“एक विशेष ताप पर जल में
H+ एवं
OH− आयनों की
सांद्रताओं के
गुणनफल को जल का
आयनिक गुणनफल कहते हैं।
इसे Kw से व्यक्त करते हैं।”
298 K पर प्रायोगिक रूप से
H+ आयन की सांद्रता
1.0 × 10−7 M पाई गई है और जल के
वियोजन से उत्पन्न
H+ और
OH− आयनों की संख्या बराबर होती है,
[H+] = [OH−] = 1 × 10−7 M
or
Mole / liter
इस प्रकार, 298 K पर
Kw का मान —
Kw = [H+][OH−]
= (1 × 10−7 M)(1 × 10−7 M)
= 1 × 10−14 M2
250 या 298 K पर,
एक लीटर जल में,
कुल लगभग 55.5 मोलों में से केवल
जल के 10−7 मोल ही
आयनिक रूप में रहते हैं।
[H+] = [OH−]
विलयन उदासीन होता है।
[H+] > [OH−]
विलयन अम्लीय होता है।
[H+] < [OH−]
विलयन क्षारीय होता है।
pH स्केल
विलयन में
H+ की
सांद्रता के पद में
अम्लीयता को मापने के लिये
एक पैमाना विकसित किया गया,
जिसको pH स्केल कहते हैं।
अतः किसी विलयन का pH
उसके H+ आयन सांद्रता का
ऋणात्मक लघुगणक होता है।
pH = − log[H+]
Note: यदि
[H+] आयन की सांद्रता
= 10−x तब उसका
pH = x
| [H+] | 10−2 M | 10−4 M | 10−7 M |
|---|---|---|---|
| pH | 2 | 4 | 7 |
pH किसी विलयन में
H+ आयन की सांद्रता को
व्यक्त करता है तथा
pOH विलयन में
OH− आयन की सांद्रता को
व्यक्त करता है।
हम जानते हैं कि —
[H+] [OH−] = Kw = 1 × 10−14
समीकरण के दोनों ओर का
लघुगणक लेने पर —
log [H+] + log [OH−] = log Kw = log (1 × 10−14)
or
−log[H+] − log[OH−] = −log Kw = −log(1 × 10−14)
or
pH + pOH = pKw = 14
शुद्ध तथा उदासीन जल में
298 K पर
हाइड्रोजन आयन की सांद्रता
10−7 M होती है,
इसलिए इसका
pH
= −log (10−7) = 7 होगा।
| विलयन का प्रकार | [H+] | [OH−] | pH | pOH |
|---|---|---|---|---|
| अम्लीय विलयन | > 10−7 | < 10−7 | < 7 | > 7 |
| उदासीन विलयन | 10−7 | 10−7 | 7 | 7 |
| क्षारीय विलयन | < 10−7 | > 10−7 | > 7 | < 7 |
दुर्बल अम्लों के आयनन या वियोजन स्थिरांक
माना दुर्बल अम्ल
HX हो तो —
HX(aq) + H2O(aq) ⇌ H3O+(aq) + X−(aq)
दुर्बल अम्ल
| प्रारम्भिक सान्द्रता | C | 0 | 0 |
माना α आयनीकरण की मात्रा है। |
| सान्द्रता में परिवर्तन | −Cα | + Cα | + Cα | |
| साम्य सान्द्रता | C − Cα | Cα | Cα |
C = अवियोजित अम्ल HX की प्रारम्भ में सान्द्रता |
Ka =
C2 α2
C(1−α)
=
C α2
(1−α)
Ka =
अम्ल HX का
वियोजन या
आयनन स्थिरांक
α <<<< 1
Ka = C α2
या
α =
√
Ka
C
या
α =
1
√c
या
α = √V
Note:
-
Ka = C α2,
Ka का मान जितना अधिक होगा
अम्ल उतना ही अधिक
प्रबल होगा। -
α =
1
√c
,
अम्ल का वियोजन
या α का मान c के
वर्गमूल का व्युत्क्रम होता है। -
α = √V,
अम्ल का वियोजन या
आयनन α
तनुकरण के समानुपाती है। -
pK के रूप में लिखने पर —
pK = −log K
दुर्बल अम्लों के लिए
pKa के मान उच्च तथा
Ka के मान कम होते हैं।
दुर्बल क्षारकों का आयनन या वियोजन स्थिरांक
माना दुर्बल क्षार
MOH होता है —
MOH(aq) ⇌ M+(aq) + OH−(aq)
दुर्बल क्षार
| प्रारम्भिक सान्द्रता | C | 0 | 0 |
माना α आयनीकरण की मात्रा है। |
| सान्द्रता में परिवर्तन | −Cα | + Cα | + Cα | |
| साम्य सान्द्रता | C − Cα | Cα | Cα |
C = अवियोजित क्षार MOH की प्रारम्भ में सान्द्रता |
Kb =
C2 α2
C(1−α)
=
C α2
(1−α)
Kb =
क्षार MOH का
वियोजन या
आयनन स्थिरांक
α <<<< 1
Kb = C α2
या
α =
√
Kb
C
या
α =
1
√c
या
α = √V
Note:
-
Kb = C α2,
Kb का मान जितना अधिक होगा
क्षार उतना ही अधिक
प्रबल होगा। -
α =
1
√c
,
क्षार का वियोजन या आयनन α
क्षार की प्रारम्भ में सान्द्रता
के वर्गमूल के व्युत्क्रम के समानुपाती होता है। -
α = √V,
क्षार का वियोजन या आयनन α
तनुकरण के समानुपाती होता है। -
pK के रूप में विलयन पर —
pKb = −log Kb
दुर्बल क्षारों के लिए
pKb के मान उच्च तथा
Kb के मान कम होते हैं।
pK value
दुर्बल अम्ल तथा
दुर्बल क्षार के
वियोजन गुणांक (K) का
ऋणात्मक लघुगणक होता है।
pKa = −log Ka
तथा
pKb = −log Kb
माना कि HF एक
दुर्बल अम्ल है और
इसका संयुग्मी क्षार
F− होता है —
HF ⇌ H+ + F−
Ka =
[H+][F−]
[HF]
→ (i)
F− + H2O ⇌ HF + OH−
Kb =
[HF][OH−]
[F−]
→ (ii)
समीकरण (i) × (ii)
Ka × Kb =
[H+][F−]
[HF]
×
[HF][OH−]
[F−]
Ka × Kb = [H+][OH−] = Kw
or
Ka × Kb = Kw
ऋणात्मक लघुगणक लेने पर —
log Ka + log Kb = log Kw
or
−log Ka − log Kb = −log Kw
pKa + pKb = pKw = 14
(at 298 K)
pKa = −log Ka
(दुर्बल अम्लों के लिए pKa का मान उच्च तथा Ka का मान कम होता है।)
pKb = −log Kb
(दुर्बल क्षारों के लिए pKb का मान उच्च तथा Kb का मान कम होता है।)
अम्ल-सामर्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक
-
अम्ल का
वियोजन
H − A बन्ध की
सामर्थ्य तथा
ध्रुवणता पर निर्भर करती है।
अम्ल की प्रबलता α ∝
1
बन्ध की सामर्थ्य
α ∝ अम्ल की ध्रुवणता
अम्ल की ध्रुवणता = Hδ+ − Clδ−
- आवर्त सारणी में —
|
F
Cl Br I ↓ |
वर्ग में ऊपर से नीचे चलने पर
आकार ↑ HF < HCl < HBr < HI |
-
एक ही आवर्त के तत्वों में —
बायें से दायें चलने पर, आकार ↓, ध्रुवणता ↑, बन्ध ध्रुवण ↑,
अम्लीय प्रकृति ↑
CH4 < NH3 < H2O < HF
लवणों का जल-अपघटन एवं इनके विलयन का pH
अम्ल + क्षार = लवण + H2O
H2O
अम्ल + क्षार
जलीय विलयन
लवणों के प्रकार —
- प्रबल अम्ल एवं प्रबल क्षार के लवण
- प्रबल अम्ल एवं दुर्बल क्षार के लवण
- दुर्बल अम्ल एवं प्रबल क्षार के लवण
- दुर्बल अम्ल एवं दुर्बल क्षार के लवण
(a) प्रबल अम्ल एवं प्रबल क्षार के लवण
उदाहरण —
NaCl (HCl + NaOH), NaNO3, Na2SO4 आदि
NaCl(s) + H2O(l) ⇌ NaOH(aq) + HCl(aq)
लवण
प्रबल क्षार
प्रबल अम्ल
ये लवण समान रूप से
आयनित होते हैं, अतः इन लवणों के
विलयन उदासीन
(pH = 7) होता है।
(b) प्रबल अम्ल एवं दुर्बल क्षार के लवण
उदाहरण —
NH4Cl, NH4NO3, (NH4)2SO4 आदि।
NH4Cl(s) + H2O ⇌ NH4OH(aq) + HCl(aq)
or
H+(aq) Cl−(aq)
लवण
दुर्बल क्षार
प्रबल अम्ल
इन लवणों का
विलयन
H+(aq) आयन बनने के कारण
अम्लीय प्रकृति
(pH < 7) का होता है।
(c) दुर्बल अम्ल एवं प्रबल क्षार के लवण
उदाहरण —
CH3COONa, CH3COOK, HCOONa आदि।
CH3COONa + H2O ⇌ CH3COOH + NaOH(aq)
or
Na+(aq) OH−(aq)
लवण
दुर्बल अम्ल
प्रबल क्षार
इन लवणों का
विलयन
OH−(aq) आयन बनने के कारण
क्षारीय प्रकृति
(pH > 7) का होता है।
(d) दुर्बल अम्ल एवं दुर्बल क्षार के लवण
उदाहरण —
CH3COONH4, HCOONH4, NH4CN,
(NH4)2CO3 आदि।
CH3COONH4 + H2O(l) ⇌ CH3COOH + NH4OH
लवण
दुर्बल अम्ल
दुर्बल क्षार
ये लवण समान रूप से
आयनित होते हैं, अतः इन लवणों के
विलयन उदासीन
(pH = 7) होता है।
बफर-विलयन
-
ऐसे विलयन, जिनका
pH तनु करने अथवा
अम्ल या
क्षार की थोड़ी सी मात्रा मिलाने के बाद भी
अपरिवर्तित रहता है,
बफर-विलयन कहलाते हैं। -
उदाहरण —
CH3COONH4,
NH4OH आदि।
CH3COONH4
⇌
CH3COO−
+
NH4+
अमोनियम एसीटेट
यदि HCl की कुछ मात्रा जोड़ते हैं, तो —
CH3COO− + H+Cl−
⇌
CH3COOH
(दुर्बल अम्ल)
(pH में कोई परिवर्तन नहीं)
यदि NaOH की कुछ मात्रा जोड़ते हैं, तो —
NH4+ + Na+OH−
⇌
NH4OH
(दुर्बल क्षार)
(pH में कोई परिवर्तन नहीं)
विलेयता तथा विलेयता गुणनफल
विलेयता —
किसी पदार्थ की विलेयता,
एक निश्चित ताप पर
विलायक की निश्चित मात्रा में
घुली हुई उस पदार्थ की
अधिकतम मात्रा होती है।
विलेयता गुणनफल —
एक निश्चित ताप पर
कम मात्रा में घुलने वाले
वैद्युत अपघट्य का
विलेयता गुणनफल,
उनके संतृप्त विलयन में उपस्थित
आयनिक सांद्रताओं के गुणनफल के बराबर होता है।
इसे विलेयता गुणनफल कहते हैं।
इसे Ksp से व्यक्त करते हैं।
विलेयता गुणनफल (Ksp) की गणना
माना के
AyBx प्रकार का
विद्युत अपघट्य
वियोजित होकर निम्न प्रकार से आयन देता है,
AyBx → yAx+ + xBy−
yS
xS
द्रव्यमान अनुपाती क्रिया नियम से,
Kc =
[Ax+]y [By−]x
[AyBx]
or
Kc × [AyBx] =
[Ax+]y [By−]x
Ksp
or
Ksp = [Ax+]y [By−]x
यदि साम्यावस्था पर
मोलर-विलेयता S हो तो —
Ksp = [Ax+]y [By−]x
Ksp = (yS)y (xS)x
= yy . xx . S(x+y)
S(x+y) =
Ksp
yy xx
S =
(
Ksp
yy xx
)1/(x+y)
विलेयता गुणनफल तथा आयनिक गुणनफल
यदि —
-
जब Kip < Ksp हो, तो
विलयन असंतृप्त होगा जिसमें और अधिक
विलेय घोला जा सकता है।
अर्थात कोई अवक्षेपण नहीं होगा। -
जब Kip = Ksp हो, तो
विलयन संतृप्त होगा जिसमें और
विलेय नहीं घोला जा सकता,
लेकिन अवक्षेपण नहीं बनेगा। -
जब Kip > Ksp हो, तो
विलयन अतिसंतृप्त होगा अर्थात
अवक्षेपण होगा।
जहाँ Kip =
आयनिक गुणनफल
उदाहरण
AgCl ⇌ Ag+(aq) + Cl−(aq)
K =
[Ag+] [Cl−]
[AgCl]
Ksp = [Ag+] [Cl−]
उदाहरण
जिरकोनियम फॉस्फेट
(Zr)3(PO4)4
के लिए गुणनफल Ksp तथा
मोलर विलेयता (S)
(Zr)3(PO4)4
⇌
3Zr4+ + 4PO43−
यदि
[Zr4+] = 3S
तथा
[PO43−] = 4S
अतः
Ksp = (3S)3 (4S)4
= 6912 (S)7
या
S =
Ksp
xx·yy
1/(x+y)
=
Ksp
33·44
1/(3+4)
=
Ksp
6912
1/7
प्रश्न
यह मानते हुए कि किसी भी प्रकार के आयन
जल से अभिक्रिया नहीं करते,
शुद्ध जल में A2X3 की
विलेयता की गणना कीजिए।
A2X3 का विलेयता गुणनफल
Ksp = 1.1 × 10−23 है।
हल —
A2B3 ⇌ 2A3+ + 3X2−
2S 3S
Ksp = [A3+]2 [X2−]3
1.1 × 10−23 = [A3+]2 [X2−]3
यदि S = A2B3 की
विलेयता हो तो —
[A3+] = 2S,
[X2−] = 3S
अतः
1.1 × 10−23 = [2S]2 × [3S]3
108 S5 = 1.1 × 10−23
S5 = 1 × 10−25
या
S = 1.0 × 10−5 mol/L
सम-आयन प्रभाव
-
यदि किसी दुर्बल विद्युत अपघट्य के विलयन में
सम-आयन वाला कोई
प्रबल विद्युत अपघट्य मिला दिया जाये, तो
दुर्बल विद्युत अपघट्य के
वियोजन की मात्रा कम हो जाती है।
इस प्रभाव को सम-आयन प्रभाव कहते हैं। - यह लॉ-शातेलिए सिद्धान्त पर आधारित है।
उदाहरण —
CH3COOH
(दुर्बल विद्युत अपघट्य)
का वियोजन
CH3COOH
⇌
CH3COO− + H+
एसीटिक अम्ल
एसीटेट आयन
यदि हम और अधिक मात्रा में
CH3COO− आयन मिलाते हैं,
तो H+ की सांद्रता घटती है।
अथवा H+ आयन मिलाते हैं, तो
CH3COO− की सांद्रता घटती है।
अतः साम्य लाने के लिए
साम्यावस्था बायीं ओर
(पश्च दिशा) विस्थापित होगी।
