कार्बोनिल यौगिक
इनमें कार्बन-ऑक्सीजन ने द्विबन्ध होता है, जिसे कार्बोनिल समूह कहते हैं।
>C = O
कार्बोनिल यौगिक मुख्यतः निम्न प्रकार के होते हैं:
- एल्डिहाइड → –CHO
- कीटोन → Ar/R–CO–R/Ar
- कार्बोक्सिलिक अम्ल → R–COOH
- एस्टर → R–COOR′
- एसिड हैलाइड → R–COCl
- एमाइड → R–CONH2
- एनहाइड्राइड → (RCO)2O
कार्बोनिल यौगिकों का नामकरण
| संरचना | सामान्य नाम | आई.यू.पी.ए.सी. नाम |
|---|---|---|
|
एल्डिहाइड HCHO |
फॉर्मल्डिहाइड | मेथेनल |
| CH3CHO | एसीटेल्डिहाइड | एथेनल |
| (CH3)2CHCHO | आइसोब्यूटिराल्डिहाइड | 2-मेथिलप्रोपेनल |
| मिथाइल-प्रतिस्थापित साइक्लोहेक्सेन कार्बैल्डिहाइड | γ-मेथिलसाइक्लोहेक्सेनकार्बैल्डिहाइड | 3-मेथिलसाइक्लोहेक्सेनकार्बैल्डिहाइड |
| CH3CH(OCH3)CHO | α-मेथॉक्सीप्रोपिओनाल्डिहाइड | 2-मेथॉक्सीप्रोपेनल |
| CH3CH2CH2CH2CHO | वैलेराल्डिहाइड | पेन्टेनल |
| CH2=CHCHO | एक्रोलीन | प्रोप-2-एनल |
| बेंजीन रिंग–CHO | बेंजोएल्डिहाइड | बेंजीन-1, 2-डाइकार्बैल्डिहाइड |
| m-ब्रोमो प्रतिस्थापित बेंज़ैल्डिहाइड | m-ब्रोमोबेंज़ैल्डिहाइड | 3-ब्रोमोबेंज़ैल्डिहाइड अथवा 3-ब्रोमोबेंजीनकार्बैल्डिहाइड |
| कीटोन | ||
| CH3COCH2CH2CH3 | मेथिल-n-प्रोपिल कीटोन | पेन्टेन-2-ओन |
| (CH3)2CHCOCH(CH3)2 | डाइआइसोप्रोपाइल कीटोन | 2,4-डाइमेथिलपेन्टेन-3-ओन |
| मेथिल-प्रतिस्थापित साइक्लोहेक्सेनोन | α-मेथिलसाइक्लोहेक्सेनोन | 2-मेथिलसाइक्लोहेक्सेनोन |
| (CH3)2C=CHCOCH3 | मेसिटिल ऑक्साइड | 4-मेथिलपेन्ट-3-ईन-2-ओन |
कार्बोनिल समूह की संरचना
- कार्बोनिल समूह में कार्बन परमाणु sp2 संकरित अवस्था में होता है तथा तीन सिग्मा (σ) बंध निर्मित करता है। कार्बन का चौथा संयोजकता इलेक्ट्रॉन कार्बन के असंकरित p-कक्षक में होता है तथा ऑक्सीजन के p-कक्षक के साथ अतिव्यापन कर एक π बंध बनाता है।
- ऑक्सीजन परमाणु पर दो इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होते हैं।
- संरचना — समतलीय त्रिकोणीय, बंध कोण 1200
ऑक्सीजन की विद्युतऋणात्मकता कार्बन से अधिक होने के कारण कार्बन-ऑक्सीजन ध्रुवीय प्रकृति का हो जाता है। अतः कार्बोनिल समूह का कार्बन एक इलेक्ट्रॉनस्नेही (लुईस अम्ल) केंद्र और कार्बोनिल ऑक्सीजन एक नाभिकस्नेही (लुईस क्षार) केंद्र होता है।
Note- जब एल्डिहाइड समूह वलय से जुड़ा होता है तो साइक्लोएल्केन (चक्रीय एल्केन) का नाम लिखने के बाद अनुलग्न कार्बेल्डिहाइड जोड़ देते हैं तथा वलय के कार्बन परमाणुओं का अंकन उस कार्बन परमाणु से करते हैं, जिससे एल्डिहाइड समूह जुड़ा होता है।
साइक्लोहेक्सेनकार्बेल्डिहाइड
एल्डिहाइड एवं कीटोनों के बनाने की विधियाँ
- एल्कोहॉलों के ऑक्सीकरण से
- कीटोनों के हाइड्रोजनीकरण से
-
हाइड्रोकार्बनों से
- एल्कीनों के ओजोन अपघटन से
- एल्काइनों के जलयोजन से
ऐल्कोहॉलों के ऑक्सीकरण
प्राथमिक एवं द्वितीयक ऐल्कोहॉल के ऑक्सीकरण पर क्रमशः ऐल्डिहाइड एवं कीटोन बनते हैं।
-
प्राथमिक ऐल्कोहॉल
R–CH2OH ऑक्सीकरण → R–CHO
प्राथमिक ऐल्कोहॉल → ऐल्डिहाइड
-
द्वितीयक ऐल्कोहॉल
R–CH(OH)–R′ ऑक्सीकरण → R–CO–R′
द्वितीयक ऐल्कोहॉल → कीटोन
-
तृतीयक ऐल्कोहॉल
R3C–OH ऑक्सीकरण → कोई अभिक्रिया नहीं
तृतीयक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण नहीं होता।
ऐल्कोहॉलों के विहाइड्रोजनीकरण से
यह ऐल्कोहॉलों को बनाने की औद्योगिक विधि है।
-
प्राथमिक ऐल्कोहॉल
R–CH2–OH Cu / 300°C → R–CHO + H2
प्राथमिक ऐल्कोहॉल → ऐल्डिहाइड
-
द्वितीयक ऐल्कोहॉल
R–CH(OH)–R′ Cu / 300°C → R–CO–R′ + H2
द्वितीयक ऐल्कोहॉल → कीटोन
-
तृतीयक ऐल्कोहॉल
(CH3)3C–OH Cu / 300°C → (CH3)2C=CH2 + H2O
तृतीयक ऐल्कोहॉल → एल्कीन
हाइड्रोकार्बन से
- एल्कीनों के ओजोन अपघटन से
- एल्काइनों के जलयोजन से
(i) एल्कीनों के ओजोन अपघटन से
एथीन फॉर्मल्डिहाइड + फॉर्मल्डिहाइड
प्रोपीन एथेनल + मेथेनल
आइसोब्यूटीन एसीटोन + मेथेनल
(ii) एल्काइनों के जलयोजन से
H2SO4 एवं HgSO4 की उपस्थिति में एल्काइनों में जलयोजन द्वारा ऐल्डिहाइड/कीटोन प्राप्त होते हैं।
यह अभिक्रिया एनॉल रूप से कीटो रूप में परिवर्तन करती है।
एथाइन एनॉल एसीटैल्डिहाइड
प्रोपाइन एनॉल एसीटोन
एल्डिहाइडों को बनाने के विधियाँ
- ऐसिल क्लोराइड से (अम्ल क्लोराइड)
- नाइट्राइल एवं एस्टर से
-
हाइड्रोकार्बन से
-
मेथिल बेंजीन के
ऑक्सीकरण द्वारा
- क्रोमिल क्लोराइड के उपयोग से
- क्रोमिक ऑक्साइड के उपयोग से
- पार्श्व श्रृंखला के क्लोरीनीकरण के पश्चात जल अपघटन
- गाटरमान–कोच अभिक्रिया से
-
मेथिल बेंजीन के
ऑक्सीकरण द्वारा
ऐसिल क्लोराइड से (रोज़ेनमुण्ड अपचयन)
Ar / R−COCl + H2 ⟶ Ar / R−CHO
H2 / Pd−BaSO4
−HCl
बेंजोयल क्लोराइड से बेंज़ेल्डिहाइड
नाइट्राइल एवं ऐस्टर से (स्टीफन अभिक्रिया)
नाइट्राइल (एल्किल सायनाइड) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा स्टैनस क्लोराइड की उपस्थिति में ईमीन में अपचयित हो जाते हैं। जब जल अपघटन करने पर सजात एल्डिहाइड देते हैं।
R−C≡N + SnCl2 + HCl ⟶ R−CH=NH (ईमीन)
R−CH=NH H2O / H+ ⟶ R−CHO + NH3
R−C≡N ⟶ R−CHO + NH3
(i) SnCl2 / HCl
(ii) H2O / Δ
एल्किल सायनाइड ⟶ एल्डिहाइड
हाइड्रोकार्बन से
(i) मेथिल बेंजीन के ऑक्सीकरण द्वारा
- क्रोमिल क्लोराइड (CrO2Cl2) के उपयोग से (इटार्ड अभिक्रिया)
- क्रोमिक ऑक्साइड (CrO3) के उपयोग से
टॉलूइन → जेम-डाइएसीटेट → बेंज़ैल्डिहाइड
इटार्ड अभिक्रिया
(ii) पार्श्व शृंखला के क्लोरीनीकरण के पश्चात् जल अपघटन से
टॉलूइन → बेंज़ल क्लोराइड / जेम-डाइक्लोराइड → बेंज़ैल्डिहाइड
(iii) गाटरमान-कोच अभिक्रिया से
बेंजीन या इसके प्रतिस्थापित व्युत्पन्न निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड तथा क्यूप्रस क्लोराइड की उपस्थिति में कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन क्लोराइड के साथ क्रिया करते हैं, तो बेंज़ैल्डिहाइड या प्रतिस्थापित बेंज़ैल्डिहाइड प्राप्त होते हैं।
Benzene → Benzaldehyde
कीटोनों को बनाने की विधियाँ
- ऐसिल क्लोराइड से
- नाइट्राइल से
- बेंजीन या प्रतिस्थापित बेंजीन से
एल्डिहाइड बनाने की विधियाँ
- ऐसिल क्लोराइड से
2 R–C(=O)–Cl R2Cd → R–C(=O)–R' + CdCl2
- नाइट्राइल से
Ar / R – C ≡ N + R – Mg – X → Ar / R – C(–R)=N–Mg–X H3O+ → Ar / R – C(=O) + Mg(NH2)X
प्रश्न — आप प्रोपेन नाइट्राइल से प्रोपीओफिनोन कैसे बनाओगे?
हल —
CH3 – CH2 – C ≡ N
+ C6H5MgBr
ईथर
→
CH3 – CH2 – C(=N–MgBr) – C6H5
H2O
→
CH3 – CH2 – C(=O) – C6H5
+
Mg(NH2)X
प्रोपीओफिनोन
- बेंजीन या प्रतिस्थापित बेंजीन से (फ्राइडल-क्राफ्ट्स ऐसिलीकरण अभिक्रिया)
निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड की उपस्थिति में बेंजीन या प्रतिस्थापित बेंजीन, अम्ल क्लोराइड के साथ अभिक्रिया कर संगत कीटोन देते हैं। यह अभिक्रिया फ्राइडल-क्राफ्ट्स ऐसिलीकरण अभिक्रिया कहलाती है।
C6H6
+
Ar / R – C(=O) – Cl
निर्जल AlCl3
→
C6H5 – C(=O) – Ar / R
+
HCl
भौतिक गुणधर्म
भौतिक अवस्था — मेथेनॉल एक गैस है, एथेनॉल एक वाष्पशील द्रव है। अन्य एल्डिहाइड्स एवं कीटोन्स कमरे के ताप पर द्रव या ठोस होते हैं।
क्वथनांक — एल्डिहाइडों एवं कीटोनों में द्विध्रुव − द्विध्रुव आकर्षण के कारण संघनन हो जाता है। जिस कारण एल्डिहाइडों व कीटोनों के क्वथनांक लगभग समान अणुभार वाले हाइड्रोकार्बनों और ईथरों से अधिक होते हैं।
एल्डिहाइडों एवं कीटोनों > ईथर > हाइड्रोकार्बन
एल्डिहाइडों एवं कीटोनों के क्वथनांक समान अणुभार वाले एल्कोहॉलों से कम होते हैं। इसका कारण है कि एल्कोहॉलों में H-बन्ध उपस्थित होते हैं।
एल्कोहॉल > एल्डिहाइड एवं कीटोन
क्वथनांक ∝ 1 / पार्श्व शृंखला की संख्या
जल में विलेयता — एल्डिहाइडों व कीटोनों के निम्नतर सदस्य जैसे मेथेनॉल, एथेनॉल एवं प्रोपेनोन जल के साथ हाइड्रोजन बन्ध बनाने के कारण प्रत्येक अनुपात में जल में घुलनशील होते हैं।
R−C(=O)−H ··· H−O−H ··· O=C−R
विलेयता ∝ 1 / ऐल्किल समूह का आकार
एल्डिहाइडों व कीटोनों में ऐल्किल शृंखला की लम्बाई बढ़ने के साथ इनकी विलेयता घटती जाती है।
रासायनिक अभिक्रियाएँ
-
नाभिकस्नेही योग अभिक्रिया
- नाभिकस्नेही योग अभिकर्मकों की क्रियाविधि
- अभिक्रियाशीलता
-
महत्त्वपूर्ण उदाहरण
- हाइड्रोजन सायनाइड (HCN) का संयोजन
- सोडियम बाइसल्फाइट का संयोजन
- ग्रिन्यार अभिकर्मकों का संयोजन
- ऐल्कोहॉलों का संयोजन
- अमोनिया व इसके व्युत्पन्नों का संयोजन
-
अपचयन
- ऐल्डिहाइडों में अपचयन
- हाइड्रोकार्बनों में अपचयन
-
ऑक्सीकरण
-
मृदु ऑक्सीकारक क्रमशः
ऐल्डिहाइडों और
कीटोनों में विभक्त करने के लिए
प्रयुक्त होते हैं —
- टॉलेंस-परीक्षण
- फेलिंग-परीक्षण
- विभिन्न कीटोनों का हैलोफॉर्म अभिक्रिया द्वारा ऑक्सीकरण
-
मृदु ऑक्सीकारक क्रमशः
ऐल्डिहाइडों और
कीटोनों में विभक्त करने के लिए
प्रयुक्त होते हैं —
-
α-हाइड्रोजन के कारण होने वाली अभिक्रियाएँ
ऐल्डिहाइड व कीटोन के α-हाइड्रोजन परमाणुओं की अम्लता
- ऐल्डोल संघनन
- क्रॉस ऐल्डोल संघनन
-
अन्य अभिक्रियाएँ
- कैनीज़ारो अभिक्रिया
- इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया
नाभिकस्नेही योगज अभिक्रिया
- नाभिकस्नेही योगज अभिक्रियाएँ की क्रियाविधि
- अभिक्रियाशीलता
-
महत्त्वपूर्ण उदाहरण
- हाइड्रोजन सायनाइड (HCN) का संयोजन
- सोडियम बाइसल्फाइट का संयोजन
- ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक का संयोजन
- ऐल्कोहॉलों का संयोजन
- अमोनिया व इसके व्युत्पन्नों का संयोजन
(i) नाभिकरागी योग अभिक्रियाओं की क्रियाविधि
कार्बोनिल समूह में C = O बन्ध ध्रुवीय होता है, इसलिए Nu− का आक्रमण कार्बन परमाणु पर होता है।
Nu− + >C = O ⇌ >C(Nu)O− ⇌ >C(Nu)OH
चरण 1 (मन्द) चरण 2 (तीव्र)
(ii) अभिक्रियाशीलता
(a) इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव — कार्बोनिल समूह के कार्बन पर धनावेश की मात्रा बढ़ने पर Nu− का आक्रमण बढ़ जाता है, अतः क्रियाशीलता बढ़ती है।
(b) विमीय प्रभाव — यदि कार्बोनिल समूह से जुड़े समूहों का आकार बड़ा हो, तो उनके अधिक विमीय बाधा के कारण Nu− का आक्रमण घट जाता है, जिससे क्रियाशीलता घट जाती है।
| इलेक्ट्रॉनिक प्रभाव | विमीय प्रभाव |
|---|---|
| ऐल्डिहाइड कीटोन से अधिक क्रियाशील होते हैं, क्योंकि कीटोन में दो ऐल्किल समूह होने के कारण +I-प्रभाव अधिक होता है, जो कार्बोनिल समूह पर धनावेश की मात्रा को कम कर देता है। | विमीय रूप से भी कीटोनों में कार्बोनिल समूह से जुड़े समूहों का आकार बड़ा होने पर उनके अधिक विमीय बाधा के कारण Nu− का आक्रमण घट जाता है, जिससे क्रियाशीलता घट जाती है। |
ऐल्डिहाइड तथा कीटोन में क्रियाशीलता का क्रम —
HCHO > RCHO > RCOR
क्रियाशीलता का घटता क्रम
नाभिकस्नेही योग अभिक्रियाओं के महत्त्वपूर्ण उदाहरण
(क) हाइड्रोजन सायनाइड (HCN) का योग
कार्बोनिल समूह पर CN− का नाभिकस्नेही आक्रमण होता है, जिससे एल्कॉक्साइड मध्यवर्ती बनता है। इसके बाद H+ के योग से सायनोहाइड्रिन प्राप्त होता है।
सायनोहाइड्रिन
(ख) सोडियम बाइसल्फाइट का संयोजन
ऐल्डिहाइड तथा कुछ कीटोन NaHSO3 के साथ योग करके बाइसल्फाइट योगिक बनाते हैं।
बाइसल्फाइट योगिक
(ग) ग्रिन्यार अभिकर्मकों का योग
ग्रिन्यार अभिकर्मक कार्बोनिल यौगिकों से अभिक्रिया करके अलग-अलग प्रकार के ऐल्कोहॉल देते हैं।
| कार्बोनिल यौगिक | अभिक्रिया का प्रकार | उत्पाद |
|---|---|---|
| HCHO | ग्रिन्यार अभिकर्मक का योग | 1° ऐल्कोहॉल |
| ऐल्डिहाइड (HCHO के अलावा) | ग्रिन्यार अभिकर्मक का योग | 2° ऐल्कोहॉल |
| कीटोन | ग्रिन्यार अभिकर्मक का योग | 3° ऐल्कोहॉल |
(घ) ऐल्कोहॉलों का योग
ऐल्डिहाइड और कीटोन अम्लीय माध्यम में ऐल्कोहॉल के साथ अभिक्रिया करके पहले हेमिऐसीटल / हेमीकीटल तथा फिर ऐसीटल / कीटल बनाते हैं।
R–CH(OH)(OR′) + R′OH ⇌ R–CH(OR′)2 + H2O
हेमिऐसीटल → ऐसीटल
R2C(OH)(OR′) + R′OH ⇌ R2C(OR′)2 + H2O
हेमीकीटल → कीटल
(च) अमोनिया व इसके व्युत्पन्नों का संयोजन
कार्बोनिल यौगिक अमोनिया तथा इसके व्युत्पन्नों के साथ अभिक्रिया करके C=N युक्त यौगिक बनाते हैं तथा जल निकलता है।
| G | अभिकर्मक का नाम | कार्बोनिल व्युत्पन्न | उत्पाद |
|---|---|---|---|
| –H | अमोनिया | >C=NH | इमीन |
| –R | ऐमीन | >C=NR | प्रतिस्थापित इमीन (शिफ क्षारक) |
| –OH | हाइड्रॉक्सिल ऐमीन | >C=N–OH | ऑक्सीम |
| –NH2 | हाइड्रेजीन | >C=N–NH2 | हाइड्रैजोन |
| –NH–C6H4NO2 | फेनिल हाइड्रजीन | >C=N–NH–C6H4NO2 | फेनिलहाइड्रैजोन |
| –NH–C6H3(NO2)2 | 2,4-डाइनाइट्रोफिनाइल हाइड्रजीन (2,4-DNP) | >C=N–NH–C6H3(NO2)2 | 2,4-डाइनाइट्रोफिनाइलहाइड्रैजोन |
| –NH–CO–NH2 | सेमीकार्बाजाइड | >C=N–NH–CO–NH2 | सेमीकार्बाजोन |
Note : 2,4-DNP-व्युत्पन्न पीले, नारंगी या लाल ठोस होते हैं, जो ऐल्डिहाइड व कीटोन की पहचान के काम आते हैं।
2. अपचयन
(i) ऐल्कोहॉलों में अपचयन
ऐल्डिहाइड व कीटोन, NaBH4 अथवा LiAlH4 की उपस्थिति में अपचयित होकर क्रमशः प्राथमिक तथा द्वितीयक ऐल्कोहॉल देते हैं।
कार्बोनिल समूह → ऐल्कोहॉल समूह
(ii) हाइड्रोकार्बनों में अपचयन
ऐल्डिहाइड एवं कीटोन का कार्बोनिल समूह, –CH2 समूह में परिवर्तित हो जाता है।
(वोल्फ-किश्नर अपचयन) → >C=NNH2 Glycol, KOH → >CH2
(क्लेमेंसन अपचयन) → >CH2
3. ऑक्सीकरण
-
ऑक्सीकरण
- ऐल्डिहाइडों का ऑक्सीकरण
- कीटोनों का ऑक्सीकरण
ऑक्सीकरण
(i) ऐल्डिहाइड का ऑक्सीकरण
ऐल्डिहाइड आसानी से प्रबल तथा दुर्बल ऑक्सीकारकों की उपस्थिति में कार्बोक्सिलिक अम्ल में ऑक्सीकृत हो जाते हैं।
प्रबल ऑक्सीकारक – K2Cr2O7, KMnO4, HNO3 etc.
दुर्बल ऑक्सीकारक – टॉलेंस अभिकर्मक तथा फेलिंग अभिकर्मक
(ii) कीटोनों का ऑक्सीकरण
कीटोनों का ऑक्सीकरण केवल प्रबल परिस्थितियों, जैसे प्रबल ऑक्सीकारक (KMnO4, HNO3 आदि) तथा उच्च ताप पर होता है।
C1–C2 बंध के विखंडन के कारण C2–C3 बंध के विखंडन के कारण
Important point: दुर्बल ऑक्सीकारकों के द्वारा हम ऐल्डिहाइड और कीटोनों में विभेद कर सकते हैं —
- टॉलेंस-परीक्षण
- फेलिंग-परीक्षण
- मिथाइल कीटोन का हैलोफॉर्म अभिक्रिया द्वारा ऑक्सीकरण
(i) टॉलेंस-परीक्षण
ऐल्डिहाइड को ताजा बने अमोनियायुक्त सिल्वर नाइट्रेट विलयन (टॉलेंस अभिकर्मक) के साथ गरम करने पर रजत दर्पण बनता है क्योंकि सिल्वर आयन अपचयित हो जाता है तथा ऐल्डिहाइड कार्बोक्सिलेट आयन में ऑक्सीकृत हो जाते हैं।
Silver mirror
(ii) फेलिंग परीक्षण
- फेलिंग विलयन – A = aq. CuSO4 (Blue)
- फेलिंग विलयन – B = क्षारीय Na-K टार्ट्रेट (रोशेल लवण)
- फेलिंग विलयन = Feh.-A + Feh.-B equal portion (50% + 50%)
लाल-भूरा अवक्षेप
(iii) मिथाइल कीटोन का हैलोफॉर्म अभिक्रिया द्वारा ऑक्सीकरण
आवश्यक शर्त — ऐसे ऐल्डिहाइड तथा कीटोन जिनमें कम से कम एक मेथिल समूह कार्बोनिल समूह से जुड़ा हो।
यह परीक्षण CH3–CO– समूह की जाँच करने के काम आता है।
हेलोफॉर्म (ppt)
4. α-हाइड्रोजन के कारण होने वाली अभिक्रियाएँ
ऐल्डिहाइड व कीटोन में कार्बोनिल समूह से जुड़े कार्बन पर उपस्थित H-परमाणु, α-H कहलाते हैं।
ऐल्डिहाइड व कीटोन के α-हाइड्रोजन की अम्लता का कारण कार्बोनिल समूह के e− खींच लेने का प्रभाव तथा संयुग्मी क्षार के अनुनाद द्वारा स्थायित्व प्राप्त कर लेने के कारण α-H परमाणु आसानी से निकल जाता है। इसी कारण ऐल्डिहाइड व कीटोन के α-हाइड्रोजन को अम्लीय प्रकृति का कहते हैं।
α-H के कारण होने वाली अभिक्रियाएँ
- ऐल्डोल संघनन
- क्रॉस ऐल्डोल संघनन
(i) ऐल्डोल संघनन
ऐल्डिहाइडों व कीटोनों में कम से कम एक α-हाइड्रोजन होता है, तो तनु क्षार की उपस्थिति में वे अभिक्रिया द्वारा क्रमशः β-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड (ऐल्डोल) अथवा β-हाइड्रॉक्सी कीटोन (कीटोल) देते हैं। इस अभिक्रिया को ऐल्डोल अभिक्रिया कहते हैं।
ऐसीटैल्डिहाइड → 3-hydroxybutanal → α,β-असंतृप्त ऐल्डिहाइड
एसीटोन → β-हाइड्रॉक्सी कीटोन → α,β-असंतृप्त कीटोन
(ii) क्रॉस ऐल्डोल संघनन
जब दो भिन्न-भिन्न ऐल्डिहाइडों और/या कीटोनों के मध्य ऐल्डोल संघनन होता है, तो उसे क्रॉस ऐल्डोल संघनन कहते हैं।
स्वयं ऐल्डोल उत्पाद क्रॉस ऐल्डोल उत्पाद
5. अन्य अभिक्रियाएँ
- कैनीजारो अभिक्रिया
- इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया
(i) कैनीजारो अभिक्रिया
ऐल्डिहाइड जिनमें α-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होते, वे सांद्र NaOH की उपस्थिति में गर्म करने से एक अणु ऐल्कोहॉल में अपचयित हो जाता है, जबकि दूसरा अणु कार्बोक्सिलिक अम्ल के लवण में ऑक्सीकृत हो जाता है।
फॉर्मल्डिहाइड → मेथेनॉल + पोटेशियम फॉर्मेट
बेंज़ैल्डिहाइड → बेंज़िल ऐल्कोहॉल + सोडियम बेंजोएट
(ii) इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया
ऐरोमैटिक ऐल्डिहाइड व कीटोन में कार्बोनिल समूह, बेंजीन वलय पर इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के लिए अर्थो व पैरा निर्देशक तथा मेटा-निष्क्रियकारी होता है।
बेंज़ैल्डिहाइड → m-नाइट्रोबेंज़ैल्डिहाइड
ऐल्डिहाइड एवं कीटोनों के उपयोग
- रासायनिक उद्योगों में ऐल्डिहाइड एवं कीटोन अन्य उत्पादों के संश्लेषण के लिए विलायक, प्राथमिक पदार्थों और अभिकर्मकों के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।
- फॉर्मेल्डिहाइड का 40% जलीय विलयन फॉर्मेलिन को नाम से जाना जाता है, जो जैविक प्रतिदर्शों के परिरक्षण में तथा बैक्टीरियों के विनाश में जीवाणुनाशी एवं प्रतिजैविक का कार्य करता है। इसका प्रयोग फॉर्मेल्डिहाइड रेज़िनों बनाने में किया जाता है।
- ऐसिटैल्डिहाइड मुख्यतः ऐसिटिक अम्ल, एथिल ऐसिटेट, एसिटिक एनहाइड्राइड, ब्यूटेनॉलों एवं औषधों के उत्पादन में प्रारंभिक पदार्थ के रूप में उपयोग किया जाता है।
- बेंजैल्डिहाइड का उपयोग इत्र तथा रंजक उद्योगों में किया जाता है।
- ऐसिटोन और ऐसीटोफिनोन कीटोन सामान्य औद्योगिक विलायक हैं।
- कुछ ऐल्डिहाइड एवं कीटोन, जैसे सिनेमैल्डिहाइड, वेनिलिन, स्ट्रोनोपिनोन, कपूर आदि अपनी सुगंध और सुखदायक प्रभाव के लिए उपयोग में लाए जाते हैं।
कार्बोक्सिलिक अम्ल
ऐसे कार्बनिक यौगिक जिनमें कार्बोक्सिलिक, –COOH क्रियात्मक समूह उपस्थित होता है, कार्बोक्सिलिक अम्ल कहलाते हैं।
इनमें क्रियात्मक समूह एक हाइड्रॉक्सिल (–OH) समूह के साथ जुड़ा रहता है।
- फॉर्मिक अम्ल HCOOH — लाल चींटियों से प्राप्त
- एसिटिक अम्ल CH3–CH2COOH — सिरके से प्राप्त
- ब्यूटिरिक अम्ल CH3CH2CH2COOH — सड़े मक्खन से प्राप्त
| संरचना | सामान्य नाम | IUPAC नाम |
|---|---|---|
| HCOOH | फॉर्मिक अम्ल | मेथेनॉइक अम्ल |
| CH3COOH | एसिटिक अम्ल | एथेनॉइक अम्ल |
| CH3CH2COOH | प्रोपियोनिक अम्ल | प्रोपेनॉइक अम्ल |
| CH3–CH2–CH2–COOH | ब्यूटिरिक अम्ल | ब्यूटेनॉइक अम्ल |
| (CH3)2CHCOOH | आइसोब्यूटिरिक अम्ल | 2-मेथिलप्रोपेनॉइक अम्ल |
| HOOC–COOH | ऑक्सेलिक अम्ल | एथेनडाइओइक अम्ल |
| HOOC–CH2–COOH | मेलोनिक अम्ल | प्रोपेनडाइओइक अम्ल |
| HOOC–(CH2)2–COOH | सक्सिनिक अम्ल | ब्यूटेनडाइओइक अम्ल |
| HOOC–(CH2)3–COOH | ग्लूटेरिक अम्ल | पेंटेनडाइओइक अम्ल |
| HOOC–(CH2)4–COOH | एडिपिक अम्ल | हेक्सेनडाइओइक अम्ल |
| HOOC–CH2–CH(COOH)–CH2–COOH | - | प्रोपेन-1, 2, 3-ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल |
| C6H5–COOH | बेंजोइक अम्ल | बेंजीनकार्बोक्सिलिक अम्ल (बेंजोइक अम्ल) |
| C6H5–CH2COOH | फेनिलएसेटिक अम्ल | 2-फेनिलएथेनॉइक अम्ल |
| C6H4(COOH)2 | फ्थैलिक अम्ल | बेंजीन-1, 2-डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल |
Note
ऑक्सैलिक अम्ल मेलॉनिक अम्ल सक्सिनिक अम्ल
ग्लूटेरिक अम्ल
एडिपिक अम्ल
कार्बोक्सिल समूह की संरचना
कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाने की विधियाँ
- प्राथमिक ऐल्कोहॉलों व ऐल्डिहाइडों से
- ऐल्किल बेंजीनों से
- नाइट्राइल और ऐमाइड से
- ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक से
- ऐसिल क्लोराइड और ऐसिडऐनहाइड्राइड से
- एस्टर से
कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाने की विधियाँ
1. प्राथमिक ऐल्कोहॉल व ऐल्डिहाइड से
(i) प्राथमिक ऐल्कोहॉल से
(ii) H3O+ → R–COOH
(ii) ऐल्डिहाइड से — दुर्बल ऑक्सीकारक के उपयोग से ऐल्डिहाइड कार्बोक्सिलिक अम्ल में बदलते हैं।
फॉर्मल्डिहाइड → फॉर्मिक अम्ल एसीटैल्डिहाइड → एसीटिक अम्ल
2. ऐल्किल बेंजीनों से
- ऐल्किल बेंजीनों को क्रोमिक अम्ल अथवा क्षारीय KMnO4 द्वारा ऑक्सीकृत करके ऐरोमैटिक कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाये जाते हैं।
- ऐल्किल बेंजीनों में पार्श्व शृंखला चाहे किसी भी लम्बाई की हो, ऑक्सीकारित होकर कार्बोक्सिल समूह में परिणत हो जाती है।
मेथिलबेंजीन → बेंजोइक अम्ल
n-ब्यूटिलबेंजीन → बेंजोइक अम्ल
3. नाइट्राइल और एमाइड से
उष्मक के रूप में H+ या OH− आयनों की उपस्थिति में नाइट्राइल पहले एमाइड और फिर कार्बोक्सिलिक अम्लों में जल अपघटित हो जाते हैं।
(HOH) → Ar / R – C(OH)=NH → Ar / R – C(=O) – NH2 Δ
(HOH) → Ar / R – COOH + NH3
इमिडिक अम्ल → एमाइड → कार्बोक्सिलिक अम्ल
4. ग्रिगनार्ड अभिकर्मक से
ग्रिगनार्ड अभिकर्मक कार्बन डाइऑक्साइड (शुष्क बर्फ) के साथ अभिक्रिया से कार्बोक्सिलिक अम्ल के लवण प्राप्त होते हैं।
5. ऐसिल क्लोराइड और ऐनहाइड्राइड से
बेंजोइक ऐनहाइड्राइड → बेंजोइक अम्ल
बेंजोइक एथेनोइक ऐनहाइड्राइड → बेंजोइक अम्ल + एथेनोइक अम्ल
6. एस्टर से
एस्टरों के अम्लीय जल अपघटन से सीधे ही कार्बोक्सिलिक अम्ल प्राप्त होते हैं, जबकि क्षारीय जल अपघटन द्वारा कार्बोक्सिलेट लवण होते हैं, जो अम्ल द्वारा विलोम पर कार्बोक्सिलिक अम्ल देते हैं।
एथिल बेंजोएट → बेंजोइक अम्ल + एथिल ऐल्कोहॉल
H3O+ ↓
CH3CH2CH2COOH
एथिल ब्यूटिरेट → सोडियम ब्यूटिरेट → ब्यूटिरिक अम्ल
भौतिक गुण
क्वथनांक — कार्बोक्सिलिक अम्लों में H-बन्ध बनने से अतिरिक्त ऐसोसिएशन होता है। इस कारण इनका क्वथनांक समान अणुभार वाले ऐल्कोहॉल से अधिक होता है।
क्वथनांक ∝ 1 / पार्श्व श्रृंखला की संख्या
C4 तक सरल कार्बोक्सिलिक अम्ल हाइड्रोजन बन्ध बनने के कारण जल में विलेय होते हैं। कार्बन परमाणुओं की संख्या (ऐल्किल समूह) बढ़ने के साथ विलेयता घटती जाती है।
विलेयता ∝ 1 / ऐल्किल समूह का आकार
रासायनिक अभिक्रियाएँ
-
अभिक्रियाएँ जिनमें
O-H बंध का
विच्छेदन होता है —
-
अम्लता
- धातु व क्षार के साथ अभिक्रिया
- कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लता पर प्रतिस्थापियों का प्रभाव
-
अम्लता
-
अभिक्रियाएँ जिनमें
C-OH बंध का
विच्छेदन होता है —
- एस्टरीकरण का वियोजन
- एस्टरीकरण
- PCl5, PCl3 तथा SOCl2 के साथ अभिक्रिया
- अमोनिया एवं क्षार के साथ अभिक्रिया
-
कार्बॉक्सिलिक समूह
–COOH की
अभिक्रियाएँ —
- अपचयन
- विकलकार्बॉक्सीकरण
-
हाइड्रोकार्बन भाग में
प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ —
- हेलोजनीकरण (हेलोफार्म उत्पन्न की अभिक्रिया)
- वलय प्रतिस्थापन
अभिक्रियाएँ जिनमें O–H बंध का विखण्डन होता है
अम्लता
कार्बोक्सिलिक अम्ल जल में वियोजित होकर कार्बोक्सिलेट ऋणायन तथा प्रोटॉन (H+) आयन देते हैं, जो अनुनाद द्वारा स्थायित्व प्राप्त करते हैं।
उपर्युक्त अभिक्रिया के लिए:
Ka = अम्ल वियोजन स्थिरांक
Ka तथा pKa में सम्बन्ध:
अतः अम्ल के pKa मान जितना कम होगा, अम्ल उतना ही प्रबल होगा।
प्रश्न — फीनॉल ऐल्कोहॉलों की अपेक्षा अधिक अम्लीय होते हैं। क्यों?
प्रश्न — कार्बोक्सिलिक अम्ल, फीनॉलों की अपेक्षा अधिक अम्लीय होते हैं। समझाइए?
हल — कार्बोक्सिलिक अम्ल का संयुग्मी क्षार, कार्बोक्सिलेट आयन, दो ऑक्सीजन परमाणुओं पर ऋणावेश के विस्थानीकरण के कारण स्थायित्व प्राप्त करता है। जबकि फीनॉल का संयुग्मी क्षार एक फिनॉक्साइड आयन प्राप्त होता है, जिसकी अनुनादी संरचनाएँ असमान होती हैं, क्योंकि इनमें ऋणावेश अल्प विद्युतऋणी कार्बन परमाणु पर स्थित होता है।
अतः कार्बोक्सिलेट आयन का ऋणावेश दो विद्युतऋणी ऑक्सीजन परमाणुओं पर विस्थापित होता है, जबकि फिनॉक्साइड आयन में यह ऑक्सीजन एवं ऑर्थो/पैरा कार्बन परमाणुओं पर विस्थापित होता है। इस कारण कार्बोक्सिलेट आयन, फिनॉक्साइड आयन की तुलना में अधिक स्थायित्व प्राप्त करता है। अतः कार्बोक्सिलिक अम्ल फीनॉलों की अपेक्षा अधिक अम्लीय होते हैं।
अम्लता पर प्रतिस्थापियों का प्रभाव
कार्बोक्सिलिक अम्ल की अम्लता पर प्रतिस्थापियों का प्रभाव दो कारणों से होता है:
- प्रेरणिक प्रभाव — यदि प्रतिस्थापी –I समूह हो तो यह कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीयता बढ़ाता है, जबकि यदि ये +I समूह हों तो अम्लीयता घटाता है।
- अनुनादी प्रभाव — यदि प्रतिस्थापी –R समूह हो तो यह कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीयता बढ़ाता है, जबकि यदि ये +R समूह हों तो अम्लीयता घटाता है। साथ ही अनुनादी प्रभाव केवल O– और P– स्थिति पर ही होता है।
EDG → कार्बोक्सिलेट आयन को अस्थायी बनाता है और अम्ल को दुर्बल कर देता है।
धातु व क्षारों के साथ अभिक्रिया
सोडियम कार्बोक्सिलेट
सोडियम कार्बोक्सिलेट
अभिक्रियाएँ जिनमें C–OH बंध का विखण्डन होता है
1. ऐनहाइड्राइड का विरचन
or P2O5, Δ → (CH3CO)2O
एथेनोइक अम्ल → एथेनोइक ऐनहाइड्राइड
2. एस्टरीकरण
कार्बोक्सिलिक अम्लों के एस्टरीकरण की क्रियाविधि निम्नलिखित है:
कार्बोक्सिलिक अम्ल
चतुष्फलकीय मध्यवर्ती
प्रोटॉनित एस्टर
एस्टर
3. PCl5, PCl3 तथा SOCl2 के साथ अभिक्रिया
- PCl5, PCl3 तथा SOCl2 के साथ अभिक्रिया
R – C(=O) – OH + PCl5 → R – C(=O) – Cl + POCl3 + HCl
कार्बोक्सिलिक अम्ल ऐसिल क्लोराइड
3 R – C(=O) – OH + PCl3 → 3 R – C(=O) – Cl + H3PO3
कार्बोक्सिलिक अम्ल ऐसिल क्लोराइड
R – C(=O) – OH + SOCl2 → R – C(=O) – Cl + SO2 + HCl
कार्बोक्सिलिक अम्ल ऐसिल क्लोराइड
4. अमोनिया के साथ अभिक्रिया (ऐल्केनोमाइड का बनना)
कार्बोक्सिलिक अम्ल अमोनिया के साथ अभिक्रिया द्वारा अमोनियम लवण बनाते हैं, जो अधिक उच्च ताप पर गर्म करने से एमाइड तथा H2O बनाते हैं।
कार्बोक्सिलिक अम्ल → अमोनियम लवण → ऐल्केनोमाइड
उदाहरण
बेंजोइक अम्ल → अमोनियम बेंजोएट → बेंजोएमाइड
फ्थैलिक अम्ल → अमोनियम लवण → फ्थैलिमाइड
कार्बोक्सिलिक समूह – COOH की अभिक्रियाएँ
1. अपचयन
2. विकार्बोक्सिलीकरण
(सोडा लाइम के साथ अभिक्रिया)
हाइड्रोकार्बन भाग में प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ
1. हैलोजनीकरण (हेल-वोल्हार्ड जेलेंस्की अभिक्रिया)
आवश्यक शर्त — α–H का उपस्थित होना।
α–हाइड्रोजन वाले कार्बोक्सिलिक अम्ल Cl2 या Br2 के साथ कम मात्रा में लाल फॉस्फोरस की उपस्थिति में क्रिया करके α–हैलोकार्बोक्सिलिक अम्ल देते हैं। यह अभिक्रिया हेल वोल्हार्ड जेलेंस्की अभिक्रिया कहलाती है।
(X = Cl, Br) → R–CHX–COOH Red P / X2 / Δ → R–CX2–COOH
α–हैलोकार्बोक्सिलिक अम्ल α,α–डाइहैलोकार्बोक्सिलिक अम्ल
2. वलय प्रतिस्थापन (इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया)
ऐरोमैटिक कार्बोक्सिलिक अम्ल में कार्बोक्सिल समूह इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के लिए o– व p– निष्क्रियकारी तथा m– निर्देशक होता है।
बेंजोइक अम्ल → m-नाइट्रोबेंजोइक अम्ल
बेंजोइक अम्ल → m-ब्रोमोबेंजोइक अम्ल
Note: ऐरोमैटिक कार्बोक्सिलिक अम्ल फ्रिडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया प्रदर्शित नहीं करते। इसे प्रमुख उदाहरण ट्यूलियम क्लोराइड (लुईस अम्ल) कार्बोक्सिल समूह से बंधित हो जाता है।
कार्बोक्सिलिक अम्लों के उपयोग
- मेथेनॉइक अम्ल रबर, वस्त्र, रंगाई, चमड़ा एवं इलेक्ट्रोप्लेटिंग उद्योगों में उपयोग में आता है।
- एथेनॉइक अम्ल विनिगर के रूप में सिरका एवं सैलूलोज़ एसीटेट के निर्माण हेतु उपयोग किया जाता है।
- बेंजीनकार्बोक्सिलिक अम्ल का उपयोग नाइलॉन-6, 6 के निर्माण में होता है।
- बेंजोइक अम्ल एवं फ्थैलिक अम्ल रंजकों तथा औषधि उद्योगों में होते हैं।
- सोडियम बेंजोएट का उपयोग खाद्य परिरक्षक में होता है।
- उच्चतर वसीय अम्लों का उपयोग साबुन एवं अपमार्जकों के उत्पादन में किया जाता है।
