हेलोऐल्केन तथा हेलोऐरीन
ऐलिफैटिक अथवा एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणु का हैलोजन परमाणु द्वारा प्रतिस्थापन होने से क्रमशः ऐल्किल हैलाइड (हेलोऐल्केन) तथा ऐरिल हैलाइड (हेलोऐरीन) बनते हैं।
हेलोऐल्केन तथा हेलोऐरीन के सामान्य उदाहरण
1. ऐल्केन से ऐल्किल हैलाइड
R−H −H ⟶ R− +X ⟶ R−X [X = F, Cl, Br, I]
अल्केन ऐल्किल ऐल्किल हैलाइड
[CnH2n+2] [CnH2n+1] [CnH2n+1X]
2. बेंजीन से ऐरिल हैलाइड
Ar−H या C6H6 −H ⟶ Ar− या C6H5 +X ⟶ Ar−X या C6H5−X
बेंजीन फेनिल फेनिल हैलाइड
या ऐरिल हैलाइड
हैलोजन परमाणुओं की संख्या के आधार पर
| सूत्र | सामान्य नाम | IUPAC नाम | श्रेणी |
|---|---|---|---|
| CH3Cl | मेथिल क्लोराइड | क्लोरो मेथेन | मोनो हैलोऐल्केन |
| CH2Cl2 | मेथिलीन क्लोराइड | डाइक्लोरो मेथेन | डाइहैलोऐल्केन |
| CHCl3 | क्लोरोफॉर्म | ट्राइक्लोरो मेथेन | ट्राइहैलोऐल्केन |
| CCl4 | कार्बन टेट्राक्लोराइड | टेट्राक्लोरो मेथेन | टेट्राहैलोऐल्केन |
संकरण के आधार पर
sp3 C − X आबंध युक्त यौगिक (X = F, Cl, Br, I) ऐल्किल हैलाइड कहलाते हैं।
(i) मोनो हैलो ऐल्केन / ऐल्किल हैलाइड
R3C − X sp3 संकरित C
मोनो हैलो ऐल्केन पुनः तीन प्रकार के होते हैं।
(a) प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड (1° R−X) में हैलोजन परमाणु प्राथमिक कार्बन से जुड़ा होता है।
मोनो हैलो ऐल्केन तथा ऐलिलिक हैलाइड
(a) प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड [1° R−X]
इसमें हैलोजन परमाणु प्राथमिक कार्बन से जुड़ा होता है।
CH3−X , CH3−CH2−X , CH3−CH(CH3)−CH2−X
sp3 (1°) sp3 (1°) sp3 (1°)
(CH3)3C−CH2−X sp3 (1°)
(b) द्वितीयक ऐल्किल हैलाइड [2° R−X]
इसमें हैलोजन परमाणु द्वितीयक कार्बन से जुड़ा होता है।
CH3−CH(X)−CH3 , CH3−CH(X)−CH2−CH3 , CH3−CH2−CH(X)−CH3
sp3 (2°) sp3 (2°) sp3 (2°)
CH3−CH(CH3)−CH(X)−CH3 sp3 (2°)
(c) तृतीयक ऐल्किल हैलाइड [3° R−X]
इसमें हैलोजन परमाणु तृतीयक कार्बन से जुड़ा होता है।
(CH3)3C−X , CH3−C(X)(CH3)−CH2−CH3 , C(CH3)2(X)−CH2−CH3
sp3 (3°) sp3 (3°) sp3 (3°)
CH3−C(X)(CH3)−CH(CH3)−CH3 sp3 (3°)
(ii) ऐलिलिक हैलाइड
[CH2 = CH−CH2− = ऐलिलिक समूह]
जिन यौगिकों में हैलोजन परमाणु ऐलिलिक कार्बन से जुड़ा होता है, उन्हें ऐलिलिक हैलाइड कहते हैं।
[CH2 = CH−CH2]−X , CH3−CH = CH−CH2−X , C6H5−CH2−X
ऐलिलिक हैलाइड ऐलिलिक हैलाइड ऐलिलिक हैलाइड
C−[C = C]−C(X) sp3 ऐलिलिक हैलाइड
(iii) बेन्जिलिक हैलाइड
[C6H5−CH2− = बेन्जिल समूह]
जिन यौगिकों में हैलोजन परमाणु बेन्जिलिक कार्बन से जुड़ा होता है, उन्हें बेन्जिलिक हैलाइड कहते हैं।
C6H5−CH2−X sp3
(बेन्जिलिक हैलाइड) 1°
C6H5−CH(X)−CH3 sp3
(बेन्जिलिक हैलाइड) 2°
C6H5−C(X)(CH3)2 sp3
(बेन्जिलिक हैलाइड) 3°
(CH3)3C−C6H4−CH2Cl , C6H5−C(Br)(CH3)−CH3 , नाफ्थलीन वलय−X
ये सभी बेन्जिलिक हैलाइड के उदाहरण हैं।
(b) sp2 C−X आबंधयुक्त यौगिक
ये दो प्रकार के यौगिक होते हैं
(i) वाइनिलिक हैलाइड
[CH2 = CH− = वाइनिल समूह]
जिन यौगिकों में हैलोजन परमाणु सीधे द्विबन्धित कार्बन sp2 से जुड़ा होता है, उन्हें वाइनिलिक हैलाइड कहते हैं।
[CH2 = CH]−X , CH3−CH = CH−X , चक्रीय अल्कीन−X
sp2 sp2 sp2
C−C(X)=C−C−C sp2
वाइनिलिक हैलाइड
(ii) एरिल हैलाइड
बेंजीन वलय से सीधे हैलोजन परमाणु जुड़े होने पर ऐसे यौगिक एरिल हैलाइड कहलाते हैं।
[C6H5− = एरिल समूह]
C6H5−X , CH3−C6H4−X , Cl−C6H3−C3H7 , C4H9−C6H4−Br
sp2 sp2 sp2 sp2
एरिल हैलाइड एरिल हैलाइड एरिल हैलाइड एरिल हैलाइड
नामकरण
सामान्य नामकरण : ऐल्किल + हैलाइड
Note: जेम-डाइहैलाइड : यदि हैलोजन परमाणु एक ही कार्बन परमाणु पर उपस्थित हों, तो उसे जेम-डाइहैलाइड या जेमिनल हैलाइड कहते हैं।
विसिनल हैलाइड : यदि हैलोजन परमाणु निकटवर्ती कार्बन परमाणुओं पर उपस्थित हों, तो वह विसिनल हैलाइड कहलाता है।
| Structure | Common name | IUPAC name |
|---|---|---|
| CH3CH2CH(Cl)CH3 | sec-ब्यूटिल क्लोराइड | 2-क्लोरोब्यूटेन |
| (CH3)3C−CH2−Br | neo-पेंटिल ब्रोमाइड | 1-ब्रोमो-2,2-डाइमेथिल प्रोपेन |
| (CH3)3C−Br | tert-ब्यूटिल ब्रोमाइड | 2-ब्रोमो-2-मेथिल प्रोपेन |
| CH2=CH−Cl | वाइनिल क्लोराइड | क्लोरोएथीन |
| CH2=CH−CH2−Br | ऐलिल ब्रोमाइड | 3-ब्रोमोप्रोपीन |
| o-क्लोरोटॉलूईन | o-क्लोरोटॉलूईन | 1-क्लोरो-2-मेथिल बेंजीन |
| या | 2-क्लोरोब्यूटीन | 2-क्लोरोब्यूटीन |
| C6H5CH2Cl | बेंजिल क्लोराइड | क्लोरोफिनाइल मेथेन |
| CH2Cl2 | मेथिलीन क्लोराइड | डाइक्लोरोमेथेन |
| CHCl3 | क्लोरोफॉर्म | ट्राइक्लोरोमेथेन |
| CHBr3 | ब्रोमोफॉर्म | ट्राइब्रोमोमेथेन |
| CCl4 | कार्बन टेट्राक्लोराइड | टेट्राक्लोरोमेथेन |
| CH3CH2CH2−F | n-प्रोपिल फ्लुओराइड | 1-फ्लुओरोप्रोपेन |
| CH2=CH−CH2Cl | ऐलिल क्लोराइड | 3-क्लोरोप्रोप-1-इन |
C−X आबंध की प्रकृति
- हैलोजन की विद्युतऋणात्मकता कार्बन से अधिक होती है।
- अतः कार्बन परमाणु पर आंशिक धनावेश तथा हैलोजन परमाणु पर आंशिक ऋणावेश आ जाता है।
δ+
δ−
C — X
आवर्त सारणी में वर्ग में ऊपर से नीचे की ओर जाने पर हैलोजन परमाणु का आकार बढ़ता जाता है। अतः फ्लुओरीन परमाणु सबसे छोटा आकार का तथा आयोडीन परमाणु सबसे बड़े आकार का होता है।
परिणामतः कार्बन−हैलोजन आबंध की आबंध लंबाई C−F से C−I तक बढ़ती जाती है।
| आबंध | आबंध लंबाई (pm) | C−X आबंध एन्थैल्पी (kJ mol−1) | द्विध्रुव आघूर्ण (Debye) |
|---|---|---|---|
| CH3−F | 139 | 452 | 1.847 |
| CH3−Cl | 178 | 351 | 1.860 |
| CH3−Br | 193 | 293 | 1.830 |
| CH3−I | 214 | 234 | 1.636 |
हेलोऐल्केन को बनाने की विधियाँ
- ऐल्कोहॉलों से
-
हाइड्रोकार्बनों से
- मुक्त मूलक हैलोजनीकरण द्वारा
- इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन द्वारा
- सैंडमेयर अभिक्रिया द्वारा
-
ऐल्कीनों से
- हाइड्रोजन हैलाइड के संयोजन / योगजन द्वारा
- हैलोजन के संयोजन द्वारा
- हैलोजन विनिमय
अल्कोहॉलों से ऐल्किल हैलाइड
R-OH (Alcohols) से ऐल्किल हैलाइड निम्न अभिक्रियाओं द्वारा प्राप्त किए जाते हैं।
| अभिकर्मक | अभिक्रिया |
|---|---|
| HCl + Anhy. ZnCl2 | R-OH → R-Cl + H2O |
| NaBr + H2SO4 | R-OH → R-Br + NaHSO4 + H2O |
| PCl5 | R-OH → R-Cl + POCl3 + HCl |
| Red P / X2 | R-OH → R-X (X2 = Br2, I2) |
| SOCl2 | RCl + SO2↑ + HCl↑ (Darzen Process) |
| PX3 | 3R-OH → 3R-X + H3PO3 (X = Cl, Br) |
Note: ऐल्किल क्लोराइड को प्राप्त करने के लिए डार्जन अभिक्रिया से थायोनिल क्लोराइड (SOCl2) का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि गैसीय उत्पाद (SO2, HCl) आसानी से निकल जाते हैं। अतः अभिक्रिया में शुद्ध ऐल्किल हैलाइड प्राप्त होता है।
- प्राथमिक एवं द्वितीयक अल्कोहॉलों की HCl से अभिक्रिया में ZnCl2 उत्प्रेरक की तरह काम में लिया जाता है, क्योंकि यह C-OH बन्ध को दुर्बल बनाता है।
- तृतीयक अल्कोहॉलों की अभिक्रिया केवल कमरे के ताप पर केवल सान्द्र HCl के साथ हिलाने पर सम्पन्न हो जाती है।
- ऐल्किल हैलाइड की अभिक्रियाशीलता का क्रम : 30 > 20 > 10
- HX का क्रम : HI > HBr > HCl
फिनॉल से ऐरिल हैलाइड (C6H5X) के निर्माण के लिए ऊपरबताई गयी विधियाँ प्रयुक्त नहीं हैं, क्योंकि फिनॉल में pπ-dπ अनुनाद के कारण ऑक्सीजन के विस्थाप्य युग्म के गुण में कमी आ जाती है और यह फिनॉल बन्ध से अधिक मजबूती से बँधा होता है। अतः इसे फेनॉक्साइड आयन की तुलना में तोड़ना कठिन होता है।
हैलोएरीन एवं हैलोऐल्केन बनाने की विधियाँ
2. हाइड्रोकार्बनों से
(a) मुक्त मूलक हैलोजनीकरण द्वारा
CH3−CH2−CH2−CH3 X2/UV or Heat ⟶ CH3−CH2−CH2−CH2−Cl + CH3−CH2−CHCl−CH3
(b) इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन द्वारा
ऐरिल हैलाइडों को हैलोजन से विलयन अथवा आयरन (III) क्लोराइड अथवा किसी अन्य लुईस अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में एरीन के ओर्थो तथा पैरा स्थानों पर इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन द्वारा आसानी से किया जा सकता है।
C6H5−CH3 + X2 Fe / अंधेरा ⟶ o−हैलोटॉलुईन + p−हैलोटॉलुईन
(c) सैन्डमेयर अभिक्रिया
जब किसी प्राथमिक ऐमीन (ऐनिलीन) को सोडियम नाइट्राइट के साथ क्रिया करायी जाती है, तो बेंजीन डाइऐजोनियम लवण बनता है। बेंजीन डाइऐजोनियम क्लोराइड अथवा ब्रोमाइड के विलयन को कॉपर क्लोराइड अथवा कॉपर ब्रोमाइड के विलयन में मिलाने पर डाइऐजोनियम समूह −Cl अथवा −Br के द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है।
C6H5NH2
NaNO2/2HCl
273−278K
⟶
C6H5N2+Cl−
C6H5N2+Cl− CuCl/HCl ⟶ C6H5Cl + N2
C6H5N2+Cl− CuBr/HBr ⟶ C6H5Br + N2
C6H5N2+Cl− KI ⟶ C6H5I + N2 + KCl
(d) ऐल्कीनों से
(i) हाइड्रोजन हैलाइड (HX) के योग द्वारा
सममित ऐल्कीनों में
CH2=CH2 + HCl ⟶ CH3CH2Cl
असममित ऐल्कीनों में (मार्कोवनीकॉफ के नियमानुसार)
H3C−CH=CH2 + HCl ⟶ CH3−CH(Cl)−CH3 मुख्य उत्पाद
CH3−CH2−CH2Cl गौण उत्पाद
मार्कोवनीकॉफ नियम : आक्रमण करने वाले ऋणावेशित आयन का आक्रमण सदा उस द्विबंधयुक्त कार्बन परमाणु पर होता है जिस पर हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या कम हो।
(ii) हैलोजन के संयोजन द्वारा
CCl4 में घुले ब्रोमीन को ऐल्कीन में डालने से ब्रोमीन का लाल रंग विलुप्त हो जाता है।
यह विधि किसी अणु में द्विबन्ध की पहचान करने की एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला विधि है।
अभिक्रिया : CH2=CH2 + Br2 / CCl4 → BrCH2−CH2Br
डाइब्रोमाइड (Vic-dibromide) यौगिक
हैलोजन विनिमय
ऐल्किल क्लोराइड / ब्रोमाइड को शुष्क एसीटोन में NaI के साथ अभिक्रिया कराने पर ऐल्किल आयोडाइड का निर्माण होता है।
इस अभिक्रिया को फिंकेलस्टीन अभिक्रिया कहते हैं।
R - X + NaI → R - I + NaX (X = Cl, Br)
इस प्रकार प्राप्त NaCl तथा NaBr शुष्क एसीटोन में अवक्षेपित हो जाते हैं।
स्वार्ट्स अभिक्रिया
Hg2F2, CoF2 तथा SbF3 की उपस्थिति में ऐल्किल क्लोराइड / ब्रोमाइड को गर्म करने पर ऐल्किल फ्लोराइड का संश्लेषण किया जाता है।
CH3Br + AgF → CH3F + AgBr
भौतिक गुण
- शुद्ध अवस्था में ऐल्किल हैलाइड रंगहीन यौगिक होते हैं, परन्तु ब्रोमाइड तथा आयोडाइड प्रकाश के संपर्क में आने पर रंगीन हो जाते हैं।
- मेथिल क्लोराइड, मेथिल ब्रोमाइड, एथिल क्लोराइड तथा कुछ क्लोरोफ्लोरोकार्बन कमरे के ताप पर गैसें के रूप में होते हैं, जबकि उच्च सदस्य द्रव अथवा ठोस होते हैं।
- कार्बनिक हैलोजन यौगिक के अन्य सामान्यतः धीमे होते हैं। उच्च द्रवता एवं उनका हाइड्रोकार्बनों की तुलना में उच्च आण्विक द्रव्यमान होने के कारण हैलोजन यौगिकों में प्रबल द्विध्रुव-द्विध्रुव तथा वान्डरवाल्स बल होते हैं। यही कारण है कि क्लोराइड, ब्रोमाइड तथा आयोडाइड के क्वथनांक तथा गलनांक समान हाइड्रोकार्बनों के क्वथनांकों से अधिक होते हैं।
क्वथनांक का क्रम — वर्धमान द्रव्यमान पर आधारित
CH3−I > CH3−Br > CH3−Cl > CH3−F
R−I > R−Br > R−Cl > R−F (ऐल्किल समूह समान होने पर)
क्वथनांक ∝ 1 / पार्श्व शृंखला की संख्या
CH3−(CH2)2−CH2Br > (CH3)2CH−CH2Br > (CH3)3C−Br
डाइहैलोजेनो में पैरा-समावयवी का गलनांक अन्य ऑर्थो- तथा मेटा-समावयवियों की अपेक्षा उच्च होता है, क्योंकि पैरा-समावयवियों में सममिति के कारण वे क्रिस्टल जालक में अधिक सघनता से सन्निविष्ट होते हैं।
o−डाइक्लोरोबेंजीन m−डाइक्लोरोबेंजीन p−डाइक्लोरोबेंजीन
गलनांक 256 K 249 K 323 K
इसलिए para-isomer का गलनांक अधिक होता है।
विलेयता : हैलोऐल्केन जल में बहुत कम विलेय होते हैं, क्योंकि ये जल के साथ H-बन्ध नहीं बनाते। लेकिन हैलोऐल्केन की विलेयता कार्बनिक विलायकों में जल की अपेक्षा अधिक होती है।
रासायनिक अभिक्रियाएँ
(1) हेलोऐल्केनों की अभिक्रियाएँ
- नाभिकरागी प्रतिस्थापन
- विलोपन अभिक्रिया
- धातुओं के साथ अभिक्रिया
(2) हेलोएरीन की अभिक्रियाएँ
- नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
-
इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ
- हैलोजनीकरण
- नाइट्रीकरण
- सल्फोनेशन
- फ्रीडेल क्राफ्ट अभिक्रिया
- धातुओं के साथ अभिक्रिया
वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया
फिटिग अभिक्रिया
नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया
इस अभिक्रिया में नाभिकस्नेही (Nu−) उस हेलोऐल्केन से अभिक्रिया करता है, जिसमें हैलोजन परमाणु से आबद्ध कार्बन परमाणु पर आंशिक धनावेश होता है। ऐसी अभिक्रिया में इसी के साथ हैलाइड आयन निकल जाता है, जिसे त्यागी समूह (leaving group) कहते हैं।
चूँकि प्रतिस्थापन अभिक्रिया नाभिकस्नेही (Nu−) के द्वारा होती है, अतः इसे नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं।
Nu− + R-X → R-Nu + X−
ऐल्किल हैलाइड का नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन
| अभिकर्मक | उत्पाद |
|---|---|
| KOH(aq.) | C2H5OH + KX |
| KCN | C2H5CN + KX |
| AgCN | C2H5NC + AgX |
| KNO2 | C2H5ONO + KX |
| AgNO2 | C2H5NO2 + AgX (Nitro ethane) |
| R′ONa | C2H5-O-R′ + NaX |
| HC≡C−Na+ | HC≡C-C2H5 + NaX |
| R′COOAg | R′-COO-C2H5 + AgX |
| LiAlH4 | RH (Hydrocarbon) |
| R′−M+ | C2H5-R′ (Alkanes) |
कुछ प्रमुख नाभिकस्नेही (Nu−)
Nu− : OH−, C≡N:−, Ag-CN:, O−-N=O, Ag-O-N=O, R′O−, HC≡C−, R′COO−, H−, R′−
Note: उभयदंती नाभिकस्नेही ऐसे समूह होते हैं जिनमें दो नाभिकस्नेही केन्द्र परमाणु होते हैं, जैसे सायनाइड तथा नाइट्राइट।
प्रश्न: हेलोऐल्केन की KCN से अभिक्रिया करके मुख्य उत्पाद के रूप में ऐल्किल सायनाइड बनता है, जबकि AgCN से अभिक्रिया करने पर आइसोसाइनाइड मुख्य उत्पाद बनता है। क्यों?
हल: KCN आयनिक होता है तथा विलयन में सायनाइड आयन (C≡N:−) देता है। यहाँ कार्बन तथा नाइट्रोजन दोनों ही परमाणु इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान कर सकते हैं, परन्तु ऋण आवेश मुख्यतः कार्बन पर होने के कारण यह कार्बन परमाणु के द्वारा जुड़ता है। अतः C-C आबन्ध C-N आबन्ध की तुलना में अधिक स्थायी होता है।
AgCN (Ag-C≡N:) सहसंयोजक प्रकृति का होता है तथा इसका नाइट्रोजन परमाणु इलेक्ट्रॉन युग्म दान करने के लिए स्वतंत्र होता है, इसलिए आइसोसाइनाइड मुख्य उत्पाद के रूप में बनता है।
नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया के प्रकार
(1) SN1 अभिक्रिया
(2) SN2 अभिक्रिया
| SN1 अभिक्रिया | SN2 अभिक्रिया |
|---|---|
|
एक-अणुक अभिक्रिया अर्थात
अभिक्रिया की दर केवल एक अणु पर निर्भर करती है।
(अभिक्रिया की कोटि = 1) r = k[RX] |
द्वि-अणुक अभिक्रिया अर्थात
अभिक्रिया का वेग दोनों
अभिकारकों की सांद्रता पर निर्भर करता है।
(अभिक्रिया की कोटि = 2) r = k[RX][Nu] |
| यह दो पदों में होती है। | यह एक पद में होती है। |
| मध्यवर्ती कार्बधनायन बनता है। | मध्यवर्ती के स्थान पर संक्रमण अवस्था बनती है। |
|
R-X की क्रियाशीलता का क्रम :
3° > 2° > 1° |
R-X की क्रियाशीलता का क्रम :
1° > 2° > 3° |
| अभिक्रिया में रेसेमिक मिश्रण प्राप्त होता है। | वाल्डन प्रतिलोमन होता है। |
(1.) SN1 अभिक्रिया
SN1 अभिक्रिया की क्रियाविधि —
Step – 1: मंदगति C−X आबंध के हेमोलिटिक विखंडन से एक कार्बोकैटायन (sp2) तथा एक हैलाइड आयन बनता है।
Step – 2: निर्मित कार्बोकैटायन पर नाभिकस्नेही के द्वारा आक्रमण होता है तथा प्रतिस्थापन अभिक्रिया पूर्ण होती है।
CH3
|
CH3−C−X
(slow, RDS)
⇌
CH3−C+−CH3
+ X−
|
CH3
Alkyl halide समतलीय कार्बोकैटायन
कार्बोकैटायन का स्थायित्व
3° > 2° > 1°
CH3
|
CH3−C+−CH3
+
Nu−
(Fast)
⟶
CH3
|
CH3−C−Nu
|
CH3
समतलीय कार्बोकैटायन प्रतिस्थापित उत्पाद
ऐल्किल हैलाइड के लिए SN1 अभिक्रिया में रैसेमिक मिश्रण प्राप्त होता है, क्योंकि SN1 अभिक्रिया के प्रथम पद में प्राप्त समतलीय कार्बोकैटायन का संकरण sp2 तथा आकृति समतलीय होने के कारण दोनों दिशाओं से आक्रमण कर 50% : 50% d-समावयवी तथा l-समावयवी बनते हैं। रैसेमिक मिश्रण का ध्रुवण घूर्णन शून्य होता है।
Nu− (back side attack) Nu− (frontal attack)
समतलीय कार्बोकैटायन ⟶ d-(+) 50% + l-(−) 50%
रैसेमिक मिश्रण
रैसेमिक मिश्रण उन प्रतिकृति युग्मों (d- तथा l-) के समान अनुपात में मिश्रण का ध्रुवण घूर्णन शून्य होता है, क्योंकि एक समावयवी के द्वारा उत्पन्न घूर्णन को दूसरा समावयवी निरस्त कर देता है। इस प्रकार के मिश्रण को रैसेमिक मिश्रण कहते हैं।
Note:
- SN1 अभिक्रिया की दर दूसरे धीमे पद पर निर्भर करती है। अतः अभिक्रिया का वेग केवल ऐल्किल हैलाइड की सान्द्रता पर निर्भर करता है। यह हैलोऐल्केन की प्रकृति पर, नाभिकस्नेही की शक्ति पर तथा विलायक की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती।
- ऐल्किल हैलाइड में उत्पन्न कार्बोकैटायन जितना स्थायी होगा, अभिक्रिया उतनी ही सरल होगी तथा अभिक्रिया का वेग उतना ही अधिक होगा।
- तृतीयक हैलाइड में प्राथमिक हैलाइड की अपेक्षा SN1 अभिक्रिया अधिक होती है, क्योंकि इससे बनने वाले 3° कार्बोकैटायन का स्थायित्व अधिक होता है।
R−X की क्रियाशीलता का क्रम — 3° > 2° > 1°
R−X की क्रियाशीलता का क्रम — R−I > R−Br > R−Cl > R−F
(2) SN2 अभिक्रिया यह एक पद में होती है
SN2 अभिक्रिया एक एक-पदी अभिक्रिया है। इसमें नाभिकरागी तथा त्यागी समूह की क्रिया एक साथ होती है।
इस अभिक्रिया में नाभिकरागी पश्च आक्रमण (back side attack) करता है, जिसके कारण वॉल्डन प्रतिलोमन होता है।
R-X की क्रियाशीलता का क्रम : 1° > 2° > 3°
प्रश्न : वॉल्डन प्रतिलोमन किसे कहते हैं?
उत्तर : ऐल्किल हैलाइड से SN2 अभिक्रिया द्वारा प्राप्त उत्पाद का विन्यास अभिकारक की तुलना में उलटा होता है। क्योंकि नाभिकरागी उस दिशा से जुड़ता है, जो हैलोजन परमाणु की विपरीत दिशा होती है। अर्थात d-विन्यास से l-विन्यास या l-विन्यास से d-विन्यास में परिवर्तन हो जाता है। इस घटना को वॉल्डन प्रतिलोमन कहते हैं।
प्रश्न : SN2 अभिक्रिया केवल 1° तथा 2° R−X में क्यों होती है?
उत्तर : सामान्य ऐल्किल हैलाइड में प्राथमिक हैलाइड (1°) में तीन छोटे हाइड्रोजन परमाणु होते हैं, इसलिए नाभिकरागी आसानी से आक्रमण कर लेता है। इस कारण 1° हैलाइड सबसे अधिक क्रियाशील होता है।
तृतीयक ऐल्किल हैलाइड (3°) सबसे कम क्रियाशील होते हैं, क्योंकि इनके पास −CH3 जैसे बड़े समूह होते हैं, जो नाभिकरागी के लिए स्थानिक अवरोध उत्पन्न करते हैं। अतः 3° कम क्रियाशील होता है।
| अभिक्रिया | क्रियाशीलता का क्रम |
|---|---|
| SN2 अभिक्रिया | CH3X > 1° > 2° > 3° |
| SN1 अभिक्रिया | 3° > 2° > 1° > CH3X |
Note : ऐलिलिक तथा बेंज़िलिक हैलाइड SN1 अभिक्रिया के प्रति अधिक क्रियाशीलता प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि निर्मित कार्बोकैटायन अनुनाद के द्वारा स्थायित्व प्राप्त कर लेता है।
विलोपन अभिक्रिया
जल β-हाइड्रोजन परमाणु युक्त हेलोऐल्केन को KOH के ऐल्कोहॉलीय विलयन के साथ गर्म किया जाता है, तो β-हाइड्रोजन परमाणु तथा α-कार्बन से बँधा हैलोजन परमाणु का विलोपन होता है।
B− + R-CH2-CHX-R′ → R-CH=CH-R′ + B-H + X−
यहाँ
B =
क्षार
X =
अवक्षेप समूह
सेत्ज़ेफ का नियम
विहाइड्रोजनीकरण के फलस्वरूप वह ऐल्कीन मुख्य उत्पाद के रूप में बनेगी, जिसमें द्वि-आबद्ध कार्बन परमाणुओं पर ऐल्किल समूहों की संख्या अधिक होगी। अतः 2-ब्रोमोपेन्टेन मुख्य उत्पाद के रूप में पेन्ट-2-ईन देती है।
| अभिकारक | मुख्य उत्पाद | प्रतिशत | गौण उत्पाद | प्रतिशत |
|---|---|---|---|---|
| 2-ब्रोमोपेन्टेन + OH− | पेन्ट-2-ईन | 81% | पेन्ट-1-ईन | 19% |
CH3-CH2-CH2-CH(Br)-CH3 + OH− → CH3-CH2-CH=CH-CH3 (81%)
CH3-CH2-CH2-CH(Br)-CH3 + OH− → CH3-CH2-CH2-CH=CH2 (19%)
ऐल्किल हैलाइडों से विहाइड्रोजन का क्रम : 3° > 2° > 1°
धातुओं से अभिक्रिया
ऐल्किल क्लोराइड, ब्रोमाइड तथा आयोडाइड कुछ धातुओं के साथ अभिक्रिया करके कार्बन-धातु बंध युक्त यौगिक बनाते हैं। ऐसे कार्बनधात्विक यौगिक कहलाते हैं।
ग्रीन्यार अभिकर्मक (R-Mg-X) का बनना
CH3CH2Br + Mg
⟶ शुष्क ईथर
CH3CH2MgBr
ग्रीन्यार अभिकर्मक
गुण : ध्रुवीय बंध, अधिक क्रियाशील अणु
δ− δ2+ δ−
R - Mg - X
प्रश्न : ग्रीन्यार अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया के समय नमी (H2O) को हटाना आवश्यक क्यों है? इसके लिए शुष्क ईथर का प्रयोग क्यों किया जाता है?
हल : ग्रीन्यार अभिकर्मक अत्यधिक क्रियाशील होते हैं। ये जल, ऐल्कोहॉल अथवा ऐमीन में प्रोटॉन (H+) ग्रहण कर हाइड्रोकार्बन (R-H) देते हैं। अतः ग्रीन्यार अभिकर्मक बनाने व उसके साथ अभिक्रिया के समय वायुमंडल की नमी को भी निकालना आवश्यक है। इसलिए अभिक्रिया को शुष्क ईथर में किया जाता है।
R-Mg-X + H2O ⟶ R-H + Mg(OH)X
हाइड्रोकार्बन
प्रश्न : ऐल्किल हैलाइड को हाइड्रोकार्बन में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक अभिक्रिया समीकरण लिखिए।
हल
R-X + Mg ⟶ शुष्क ईथर R-Mg-X + H2O ⟶ R-H + Mg(OH)X
वुर्ट्ज अभिक्रिया
ऐल्किल हैलाइड शुष्क ईथर में सोडियम के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोकार्बन बनाते हैं। इसे वुर्ट्ज अभिक्रिया कहते हैं। इस अभिक्रिया द्वारा कार्बन की संख्या बढ़ाई जाती है।
2R-X + 2Na ⟶ शुष्क ईथर R-R + 2NaX
हेलोएरीन की अभिक्रियाएँ
1. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया : कम क्रियाशीलता क्योंकि
(i) अनुनाद प्रभाव
हेलोएरीन में C−Cl आबंध में आंशिक द्विबंध गुण आ जाता है, इसलिए इस बंध का टूटना कठिन हो जाता है। अतः हेलोऐल्केन (R−X) की तुलना में हेलोएरीन (Ar−X) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति कम क्रियाशील होते हैं।
(ii) संकरण में अंतर (C−X बंध में)
Ar−X में X से जुड़ा C परमाणु sp2 संकरित होता है, इसलिए C−X बंध छोटा और अधिक दृढ़ होता है। अतः इसका टूटना कठिन होता है। इसलिए हेलोऐल्केन (R−X) की तुलना में हेलोएरीन (Ar−X) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति कम क्रियाशील होते हैं।
R−X में X से जुड़े C परमाणु का संकरण sp3 (s गुण 25%) Ar−X में हैलोजन से जुड़े C परमाणु का संकरण sp2 (s गुण 33.33%)
(iii) फेनिल धनायन का अस्थायित्व
हेलोएरीन के स्वत: आयनीकरण के कारण बनने वाला फेनिल धनायन अनुनाद द्वारा स्थायी नहीं हो पाता। अतः नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रिया नहीं होती।
C6H5−X ✗ C6H5+ + X−
फेनिल धनायन (अस्थायी)
2. हैलोजन (X) का हाइड्रॉक्सिल (−OH) समूह द्वारा प्रतिस्थापन
C6H5Cl
(i) NaOH, 623K, 300 atm
(ii) H+
⟶
C6H5OH
क्लोरो बेंजीन फिनॉल
Note — यदि ऑर्थो तथा पैरा स्थिति पर इलेक्ट्रॉन खींचने वाले समूह (−NO2) उपस्थित हों, तब बेंजीन से हैलोजन का हटना आसान हो जाता है।
p−नाइट्रोक्लोरोबेंजीन
(i) NaOH, 443K
(ii) H+
⟶
p−नाइट्रोफिनॉल
2,4−डाइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन
(i) NaOH, 368K
(ii) H+
⟶
2,4−डाइनाइट्रोफिनॉल
2,4,6−ट्राइनाइट्रोक्लोरोबेंजीन गरम H2O ⟶ 2,4,6−ट्राइनाइट्रोफिनॉल
2. इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ
- हैलोजनीकरण
- नाइट्रीकरण
- सल्फोनीकरण
-
फ्रीडेल क्राफ्ट अभिक्रिया
- ऐल्किलीकरण
- ऐसिलीकरण
(i) हैलोजनीकरण (+ Cl)
क्लोरोबेंजीन की Cl2 के साथ निर्जल AlCl3 अथवा निर्जल FeCl3 की उपस्थिति में अभिक्रिया कराने पर ऑर्थो तथा पैरा उत्पाद प्राप्त होते हैं।
अभिक्रिया :
C6H5Cl + Cl2
/ निर्जल AlCl3 या FeCl3
→
1,4-डाइक्लोरोबेंजीन
(मुख्य)
+
1,2-डाइक्लोरोबेंजीन
(अल्प)
(ii) नाइट्रीकरण (+ NO2)
क्लोरोबेंजीन की सांद्र HNO3 तथा सांद्र H2SO4 के साथ अभिक्रिया कराने पर ऑर्थो तथा पैरा नाइट्रो उत्पाद प्राप्त होते हैं।
अभिक्रिया :
C6H5Cl
/ सांद्र HNO3, सांद्र H2SO4
→
1-क्लोरो-2-नाइट्रोबेंजीन
(अल्प)
+
1-क्लोरो-4-नाइट्रोबेंजीन
(मुख्य)
(iii) सल्फोनीकरण (+ SO3H)
क्लोरोबेंजीन की सांद्र H2SO4 के साथ उष्मा देने पर ऑर्थो तथा पैरा सल्फोनिक अम्ल प्राप्त होते हैं।
अभिक्रिया :
C6H5Cl
/ सांद्र H2SO4, Δ
→
2-क्लोरोबेंजीन सल्फोनिक अम्ल
(अल्प)
+
4-क्लोरोबेंजीन सल्फोनिक अम्ल
(मुख्य)
(iv) फ्रीडेल क्राफ्ट अभिक्रिया
(a) ऐल्किलीकरण (+ CH3)
क्लोरोबेंजीन की CH3Cl के साथ निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में अभिक्रिया कराने पर ऑर्थो तथा पैरा उत्पाद प्राप्त होते हैं।
अभिक्रिया :
C6H5Cl + CH3Cl
/ निर्जल AlCl3
→
1-क्लोरो-2-मेथाइलबेंजीन
(अल्प)
+
1-क्लोरो-4-मेथाइलबेंजीन
(मुख्य)
(b) ऐसिलीकरण (+ −COCH3)
क्लोरोबेंजीन की CH3COCl के साथ निर्जल AlCl3 की उपस्थिति में अभिक्रिया कराने पर ऑर्थो तथा पैरा उत्पाद प्राप्त होते हैं।
अभिक्रिया :
C6H5Cl + CH3COCl
/ निर्जल AlCl3
→
2-क्लोरोऐसीटोफिनोन
(अल्प)
+
4-क्लोरोऐसीटोफिनोन
(मुख्य)
3.धातुओं के साथ अभिक्रिया
वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया
ऐल्किल हैलाइड (R-X) तथा ऐरिल हैलाइड (Ar-X) का मिश्रण, Na के साथ शुष्क ईथर की उपस्थिति में गर्म करने पर ऐल्किल बेंजीन (Ar-R) देता है। इस अभिक्रिया को वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया कहते हैं।
Ar-X + Na + R-X ⟶ Ar-R + NaX
फिटिग अभिक्रिया
ऐरिल हैलाइड (Ar-X) को शुष्क ईथर में Na के साथ अभिक्रिया कराने पर सजातीय यौगिक बनते हैं, जिसमें दो ऐरिल समूह आपस में जुड़ जाते हैं। इसे फिटिग अभिक्रिया कहते हैं।
2Ar-X + 2Na ⟶ Ar-Ar + 2NaX
पॉलीहैलोजन यौगिक
एक से अधिक हैलोजन परमाणु युक्त यौगिक पॉलीहैलोजन यौगिक कहलाते हैं।
- डाइक्लोरोमीथेन (मेथिलीन क्लोराइड) (CH2Cl2)
- ट्राइक्लोरोमीथेन (क्लोरोफॉर्म) (CHCl3)
- ट्राइआयोडोमीथेन (आयोडोफॉर्म) (CHI3)
- टेट्राक्लोरोमीथेन (कार्बन टेट्राक्लोराइड) (CCl4)
- फ्रेऑन
- p,p'-डाइक्लोरोडाइफिनाइल-ट्राइक्लोरो एथेन (DDT)
(i) डाइक्लोरोमीथेन (मेथिलीन क्लोराइड)
CH2Cl2
इसका उपयोग विलायक के रूप में, पेंट, ऐरोसॉल में तथा औषधि निर्माण की प्रक्रिया में होता है।
यह धातु की सफाई एवं फिनिशिंग विलायक के रूप में भी प्रयुक्त होता है।
यह मनुष्यों के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को हानि पहुँचाता है। वायु में मेथिलीन क्लोराइड की थोड़ी-सी मात्रा के संपर्क में आने से सुनने और देखने की क्षमता में कमी आती है।
आँखों से सीधा संपर्क होने पर कॉर्निया जल सकता है।
(ii) ट्राइक्लोरोमीथेन (क्लोरोफॉर्म)
CHCl3
इसका उपयोग वसा, ऐल्केलॉयड, आयोडीन तथा अन्य पदार्थों के लिए विलायक के रूप में होता है।
वर्तमान में क्लोरोफॉर्म का प्रमुख उपयोग फ्रेऑन प्रशीतक F-22 बनाने में होता है।
क्लोरोफॉर्म को सूँघने से व्यक्ति बेहोश हो जाता है। पहले इसका उपयोग शल्य चिकित्सा में निश्चेतक के रूप में होता था, परंतु अब इसका स्थान ईथर जैसे कम विषैले और अधिक सुरक्षित निश्चेतकों ने ले लिया है।
प्रश्न : क्लोरोफॉर्म को रंगीन बोतलों में क्यों रखा जाता है?
हल : क्लोरोफॉर्म प्रकाश की उपस्थिति में वायु द्वारा धीरे-धीरे ऑक्सीकृत होकर अत्यधिक विषैली गैस कार्बोनिल क्लोराइड (COCl2) बनाती है, जिसे फॉस्जीन भी कहते हैं। इसलिए भंडारण के लिए इसे पूर्ण भरी हुई रंगीन बोतलों में रखा जाता है, ताकि उनमें वायु न रहे।
(iii) ट्राइआयोडोमीथेन (आयोडोफॉर्म)
CHI3
इसका उपयोग प्रारंभ में पूतिरोधी (एंटीसेप्टिक) के रूप में किया जाता था। इसकी अप्रिय गंध के कारण अब इसके स्थान पर आयोडीन युक्त अन्य दवाओं का उपयोग किया जाता है।
(iv) टेट्राक्लोरोमीथेन (कार्बन टेट्राक्लोराइड)
CCl4
इसका अत्यधिक मात्रा में उत्पादन प्रशीतक बनाने तथा ऐरोसॉल के लिए प्रणोदक के उत्पादन में उपयोग करने के लिए किया जाता है।
कार्बन टेट्राक्लोराइड वायु में मुक्त होने पर ऊपरी वायुमंडल में पहुँच जाती है और ओजोन परत को नष्ट कर देती है।
ओजोन परत के नष्ट होने से मनुष्यों पर पराबैंगनी किरणों का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे त्वचा का कैंसर, आँखों की बीमारियाँ, अन्य विकार तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी हो जाती है।
(v) फ्रेऑन
मीथेन व एथेन के क्लोरोफ्लुओरो व्युत्पन्न संयुक्त रूप से फ्रेऑन कहलाते हैं।
ये अत्यधिक स्थायी, निष्क्रिय, निर्विष, असंक्षारक तथा आसानी से द्रवित हो सकने वाली गैसें हैं।
फ्रेऑन-12 (CF2Cl2) उद्योगों में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले सामान्य फ्रेऑनों में से एक है।
ये ऐरोसॉल प्रणोदक, प्रशीतक तथा वायु शीतलन में उपयोग करने के लिए उत्पादित किए जाते हैं।
(vi) p,p'-डाइक्लोरोडाइफिनाइल-ट्राइक्लोरो एथेन (DDT)
प्रथम क्लोरीनीकृत कार्बनिक कीटनाशी DDT बनाया गया था।
यह मुख्यतः मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों तथा टाइफस वाहक जुओं को समाप्त करने में प्रभावकारी होती है।
प्रश्न : कीटनाशी DDT और बेंज़ीन हेक्साक्लोराइड के IUPAC नाम क्या हैं? इनका भारत और अन्य देशों में उपयोग प्रतिबंधित क्यों है?
हल : DDT का IUPAC नाम 1,1,1-trichloro-2,2-bis(p-chlorophenyl)ethane है।
बेंज़ीन हेक्साक्लोराइड (BHC) का IUPAC नाम 1,2,3,4,5,6-hexachlorocyclohexane है।
इनका उपयोग कई देशों में प्रतिबंधित या बहुत सीमित कर दिया गया है, क्योंकि ये जैव-अविघटनीय होते हैं और पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं।
ये खाद्य शृंखला में जैव-संचयन करते हैं, जिससे मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
ये मिट्टी और जल को भी प्रदूषित करते हैं, इसलिए इनके उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है।
नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के त्रिविम रासायनिक पहलू
ध्रुवण घूर्णक यौगिक : वे यौगिक जो एक दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब होते हैं, परस्पर अध्यारोपित नहीं किये जा सकते, ऐसे यौगिक समतल ध्रुवित प्रकाश के तल को घुमाते हैं। इस प्रकार के यौगिकों को ध्रुवण घूर्णक यौगिक कहते हैं।
प्रकाशीय समावयवी जो समतल ध्रुवित प्रकाश को दायीं ओर (Clockwise) घुमाते हैं, उन्हें दक्षिण ध्रुवण घूर्णक समावयवी या d-रूप कहते हैं तथा (+) चिन्ह से व्यक्त करते हैं।
प्रकाशीय समावयवी जो समतल ध्रुवित प्रकाश को बायीं ओर अर्थात (Anticlockwise) घुमाते हैं, उन्हें वाम ध्रुवण घूर्णक समावयवी या l-रूप कहते हैं तथा (−) चिन्ह से व्यक्त करते हैं।
एकाइरल अणु : वे अणु जो अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित हो जाते हैं, उन्हें एकाइरल अणु कहते हैं।
काइरल अणु : वे अणु जो अपने दर्पण प्रतिबिम्ब पर अध्यारोपित नहीं होते, काइरल अणु कहलाते हैं तथा इस गुण को काइरालता कहते हैं।
काइरल कार्बन : वह कार्बन जो चार अलग-अलग समूहों से जुड़ा हो, काइरल कार्बन कहलाता है।
प्रतिबिम्ब रूप या एनैन्टियोमर : वे त्रिविम समावयवी जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिम्ब होते हैं तथा एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किये जा सकते, उन्हें प्रतिबिम्ब रूप या एनैन्टियोमर (enantiomers) कहते हैं।
समावयवी जो ध्रुवित प्रकाश के तल को दायीं दिशा में घुमाते हैं, दक्षिणावर्ती (d)(+) कहलाते हैं। तथा समावयवी जो ध्रुवित प्रकाश के तल को बायीं दिशा में घुमाते हैं, वामावर्ती (l)(−) कहलाते हैं।
रैसेमिक मिश्रण : दो प्रतिबिम्ब रूपों (d तथा l) के समान अनुपात में मिश्रण का ध्रुवण घूर्णन शून्य होता है, क्योंकि एक समावयवी के द्वारा उत्पन्न घूर्णन को दूसरा समावयवी निरस्त कर देता है। इस प्रकार के मिश्रण को रैसेमिक मिश्रण कहते हैं।
रैसेमिक मिश्रण को प्रदर्शित करने के लिए dl अथवा (±) उपसर्ग लगाते हैं। उदाहरण : (±) ब्यूटेन-2-ऑल
रैसीमीकरण : प्रतिबिम्ब रूप के रैसेमिक मिश्रण में परिवर्तन होने के प्रक्रम को रैसीमीकरण कहते हैं।
प्रतिलोमन, धारण तथा रेसमीकरण
जब नाभिकरागी किसी असममित कार्बन परमाणु पर आक्रमण करता है, तब तीन प्रकार के विन्यास वाले उत्पाद प्राप्त हो सकते हैं।
- यदि केवल यौगिक ‘क’ प्राप्त होता है, तो इसे विन्यास का धारण कहते हैं।
- धारण किसी अभिक्रिया में विन्यास परिवर्तन नहीं होता। अर्थात उत्पाद में त्रिविम विन्यास वही बना रहता है, जैसा कि अभिकारक में था।
- यदि केवल यौगिक ‘ख’ प्राप्त होता है, तो इसे विन्यास का प्रतिलोमन कहते हैं।
- यदि दोनों यौगिक ‘क’ तथा ‘ख’ 50 : 50 अनुपात में प्राप्त होते हैं, तो इस प्रक्रिया को रेसमीकरण कहते हैं।
प्रश्न : वॉल्डन प्रतिलोमन किसे कहते हैं?
हल : ऐल्किल हैलाइड से SN2 अभिक्रिया द्वारा प्राप्त उत्पाद का विन्यास अभिकारक की तुलना में प्रतिलोम होता है। क्योंकि नाभिकरागी, जहाँ हैलोजन परमाणु जुड़ा होता है, उसकी विपरीत दिशा से आकर जुड़ता है। अर्थात d-विन्यास से l-विन्यास या l-विन्यास से d-विन्यास में परिवर्तन हो जाता है। इस घटना को वॉल्डन प्रतिलोमन कहते हैं।
ऐल्किल हैलाइडों का कार्बन परमाणु असममित होता है।
ऐल्किल हैलाइडों के लिए SN1 अभिक्रिया में रेसमीक मिश्रण प्राप्त होता है।
क्योंकि SN1 अभिक्रिया के प्रथम पद में प्राप्त मध्यवर्ती कार्बोकैटायन का संकरण sp2 तथा आकृति समतलीय होने के कारण, नाभिकरागी दोनों दिशाओं से आक्रमण कर सकता है। इसलिए 50% d-विन्यासयुक्त तथा 50% l-विन्यासयुक्त उत्पाद बनते हैं।
