Class 11 Chemistry Chapter 8 Notes – organic chemistry some basic principles and techniques (Hindi Medium)

कार्बन की चतुषसंयोजकता

कार्बनिक यौगिकों की
आकृति का निर्धारण उसमें उपस्थित
कार्बन परमाणु के
संकरण द्वारा किया जाता है।

जैसे —

C2H6 अणु में sp3 संकरण

C2H6 sp3 Hybridisation

C2H4 में sp2 संकरण

C2H4 sp2 Hybridisation

C2H2 में sp संकरण

C2H2 sp Hybridisation

संकरित कक्षकों के विद्युतऋणात्मकता का क्रम

गुण sp sp2 sp3
कक्षक 2 3 4
% s गुण 50% 33.33% 25%
% p गुण 50% 66.67% 75%
Examples HC ≡ CH H2C = CH2 CH3 − CH3

संकरित कक्षकों की विद्युतऋणात्मकता का क्रम —


sp > sp2 > sp3

(विद्युतऋणात्मकता ∝ % s – लक्षण)

एल्काइन > एल्कीन > एल्केन

संकरण आधारित प्रश्न

प्रश्न 1 :
निम्नलिखित अणुओं में से प्रत्येक में
कितने σ तथा π आबंध हैं ?

(i) H–C ≡ C–C = CH–CH3
(ii) CH2 = C = CH–CH3

उत्तर देखें

(i) H–C ≡ C–C = CH–CH3

Step 1 :
एकल आबंध = 1 σ

Step 2 :
द्वि आबंध = 1 σ + 1 π

Step 3 :
त्रि आबंध = 1 σ + 2 π

C≡C → 1σ + 2π
C=C → 1σ + 1π


कुल σ आबंध = 10


कुल π आबंध = 3


(ii) CH2 = C = CH–CH3

दो C=C द्वि आबंध उपस्थित हैं।

कुल σ आबंध = 8

कुल π आबंध = 2

प्रश्न 2 :
निम्नलिखित यौगिकों में प्रत्येक कार्बन की
संकरण अवस्था क्या है ?

(i) CH3Cl  
(ii) (CH3)2CO  
(iii) CH3CN  
(iv) HCONH2  
(v) CH3CH = CH–CN

उत्तर देखें

(i) CH3Cl
Carbon के
चार σ बन्ध होते हैं →
sp3

(ii) (CH3)2CO
CH3 carbon →
sp3
C=O carbon →
sp2

(iii) CH3CN
CH3 carbon →
sp3
C≡N carbon →
sp

(iv) HCONH2
Carbonyl carbon →
sp2

(v) CH3CH = CH–CN
CH3 carbon →
sp3
C=C carbon →
sp2
C≡N carbon →
sp

कार्बनिक यौगिक का संरचनात्मक निरूपण

कार्बनिक यौगिकों को मुख्यतः
तीन प्रकार से दर्शाया जाता है —

  1. पूर्ण संरचना द्वारा
  2. संक्षिप्त संरचना द्वारा
  3. बॉण्ड रेखा संरचना द्वारा
(1) पूर्ण संरचना द्वारा

उदाहरण :

अणु नाम
C2H6 एथेन
C2H4 एथीन
C2H2 एथाइन
CH3OH मेथेनॉल
(2) संक्षिप्त संरचना द्वारा

CH3–CH3 →
C2H6
   (एथेन)

CH2=CH2 →
C2H4
   (एथीन)

CH≡CH →
C2H2
   (एथाइन)

CH3–CH2–CH2–CH3
→ C4H10

—

(3) बॉण्ड रेखा संरचना द्वारा

इस प्रकार की संरचना में
कार्बन परमाणुओं को
रेखाओं द्वारा दर्शाया जाता है।

CH3–CH2–CH2–CH3

(रेखा संरचना द्वारा दर्शाया जाता है)

अभ्यास प्रश्न

प्रश्न :
3-मिथाइलऑक्टेन
का संरचनात्मक निरूपण कीजिए।

CH3–CH2–CH2–CH2–CH2–CH–CH2–CH3

│

CH3

3-ब्रोमोब्यूटेन को दर्शाने के विभिन्न तरीके

CH3–CHBr–CH2–CH3

CH3–CH(Br)–CH2–CH3

कार्बनिक यौगिकों का त्रिविमीय सूत्र

कार्बनिक यौगिकों की
त्रिविमीय संरचना को दर्शाने के लिए
विभिन्न प्रकार की रेखाओं का प्रयोग किया जाता है।

रेखा का प्रकार अर्थ
साधारण रेखा यह दर्शाती है कि आबंध
कागज के तल पर स्थित है।
टूटी रेखा यह दर्शाती है कि आबंध
दर्शक से दूर जा रहा है।
ठोस मोटी रेखा यह दर्शाती है कि आबंध
दर्शक की ओर आ रहा है।

त्रिविमीय संरचना में कार्बन के चारों आबंध अलग-अलग दिशाओं में होते हैं।

कार्बनिक यौगिकों का वर्गीकरण

कार्बनिक यौगिक

अचक्रीय (Open Chain) चक्रीय (Closed Chain)

C की खुली श्रृंखला
(सीधी या शाखित)

एल्केन : CnH2n+2

एल्कीन : CnH2n

एल्काइन : CnH2n-2

असंतृप्त कार्बनिक यौगिक

3 या अधिक C परमाणु

C–C , C=C , C≡C

साइक्लोएल्केन
साइक्लोएल्कीन
साइक्लोएल्काइन

C वलय के रूप में

सम चक्रीय
केवल C परमाणु द्वारा वलय

विषमचक्रीय
C के अलावा अन्य परमाणु वलय में उपस्थित

एरोमैटिक यौगिक

  • वलय में 6 C परमाणु
  • एकांतर एकल तथा द्वि आबंध
  • बेंज़ीन वलय

अचक्रीय या ऐलिफैटिक (वसीय) यौगिक

अचक्रीय या ऐलिफैटिक (वसीय) यौगिक
वे कार्बनिक यौगिक होते हैं जिनमें
कार्बन की सीधी या शाखित श्रृंखला
पाई जाती है। इन यौगिकों को
ऐलिफैटिक यौगिक भी कहा जाता है।

उदाहरण :

संरचना यौगिक का नाम
CH3–CH3 एथेन
CH3–CH(CH3)–CH3 आइसोब्यूटेन
CH3–CHO एसीटैल्डिहाइड
CH3–COOH एसीटिक अम्ल

चक्रीय यौगिक (C वलय के रूप में उपस्थित)

चक्रीय यौगिकों में
कार्बन परमाणु आपस में जुड़कर वलय बनाते हैं।
इनके मुख्यतः दो प्रकार होते हैं —

(a) ऐलिसाइक्लिक यौगिक

ऐलिसाइक्लिक (Alicyclic) या
ऐलिफैटिक चक्रीय यौगिक वे यौगिक हैं जिनमें
कार्बन परमाणु जुड़कर समचक्रीय (Homocyclic) वलय बनाते हैं।

इनमें सामान्यतः 3 या अधिक C परमाणु होते हैं।

संभव बंध :
C–C , C=C , C≡C

उदाहरण :
साइक्लोएल्केन
साइक्लोएल्कीन
साइक्लोएल्काइन


विषमचक्रीय यौगिक

यदि वलय में
कार्बन परमाणु के अलावा अन्य परमाणु
जुड़े होते हैं तो उन्हें
विषमचक्रीय (Heterocyclic) वलय कहते हैं।

उदाहरण : फ्यूरान, थायोफीन, पाइरीडिन


एरोमैटिक यौगिक
  • वलय में 6 C परमाणु होते हैं
  • एकांतर एकल तथा द्वि आबंध उपस्थित होते हैं
  • बेंज़ीन वलय पाया जाता है

उदाहरण : बेंजीन


क्रियात्मक समूह (Functional Group)

क्रियात्मक समूह वह
परमाणु या परमाणुओं का समूह होता है जो
किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित होकर
उस यौगिक के रासायनिक गुणों के लिए उत्तरदायी होता है।

अर्थात किसी कार्बनिक यौगिक में जुड़ा हुआ वह समूह जो उसके
रासायनिक अभिक्रियाओं को निर्धारित करता है,
क्रियात्मक समूह कहलाता है।

उदाहरण :
  • हाइड्रॉक्सिल समूह → (–OH)
  • एल्डिहाइड समूह → (–CHO)
  • कार्बोक्सिलिक अम्ल समूह → (–COOH)

सजातीय श्रेणी (Homologous Series)

कार्बनिक यौगिकों का ऐसा समूह जिसमें
एक ही प्रकार का क्रियात्मक समूह होता है और
क्रमागत सदस्यों के बीच
–CH2 का अंतर होता है,
सजातीय श्रेणी कहलाती है।

सजातीय श्रेणी के सदस्यों को सामान्यतः उनके
सामान्य सूत्र द्वारा व्यक्त किया जाता है।

कार्बनिक यौगिकों की नामपद्धति

कार्बनिक यौगिकों के नाम मुख्यतः दो प्रकार से दिए जाते हैं —

  1. रूढ़ पद्धति (सामान्य नाम)
  2. IUPAC नामकरण
    (International Union of Pure and Applied Chemistry)

(1) रूढ़ पद्धति या सामान्य नाम

कुछ कार्बनिक यौगिकों के सामान्य नाम नीचे दिए गए हैं —

यौगिक सामान्य नाम यौगिक सामान्य नाम
CH4 मीथेन CHCl3 क्लोरोफॉर्म
CH3CH2CH2CH3 n-ब्यूटेन CH3COOH एसीटिक अम्ल
(CH3)2CHCH3 आइसोब्यूटेन C6H6 बेंजीन
(CH3)2CO डाइमिथाइल कीटोन C6H5OCH3 एनीसोल
CH3CH2CH2OH n-प्रोपाइल ऐल्कोहॉल C6H5NH2 एनिलिन
HCHO फॉर्मल्डिहाइड C6H5COCH3 एसीटोफेनोन
(CH3)2CO एसीटोन CH3OCH2CH3 एथिल मिथाइल ईथर

(2) IUPAC नामकरण

IUPAC नामकरण में यौगिकों का नाम निम्न चरणों में निर्धारित किया जाता है —

  1. जनक श्रृंखला का चयन
    (सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला)
  2. क्रमांकन
    जिससे क्रियात्मक समूह को न्यूनतम संख्या मिले।
  3. प्रतिस्थापी समूह (Substituent) पहचानना।
  4. क्रियात्मक समूह (Functional Group) की पहचान।

प्रतिस्थापी समूह (Substituent Group)
  • –X (F, Cl, Br, I) → हैलो
  • –F → फ्लोरो
  • –Cl → क्लोरो
  • –Br → ब्रोमो
  • –I → आयोडो

क्रियात्मक समूह (Functional Group)
  • –OH → ऑल
  • –CHO → ऐल
  • C=O → ओन
  • –COOH → ओइक अम्ल

जनक श्रृंखला में कार्बन परमाणुओं की संख्या

C1 → Meth
C2 → Eth
C3 → Prop
C4 → But
C5 → Pent
C6 → Hex
C7 → Hept
C8 → Oct
C9 → Non
C10 → Dec

क्रियात्मक समूह युक्त यौगिकों का नामकरण

क्रियात्मक समूह का नाम सूत्र पूर्वलक्षण अनुलक्षण
कार्बोक्सिलिक अम्ल –COOH — ओइक अम्ल
सल्फोनिक अम्ल –SO3H — सल्फोनिक अम्ल
एस्टर –COOR एल्कॉक्सी कार्बोनिल —ओएट
अम्ल हैलाइड –COX — हैलो कार्बोनिल
एमाइड –CONH2 — एमाइड
नाइट्राइल –CN सायनो नाइट्राइल
आइसो नाइट्राइल –NC आइसो सायनो —
एल्डिहाइड –CHO फॉर्मिल ऐल
कीटोन RCOR ऑक्सो ओन
एल्कोहॉल –OH हाइड्रॉक्सी ऑल
थायो एल्कोहॉल –SH मरकैप्टो थियॉल
एमीन –NH2 एमीनो एमीन
ईथर R–O–R’ — एल्कॉक्सी
नाइट्रो –NO2 नाइट्रो —
हैलोजन X (F, Cl, Br, I) फ्लोरो, क्लोरो, ब्रोमो, आयोडो —

बहुक्रियात्मक समूह वाले यौगिकों का नामकरण

  • जब कार्बन की श्रृंखला में
    एक से अधिक क्रियात्मक समूह उपस्थित होते हैं,
    तो एक क्रियात्मक समूह को मुख्य मानकर
    दूसरे क्रियात्मक समूहों को
    प्रतिस्थापी के रूप में नाम दिया जाता है।
  • मुख्य क्रियात्मक समूह का चयन
    प्राथमिकता के आधार पर किया जाता है।
  • प्राथमिकता क्रम का एक सामान्य क्रम —

    –COOH , –SO3H , –COOR , –COCl , –CONH2 , –CN , –CHO , >C=O , –OH , –NH2 , C=C , C≡C

  • R , C6H5 (फेनिल) , हैलोजन X (F, Cl, Br, I) , NO2 ,
    एल्कॉक्सी (–OR)
    आदि को हमेशा
    प्रतिस्थापी पूर्वलक्षण के रूप में लिखा जाता है।

उदाहरण

HO–CH2(CH2)3–CH2–C(=O)–CH3

सही नाम :
7-हाइड्रॉक्सीहेप्टेन-2-ओन

गलत नाम :
2-ऑक्सोहेप्टेन-7-ऑल


यदि एक ही प्रकार के क्रियात्मक समूह
की संख्या एक से अधिक हो, तो उनकी संख्या बताने के लिए
di, tri, tetra आदि उपसर्ग लगाए जाते हैं।

CH2(OH)CH2(OH)

एथेन-1,2-डाइऑल

बेंजीन व्युत्पन्नों की नामपद्धति

  • IUPAC नामकरण में
    प्रतिस्थापी समूह का नाम
    पूर्वलक्षण के रूप में लिखकर उसके बाद
    “बेंजीन” शब्द लगाया जाता है।
  • कुछ यौगिकों के
    रूढ़ नाम भी प्रचलित हैं
    (जो कोष्ठक में लिखे जाते हैं)।

उदाहरण
संरचना IUPAC नाम रूढ़ नाम
C6H5–CH3 मेथिल-बेंजीन टोल्यून
C6H5–OCH3 मेथॉक्सी-बेंजीन एनीसोल
C6H5–NH2 एमीनो-बेंजीन एनिलिन
C6H5–NO2 नाइट्रो-बेंजीन —
C6H5–Br ब्रोमो-बेंजीन —

चक्रीय यौगिक : “साइक्लो” पूर्वलग्न

बेंजीन व्युत्पन्नों में Ortho, Meta, Para

जब बेंजीन वलय में
दो प्रतिस्थापी समूह उपस्थित होते हैं,
तो उनकी स्थिति को दर्शाने के लिए
ortho (o),
meta (m) तथा
para (p) शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

स्थिति स्थान उदाहरण
Ortho (o) 1,2 स्थिति o-डाइब्रोमोबेंजीन
Meta (m) 1,3 स्थिति m-डाइब्रोमोबेंजीन
Para (p) 1,4 स्थिति p-डाइब्रोमोबेंजीन

Ortho → 1,2     Meta → 1,3     Para → 1,4

समावयवता (Isomerism)

दो या दो से अधिक यौगिक जिनके
आणविक सूत्र समान होते हैं,
किन्तु उनके गुण भिन्न होते हैं,
उन्हें समावयव कहते हैं तथा इस परिघटना को
समावयवता कहते हैं।


समावयवता का वर्गीकरण
संरचनात्मक समावयवता त्रिविम समावयवता
  • श्रृंखला समावयवता
  • स्थिति समावयवता
  • क्रियात्मक समूह समावयवता
  • मेटामरिज्म
  • ज्यामितीय समावयवता
  • प्रकाशीय समावयवता

संरचनात्मक समावयवता + त्रिविम समावयवता = समावयवता

संरचनात्मक समावयवता

संरचनात्मक समावयवता उन यौगिकों में पाई जाती है जिनके
आणविक सूत्र समान होते हैं,
किन्तु उनकी संरचना (अर्थात परमाणुओं के आपस में बंधित होने का क्रम)
भिन्न-भिन्न होता है।

संरचनात्मक समावयवता के प्रकार
  1. श्रृंखला समावयवता
  2. स्थिति समावयवता
  3. क्रियात्मक समूह समावयवता
  4. मेटामरिज्म (मध्यावयवता)

a. श्रृंखला समावयवता

वे यौगिक जिनके आणविक सूत्र समान होते हैं लेकिन
कार्बन श्रृंखला की संरचना भिन्न होती है,
उन्हें श्रृंखला समावयव कहते हैं।

उदाहरण : C5H12 के तीन श्रृंखला समावयव

  • CH3CH2CH2CH2CH3 → पेंटेन
  • CH3CH(CH3)CH2CH3 → आइसोपेंटेन
  • (CH3)4C → नियोपेंटेन

b. स्थिति समावयवता

जब आणविक सूत्र समान हो लेकिन
क्रियात्मक समूह की स्थिति भिन्न हो,
तो उसे स्थिति समावयवता कहते हैं।

उदाहरण : C3H8O

  • CH3CH2CH2OH → प्रोपेन-1-ऑल
  • CH3CH(OH)CH3 → प्रोपेन-2-ऑल

c. क्रियात्मक समूह समावयवता

यदि दो यौगिकों के आणविक सूत्र समान हों,
किन्तु क्रियात्मक समूह भिन्न हों,
तो उसे क्रियात्मक समूह समावयवता कहते हैं।

उदाहरण : C3H6O

  • CH3COCH3 → प्रोपेनोन (कीटोन)
  • CH3CH2CHO → प्रोपेनल (एल्डिहाइड)

d. मेटामरिज्म (मध्यावयवता)

वे यौगिक जिनके आणविक सूत्र समान होते हैं लेकिन
क्रियात्मक समूह के दोनों ओर कार्बन श्रृंखला अलग-अलग होती है,
उन्हें मेटामर कहते हैं।

उदाहरण : C4H10O

  • CH3–O–C3H7 → मेथॉक्सीप्रोपेन
  • C2H5–O–C2H5 → एथॉक्सीएथेन

त्रिविम समावयवता (Stereoisomerism)

त्रिविम समावयवता उन यौगिकों में पाई जाती है जिनमें
संरचना तथा परमाणुओं के बंधन का क्रम समान रहता है,
लेकिन उनके अणुओं में परमाणुओं अथवा समूहों की त्रिविम स्थितियाँ
भिन्न होती हैं। इस प्रकार की समावयवता को
त्रिविम समावयवता कहते हैं।

प्रकार
  1. ज्यामितीय समावयवता
  2. प्रकाशीय समावयवता

डिग्री कार्बन परमाणु

कार्बन परमाणु की डिग्री उस कार्बन से जुड़े हुए
अन्य कार्बन परमाणुओं की संख्या पर निर्भर करती है।

  • 1° कार्बन (Primary Carbon) → एक कार्बन से जुड़ा
  • 2° कार्बन (Secondary Carbon) → दो कार्बन से जुड़ा
  • 3° कार्बन (Tertiary Carbon) → तीन कार्बन से जुड़ा
  • 4° कार्बन (Quaternary Carbon) → चार कार्बन से जुड़ा

प्रश्न

निम्न यौगिक में
1°, 2°, 3° तथा 4° कार्बन तथा
हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या बताइए —

CH3–C(CH3)2–CH(CH3)–CH2–OH


पूछे गए भाग
  1. 1°, 2°, 3° तथा 4° कार्बन और हाइड्रोजन परमाणु
  2. α तथा β कार्बन और हाइड्रोजन परमाणु

सहसंयोजक बंध का विघटन अथवा टूटना

सहसंयोजक बंध के टूटने के मुख्यतः
दो प्रकार होते हैं —

  1. समांश विघटन (Homolytic Cleavage)
  2. विषमांश विघटन (Heterolytic Cleavage)

(i) समांश विघटन

जब किसी अणु में सहसंयोजक बंध से जुड़े
दोनों इलेक्ट्रॉन
एक-एक परमाणु पर चले जाते हैं,
तो इस प्रकार के विघटन को
समांश विघटन कहते हैं।

इस विघटन से प्राप्त कणों को
मुक्त मूलक (Free Radical) कहते हैं।

R–X → R• + X•

यह प्रक्रिया सामान्यतः
ताप तथा प्रकाश (E = hν) की उपस्थिति में होती है।

एल्किल (R) मुक्त मूलक की स्थिरता का क्रम

3° > 2° > 1° > CH3

मुक्त मूलकों के गुण
  • इन पर सामान्यतः आवेश नहीं होता।
  • अयुग्मित इलेक्ट्रॉन के कारण ये अत्यधिक क्रियाशील होते हैं।

(ii) विषमांश विघटन

जब सहसंयोजक बंध के दोनों इलेक्ट्रॉन
एक ही परमाणु को प्राप्त हो जाते हैं,
तो इस प्रकार के विघटन को
विषमांश विघटन कहते हैं।

A : B → A+ + B−

इस विघटन से प्राप्त कणों को —

  • कार्बोकैटायन (Carbocation)
  • कार्बोएनायन (Carbanion)

कहते हैं।


कार्बोकैटायन

कार्बोकैटायन में कार्बन परमाणु का
संकरण sp2 होता है तथा
इसकी आकृति
त्रिकोणीय समतली होती है।

कार्बोकैटायन की स्थिरता का क्रम —

3° > 2° > 1° > CH3+


कार्बोएनायन

कार्बोएनायन में कार्बन परमाणु का
संकरण sp3 होता है तथा
इसकी आकृति
त्रिकोणीय पिरामिडीय होती है।

कार्बोएनायन की स्थिरता का क्रम —

CH3− > 1° > 2° > 3°

नाभिकस्नेही तथा इलेक्ट्रॉन्स्नेही

(1) नाभिकस्नेही या नाभिकरागी (Nucleophile, Nu⁻)
  • Nucleo = Nucleus तथा
    phile = love,
    अर्थात नाभिक से स्नेह करने वाला समूह।
  • नाभिकस्नेही वे कण होते हैं जो
    ऋणावेशित होते हैं या जिनके पास
    इलेक्ट्रॉन युग्म उपस्थित होता है।
  • ये सामान्यतः
    इलेक्ट्रॉन युग्म दान करने की प्रवृत्ति रखते हैं।
  • उदाहरण :
    OH⁻ , CN⁻ , Cl⁻ , CH₃⁻ , R–OH , H₂O , NH₃

(2) इलेक्ट्रॉन्स्नेही (Electrophile, E⁺)
  • Electro = electron तथा
    phile = love,
    अर्थात इलेक्ट्रॉन की ओर आकर्षित होने वाला कण।
  • इलेक्ट्रॉन्स्नेही वे कण होते हैं जो
    धनावेशित होते हैं या जिनमें
    इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति होती है।
  • उदाहरण :
    CH₃⁺ , NO₂⁺ , Cl⁺ , H⁺ , BF₃

प्रश्न

इलेक्ट्रॉन्स्नेही तथा नाभिकस्नेही क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।


वर्गीकरण प्रश्न

निम्नलिखित को नाभिकस्नेही तथा इलेक्ट्रॉन्स्नेही में वर्गीकृत कीजिए —

HS⁻ , BF₃ , C₂H₅O⁻ , (CH₃)₃N , Cl⁺ , CH₃CHO , H₂N–NO₂

नाभिकस्नेही :
HS⁻ , C₂H₅O⁻ , (CH₃)₃N , H₂N–

इलेक्ट्रॉन्स्नेही :
BF₃ , Cl⁺ , CH₃CHO , NO₂


एक और प्रश्न

निम्नलिखित में इलेक्ट्रॉन्स्नेही केंद्र पहचानिए —

CH₃–CHO , CH₃CN , CH₃I

इन यौगिकों में
कार्बोनिल कार्बन तथा
कार्बन–हैलोजन बंध वाला कार्बन
इलेक्ट्रॉन्स्नेही केंद्र होता है।

सहसंयोजी आबंधों में इलेक्ट्रॉन विस्थापन के प्रभाव

सहसंयोजी आबंधों में इलेक्ट्रॉन विस्थापन के मुख्यतः चार प्रभाव होते हैं —

  1. प्रेरणिक प्रभाव
  2. अनुनाद प्रभाव
  3. इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव (E प्रभाव)
  4. अतिसंयोजन

(1) प्रेरणिक प्रभाव

किसी सहसंयोजक यौगिक में सहसंयोजक बंध के माध्यम से
विद्युत ऋणात्मकता के अंतर के कारण
σ इलेक्ट्रॉनों का खिंचाव अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु की ओर हो जाता है।
इस घटना को प्रेरणिक प्रभाव कहते हैं।

इस प्रभाव में अधिक विद्युत ऋणात्मक परमाणु पर
आंशिक ऋण आवेश (δ−)
तथा कम विद्युत ऋणात्मक परमाणु पर
आंशिक धन आवेश (δ+) उत्पन्न हो जाता है।

यह एक स्थायी प्रभाव है और
σ बंध के माध्यम से संचरित होता है।


प्रेरणिक प्रभाव के प्रकार
+I प्रभाव (धनात्मक प्रेरणिक समूह) –I प्रभाव (ऋणात्मक प्रेरणिक समूह)

वे परमाणु या समूह जो
इलेक्ट्रॉन को धकेलते हैं
और कार्बन श्रृंखला में इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं,
+I प्रभाव प्रदर्शित करते हैं।

उदाहरण :
CH₃ , C₂H₅

वे परमाणु या समूह जो
इलेक्ट्रॉन को अपनी ओर आकर्षित करते हैं
और कार्बन श्रृंखला में इलेक्ट्रॉन घनत्व कम करते हैं,
–I प्रभाव प्रदर्शित करते हैं।

उदाहरण :
NO₂ , CN , X , COOH , COOR , OR

जैसे-जैसे दूरी बढ़ती है, प्रेरणिक प्रभाव की तीव्रता कम होती जाती है।


उदाहरण प्रश्न

प्रश्न : CH₃CH₂CH₂Br में किस बंध में ध्रुवता न्यूनतम होगी?

उत्तर : दूरी बढ़ने पर प्रेरणिक प्रभाव कम होता है, इसलिए
C₃–H बंध में ध्रुवता सबसे कम होगी।


अभ्यास प्रश्न

निम्नलिखित में से कौन अधिक स्थायी है तथा क्यों?

O₂N–CH₂–CH₂O⁻   और   CH₃–CH₂–CH₂O⁻

NO₂ समूह के –I प्रभाव के कारण
पहला यौगिक अधिक स्थायी होगा।


निम्नलिखित कार्बोकैटायनों में से कौन सबसे अधिक स्थायी है?

(i) (CH₃)₃C–CH₂⁺
(ii) (CH₃)₃C⁺
(iii) CH₃CH₂CH₂⁺
(iv) CH₃CH₂CH₂CH₃

(2) अनुनाद प्रभाव (Resonance Effect)

दो π-बंधों की पारस्परिक क्रिया अथवा π-बंध के पास उपस्थित
एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म की क्रिया के कारण
अणु में उत्पन्न ध्रुवता को
अनुनाद प्रभाव कहते हैं।

अनुनाद संरचनाएँ सामान्यतः
स्थायी नहीं होतीं,
परन्तु उनका संयुक्त रूप वास्तविक संरचना को दर्शाता है।


उदाहरण : ब्यूटा-1,3-डाइइन

CH₂ = CH – CH = CH₂
⇌
H₂C⁺ – CH = CH – CH₂⁻
⇌
⁻CH₂ – CH = CH – CH₂⁺


उदाहरण : नाइट्रोमेथेन (CH₃NO₂)

CH₃ – N⁺(=O) – O⁻
⇌
CH₃ – N⁺(–O⁻) = O

इन दोनों N–O बंधों की
लंबाई समान होती है।


प्रश्न

CH₃COO⁻ की अनुनाद संरचनाएँ लिखिए।

CH₃ – C(=O) – O⁻
⇌
CH₃ – C(–O⁻) = O


एक और उदाहरण

CH₂ = CH – CHO की अनुनाद संरचनाएँ —

CH₂ = CH – C(=O)H
⇌
CH₂⁻ – CH = C⁺ – H
⇌
CH₂ – CH = C⁺ – H

स्थायित्व क्रम :
I > II > III

I सबसे अधिक स्थायी है क्योंकि सभी परमाणुओं का ऑक्टेट पूर्ण है।


अनुनाद के प्रकार

  1. धनात्मक अनुनाद प्रभाव (+R प्रभाव)
  2. ऋणात्मक अनुनाद प्रभाव (–R प्रभाव)

(i) +R प्रभाव

वे समूह जो
इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं तथा
इलेक्ट्रॉन दान करते हैं,
+R प्रभाव प्रदर्शित करते हैं।

उदाहरण :
–OH , –OR , –OCOR , –NH₂ , –NHR , –NR₂ , –NHCOR

फिनॉल और
एनिलिन में +R प्रभाव पाया जाता है।


(ii) –R प्रभाव

वे समूह जो
इलेक्ट्रॉन आकर्षित करते हैं तथा
इलेक्ट्रॉन घनत्व कम करते हैं,
–R प्रभाव प्रदर्शित करते हैं।

उदाहरण :
–COOH , –CHO , >C=O , –CN , –NO₂

नाइट्रोबेंजीन में –R प्रभाव पाया जाता है।

(3) इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव

  • यह प्रभाव सामान्यतः
    π-बंध युक्त कार्बनिक यौगिकों में पाया जाता है।
  • किसी अभिकर्मक की उपस्थिति में
    π इलेक्ट्रॉनों का पूर्ण स्थानांतरण
    एक परमाणु से दूसरे परमाणु की ओर हो जाता है।
  • यह एक अस्थायी प्रभाव है।
    अभिकर्मक हटाने पर यह प्रभाव समाप्त हो जाता है।
  • इसे सामान्यतः
    मुड़े हुए तीर (curved arrow) द्वारा दर्शाया जाता है।

A = B ⟶ A⁺ – B⁻


इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव के प्रकार
  1. धनात्मक इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव (+E प्रभाव)
  2. ऋणात्मक इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव (–E प्रभाव)

(i) +E प्रभाव

इस प्रभाव में
आक्रमण करने वाला इलेक्ट्रॉन्स्नेही (E⁺)
उस परमाणु से जुड़ता है जिस पर
π इलेक्ट्रॉन स्थानांतरित होते हैं।

यह प्रभाव सामान्यतः
एल्कीन तथा एल्काइन में पाया जाता है।

C = C + H⁺ ⟶ C⁺ – C – H


(ii) –E प्रभाव

जब π इलेक्ट्रॉन उस परमाणु की ओर स्थानांतरित होते हैं
जो अधिक विद्युतऋणात्मक होता है
(जैसे O, N, S), तब
–E प्रभाव उत्पन्न होता है।

इस स्थिति में आक्रमण करने वाला
नाभिकस्नेही
विपरीत परमाणु से जुड़ता है।

>C = O + CN⁻ ⟶ >C–O⁻


नोट :
जब प्रेरणिक प्रभाव तथा
इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव
एक-दूसरे की विपरीत दिशा में कार्य करते हैं,
तो इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव अधिक प्रबल होता है।

(4) अतिसंयुग्मन (Hyperconjugation)

  • यह σ-इलेक्ट्रॉनों का विस्थापन होता है,
    जिसे σ–π अतिसंयुग्मन अथवा
    अविकृत अनुनाद भी कहते हैं।
  • अतिसंयुग्मन एक स्थायी प्रभाव होता है।
  • किसी अणु में उपस्थित
    σ बंध इलेक्ट्रॉनों और
    π इलेक्ट्रॉनों के मध्य
    आकर्षण को अतिसंयोजन कहते हैं।

शर्त

यदि α-कार्बन पर
हाइड्रोजन परमाणु उपस्थित हो
तथा पास में
π-बंध,
कार्बोकैटायन
या मुक्त मूलक उपस्थित हो,
तो अतिसंयोजन संभव होता है।

α-H की संख्या ∝ अतिसंयुग्मन संरचना ∝ स्थायित्व


उदाहरण

एथिल कार्बोकैटायन में H परमाणु के σ इलेक्ट्रॉन
C–C बंध की ओर स्थानांतरित हो जाते हैं,
जिससे कार्बोकैटायन की
स्थिरता बढ़ जाती है।

CH₃–CH₂⁺ ⇌ अतिसंयुग्मन संरचनाएँ

α-H की संख्या = 3
⇒ अतिसंयोजित संरचनाएँ = 3
⇒ स्थिरता अधिक


कार्बोकैटायन का स्थायित्व क्रम

3° > 2° > 1° > CH₃⁺


कार्बोकैटायन α-H परमाणु अतिसंयोजित संरचनाएँ स्थायित्व
3° 9 1 + 9 = 10 सर्वाधिक स्थायी
2° 6 1 + 6 = 7 स्थायी
1° 3 1 + 3 = 4 कम स्थायी
CH₃⁺ 0 1 + 0 = 1 सबसे कम स्थायी

अभ्यास प्रश्न

(i) (CH₃)₃C–CH₂⁺ की स्थिरता अधिक क्यों है?

(ii) CH₃⁺ का स्थायित्व सबसे कम क्यों होता है?

(iii) एथिल कार्बोकैटायन में अतिसंयोजन दर्शाते हुए संरचना बनाइए।

कार्बनिक यौगिकों के शोधन की विधियाँ

कार्बनिक यौगिकों को शुद्ध करने के लिए निम्नलिखित प्रमुख विधियाँ प्रयोग की जाती हैं —

  1. ऊर्ध्वपातन (Sublimation)
  2. क्रिस्टलीकरण (Crystallization)
  3. आसवन (Distillation)
  4. विलेय निष्कर्षण (Solvent Extraction)
  5. वर्णलेखन (क्रोमैटोग्राफी) (Chromatography)

कार्बनिक यौगिकों के शोधन की विधियाँ

(i) ऊर्ध्वपातन (Sublimation)

कुछ कार्बनिक ठोस पदार्थ गर्म करने पर
द्रव अवस्था में आए बिना सीधे ठोस से वाष्प में बदल जाते हैं।
इस प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं।

ठोस   →   (गर्म करने पर)   →   वाष्प

  • ऊर्ध्वपातन विधि का उपयोग
    ऊर्ध्वपाती यौगिकों को
    अशुद्धियों से अलग करने में किया जाता है।
  • इस विधि का उपयोग सामान्यतः
    कपूर, नेफ्थलीन, बेंजोइक अम्ल, NH₄Cl, HgCl₂, ठोस SO₂, आयोडीन
    आदि के शोधन में होता है।

(ii) क्रिस्टलीकरण (Crystallization)

यह विधि
कार्बनिक यौगिक तथा अशुद्धियों की घुलनशीलता के अंतर
पर आधारित होती है।

  • अशुद्ध यौगिक को किसी ऐसे
    उपयुक्त विलायक में घोलते हैं,
    जिसमें वह सामान्य ताप पर कम तथा उच्च ताप पर अधिक घुलनशील हो।
  • गर्म विलयन को संतृप्त (Saturated) किया जाता है और ठंडा करने पर
    शुद्ध क्रिस्टल प्राप्त होते हैं।
  • क्रिस्टलों को छानकर और सुखाकर शुद्ध यौगिक प्राप्त किया जाता है।
  • यदि अशुद्धियाँ अधिक हों तो
    बार-बार क्रिस्टलीकरण किया जाता है।

(iii) आसवन (Distillation)

इस विधि की सहायता से हम —

  1. वाष्पशील द्रवों को अवाष्पशील अशुद्धियों से अलग कर सकते हैं।
  2. दो द्रवों जिनके क्वथनांक में पर्याप्त अंतर हो,
    उन्हें अलग कर सकते हैं।

भिन्न क्वथनांक वाले द्रवों को
निम्न ताप पर वाष्पित करके
और बाद में संघनित करके अलग किया जाता है।

उदाहरण : क्लोरोफॉर्म (CHCl₃) (क्वथनांक 334 K) और
एनिलिन (C₆H₅NH₂) (क्वथनांक 457 K)
को आसवन विधि द्वारा अलग किया जा सकता है।

इस विधि में मिश्रण को फ्लास्क में सावधानीपूर्वक गर्म किया जाता है।
निम्न क्वथनांक वाला द्रव पहले वाष्प बनता है,
फिर संघनित्र (Condenser) से ठंडा करके अलग पात्र में एकत्र किया जाता है।

प्रभाजी आसवन (Fractional Distillation)

दो द्रव जिनके
क्वथनांक में बहुत कम अंतर होता है,
उन्हें साधारण आसवन द्वारा अलग नहीं किया जा सकता।
ऐसे द्रवों को अलग करने के लिए
प्रभाजी आसवन विधि का प्रयोग किया जाता है।

इस तकनीक में गोल तले वाले फ्लास्क के मुख में
प्रभाजी कॉलम लगाया जाता है।
जब मिश्रण को गर्म किया जाता है तो उत्पन्न वाष्प
प्रभाजी कॉलम से होकर गुजरती है।

  • उच्च क्वथनांक वाले द्रव की वाष्प
    जल्दी संघनित हो जाती है और नीचे लौट आती है।
  • निम्न क्वथनांक वाला द्रव
    अधिक मात्रा में वाष्प बनकर ऊपर उठता रहता है।
  • इस प्रकार बार-बार वाष्पीकरण और संघनन की प्रक्रिया से
    दोनों द्रवों को अलग किया जा सकता है।

प्रक्रिया

प्रमाजी कॉलम में ऊपर उठती वाष्प और नीचे गिरते द्रव के बीच
बार-बार वाष्पीकरण और संघनन होता है।
इससे निम्न क्वथनांक वाले द्रव की मात्रा ऊपर बढ़ती जाती है।

अंततः निम्न क्वथनांक वाला द्रव
संघनित्र (Condenser) में संघनित होकर
अलग पात्र में एकत्र हो जाता है।


उपयोग

प्रभाजी आसवन का उपयोग मुख्यतः
पेट्रोलियम उद्योग में
कच्चे तेल को विभिन्न अंशों में विभाजित करने के लिए किया जाता है।

उदाहरण —
पेट्रोल, केरोसीन तेल, डीजल तेल, स्नेहक तेल आदि।



भाप आसवन (Steam Distillation)

यह तकनीक उन पदार्थों के शोधन के लिए उपयोग की जाती है
जो भाप वाष्पशील होते हैं,
परंतु जल में अघुलनशील होते हैं।

  • भाप आसवन में शुद्ध जल को गर्म करके
    भाप उत्पन्न की जाती है।
  • इस भाप को उस पात्र में प्रवाहित किया जाता है
    जिसमें अशुद्ध कार्बनिक पदार्थ उपस्थित होता है।
  • भाप के साथ कार्बनिक यौगिक भी
    वाष्प बनकर ऊपर उठते हैं।
  • इन वाष्पों को संघनित्र (Condenser) से ठंडा करने पर
    द्रव रूप में प्राप्त किया जाता है।
  • इसके बाद जल और कार्बनिक द्रव को
    पृथक्करण फ़नल की सहायता से अलग कर लिया जाता है।

उदाहरण

एनीलिन को इस विधि द्वारा
एनीलिन-जल मिश्रण से अलग किया जाता है।



(iv) विभेदी निष्कर्षण

  • इस विधि की सहायता से
    कार्बनिक यौगिक को उसके
    जलीय विलयन से ऐसे
    कार्बनिक विलायक द्वारा
    निष्कर्षित किया जाता है,
    जिसमें कार्बनिक यौगिक की
    विलेयता अधिक तथा
    जल में कम होती है।
  • जलीय विलयन तथा
    कार्बनिक विलायक
    अमिश्रणीय होने चाहिए,
    ताकि वे परत बना सकें, जिन्हें
    पृथक्करण फ़नल द्वारा
    अलग किया जा सके।

उदाहरण :
बेंजोइक अम्ल को
जल से
बेंजीन के प्रयोग द्वारा
निष्कर्षित कर सकते हैं।


(v) वर्णलेखन (क्रोमैटोग्राफी)

क्रोमैटोग्राफी नाम एक ग्रीक शब्द है, जिसमें
क्रोमो का मतलब रंग और
ग्राफी का मतलब लेखन है।
यौगिक इस विधि का सामान्यतः उपयोग
पौधों में पाए जाने वाले रंगीन पदार्थों के
पृथक्करण में होता है।

वर्णलेखन का सिद्धांत

विभिन्न घटकों के मिश्रण को
अधिशोषक से गुजारा जाता है।
इससे मिश्रण के घटक अधिशोषक पर अलग-अलग स्थानों पर
अधिशोषित हो जाते हैं।
बाद में अधिशोषित घटकों को
उपयुक्त विलायक द्वारा
अलग कर लिया जाता है।

कॉलम वर्णलेखन
  • इस तकनीक में काँच की एक लंबी नली में
    अधिशोषक (स्थिर प्रावस्था) भरा जाता है।
  • नली के निचले सिरे पर
    रूई की परत रखी जाती है।
  • यौगिकों का मिश्रण
    उपयुक्त विलायक की न्यूनतम मात्रा में
    घोलकर कॉलम के ऊपर डाला जाता है।
  • इसके बाद
    उपयुक्त विलायक
    (जिसे चल प्रावस्था कहते हैं) धीरे-धीरे कॉलम से प्रवाहित किया जाता है।
  • अधिक अधिशोषित होने वाले
    यौगिक ऊपर रह जाते हैं,
    जबकि अन्य यौगिक कॉलम में विभिन्न
    दूरियों तक नीचे चले जाते हैं।
उपयोग
  • मिश्रण को उसके घटकों में पृथक करने में।
  • यौगिकों की शुद्धता जाँचने में।
  • यौगिकों की पहचान में।


कार्बनिक यौगिकों का गुणात्मक विश्लेषण

कार्बनिक यौगिकों में प्रायः
कार्बन तथा हाइड्रोजन उपस्थित रहते हैं।
इनके अतिरिक्त इनमें
ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन तथा फॉस्फोरस भी उपस्थित हो सकते हैं।

कार्बन तथा हाइड्रोजन की पहचान (कॉपर ऑक्साइड परीक्षण)

कार्बन तथा हाइड्रोजन कार्बनिक यौगिकों के आवश्यक घटक होते हैं।
इनकी पहचान कॉपर ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया द्वारा की जाती है।

कार्बन की पहचान
  • कार्बनिक यौगिक में उपस्थित
    कार्बन गर्म करने पर
    कॉपर ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया करके
    CO₂ बनाता है।
    इस गैस को चूने के पानी में प्रवाहित करने पर
    चूने का पानी दूधिया हो जाता है।

C + 2CuO → CO₂ + 2Cu

CO₂ + Ca(OH)₂ → CaCO₃ + H₂O

हाइड्रोजन की पहचान

कार्बनिक यौगिकों में उपस्थित
हाइड्रोजन,
क्यूप्रिक ऑक्साइड के साथ अभिक्रिया द्वारा
H₂O बनाता है।
इस जल को निर्जल CuSO₄ में डालने पर
CuSO₄ का नीला विलयन प्राप्त होता है।

H₂ + CuO → H₂O + Cu

CuSO₄ + 5H₂O → CuSO₄·5H₂O


अन्य तत्वों की पहचान

किसी कार्बनिक यौगिक में उपस्थित
नाइट्रोजन, सल्फर, हैलोजन तथा फॉस्फोरस की पहचान
लैसें-परीक्षण द्वारा की जाती है।

इसमें यौगिक को
सोडियम धातु के साथ
संलयन किया जाता है।
इससे निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं —

Na + C + N → NaCN

2Na + S → Na₂S

Na + X → NaX   (X = Cl, Br, I)

C, N, S तथा X कार्बनिक यौगिक में उपस्थित तत्व हैं।
सोडियम संलयन से प्राप्त अवशेष को
आसुत जल के साथ उबालने पर
सोडियम सायनाइड, सल्फाइड तथा हैलाइड जल में घुल जाते हैं।

इस निष्कर्ष को
सोडियम संलयन निष्कर्ष
(Sodium Fusion Extract) कहते हैं।

कार्बनिक यौगिकों का मात्रात्मक विश्लेषण

कार्बन तथा हाइड्रोजन

C की % =
12 / 44 ×
प्राप्त CO2 की मात्रा /
लिए गये कार्बनिक यौगिक की मात्रा × 100

H की % =
2 / 18 ×
प्राप्त H2O की मात्रा /
लिए गये कार्बनिक यौगिक की मात्रा × 100


नाइट्रोजन

(i) ड्यूमा विधि —
माना P mm पारे के दाब तथा
t°C पर
v mL N2 गैस प्राप्त होती है।

गैस का आयतन NTP पर

P1V1 / T1 = P2V2 / T2

P1 = P,
V1 = v,
T1 = t + 273

P2 = 760,
V2 = ?,
T2 = 273

V2 = (P × v × 273) / ((t + 273) × 760)

अतः NTP पर V2 mL N2 गैस प्राप्त होती है।

NTP पर 22400 mL N2 का द्रव्यमान = 28 g

NTP पर V2 mL N2 का द्रव्यमान
= (28 / 22400) × V2 g

m g कार्बनिक यौगिक में N2 की मात्रा
= (28 / 22400) × V2 g

100 g कार्बनिक यौगिक में N2 की मात्रा
= (28 / 22400) × (V2 / m) × 100

N2 की % = (28 / 22400) × (P × v × 273 / ((t + 273) × 760 × m)) × 100

हैलोजन

केरियस विधि : इस विधि में जब किसी
हैलोजन युक्त (Cl, Br, या I)
कार्बनिक यौगिक को
सांद्र नाइट्रिक अम्ल के साथ
सिल्वर नाइट्रेट की उपस्थिति में
बंद नली में गर्म करते हैं तो
सिल्वर हैलाइड (AgX) बनता है।
बने हुए AgX के भार से हम
हैलोजन की प्रतिशत की गणना कर सकते हैं।

X की % =
X का परमाण्विक द्रव्यमान /
AgX का आण्विक द्रव्यमान
×
बने हुए AgX की मात्रा /
लिए गये कार्बनिक यौगिक की मात्रा
× 100


प्रश्न :
हैलोजन के आकलन की केरियस विधि में
0.15 g कार्बनिक यौगिक
0.12 g AgBr देता है।
यौगिक में ब्रोमीन की प्रतिशत ज्ञात कीजिए।

हल
  • दिये गये कार्बनिक यौगिक की मात्रा = 0.15 g
  • बने हुए AgBr की मात्रा = 0.12 g
  • Br का परमाण्विक द्रव्यमान = 80 g/mol
  • AgBr का आण्विक द्रव्यमान = 108 + 80 = 188 g/mol

Br की % =
Br का परमाण्विक द्रव्यमान /
AgBr का आण्विक द्रव्यमान
×
बने हुए AgBr की मात्रा /
लिए गये कार्बनिक यौगिक की मात्रा
× 100

Br की % = (80 / 188) × (0.12 / 0.15) × 100 = 42.55 %

सल्फर

केरियस विधि — जब किसी
सल्फर युक्त कार्बनिक यौगिक को
सांद्र नाइट्रिक अम्ल के साथ गर्म करते हैं
तो सल्फर सल्फ्यूरिक अम्ल में ऑक्सीकरण हो जाता है।
इसके बाद बेरियम क्लोराइड विलयन मिलाने पर
बेरियम सल्फेट (BaSO₄) का अवक्षेप प्राप्त होता है।
इससे सल्फर की प्रतिशत ज्ञात की जाती है।

S की % =
S का परमाण्विक द्रव्यमान /
BaSO₄ का आण्विक द्रव्यमान
×
बने हुए BaSO₄ की मात्रा /
लिए गये कार्बनिक यौगिक की मात्रा
× 100

S की % =
32 / 233 ×
बने हुए BaSO₄ की मात्रा /
लिए गये कार्बनिक यौगिक की मात्रा
× 100


प्रश्न :
सल्फर आकलन में
0.157 g कार्बनिक यौगिक से
0.4813 g बेरियम सल्फेट प्राप्त हुआ।
यौगिक में सल्फर का प्रतिशत क्या है?

हल
  • दिये गये कार्बनिक यौगिक की मात्रा = 0.157 g
  • बने हुए BaSO₄ की मात्रा = 0.4813 g
  • S का परमाण्विक द्रव्यमान = 32 g/mol
  • BaSO₄ का आण्विक द्रव्यमान = 137 + 32 + 64 = 233 g/mol

S की % =
32 / 233 ×
0.4813 /
0.157
× 100

S की % = 42.10 %

ऑक्सीजन

कार्बनिक यौगिक में
ऑक्सीजन की प्रतिशत मात्रा की गणना
अन्तर विधि द्वारा निकालते हैं।
ऑक्सीजन के अलावा अन्य
कार्बनिक यौगिक में उपस्थित सभी तत्वों का
आकलन कर लेते हैं और उन सभी की
प्रतिशत योग को
100 से घटाकर
ऑक्सीजन की प्रतिशत ज्ञात कर लेते हैं।

ऑक्सीजन का प्रतिशत =
100 − (सभी तत्वों के प्रतिशत का कुल योग)


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