परमाणु शब्द ग्रीक भाषा से उत्पन्न हुआ है, जिसमें atomio का अर्थ ‘न काटे जाने वाला’ या अविभाज्य होता है। लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा किये गये प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ कि परमाणु को आगे विभाजित कर सकते हैं।
इलेक्ट्रॉन की खोज : कैथोड किरण
कैथोड किरणों की खोज विलियम क्रुक्स द्वारा की गई। वैज्ञानिक क्रुक्स ने विसर्जन नलिका का उपयोग करके यह प्रयोग किया। कैथोड किरण विसर्जन नलिका का चित्र भी होता है, जिसमें वायु के दो इलेक्ट्रोड (कैथोड तथा एनोड) लगे होते हैं।
- जब कैथोड किरण विसर्जन नलिका में वायु के निम्न दाब पर उच्च विभव (10,000 वोल्ट) लगाया तो कैथोड से किरणें निकलकर एनोड की ओर से गयीं। इन्हें कैथोड किरण कहते हैं और कैथोड किरण पुंज कहा गया।
- कैथोड किरणें विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्रों की अनुपस्थिति में सीधी रेखा में गमन करती हैं।
- जब कैथोड किरणें फ्लुओरोसेंट पदार्थ जैसे जिंक सल्फाइड लेपित परदे (ZnS) पर टकराती हैं, तब प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।
- यह मोटी धातु सतह को कैथोड किरणों के मार्ग में रखने पर उसके पीछे छाया उत्पन्न करती हैं।
- कैथोड किरणें यांत्रिक प्रभाव उत्पन्न करती हैं, अर्थात मार्ग में रखे हल्के पैडल को घुमा देती हैं।
- कैथोड किरणों में ऊष्मीय प्रभाव होता है, अर्थात जैसा गैस से गुजराती हैं उस क्षेत्र को गर्म कर देती हैं।
- इन किरणों को पृथक विसर्जन नलिका में उपस्थित कैथोड के पदार्थ द्वारा या गैस से प्रभावित नहीं करती हैं।
- विद्युत क्षेत्र की उपस्थिति में कैथोड किरणें धनावेशित प्लेट की ओर तथा चुम्बकीय क्षेत्र में निम्न की ओर विक्षेपित हो जाती हैं। यह सिद्ध करता है कि कैथोड किरणें ऋणावेशित कणों से बनी होती हैं, जिन्हें इलेक्ट्रॉन कहते हैं तथा इनमें द्रव्यमान होता है।
इलेक्ट्रॉन का आवेश द्रव्यमान (e/m) अनुपात (जे. जे. थॉमसन)
जे. जे. थॉमसन ने इलेक्ट्रॉनों पर एक साथ लंबवत विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्र लगाकर e/m का मान ज्ञात किया।
- जब केवल विद्युत क्षेत्र लगाया जाता है, तब इलेक्ट्रॉन पुंज परदे पर A बिंदु पर टकराते हैं।
- इसी प्रकार जब केवल चुम्बकीय क्षेत्र लगाया जाता है, तब वे इलेक्ट्रॉन पुंज परदे पर C बिंदु पर टकराते हैं।
- विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्र को उपयुक्त रूप से समायोजित करने पर इलेक्ट्रॉन पुंज सीधी रेखा में गमन करते हुए B बिंदु पर टकराते हैं।
अतः इलेक्ट्रॉन के e / me का मान 1.76 × 1011 C kg−1 प्राप्त होता है।
e / me = 1.76 × 1011 C kg−1
इलेक्ट्रॉनों पर आवेश (मिलिकन की तेल की बूँद विधि द्वारा)
- इलेक्ट्रॉनों पर आवेश मिलिकन की तेल की बूँद विधि द्वारा ज्ञात किया गया।
- इस विधि में संधारित्र की प्लेटों के समान दो क्षैतिज गोलाकार प्लेटें ली जाती हैं। ऊपर की प्लेट में उपस्थित छोटे से छिद्र से तेल की बूँदें गुजारी जाती हैं।
- उन बूँदों के मुक्त पतन की दर का सूक्ष्मदर्शक द्वारा अवलोकन करके बूँद का द्रव्यमान ज्ञात किया जाता है।
- कक्ष के अंदर की वायु को X-किरणों द्वारा आयनित किया जाता है, जिससे तेल की बूँदों पर आयनीत गैस के कारण विद्युत आवेश आ जाता है।
- इस प्रकार मिलिकन ने निष्कर्ष निकाला कि तेल की बूँद पर विद्युत आवेश (q) का परिमाण सदैव निश्चित आवेश (e) का पूर्ण गुणज होता है।
q = ne
n = 1, 2, 3 ... (e− की संख्या)
e = e− पर आवेश
इलेक्ट्रॉन पर आवेश = −1.6 × 10−19 C
इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान (m) की गणना
m = e / (e/m)
= (1.6 × 10−19 C) / (1.76 × 1011 C kg−1)
= 9.10 × 10−31 kg
उदाहरण
प्रश्न — मिलिकन के प्रयोग में तेल की बूँद पर स्थैतिक विद्युत आवेश −1.282 × 10−18 C है। उसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात कीजिए।
दिया है — तेल की बूँद पर कुल आवेश, q = −1.282 × 10−18 C
एक इलेक्ट्रॉन पर आवेश = e = −1.6022 × 10−19 C
हम जानते हैं : q = ne
n = q / e
n = (−1.282 × 10−18) / (−1.6022 × 10−19)
n = 8
अतः तेल की बूँद पर उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या = 8
प्रोटॉन की खोज - केनाल किरणें
- प्रोटॉन की खोज निम्नलिखित प्रकार की गयी।
- विसर्जन नलिका में छिद्रित कैथोड का उपयोग किया गया और जिससे यह ज्ञात हुआ कि ऐनोड से कैथोड की तरफ किरणें गमन करती हैं जिन्हें धनात्मक या केनाल किरणें कहा गया है।
धनावेशित कणों के गुण निम्नलिखित हैं -
- कैथोड किरणों के विपरीत, धनावेशित या केनाल किरण नलिका में उपस्थित गैस की प्रकृति पर निर्भर करती हैं।
- धनात्मक रश्मियाँ आवेशित अणु (जैसे H+, O2+ etc.) होते हैं। ये कैथोड के छिद्रों से होकर गुजरते हैं और यदि छिद्र के सामने उस गैस का एक पात्र रखकर भरें, तो उससे उसी गैस के धनात्मक आयन उत्पन्न होते हैं।
- गैसों तथा यौगिकों में इन कणों का व्यवहार कैथोड किरणों के व्यवहार के विपरीत है।
- सबसे छोटा और हल्का कण आयन हाइड्रोजन से प्राप्त हुआ था। इसे प्रोटॉन (H+) कहते हैं।
| गैसीय परमाणु | धनात्मक या केनाल किरण | इलेक्ट्रॉन या कैथोड किरण |
|---|---|---|
| H | H+ | e− |
| O ⟶ | O+ | e− |
| O2 ⟶ | O2+ | e− |
| O2 ⟶ | O22+ | 2e− |
- प्रोटॉन पर आवेश = 1.6×10−19 C
- प्रोटॉन का द्रव्यमान = m = 1.67×10−27 kg
न्यूट्रॉन की खोज
न्यूट्रॉन की खोज (चैडविक द्वारा)
- चैडविक ने बेरिलियम पर α-कणों का प्रहार करवाया, जिससे प्रोटॉन के भार से कुछ अधिक भार वाले विद्युत उदासीन कण प्राप्त हुए। इन्हें न्यूट्रॉन (n) नाम दिया गया।
94Be + 42He → 126C + 10n
- न्यूट्रॉन (10n) पर आवेश = 0
- न्यूट्रॉन (10n) का द्रव्यमान m = 1.68×10−27 kg
| नाम | प्रतीक | आवेश (कूलॉम) | सापेक्ष आवेश | द्रव्यमान (kg) | द्रव्यमान (Amu) | लगभग द्रव्यमान |
|---|---|---|---|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन | (e) | −1.602 × 10−19 | −1 | 9.109 × 10−31 | 0.000546 | 0 |
| प्रोटॉन | (p) | +1.602 × 10−19 | +1 | 1.67 × 10−27 | 1.00728 | 1 |
| न्यूट्रॉन | (n) | शून्य | शून्य | 1.68 × 10−27 | 1.00899 | 1 |
परमाणु मॉडल
परमाणु का थॉमसन मॉडल
- जो जे थॉमसन ने परमाणु को एक ठोस गोला माना जिसमें धनावेश समान रूप से व्याप्त रहता है तथा इस धनावेशित गोले में इलेक्ट्रॉन वैसे ही धँसे होते हैं जैसे खरबूजे के भीतर बीज धँसे होते हैं।
- इस मॉडल को थॉमसन का प्लम-पुडिंग मॉडल भी कहते हैं। इस मॉडल में परमाणु के धनावेश को पुडिंग अथवा तरबूज के समान माना गया है, जिसमें इलेक्ट्रॉन किशमिश एवं अथवा तेज की तरह धँसे हों।
रदरफोर्ड का नाभिकीय परमाणु मॉडल
- परमाणु की संरचना का निर्धारण करने के लिए रदरफोर्ड ने α-कणों के स्वर्ण की पतली पन्नी पर बमबारी की। इस पतली पन्नी के आसपास जिंक सल्फाइड का पर्दा उपस्थित होता है।
- इस पर्दे पर α-कणों के टकराने पर स्किंटिलेशन होता है, जो प्रकाश की चमक उत्पन्न होती है।
- इस प्रयोग से निम्न प्रेक्षण प्राप्त हुए।
- अधिकांश α-कण स्वर्ण की पन्नी से बिना विचलित हुए निकल गए।
- 200 में 1 α-कण थोड़ा कम कोण से विचलित हुआ।
- 20,000 में से 1 कण की लौट अर्थात लगभग 180° के कोण से वापस लौट गए।
इन प्रयोगों के निष्कर्ष
- परमाणु के अंदर अधिकांश भाग खाली होता है, क्योंकि अधिकांश α-कण स्वर्ण की पन्नी को पार कर जाते हैं।
- कुछ ही धनावेशित α-कण विचलित होते हैं। यह विचलन अवश्य ही आकर्षणीय प्रतिकर्षण बल के कारण होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि थॉमसन के विचार के विपरीत परमाणु के अंदर धनावेश समान रूप से नहीं बँटा हुआ है।
- धनावेश बहुत कम आयतन के अंदर संकेंद्रित होना चाहिए, जिससे धनावेशित α-कणों का प्रतिकर्षण और प्रकीर्णन हुआ हो।
- रदरफोर्ड ने गणना करके दिखाया कि नाभिक का आयतन परमाणु के कुल आयतन की तुलना में अत्यंत कम (नगण्य) होता है। परमाणु की त्रिज्या लगभग 10−10 m होती है, जबकि नाभिक की त्रिज्या लगभग 10−15 m होती है।
ऊपर दिए गए प्रेक्षणों और परिणामों के आधार पर रदरफोर्ड ने परमाणु का नाभिकीय मॉडल प्रस्तुत किया। इस मॉडल के अनुसार —
- परमाणु का लगभग समस्त धनावेश एवं समस्त द्रव्यमान एक अति अल्प क्षेत्र में केंद्रित होता है। परमाणु के इस अति अल्प भाग को रदरफोर्ड ने नाभिक कहा।
- नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन वृत्तीय पथों में, जिन्हें कक्षा (orbit) कहा जाता है, बड़े वेग से घूमते हैं।
- अतः परमाणु की रचना सौरमंडल जैसी प्रतीत होती है, जिसमें सूर्य के समान नाभिक केंद्र में स्थित होता है और इलेक्ट्रॉन ग्रहों के समान उसके चारों ओर घूमते रहते हैं।
- इलेक्ट्रॉन तथा नाभिक आपस में आकर्षण के लिए वैद्युत बलों के द्वारा बँधे रहते हैं।
परमाणु संख्या तथा द्रव्यमान संख्या
परमाणु संख्या (Z) = प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
द्रव्यमान संख्या (A) = प्रोटॉनों की संख्या (Z) + न्यूट्रॉनों की संख्या
10n
ऋणायन परमाणु में - प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या = परमाणु संख्या (Z)
ऋणायन में (Xn−)
इलेक्ट्रॉनों की संख्या > प्रोटॉनों की संख्या
∴ इलेक्ट्रॉनों की संख्या = Z + n
धनायन में (Mn+)
इलेक्ट्रॉनों की संख्या < प्रोटॉनों की संख्या
∴ इलेक्ट्रॉनों की संख्या = Z − n
प्रश्न — 8035Br में प्रोटॉन, न्यूट्रॉन तथा इलेक्ट्रॉनों की संख्या का परिकलन कीजिए।
हल — 8035Br में Z = 35, A = 80, सामान्य उदासीन है।
प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या = Z = 35
न्यूट्रॉनों की संख्या = 80 − 35 = 45
प्रश्न — किसी स्पीशीज में इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन की संख्या क्रमशः 18, 16 तथा 16 है। इसका प्रतीक लिखिए / बताइए।
हल — परमाणु संख्या (Z) = प्रोटॉनों की संख्या (p) = 16 अतः यह तत्व सल्फर (S) है।
परमाणु द्रव्यमान संख्या (A) =
प्रोटॉनों की संख्या (p) +
न्यूट्रॉनों की संख्या (n)
= 16 + 16 = 32
यह स्पीशीज उदासीन नहीं है क्योंकि प्रोटॉनों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर नहीं है। अतः यह आयन है। जिसका प्रतीक 3216S2− होगा।
समस्थानिक : एक ही तत्व के वे परमाणु जिनमें परमाणु क्रमांक (Z) या e− की संख्या या प्रोटॉन की संख्या समान हो, लेकिन द्रव्यमान संख्या (A) या न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न हो, वे समस्थानिक कहलाते हैं।
p = p or e− = e−
Z = Z
n ≠ n,
A ≠ A
उदाहरण : H के तीन समस्थानिक निम्न में प्रयोग होते हैं :
11H प्रोटियम, 21H ड्यूटीरियम, 31H ट्रिटियम
समभारिक : विभिन्न तत्वों के वे परमाणु जिनके परमाणु क्रमांक भिन्न हो लेकिन द्रव्यमान संख्या समान हो, समभारिक कहलाते हैं।
A = A तथा Z ≠ Z
परमाणु क्रमांक भिन्न होने के कारण इनके रासायनिक गुण भी भिन्न होते हैं। उदाहरण : 4018Ar, 4019K, 4020Ca तथा 146C, 147N
आइसोटोन या समन्यूट्रॉनिक : विभिन्न तत्वों के वे परमाणु जिनमें न्यूट्रॉनों की संख्या समान हो, लेकिन परमाणु क्रमांक (Z) व द्रव्यमान संख्या (A) भिन्न हो, आइसोटोन या समन्यूट्रॉनिक कहलाते हैं।
n = n, A ≠ A , Z ≠ Z
उदाहरण
146C, 157N, 168O
समइलेक्ट्रॉनिक श्रेणी : परमाणु, धनायन व ऋणायन का वह समूह जिनमें e− की संख्या समान हो, उन्हें समइलेक्ट्रॉनिक श्रेणी कहते हैं।
e− = e−, P ≠ P
उदाहरण
H+, He, Li+, Be2+
N3−, O2−, F−, Ne, Na+, Mg2+, Al3+, Si4+
समप्रोटॉनिक श्रेणी : एक ही तत्व के परमाणु, धनायन व ऋणायन का वह समूह जिनमें प्रोटॉन की संख्या समान हो, उन्हें समप्रोटॉनिक श्रेणी कहते हैं।
P = P, e− ≠ e−
उदाहरण
Mg, Mg2+ तथा Fe, Fe2+, Fe3+
रदरफोर्ड मॉडल के दोष
(1) इस मॉडल के अनुसार e− नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं। इस चक्कर के कारण e− पर दो प्रकार के बल कार्य करते हैं, जिससे e− लगातार ऊर्जा खोते हैं।
- अभिकेन्द्रीय बल : अपकेन्द्रीय बल की अनुपस्थिति में
- लेकिन मैक्सवेल के विद्युत चुम्बकीय सिद्धांत के अनुसार जब आवेशित कण त्वरित होता है, तो वह विद्युत चुम्बकीय विकिरण के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित करता है। अतः जब e− ऊर्जा छोड़ता है, अर्थात e− में सर्पिल गति करता हुआ नाभिक में गिर जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होता तथा परमाणु स्थायी रहता है।
- रदरफोर्ड, मैक्सवेल के इसी सिद्धांत को नहीं समझ पाया।
(2) यह मॉडल परमाणुओं के रेखीय स्पेक्ट्रम की व्याख्या करने में असमर्थ रहा।
नील्स बोर का परमाणु मॉडल
इस मॉडल के मुख्य बिन्दु —
- विद्युत-चुम्बकीय विकिरण का द्वैत (तरंग तथा कण प्रकृति) व्यवहार होता है।
- परमाणु का स्थायित्व समझाने के लिए यह मॉडल प्रस्तुत किया गया।
(i) विद्युत-चुम्बकीय विकिरण का द्वैत (तरंग तथा कण प्रकृति) व्यवहार होता है।
विद्युत-चुम्बकीय विकिरण की तरंग प्रकृति
विद्युत आवेशित कणों को जब त्वरित किया जाता है, तो एकसाथ विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होते हैं, जो विद्युत एवं चुम्बकीय क्षेत्र के लंबवत दिशा में संचारित होते हैं। इन्हें विद्युत-चुम्बकीय तरंगें (विकिरण) कहा जाता है।
- दोलनायमान आवेशित कणों द्वारा उत्पन्न विद्युत क्षेत्र एवं चुम्बकीय क्षेत्र दोनों एक-दूसरे के लंबवत होते हैं एवं दोनों तरंग के संचरण की दिशा के भी लंबवत होते हैं।
- ध्वनि अथवा जल-तरंगों के विपरीत विद्युत-चुम्बकीय तरंग के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती और ये निर्वात में भी संचरित हो सकती हैं।
- विद्युत-चुम्बकीय विकिरण कई प्रकार की होती हैं। रेडियो-तरंगें या आलोक एक-दूसरे से भिन्न होती हैं, पर ये सब मिलकर विद्युत-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम बनाती हैं।
विद्युत-चुम्बकीय विकिरणों के पाँच विशेषताएँ
-
आवृत्ति (ν) :
एक दिए हुए बिन्दु से
1 सेकण्ड में गुजरने वाली
तरंगों की संख्या को
तरंगों की आवृत्ति कहते हैं।
इसे ν (न्यू) से प्रदर्शित करते हैं।
आवृत्ति (ν) का
SI मात्रक हर्ट्ज है।
(1 Hz = s−1)
1 Hz = 1 cycle/sec. -
तरंग-दैर्घ्य (λ) :
दो क्रमागत शृंग या
गर्त के मध्य की दूरी को
तरंग-दैर्घ्य (λ) कहते हैं।
- तरंग-दैर्घ्य (λ) का मात्रक मीटर (m) या सेमी (cm) या nm या pm होता है।
- 1A0 = 10−8 cm = 10−10 m
- 1nm = 10−9 m, 1pm = 10−12 m
- वेग (c) : तरंग द्वारा 1 s में तय की गई दूरी को वेग (c) कहते हैं। सभी विद्युत-चुम्बकीय तरंगों या विकिरणों का प्रकाश के वेग से संचरण करते हैं। (c = 3 × 108 m.sec.−1)
- तरंग संख्या (v̄) : प्रति इकाई cm लंबाई में तरंग-दैर्घ्य की संख्या को तरंग-संख्या कहते हैं। तरंग-संख्या का मात्रक cm−1 होता है। अतः वायुमण्डल में 1/λ का अर्थ cm−1 होता है।
- आयाम : यह किसी तरंग का उच्चतम तथा निम्नतम बिन्दुओं की गहराई को बताता है। इसे ‘A’ द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह प्रकाश की किरणों की तीव्रता या चमकीलेपन को बताता है।
v̄ = 1 / λ
आवृत्ति (ν), तरंग-दैर्घ्य (λ) तथा प्रकाश के वेग (c) में संबंध —
c = ν × λ
विकिरण-चुंबकीय विकिरण की कणीय प्रकृति - प्लांक का क्वांटम सिद्धांत
कृष्णिका (black body) : एक ऐसा आदर्श पिंड है जो प्रत्येक प्रकार की आवृत्ति के विकिरणों को उत्सर्जित तथा अवशोषित करती है। कृष्णिका तथा इस पिंड से उत्सर्जित विकिरण का कृष्णिका विकिरण कहते हैं।
प्लांक का क्वांटम सिद्धांत
- जब black body का ताप किया जाता है तो यह विभिन्न तरंगदैर्घ्यों या आवृत्ति के प्रकाश का उत्सर्जन करती है।
- जैसे किसी लोहे की छड़ को जैसे-जैसे गरम करते हैं, वह ऊर्जा ग्रहण करते हुए पहले लाल रंग की हो जाती है। जब ऊर्जा ग्रहण करना जारी रखती है तो धीरे-धीरे यह ऑरेंज लाल हो जाती है। जब इसे और अधिक गर्म किया जाता है, तब इससे निकलने वाली विकिरण का रंग सफेद हो जाता है। इसे गरम करने पर अधिक ऊर्जा ग्रहण करने पर नीला हो जाता है। इसका अर्थ है कि ताप में वृद्धि से समायाय उत्सर्जित विकिरणों की आवृत्ति तथा ऊर्जा बढ़ती जाती है।
- ऊर्जा का उत्सर्जन या अवशोषण ऊर्जा के छोटे-छोटे बंडलों के रूप में होता है। ऊर्जा के इन छोटे-छोटे बंडलों को क्वांटा कहते हैं। प्रकाश का एक क्वांटा फोटॉन कहलाता है।
इन बातों के अनुसार ऊर्जा आवृत्ति के समानुपाती होती है अर्थात
- E ∝ v
- E = hv या v = c/λ
- E = hc/λ h = प्लांक नियतांक (h = 6.62 × 10−34 J s)
Note: तरंगदैर्ध्य (λ) ↓, आवृत्ति (v) ↑, ऊर्जा (E) ↑
Vviolet-Iindigo-Bblue-Ggreen-Yyellow-Oorange-Rred (VIBGYOR)
प्रश्न - 5 × 1014 Hz आवृत्ति वाले विकिरण के एक मोल फोटॉन की ऊर्जा की गणना कीजिए।
हल - एक फोटॉन की ऊर्जा (E) = hν
h = 6.62 × 10−34 J s
ν = 5 × 1014 Hz या s−1
अतः,
E = hν
E = 6.62 × 10−34 J s × 5 × 1014 s−1
E = 3.31 × 10−19 J
यह एक फोटॉन की ऊर्जा है। अब एक मोल फोटॉनों की ऊर्जा निकालने के लिए इसे एवोगैड्रो संख्या (6.022 × 1023) से गुणा करेंगे।
एक मोल फोटॉनों की ऊर्जा
= 3.31 × 10−19 × 6.022 × 1023 J
= 19.93 × 104 J
= 1.993 × 105 J
अतः एक मोल फोटॉनों की ऊर्जा = 1.99 × 105 J mol−1
अंतिम उत्तर :
1.99 × 105 J mol−1
या
199.3 kJ mol−1
प्रकाश-विद्युत प्रभाव
धातुओं (पोटैशियम, फॉस्फोरस, सीजियम, इत्यादि) की सतह पर उपयुक्त आवृत्ति वाला प्रकाश डालने पर इलेक्ट्रॉन निकलने लगते हैं। धातु से इलेक्ट्रॉन निकलने की इस घटना को प्रकाश विद्युत प्रभाव कहते हैं।
- धातु की सतह से प्रकाशपुंज के टकराने से ही उस सतह से इलेक्ट्रॉन निकलते हैं, अर्थात धातु की सतह से इलेक्ट्रॉन निकलना तथा सतह पर प्रकाशपुंज के टकराने के बीच कोई समय अंतराल नहीं होता।
- धातु की सतह प्रति सेकंड निकसित इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रकाश की तीव्रता के समानुपाती होती है।
- प्रत्येक धातु के लिए एक न्यूनतम आवृत्ति होती है, जिसे देहली आवृत्ति कहते हैं। इस देहली आवृत्ति से कम आवृत्ति पर प्रकाश-विद्युत प्रभाव उत्पन्न नहीं होता।
देहली आवृत्ति ν0 वह न्यूनतम आवृत्ति का प्रकाश है जिसके नीचे प्रकाश द्वारा इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन नहीं होता। यही देहली आवृत्ति कहलाती है।
आइंस्टीन के अनुसार प्रकाश का एक क्वांटम फोटॉन (hν) किसी धातु पर पड़ता है, तो वह अपनी पूर्ण ऊर्जा धातु में उपस्थित e− को दे देता है। e− द्वारा प्राप्त यह ऊर्जा दो कार्य करती है।
- ऊर्जा का एक भाग W0 धातु के परमाणु से e− मुक्त कराने में काम आती है। इस न्यूनतम ऊर्जा को धातु का कार्यफलन (W0) कहते हैं।
- ऊर्जा का शेष भाग e− को गतिज ऊर्जा (1/2 mv2) प्रदान करता है।
निकसित इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करती है, लेकिन इन इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा तीव्रता पर निर्भर नहीं करती है।
फोटॉन की ऊर्जा = कार्यफलन + उत्सर्जित e− की गतिज ऊर्जा
hν = W0 + 1/2 mv2
hν = hν0 + 1/2 mv2
h(ν − ν0) = 1/2 mv2
अथवा
1/2 m v2max = hν − hν0 = hc [1/λ − 1/λ0]
क्वांटित इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तर : परमाण्विक स्पेक्ट्रम
- जब प्रिज्म में से सफेद प्रकाश की किरण को गुजारते हैं, तो यह प्रकाश रंगीन पट्टियों की एक श्रृंखला में फैल जाता है। इसे स्पेक्ट्रम कहते हैं।
- जब विद्युत-चुम्बकीय विकिरण पदार्थ के साथ अन्योन्य क्रिया करवाते हैं, तो परमाणु और अणु के e− इस ऊर्जा का अवशोषण कर लेते हैं एवं उच्च ऊर्जा स्तर पर उत्तेजित हो जाते हैं। उच्च ऊर्जा स्तर पर गये e− अस्थायी रूप से स्थायी होते हैं।
- e− जब निम्न ऊर्जा स्तर में लौटते हैं, तो विद्युत-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के विभिन्न क्षेत्रों में विकिरण उत्सर्जित करते हैं।
उत्सर्जन स्पेक्ट्रा
- किसी पदार्थ में ऊर्जा अवशोषण के बाद उत्सर्जित विकिरण का स्पेक्ट्रम उत्सर्जन स्पेक्ट्रा कहलाता है। परमाणु अथवा अणु द्वारा विकिरण का अवशोषण पर उत्तेजित हो जाते हैं।
- उत्सर्जन स्पेक्ट्रा प्राप्त करने के लिए किसी प्रतिदर्श (sample) को गर्म कर अथवा विकिरणित करके ऊर्जा दी जाती है और तब प्रतिदर्श अवशोषित ऊर्जा को निकसित करता है। तो उत्सर्जित विकिरण को तरंग-दैर्घ्य (या आवृत्ति) को रिकॉर्ड कर लिया जाता है।
अवशोषण स्पेक्ट्रा
- अवशोषण स्पेक्ट्रम, उत्सर्जन स्पेक्ट्रम के फोटोग्राफिक निगेटिव की तरह होता है। जब एक सतत विकिरण को प्रतिदर्श पर डाला जाता है, तो वह विकिरण की कुछ तरंग-दैर्घ्य को अवशोषित कर लेता है। पदार्थ द्वारा अवशोषित विकिरण की प्राप्ति बल्ब तरंग-दैर्घ्यों सम्बन्धी सतत स्पेक्ट्रम में गहरे रंग की रेखाओं के रूप में प्रदर्शित होती है।
- उत्सर्जन या अवशोषण स्पेक्ट्रम के अध्ययन को स्पेक्ट्रोस्कोपी (spectroscopy) कहते हैं।
- दृश्य प्रकाश का स्पेक्ट्रम सतत होता है, क्योंकि इसका रंग लाल रंग में और पीला या हरे रंग में मिलता है। अन्य रंगों के साथ भी ऐसा ही होता है। ऐसा कोई अन्तर इसमें नहीं मिलता।
- इसके विपरीत गैस का आवेशित या परमाणुओं का उत्सर्जन स्पेक्ट्रम लाल से बैंगनी तरंग-दैर्घ्यों में सतत रूप से नहीं होता है, परंतु उसमें केवल विशिष्ट तरंग-दैर्घ्य वाला प्रकाश उत्सर्जित होता है, जिसके बीच में काले स्थान रहते हैं।
- ऐसे स्पेक्ट्रम को रेखा स्पेक्ट्रम अथवा परमाण्वीय स्पेक्ट्रम कहते हैं, क्योंकि उत्सर्जित विकिरण स्पेक्ट्रम में चमकीली रेखाओं के रूप में प्रदर्शित होता है।
हाइड्रोजन का रेखीय स्पेक्ट्रम
- जब हाइड्रोजन गैस में विद्युत विसर्जन प्रवाहित किया जाता है, तब H2 अणु वियोजित होकर उच्च ऊर्जा वाले हाइड्रोजन परमाणु देते हैं। जो विविध आवृत्ति वाले विद्युत-चुम्बकीय विकिरण उत्सर्जित करते हैं।
- हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम में रेखाओं की कई श्रेणियाँ होती हैं, जिन्हें उनके आविष्कारक के नाम से जाना जाता है।
स्पेक्ट्रमी रेखाओं की तरंग-संख्या (v̄) :
1/λ = v̄ = RH (1/n12 − 1/n22)
जहाँ
v̄ = तरंग संख्या
λ = तरंगदैर्ध्य
RH = रिडबर्ग स्थिरांक
(1,09,678 cm−1)
| श्रेणी | n1 | n2 | स्पेक्ट्रमी क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| लाइमन | 1 | 2,3.... | पराबैंगनी |
| बाल्मर | 2 | 3,4.... | दृश्य |
| पाशन | 3 | 4,5.... | अवरक्त |
| ब्रैकेट | 4 | 5,6.... | अवरक्त |
| फुंड | 5 | 6,7.... | अवरक्त |
नील्स बोर का परमाणु मॉडल
- नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार क्षेत्र को कक्षा या कोश या ऊर्जा स्तर कहते हैं। इन्हें e− लगातार चक्कर लगाते रहते हैं। इन्हें K, L, M, N ... से प्रदर्शित करते हैं।
- किसी कोश में e− की संख्या 2n2 होती है।
| कोश या कक्षा या ऊर्जा स्तर | K | L | M | N |
|---|---|---|---|---|
| n | 1 | 2 | 3 | 4 |
| कोश में e− की संख्या (2n2) | 2 | 8 | 18 | 32 |
- एक ही कोश में चक्कर लगाने वाले e− की ऊर्जा में परिवर्तन नहीं होता है। क्योंकि बाहतम कोश के e− पर दो प्रकार के बल कार्य करते हैं।
अभिकेन्द्रिय बल (स्थिर वैद्युत आकर्षण बल) = अपकेन्द्रिय बल
- यदि e− निम्न ऊर्जा स्तर से उच्च ऊर्जा स्तर में जाता है तो ऊर्जा का अवशोषण करता है।
- यदि इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर में आता है तो ऊर्जा का उत्सर्जन करता है। यह ऊर्जा छोटे-छोटे बण्डलों के रूप में स्वयं या फोटॉन होती है। इन ऊर्जा के इन छोटे-छोटे बण्डलों को क्वान्टा (E = hν) कहते हैं।
ऊर्जा में परिवर्तन (ΔE) = E2 − E1 = hν
ΔE = hν
ΔE = hc / λ
λ = hc / ΔE
h = प्लांक नियतांक
(h = 6.62 × 10−34 J.sec.)
- एक इलेक्ट्रॉन वृत्ताकार कक्षा में चक्कर लगाता है, जिससे कोणीय संवेग (mvr) का मान nh / 2π का पूर्णगुणज होता है। (∵ n = कोश या कक्षा)
| K कोश का कोणीय संवेग | = h / 2π |
| L कोश का कोणीय संवेग | = h / π |
| M कोश का कोणीय संवेग | = 3h / 2π |
| N कोश का कोणीय संवेग | = 2h / π |
बोर कक्षा में e− का वेग, त्रिज्या तथा ऊर्जा
बोर कक्षा में e− का वेग
- v = 2.18 × 108 × Z/n cm/sec
- v = 2.18 × 106 × Z/n m/sec
- v ∝ Z or v ∝ 1/n
बोर कक्षा में e− की त्रिज्या
rn = 0.529 × (n2/Z) Å अथवा rn = 0.529 × 10−10 (n2/Z) m अथवा rn = 52.9 (n2/Z) pm
- r ∝ n2 (Z = स्थिर) तथा r ∝ 1/Z (n = स्थिर)
बोर कक्षा में e− की ऊर्जा
- En = −2.18 × 10−18 (Z2/n2) J (∵ 1J = 6.242 × 1018 eV)
- En = −13.6 (Z2/n2) eV
- En ∝ Z2 (n = स्थिर) तथा En ∝ 1/n2 (Z = स्थिर)
प्रश्न — He+ की प्रथम कक्षा से संबंधित ऊर्जा की गणना कीजिए और बताइए कि इस कक्षा की त्रिज्या क्या होगी?
हल —
En = −2.18 × 10−18 (Z2/n2) J atom−1
He+ के लिए, n = 1, Z = 2
E1 = −2.18 × 10−18 × (22/12) J = −8.72 × 10−18 J
कक्षा की त्रिज्या की गणना
∵ rn = 0.529 × 10−10 (n2/Z) m
r1 = 0.529 × 10−10 (12/2) m
r1 = 0.529/2 × 10−10 m = 0.2645 × 10−10 m
अथवा 0.02645 nm
अंतिम उत्तर :
ऊर्जा = −8.72 × 10−18 J
त्रिज्या = 0.2645 × 10−10 m
या 0.02645 nm
हाइड्रोजन के रेखा स्पेक्ट्रम की व्याख्या
जब इलेक्ट्रॉन निम्न कक्षा से उच्च कक्षा में जाता है, तो वह एक निश्चित ऊर्जा का अवशोषण करता है। तथा उच्च कक्षा से निम्न कक्षा में आने पर ऊर्जा उत्सर्जित करता है। अतः दो कक्षाओं के बीच के ऊर्जा के अंतर को ज्ञात कर सकते हैं।
ΔE = E2 − E1
स्थायी अवस्था की ऊर्जा : En = −RH(1 / n2) जहाँ n = 1, 2, 3...
अतः
ΔE = −RH(1 / n12) + RH(1 / n22)
ΔE = RH(1 / n12 − 1 / n22) (∵ RH = 2.18 × 10−18 J)
ΔE = 2.18 × 10−18 J (1 / n12 − 1 / n22)
n1 = प्रारम्भिक कक्षा
n2 = अन्तिम कक्षा
hν = ΔE = E2 − E1
ν = ΔE / h = (RH / h)(1 / n12 − 1 / n22)
h का मान = 6.62 × 10−34 Js
ν = (2.18 × 10−18 J / 6.62 × 10−34 Js) (1 / n12 − 1 / n22)
ν = 3.29 × 1015 (1 / n12 − 1 / n22) Hz
ν = C / λ ⇒ λ = C / ν (∵ 1 / λ = ν / C = v̄ तरंग संख्या)
v̄ = ν / C = RH / hC (1 / n12 − 1 / n22)
v̄ = (3.29 × 1015 s−1 / 3 × 108 m s−1) (1 / n12 − 1 / n22) (∵ 1Hz = cycle / sec)
1 / λ = v̄ = 1.09677 × 107 (1 / n12 − 1 / n22) m−1
प्रश्न : जब हाइड्रोजन परमाणु में उत्तेजित इलेक्ट्रॉन n = 6 से मूल अवस्था में जाता है, तो प्राप्त उत्सर्जित रेखाओं की अधिकतम संख्या क्या होगी?
हल : उत्सर्जित रेखाओं की अधिकतम संख्या तब होती है जब इलेक्ट्रॉन nth कक्षा से निम्न ऊर्जा स्तर में आता है।
n(n−1) / 2 = 6(6−1) / 2 = 15
अतः उत्सर्जित रेखाओं की प्राप्त संख्या 15 होगी और निम्न संक्रमणों के कारण प्राप्त होगी।
|
6 ⟶ 5 6 ⟶ 4 6 ⟶ 3 6 ⟶ 2 6 ⟶ 1 (5 रेखाएँ) |
5 ⟶ 4 5 ⟶ 3 5 ⟶ 2 5 ⟶ 1 (4 रेखाएँ) |
4 ⟶ 3 4 ⟶ 2 4 ⟶ 1 (3 रेखाएँ) |
3 ⟶ 2 3 ⟶ 1 (2 रेखाएँ) |
2 ⟶ 1 (1 रेखा) |
बोर मॉडल की कमियाँ
- यह मॉडल बहु इलेक्ट्रॉनीय परमाणुओं के स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सका।
- स्टार्क प्रभाव की पूर्णतः व्याख्या भी नहीं कर सका।
- इस मॉडल द्वारा e− जैसे कणों की द्वैती प्रकृति की व्याख्या नहीं की जा सकती है।
स्टार्क प्रभाव : विद्युत क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का और महीन रेखाओं में विभाजन, जिसे स्टार्क प्रभाव कहते हैं।
जीमन प्रभाव : चुम्बकीय क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का और महीन रेखाओं में विभाजन, जिसे जीमन प्रभाव कहते हैं।
विद्युत-चुम्बकीय विकिरण का द्वैत व्यवहार
डे ब्रोगली सिद्धान्त
- इस सिद्धान्त के अनुसार e− जैसे सूक्ष्मकण में तरंगदैर्ध्य (λ) और उसका संवेग (P) व्युत्क्रमानुपाती होते हैं।
- इस सिद्धान्त के आधार पर दृश्य में कण तथा तरंग दोनों तरह के गुण (द्वैती प्रकृति) को समझाया जाता है।
आइन्स्टाइन के अनुसार E = mc2 ...... (i)
प्लांक के अनुसार E = hν ...... (ii)
सभी (i) व (ii) से
mc2 = hν ∴ ν = c / λ
mc2 = h(c / λ)
λ = h / mc → (iii)
समीकरण (iii) में c के स्थान पर V रखने पर
λ = h / (m × V) ∴ p = mV
λ = h / p
λ ∝ 1 / p
अर्थात संवेग का मान अधिक होने पर तरंगदैर्ध्य का मान कम हो जाता है।
उदाहरण
प्रश्न — 2.05 × 107 ms−1 वेग से गति कर रहे किसी इलेक्ट्रॉन का तरंगदैर्ध्य क्या होगी?
हल — डे-ब्रोगली समीकरण के अनुसार
λ = h / mv
λ = (6.626 × 10−34 J s) / [(9.109 × 10−31 kg) × (2.05 × 107 ms−1)]
∵ 1J = m2 × kg / s2
λ = 3.55 × 10−11 m
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत
- इस सिद्धांत के अनुसार, किसी इलेक्ट्रॉन की सही स्थिति और सही वेग का निर्धारण एक साथ करना असंभव है।
- स्थिति में अनिश्चितता व संवेग में अनिश्चितता का गुणनफल h/4π के बराबर या अधिक होता है।
Δx × ΔP ≥ h/4π
हम जानते हैं कि p = mV
अतः
ΔP = Δ(mV)
∴ Δx × Δ(mV) ≥ h/4π or Δx × ΔV ≥ h/4πm
यह सिद्धांत केवल सूक्ष्म कणों पर ही लागू होता है। बड़े आकार के कणों पर यह सिद्धांत लागू नहीं होता है।
क्वाण्टम संख्याएँ
वे संख्याएँ जिनसे कोशों, उपकोशों तथा कक्षक एवं इनकी ऊर्जाओं तथा e− के चक्रण की जानकारी प्राप्त होती है, क्वाण्टम संख्याएँ कहलाती हैं। ये चार प्रकार की होती हैं।
- मुख्य क्वाण्टम संख्या (n)
- दिगंशीय क्वाण्टम संख्या (l)
- चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या (m)
- चक्रण क्वाण्टम संख्या (s)
मुख्य क्वाण्टम संख्या (n) : यह कक्षा या कोशों तथा इनकी ऊर्जाओं को प्रदर्शित करती है। इसे n से व्यक्त करते हैं।
| n | 1 | 2 | 3 | 4 |
|---|---|---|---|---|
| कक्षा का नाम | K | L | M | N |
| कोश में कक्षकों की कुल संख्या = n2 | 1 | 4 | 9 | 16 |
| कक्षा में अधिकतम e− की संख्या = 2n2 | 2 | 8 | 18 | 32 |
दिगंशीय क्वाण्टम संख्या : यह उपकोशों तथा इनकी ऊर्जाओं को प्रदर्शित करती है। इसे l से व्यक्त करते हैं। l का मान शून्य से प्रारम्भ होता है। अतः l का अधिकतम मान n−1 के बराबर होता है।
- परमाणु में चार उपकोश होते हैं, जो s < p < d < f होते हैं। यह क्वाण्टम संख्या उपकोशों के आकार को निर्धारित करती है।
| l का मान | 0 | 1 | 2 | 3 |
|---|---|---|---|---|
| उपकोश के नाम | s | p | d | f |
| उपकोशों की आकृति | गोलाकार | इलेक्ट्राकार | दि इलेक्ट्राकार | जटिल |
| उपकोश में कक्षकों की संख्या (2l+1) | 1 | 3 | 5 | 7 |
| उपकोश में कक्षकों की संख्या 2(2l+1) | 2 | 6 | 10 | 14 |
यदि l = 0 → s उपकोश →
गोलाकार
l = 1 → p उपकोश →
डम्बल
l = 2 → d उपकोश →
दि-डम्बल
l = 3 → f उपकोश →
जटिल
Note : ‘n’ व ‘l’ के मान समान नहीं हो सकते हैं।
| कक्षा | n | संभावित उपकोशों की संख्या | l के मान | कक्षकों के प्रकार | अधिकतम e− की संख्या (2n2) |
|---|---|---|---|---|---|
| K | 1 | 1 | 0 | 1s | 2 |
| L | 2 | 2 | 0,1 | 2s 2p | 8 |
| M | 3 | 3 | 0,1,2 | 3s 3p 3d | 18 |
| N | 4 | 4 | 0,1,2,3 | 4s 4p 4d 4f | 32 |
चुम्बकीय क्वाण्टम संख्या : यह कक्षकों के अभिविन्यास को प्रदर्शित करता है। इसे m से व्यक्त करते हैं। इसके मान l के मानों पर निर्भर करते हैं तथा इसके मान −l से +l तक होते हैं।
- चुम्बकीय क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का और महीन रेखाओं में विभाजन, जिसे जीमान प्रभाव कहते हैं।
- यह जीमान प्रभाव को समझाने में सहायता करता है।
s उपकोश p उपकोश d उपकोश
l = 0
l = 1
l = 2
m = 0
m = -1, 0, +1
m = -2, -1, 0, +1, +2
Px Py Pz dxy, dyz, dz2, dxz, dx2 - y2
समऊर्जा कक्षक : समान ऊर्जा वाले कक्षकों को समऊर्जा कक्षक कहलाते हैं। उदाहरण p उपकोश के लिये px, py, pz
चक्रण क्वाण्टम संख्या (s) : यह परमाणु कक्षकों में e− के चक्रण को बताती है।
- यदि इलेक्ट्रॉन अपने अक्ष पर दक्षिणावर्त (Clockwise) चक्रण कर रहा हो तो s = +1/2 तथा चित्र (↑) द्वारा व्यक्त करेंगे।
- यदि वह वामावर्त (Anticlockwise) चक्रण कर रहा हो तो s = −1/2 तथा (↓) चिह्न होगा।
एक कक्षक में अधिकतम विपरीत चक्रण करते हुए दो इलेक्ट्रॉन आ सकते हैं।
उपकोशों की आकृति
s-उपकोश —
- ये गोलाकार, सममित व अदिशात्मक होते हैं।
कक्षक : नाभिक के चारों ओर वह क्षेत्र जहाँ e− के पाए जाने की संभावना या प्रायिकता अधिक होती है, उसे ही कक्षक कहते हैं।
p-उपकोश — ये डम्बलाकार और दिशात्मक होते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं। तथा इनकी ऊर्जा के मान समान होते हैं।
d-उपकोश — ये द्वि-डम्बलाकार और दिशात्मक होते हैं। ये पाँच प्रकार के होते हैं तथा इनकी ऊर्जा के मान समान होते हैं।
f-उपकोश — इनकी आकृति जटिल प्रकार की होती है। ये सात प्रकार के होते हैं।
परमाणु में कक्षकों का पूरा जाना
आफबाऊ नियम
- इलेक्ट्रॉन पहले सबसे कम ऊर्जा वाले उपकोश में जाते हैं और उसके पूर्ण भर जाने पर उच्च ऊर्जा वाले उपकोश में प्रवेश करते हैं।
(n + l) नियम — एक कक्षक के लिए (n + l) का मान जितना कम होगा उतना कम ऊर्जा है, तो उस कक्षक में e− पहले प्रवेश जाते हैं।
3d 4s
n + l = (3+2=5) (4+0=4)
ऊर्जा का क्रम
4s < 3d
अतः e− 4s में भरा जायेगा
- यदि n + l दो या दो से अधिक परमाणु कक्षकों के लिए समान हो तो उस कक्षक की ऊर्जा कम होगी जिसका n का मान कम हो।
3d > 4p > 5s
पाउली अपवर्जन सिद्धान्त — किसी परमाणु में उपस्थित दो इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वांटम संख्याएँ एक समान नहीं हो सकती हैं।
- इसका अर्थ है कि दो इलेक्ट्रॉनों की तीन क्वांटम संख्याएँ n, l तथा m एक समान हो सकती हैं, लेकिन उनके चक्रण व स्पिन संख्या भिन्न होती है।
उदाहरण — He परमाणु में
एक इलेक्ट्रॉन की क्वांटम संख्या — n = 1, l = 0, m = 0 एवं s = +1/2
दूसरे इलेक्ट्रॉन की क्वांटम संख्या — n = 1, l = 0, m = 0 एवं s = −1/2
हुंड का अधिकतम बहुलकता का नियम
- जिस कक्षक की ऊर्जा बराबर होती है उसे समऊर्जा कक्षक कहते हैं।
- इस नियम के अनुसार एक ही उपकोश के कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन तब तक नहीं होता है जब तक उस उपकोश के प्रत्येक कक्षक में एक-एक इलेक्ट्रॉन न आ जाए।
अर्धपूर्ण व पूर्णतः कक्षकों का स्थायित्व
- उन परमाणु कक्षकों का स्थायित्व अधिक है जिनमें अर्धपूर्ण या पूर्णपूर्ण हुआ इलेक्ट्रॉनीय विन्यास होता है। क्योंकि उन परमाणु कक्षकों में e− के युग्मन से सममितता बढ़ती है।
उदाहरण
7N का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
1s2 2s2 2p3
तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
nℓx
n = मुख्य कोशों की संख्या | ℓ = उपकोश | x = इलेक्ट्रॉनों की संख्या
Cu व Cr के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
Cu29 का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 4s2, 3d9 गलत
1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 4s1, 3d10
1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 3d10, 4s1 सही
24Cr का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 4s2, 3d4 गलत
1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 4s1, 3d5 गलत
1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 3d5, 4s1 सही
