विलयन (Solution)
विलयन दो या दो से अधिक पदार्थों का समांगी मिश्रण होता है।
विलेय तथा विलायक : वह पदार्थ जिसे घोला जाता है, विलेय कहलाता है, जबकि जिस पदार्थ में विलेय को घोला जाता है, वह विलायक कहलाता है।
विलयनों के प्रकार
| विलयन के प्रकार | विलेय | विलायक | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| गैसीय | गैस | गैस | गैसों के मिश्रण, वायु |
| गैसीय | द्रव | गैस | वायु में जलवाष्प |
| गैसीय | ठोस | गैस | कपूर या नैफ्थलीन का गैस में बदलना |
| द्रवीय | गैस | द्रव | वायु का जल में विलयन, CO2 का जलीय विलयन (सोडा वाटर) |
| द्रवीय | द्रव | द्रव | एल्कोहल का जल में विलयन |
| द्रवीय | ठोस | द्रव | शक्कर का जल में विलयन |
| ठोस | गैस | ठोस | गैसों का धातुओं पर अधिशोषण |
| ठोस | द्रव | ठोस | पारे (Hg) का Na के साथ अमलगम, जलयोजित लवण जैसे CuSO4.5H2O |
| ठोस | ठोस | ठोस | दो या दो से अधिक धातुओं के समांगी मिश्रण (मिश्रधातुएँ) जैसे Cu + Au, Zn + Cu |
महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 1: विलयन को परिभाषित कीजिए। कितने प्रकार के विभिन्न विलयन संभव हैं? प्रत्येक प्रकार के विलयन के संबंध में एक उदाहरण देकर संक्षेप में लिखिए।
उत्तर: विलयन दो या दो से अधिक पदार्थों का समांगी मिश्रण होता है।
सामान्यतः विलेय और विलायक की भौतिक अवस्थाओं के आधार पर 9 प्रकार के विलयन संभव होते हैं।
| विलयन का प्रकार | विलेय | विलायक | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| गैसीय | गैस | गैस | वायु |
| गैसीय | द्रव | गैस | वायु में जलवाष्प |
| गैसीय | ठोस | गैस | कपूर / नैफ्थलीन का गैसीकरण |
| द्रवीय | गैस | द्रव | जल में CO2 (सोडा वाटर) |
| द्रवीय | द्रव | द्रव | जल में एल्कोहल |
| द्रवीय | ठोस | द्रव | जल में शक्कर |
| ठोस | गैस | ठोस | धातुओं पर गैसों का अधिशोषण |
| ठोस | द्रव | ठोस | Hg का Na के साथ अमलगम |
| ठोस | ठोस | ठोस | मिश्रधातुएँ, जैसे पीतल |
प्रश्न 2: एक ऐसे ठोस विलयन का उदाहरण दीजिए, जिसमें विलेय कोई गैस हो।
उत्तर: ऐसा ठोस विलयन, जिसमें विलेय गैस हो, उसका उदाहरण है: धातुओं पर गैसों का अधिशोषण।
उदाहरण के लिए, पैलेडियम (Pd) या प्लैटिनम (Pt) जैसी धातुओं की सतह पर हाइड्रोजन गैस का अधिशोषण हो सकता है।
विलयनों की सांद्रता को व्यक्त करना
1) गुणात्मक रूप से
- तनु विलयन : विलेय की बहुत कम मात्रा
- सान्द्र विलयन : विलेय की बहुत अधिक मात्रा
2) मात्रात्मक रूप में
-
प्रतिशतता (%)
- (i) भार-भार (या द्रव्यमान) प्रतिशतता (% w/w)
- (ii) भार-आयतन प्रतिशतता (% w/v)
- (iii) आयतन-आयतन प्रतिशतता (% v/v)
- पार्ट्स पर मिलियन (ppm) तथा पार्ट्स पर बिलियन (ppb)
- मोल-अंश (X)
- मोलरता (M)
- मोललता (m)
प्रतिशतता (%)
जब विलयन के 100 भागों में विलेय पदार्थ की मात्रा प्रदर्शित की जाती है, तो इस सांद्रण को प्रतिशतता कहते हैं।
(i) भार-भार (या द्रव्यमान) प्रतिशतता (% w/w)
यदि विलेय A तथा विलायक B हो, तो
% w/w = wA / (wA + wB) × 100
यहाँ,
- wA = विलेय का भार
- wB = विलायक का भार
- wA + wB = विलयन का भार
उदाहरण 1
10% Na2CO3 विलयन (w/w) का अर्थ है कि 100 ग्राम विलयन में 10 ग्राम Na2CO3 विलेय है।
अर्थात 10 ग्राम Na2CO3, 90 ग्राम जल में घुला है।
उदाहरण 2: 15 ग्राम NaCl को 150 ग्राम जल में घोला गया, तो NaCl का द्रव्यमान प्रतिशत (% w/w) ज्ञात कीजिए।
हल:
दिया है:
विलेय (NaCl) का भार = 15 g
विलायक (जल) का भार = 150 g
अतः विलयन का कुल भार = 15 + 150 = 165 g
अब सूत्र से,
% w/w = wA / (wA + wB) × 100
= 15 / 165 × 100
= 9.09%
अतः NaCl का द्रव्यमान प्रतिशत 9.09% होगा।
(ii) भार-आयतन प्रतिशतता (% w/v)
किसी विलेय के भार भागों की वह संख्या, जो विलयन के 100 आयतन भागों में घुली हो, उसे भार-आयतन प्रतिशतता (% w/v) कहते हैं।
सूत्र:
% w/v = wA (gm) / Vsol (ml) × 100
यहाँ,
- wA = विलेय का भार (ग्राम में)
- Vsol = विलयन का आयतन (mL में)
उदाहरण 1
10% Na2CO3 (w/v) का अर्थ है कि 10 ग्राम Na2CO3 को जल में घोलकर विलयन का कुल आयतन 100 mL किया गया है।
उदाहरण 2: 2% w/v NaCl विलयन के 400 mL बनाने के लिए कितने ग्राम NaCl की आवश्यकता होगी?
हल:
दिया है:
% w/v = 2
विलयन का आयतन = 400 mL
सूत्र:
% w/v = wA / Vsol × 100
मान रखने पर,
2 = wA / 400 × 100
wA = 2 × 400 / 100
wA = 8 g
अतः 400 mL, 2% w/v NaCl विलयन बनाने के लिए 8 ग्राम NaCl की आवश्यकता होगी।
(iii) आयतन-आयतन प्रतिशतता (% v/v)
किसी विलयन के 100 mL में उपस्थित विलेय के mL की संख्या को आयतन-आयतन प्रतिशतता (% v/v) कहते हैं।
सूत्र:
% v/v = VA (mL) / (VA + VB) (mL) × 100
यहाँ,
- VA = विलेय का आयतन
- VB = विलायक का आयतन
उदाहरण 1
एथेनॉल का जल में 10% विलयन का तात्पर्य है कि 10 mL एथेनॉल को इतने जल में घोलते हैं कि विलयन का कुल आयतन 100 mL हो जाए।
उदाहरण 2: 20 mL एथेनॉल 160 mL जल में घुला हुआ है। एथेनॉल की आयतन प्रतिशतता ज्ञात कीजिए।
हल:
दिया है:
विलेय (एथेनॉल) का आयतन = 20 mL
विलायक (जल) का आयतन = 160 mL
अतः विलयन का कुल आयतन = 20 + 160 = 180 mL
अब सूत्र से,
% v/v = VA / (VA + VB) × 100
= 20 / 180 × 100
= 11.11%
अतः एथेनॉल की आयतन प्रतिशतता 11.11% होगी।
(2) पार्ट्स पर मिलियन (ppm) और पार्ट्स पर बिलियन (ppb)
यदि विलेय की विलयन में सांद्रता अत्यन्त कम हो, तो सांद्रण को ppm (parts per million) तथा ppb (parts per billion) में मापा जाता है।
यह विलेय के अंशों की वह संख्या है, जो कि विलयन के एक मिलियन (106) या एक बिलियन (109) अंशों में घुली रहती है।
सूत्र
ppm = wA / (wA + wB) × 106
ppb = wA / (wA + wB) × 109
Note: जल अथवा वायुमण्डल में प्रदूषकों की सान्द्रता को प्रायः μg mL−1 अथवा ppm में प्रदर्शित किया जाता है।
प्रश्न 1: समुद्री जल के प्रति kg में 5.8 × 10−3 g O2 घुली है। O2 की सान्द्रता ppm में ज्ञात कीजिए।
हल:
सूत्र:
ppm = wA / (wA + wB) × 106
यहाँ,
wA = 5.8 × 10−3 g
(wA + wB) ≈ 1000 g
ppm = (5.8 × 10−3 g / 1000 g) × 106
= 5.8 ppm
अतः O2 की सान्द्रता 5.8 ppm है।
प्रश्न 2: 500 g टूथपेस्ट में फ्लोराइड की मात्रा 0.2 g दी गई है। उसमें फ्लोराइड की सान्द्रता ppm ज्ञात कीजिए।
हल:
दिया है:
विलेय (फ्लोराइड) का द्रव्यमान = 0.2 g
विलयन (टूथपेस्ट) का कुल द्रव्यमान = 500 g
सूत्र:
ppm = wA / (wA + wB) × 106
यहाँ सीधे कुल द्रव्यमान दिया है, इसलिए
ppm = 0.2 / 500 × 106
= 0.0004 × 106
= 400
अतः टूथपेस्ट में फ्लोराइड की सान्द्रता 400 ppm है।
प्रश्न 3: जब विलेय अल्पमात्रा में उपस्थित हो, तब निम्न में से कौन-सा व्यंजक उपयोग होता है?
- (a) ग्राम प्रति मिलियन
- (b) मिलीग्राम प्रतिशत
- (c) माइक्रोग्राम प्रतिशत
- (d) नैनोग्राम प्रतिशत
- (e) पार्ट्स प्रति मिलियन
उत्तर: सही विकल्प है (e) पार्ट्स प्रति मिलियन
(3) मोल प्रभाज या मोल अंश (X)
मोल प्रभाज किसी घटक की मोल संख्या तथा विलयन की कुल मोल संख्या का अनुपात होता है।
मोल प्रभाज ताप पर निर्भर नहीं करता। इसकी कोई इकाई नहीं होती, अतः यह विमाहीन राशि है।
माना कि विलयन में दो घटक A और B हैं। यदि घटक A का भार WA gm तथा घटक B का भार WB gm विलयन में उपस्थित है, तो
A तथा B के मोलों की संख्या
nA = WA / MwA
nB = WB / MwB
यहाँ MwA तथा MwB, क्रमशः A और B के आणविक/मोलर द्रव्यमान हैं।
A और B के कुल मोलों की संख्या = nA + nB
मोल अंश के सूत्र
A का मोल प्रभाज:
XA = nA / (nA + nB)
XA = (WA / MwA) / [(WA / MwA) + (WB / MwB)]
B का मोल प्रभाज:
XB = nB / (nA + nB)
XB = (WB / MwB) / [(WA / MwA) + (WB / MwB)]
विलयन में सभी घटकों के मोल प्रभाज का योग सदैव 1 होता है।
∴ XA + XB = 1
(4) मोलरता (M)
मोलरता किसी विलेय के 1 लीटर विलयन में उपस्थित मोलों की संख्या होती है।
अतः
M = nA / V(L)
तथा
n = w(gm) / M(gm/mol)
इसलिए,
M = wA(gm) / MwA(gm/mol) × 1 / Vsol.(L)
अथवा,
M = wA(gm) / MA(gm/mol) × 1000 mL / Vsol.(mL) × 1L
मोलरता की इकाई = mol/litre
(5) मोललता (m)
1 kg या 1000 g विलायक में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या को विलयन की मोललता कहते हैं।
मोललता की इकाई = मोल/किलोग्राम (mol/kg)
अतः
m = nA / WB(kg)
क्योंकि
n = w(gm) / Mw(gm/mol)
इसलिए,
m = wA(gm) / MwA(gm/mol) × 1 / WB(kg)
अथवा,
m = wA(gm) / MwA(gm/mol) × 1000 gm / WB(gm) × 1kg
यहाँ
- m = मोललता
- nA = विलेय के मोलों की संख्या
- WB = विलायक का द्रव्यमान
Note: द्रव्यमान प्रतिशत, ppm, मोल-अंश तथा मोललता ताप पर निर्भर नहीं करते, जबकि मोलरता ताप पर निर्भर करती है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आयतन ताप पर निर्भर करता है, जबकि द्रव्यमान ताप पर निर्भर नहीं करता।
विलेयता
किसी पदार्थ की विलेयता, एक निश्चित ताप पर विलायक की निश्चित मात्रा में घुली हुई उस पदार्थ की अधिकतम मात्रा होती है।
विलयन के प्रकार
संतृप्त विलयन : वह विलयन जिसमें पदार्थ की अधिक से अधिक मात्रा दिए गए तापक्रम पर घुल जाए।
असंतृप्त विलयन : यदि विलयन में पदार्थ की कम मात्रा घुली हो, तो वह असंतृप्त विलयन कहलाता है।
अतिसंतृप्त विलयन : यदि विलयन में संतृप्तता से अधिक विलेय घुला हो, तो वह अतिसंतृप्त विलयन कहलाता है।
“समान-समान को घोलता है”
अर्थात्
- ध्रुवीय विलेय + ध्रुवीय विलायक = घुलते हैं
(NaCl व शक्कर जल में आसानी से घुल जाते हैं।)
- अध्रुवीय विलेय + ध्रुवीय विलायक = नहीं घुलते हैं
(तेल व पानी नहीं घुलते।)
- अध्रुवीय विलेय + अध्रुवीय विलायक = घुलते हैं
(केरोसिन व पेट्रोल घुलते हैं।)
ताप का प्रभाव
ठोसों की द्रवों में विलेयता ताप पर निर्भर करती है।
ले-शातेलिए सिद्धान्त के अनुसार:
- यदि अभिक्रिया उष्माशोषी हो, तो ताप बढ़ाने पर विलेयता बढ़ती है।
- यदि अभिक्रिया उष्माक्षेपी हो, तो ताप बढ़ाने पर विलेयता घटती है।
गैसों की द्रवों में विलेयता
दाब बढ़ाने पर गैसों की विलेयता बढ़ती जाती है।
गैस की विलायक में विलेयता तथा दाब के मध्य मात्रात्मक संबंध हेनरी ने दिया। इसके अनुसार, स्थिर ताप पर किसी गैस की द्रव में विलेयता, विलयन की सतह पर पड़ने वाले गैस के आंशिक दाब के समानुपाती होती है।
हेनरी का नियम
गैस के मोल-अंश को उसकी विलेयता के रूप में लेने पर, हेनरी का नियम इस प्रकार लिखा जाता है:
Pg ∝ Xg
Pg = KH Xg
जहाँ
- KH = हेनरी स्थिरांक
- Pg = गैस का वाष्प अवस्था में आंशिक दाब
- Xg = गैस का मोल-अंश
Note: दिए गए दाब पर KH का मान जितना अधिक होगा, द्रव में गैस की विलेयता उतनी ही कम होगी।
हेनरी नियम के अनुप्रयोग
- सोडा-वाटर एवं शीतल पेयों में CO2 की विलेयता बढ़ाने के लिए बोतलों को अधिक दाब पर बंद किया जाता है।
गहरे समुद्र में श्वास लेते हुए गोताखोरों को अधिक दाब पर गैसों की अधिक घुलनशीलता का सामना करना पड़ता है। अधिक बाहरी दाब के कारण, श्वास के साथ ली गई वायुमण्डलीय गैसों की विलेयता रुधिर में अधिक हो जाती है।
जब गोताखोर सतह की ओर आते हैं, बाहरी दाब धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसके कारण रुधिर में घुली हुई गैसें बाहर निकलती हैं, जिससे रुधिर में नाइट्रोजन के बुलबुले बन जाते हैं। यह केशिकाओं में अवरोध उत्पन्न कर देता है और बेंड्स (Bends) अवस्था उत्पन्न कर देता है। यह अत्यधिक पीड़ादायक एवं जानलेवा हो सकता है।
बेंड्स से तथा रुधिर में नाइट्रोजन की अधिक मात्रा के जहरीले प्रभाव से बचने के लिए, गोताखोरों द्वारा श्वास लेने के लिए उपयोग किए जाने वाले टैंकों में हीलियम मिलाकर तनु की गई वायु भरी जाती है।
(11.7% हीलियम, 56.2% नाइट्रोजन तथा 32.1% ऑक्सीजन)
अधिक ऊँचाई वाली जगहों पर ऑक्सीजन का आंशिक दाब सतही स्थानों से कम होता है। अतः इन जगहों पर रहने वाले लोगों एवं आरोहकों के रुधिर और ऊतकों में ऑक्सीजन की सान्द्रता कम हो जाती है।
इसके कारण आरोहक कमजोर हो जाते हैं और स्पष्टतः सोच नहीं पाते। इन लक्षणों को ऐनॉक्सिया कहते हैं।
ताप का प्रभाव
ताप का प्रभाव : ताप बढ़ने पर किसी गैस की द्रवों में विलेयता घटती है।
द्रव का वाष्पन तथा वाष्पदाब
किसी वाष्पशील द्रव को खुले पात्र में रखने पर, अधिक गतिज ऊर्जा वाले द्रव के अणु द्रव की सतह को छोड़कर वाष्प अवस्था में चले जाते हैं। इस प्रक्रिया को वाष्पन कहते हैं।
वाष्प का पुनः द्रव अवस्था में परिवर्तन होना संघनन कहलाता है।
द्रव ⇌ वाष्प
साम्यावस्था पर वाष्पन तथा संघनन की दर बराबर होती है।
अतः एक निश्चित ताप पर साम्यावस्था में वाष्प के अणुओं द्वारा द्रव की सतह पर उत्पन्न किया गया दाब वाष्पदाब कहलाता है।
विलयन के वाष्पदाब का अवनमन
किसी विलायक में जब कोई अवाष्पशील विलेय घोला जाता है, तो उसका वाष्पदाब, शुद्ध विलायक की तुलना में कम हो जाता है।
यह वाष्पदाब में कमी, विलेय की घोली गई मात्रा के समानुपाती होती है। इसे वाष्पदाब का अवनमन कहते हैं।
माना कि किसी ताप पर शुद्ध विलायक का वाष्पदाब P0 तथा विलयन का वाष्पदाब PS है, तो
वाष्पदाब में अवनमन = P0 - PS
वाष्पदाब का आपेक्षिक अवनमन = (P0 - PS) / P0
राउल्ट का नियम
(a) अवाष्पशील विलेय के लिए
अवाष्पशील विलेय के विलयन का वाष्पदाब, शुद्ध विलायक के मोल-अंश (X) के समानुपाती होता है।
यदि मोल-अंश X हो और विलयन का वाष्पदाब PS हो, तो
PS ∝ X
PS = P0 . X
- PS = विलयन का वाष्पदाब
- P0 = शुद्ध विलायक का वाष्पदाब
- X = विलायक का मोल-अंश
प्रश्न: विलायक का वाष्पदाब P0 है। जब अवाष्पशील पदार्थ इस विलायक में मिलाया जाता है, तो वाष्पदाब PS हो जाता है। विलयन में विलायक का मोल-अंश क्या होगा?
हल:
राउल्ट के नियम के अनुसार,
PS = P0 . X
अतः
X = PS / P0
इसलिए विलयन में विलायक का मोल-अंश PS / P0 होगा।
(b) वाष्पशील विलेय के लिए
वाष्पशील द्रवों के विलयन में प्रत्येक अवयव का आंशिक दाब (P), विलयन में उसके मोल-अंश (X) के समानुपाती होता है।
माना कि दोनों अवयव क्रमशः A और B हैं, तो
PA ∝ XA
PA = PA0 XA → (i)
जहाँ PA0 = A का शुद्ध अवस्था में आंशिक दाब
PB ∝ XB
PB = PB0 XB → (ii)
जहाँ PB0 = B का शुद्ध अवस्था में आंशिक दाब
डाल्टन के आंशिक दाब नियम के अनुसार, पात्र में विलयन अवस्था का कुल दाब PTotal, विलयन के प्रत्येक अवयव के आंशिक दाबों के योग के बराबर होता है।
PTotal = PA + PB
अब PA तथा PB के मान रखने पर,
PTotal = PA0 XA + PB0 XB
क्योंकि XA + XB = 1
अतः XA = 1 - XB
PTotal = PA0(1 - XB) + PB0XB
= PA0 - PA0XB + PB0XB
= PA0 + (PB0 - PA0)XB
इसलिए,
PTotal = PA0 + (PB0 - PA0)XB
विलयन के साथ साम्य में वाष्प प्रावस्था के संघटन का निर्धारण
विलयन के साथ साम्य में वाष्प प्रावस्था के संघटन का निर्धारण अवयवों के आंशिक दाब से किया जाता है।
Pi = Xi . PTotal
- Pi = आंशिक दाब
- Xi = वाष्प प्रावस्था में मोल-अंश
- PTotal = कुल दाब
राउल्ट का नियम, हेनरी के नियम की एक विशेष स्थिति
हेनरी का नियम :
Pg = KH Xg
तथा
राउल्ट का नियम :
PS = P0 . X
राउल्ट के नियम और हेनरी के नियम की तुलना करने पर केवल समानुपातिक स्थिरांक KH तथा P0 में भिन्नता दिखाई देती है, लेकिन कई स्थितियों में इनके मान बराबर माने जाते हैं।
इसलिए राउल्ट का नियम, हेनरी के नियम की एक विशेष स्थिति माना जाता है।
आदर्श एवं अनादर्श विलयन
(A) आदर्श विलयन : ऐसे विलयन जो सभी सान्द्रताओं पर राउल्ट के नियम का पालन करते हैं, आदर्श विलयन कहलाते हैं।
(B) अनादर्श विलयन : जब कोई विलयन सभी सान्द्रताओं पर राउल्ट के नियम का पालन नहीं करता, तो वह अनादर्श विलयन कहलाता है। अनादर्श विलयन दो प्रकार के विचलन दर्शाते हैं।
तुलना सारणी
| आधार | आदर्श विलयन | अनादर्श विलयन राउल्ट नियम से धनात्मक विचलन |
अनादर्श विलयन राउल्ट नियम से ऋणात्मक विचलन |
|---|---|---|---|
| 1. | सांद्रता की प्रत्येक परास पर राउल्ट नियम का पालन करते हैं। | राउल्ट नियम का पालन नहीं करते। | राउल्ट नियम का पालन नहीं करते। |
| 2. | ΔHmix = 0 विलयन के दौरान न तो ऊर्जा उत्सर्जित होती है और न ही अवशोषित। |
ΔHmix > 0 ऊष्माशोषी विलयन, ऊष्मा अवशोषित होती है। |
ΔHmix < 0 ऊष्माक्षेपी विलयन, ऊष्मा उत्सर्जित होती है। |
| 3. | ΔVmix = 0 विलयन का कुल आयतन, घटकों के आयतनों के योग के बराबर होता है। |
ΔVmix > 0 विलयन के बाद आयतन बढ़ता है। |
ΔVmix < 0 विलयन के दौरान आयतन घटता है। |
| 4. |
PTotal = PA + PB = PA0XA + PB0XB |
PTotal > PA + PB PA > PA0XA PB > PB0XB |
PTotal < PA + PB PA < PA0XA PB < PB0XB |
| 5. |
[A-B] = [A-A] = [B-B] अंतराआणविक आकर्षण बल समान होते हैं। |
[A-B] आकर्षण बल, [A-A] एवं [B-B] आकर्षण बलों की अपेक्षा दुर्बल होते हैं। | [A-B] आकर्षण बल, [A-A] एवं [B-B] आकर्षण बलों की अपेक्षा अधिक होते हैं। |
| 6. |
'A' एवं 'B' की पलायन प्रवृत्ति शुद्ध द्रव एवं विलयन में समान होती है। (V.P.)Obs = (V.P.)Exp (B.P.)Obs = (B.P.)Exp [B.P ∝ 1/(V.P.)] |
'A' एवं 'B' आसानी से पलायित होते हैं, जो अनुमानित मान से अधिक वाष्पदाब दर्शाते हैं। (V.P.)Obs > (V.P.)Exp (B.P.)Obs < (B.P.)Exp ये कम ताप पर उबलने वाला स्थिरक्वथी मिश्रण बनाते हैं। |
दोनों घटक 'A' एवं 'B' की पलायन प्रवृत्ति कम होती है, जो आदर्श विलयन की अपेक्षा कम वाष्पदाब दर्शाते हैं। (V.P.)Obs < (V.P.)Exp (B.P.)Obs > (B.P.)Exp ये अधिक ताप पर उबलने वाला स्थिरक्वथी मिश्रण बनाते हैं। |
उदाहरण
आदर्श विलयन के उदाहरण
- n-हेक्सेन और n-हेप्टेन
- ब्रोमोएथेन और क्लोरोएथेन
- बेंजीन और टॉल्यून
धनात्मक विचलन वाले अनादर्श विलयन के उदाहरण
एथेनॉल व एसीटोन का मिश्रण, तथा एथेनॉल व साइक्लोहेक्सेन का मिश्रण।
शुद्ध एथेनॉल में अणुओं के मध्य हाइड्रोजन बन्ध होते हैं। इसमें साइक्लोहेक्सेन मिलाने पर, इसके अणु एथेनॉल अणुओं के बीच आ जाते हैं, जिसके कारण एथेनॉल अणुओं के बीच पहले से उपस्थित हाइड्रोजन बन्ध टूट जाते हैं। इससे अंतराआणविक बल कमजोर हो जाते हैं, इसलिए यह मिश्रण राउल्ट के नियम से धनात्मक विचलन दर्शाता है।
ऋणात्मक विचलन वाले अनादर्श विलयन के उदाहरण
फिनॉल व एनिलीन का मिश्रण।
इस स्थिति में फिनॉलिक प्रोटॉन और एनिलीन के नाइट्रोजन परमाणु के एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म के मध्य बनने वाला अंतराआणविक हाइड्रोजन बन्ध, पृथक अणुओं के मध्य हाइड्रोजन बन्ध की तुलना में अधिक मजबूत होता है।
क्लोरोफॉर्म व एसीटोन का मिश्रण भी ऋणात्मक विचलन दर्शाता है, क्योंकि क्लोरोफॉर्म का अणु एसीटोन के अणु के साथ हाइड्रोजन बन्ध बनाता है।
स्थिरक्वथी मिश्रण (Azeotropic Mixture)
ऐसे द्विघटकीय मिश्रण जिनका द्रव और वाष्प प्रावस्था में संघटन समान होता है, तथा जो एक नियत ताप पर उबलते हैं, उन्हें स्थिरक्वथी मिश्रण कहते हैं।
इसी कारण इन घटकों को प्रभाजी आसवन द्वारा अलग नहीं किया जा सकता।
स्थिरक्वथी मिश्रण के प्रकार
- (a) न्यूनतम क्वथनांक स्थिरक्वथी (कम ताप पर उबलने वाला)
- (b) अधिकतम क्वथनांक स्थिरक्वथी (अधिक ताप पर उबलने वाला)
(a) न्यूनतम क्वथनांक स्थिरक्वथी
इस प्रकार के मिश्रण का क्वथनांक, उसके घटकों के क्वथनांक से कम होता है।
वे विलयन जो एक निश्चित संघटन पर राउल्ट के नियम से अत्यधिक धनात्मक विचलन प्रदर्शित करते हैं, न्यूनतम क्वथनांक स्थिरक्वथी बनाते हैं।
उदाहरण
एथेनॉल एवं जल का मिश्रण
| घटक | संघटन | क्वथनांक (B.P.) |
|---|---|---|
| एथेनॉल | 95% | 78.5°C |
| जल | 5% | 100°C |
| मिश्रण | स्थिरक्वथी मिश्रण | 78.1°C |
(b) अधिकतम क्वथनांक स्थिरक्वथी
इस प्रकार के मिश्रण का क्वथनांक, उसके घटकों के क्वथनांक से अधिक होता है।
वे विलयन जो एक निश्चित संघटन पर राउल्ट के नियम से अत्यधिक ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित करते हैं, अधिकतम क्वथनांक स्थिरक्वथी बनाते हैं।
उदाहरण
नाइट्रिक अम्ल एवं जल का मिश्रण
| घटक | संघटन | क्वथनांक (B.P.) |
|---|---|---|
| HNO3 | 68% | 86°C |
| Water | 38% | 100°C |
| मिश्रण | स्थिरक्वथी मिश्रण | 109.85°C |
अणुसंख्य गुणधर्म
वे सभी गुण जो विलयन में उपस्थित कुल कणों की संख्या तथा विलेय कणों की संख्या के अनुपात पर निर्भर करते हैं, न कि विलेय कणों की प्रकृति पर, ऐसे गुणों को अणुसंख्य गुणधर्म कहते हैं।
अणुसंख्य गुणधर्म के प्रकार
- विलायक के वाष्पदाब का आपेक्षिक अवनमन
- विलायक के हिमांक का अवनमन
- विलायक के क्वथनांक का उन्नयन
- विलयन का परासरण दाब
(1) विलायक के वाष्पदाब का आपेक्षिक अवनमन
किसी विलयन में विलायक का वाष्पदाब, शुद्ध विलायक के वाष्पदाब से कम होता है।
अर्थात यदि शुद्ध विलायक में कोई अवाष्पशील विलेय घोला जाता है, तो उसके वाष्पदाब में कमी आ जाती है।
वाष्पदाब में यह कमी (अवनमन) केवल विलेय के कणों की सांद्रता पर निर्भर करती है, न कि उनकी प्रकृति पर।
राउल्ट के नियम के अनुसार, किसी अवाष्पशील विलेय के विलयन का वाष्पदाब, विलायक के मोल-अंश के समानुपाती होता है।
यदि विलेय = A और विलायक = B हो, तो
PS ∝ XB
PS = PB0 . XB
- PB0 = B का शुद्ध अवस्था में वाष्पदाब
- PS = विलयन का वाष्पदाब
वाष्पदाब में अवनमन (कमी)
ΔPS = PB0 - PS
ΔPS = PB0 - PB0XB
ΔPS = PB0(1 - XB)
ΔPS / PB0 = (1 - XB)
ΔPS / PB0 = (PB0 - PS) / PB0
इसे वाष्पदाब में आपेक्षिक अवनमन कहते हैं।
आपेक्षिक अवनमन का मान विलेय के मोल-अंश के बराबर होता है।
ΔPS / PB0 = XA
क्योंकि
XA = nA / (nA + nB)
अतः
ΔPS / PB0 = nA / (nA + nB)
- nA = विलेय के मोलों की संख्या
- nB = विलायक के मोलों की संख्या
- (nA + nB) = विलयन के कुल मोलों की संख्या
तनु विलयन के लिए
nA ≪ nB अर्थात nB ≃ (nA + nB)
अतः
ΔPS / PB0 = nA / nB
क्योंकि
nA = wA / MwA तथा nB = wB / MwB
इसलिए
ΔPS / PB0 = (wA / MwA) × (MwB / wB)
- wA = A का द्रव्यमान
- MwA = A का आणविक द्रव्यमान
- wB = B का द्रव्यमान
- MwB = B का आणविक द्रव्यमान
(2) विलयन के क्वथनांक का उन्नयन (Elevation in B.P.)
कोई द्रव उस ताप पर उबलता है, जिस पर उसका वाष्पदाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर हो जाता है।
उदाहरण के लिए, जल 373.15 K (100°C) पर उबलता है, क्योंकि इस ताप पर जल का वाष्पदाब 1.013 bar (1 वायुमण्डल) होता है।
जब किसी अवाष्पशील पदार्थ को किसी विलायक में घोला जाता है, तो द्रव का वाष्पदाब कम हो जाता है।
अतः विलयन का वाष्पदाब वायुमण्डलीय दाब के बराबर लाने के लिए अधिक ताप की आवश्यकता होती है।
इसलिए किसी भी विलयन का क्वथनांक, शुद्ध विलायक के क्वथनांक से हमेशा अधिक होता है। इसे विलायक के क्वथनांक का उन्नयन कहते हैं।
इस वृद्धि को ΔTb से व्यक्त करते हैं।
ΔTb = Tb - Tb0
- Tb = विलयन का क्वथनांक
- Tb0 = विलायक का क्वथनांक
तनु विलयन में क्वथनांक का उन्नयन ΔTb, विलयन में उपस्थित विलेय की मोललता के समानुपाती होता है।
ΔTb ∝ m
ΔTb = Kb . m
यहाँ
- m = मोललता
- Kb = क्वथनांक उन्नयन स्थिरांक या मोलल उन्नयन स्थिरांक
Kb की इकाई = K kg mol−1
जल के लिए Kb का मान 0.52 K kg mol−1 होता है।
क्योंकि
m = wA(gm) / MA(gm) × 1000 gm / WB(gm) × 1kg
अतः
ΔTb = Kb . wA(gm) / MA(gm) × 1000 gm / WB(gm) × 1kg
(3) विलायक के हिमांक का अवनमन (Lowering in Freezing Point)
वह ताप जिस पर द्रव अवस्था का वाष्पदाब, उसकी ठोस अवस्था के वाष्पदाब के बराबर हो जाता है, हिमांक कहलाता है।
किसी विलयन का हिमीकरण तभी होता है, जब उसका वाष्पदाब शुद्ध ठोस विलायक के वाष्पदाब के बराबर हो जाए।
जब एक अवाष्पशील ठोस विलायक में डाला जाता है, तो विलायक का वाष्पदाब कम हो जाता है। इससे उसके हिमांक में कमी हो जाती है, जिसे हिमांक का अवनमन (ΔTf) कहते हैं।
ΔTf = Tf0 - Tf
- Tf0 = विलायक का हिमांक
- Tf = विलयन का हिमांक
तनु विलयन का हिमांक अवनमन (ΔTf), विलयन की मोललता (m) के समानुपाती होता है।
ΔTf ∝ m
ΔTf = Kf . m
यहाँ
- m = मोललता
- Kf = हिमांक अवनमन स्थिरांक, मोलल अवनमन स्थिरांक या क्रायोस्कोपिक स्थिरांक
Kf की इकाई = K kg mol−1
जल के लिए Kf का मान 1.86 K kg mol−1 होता है।
क्योंकि
m = wA(gm) / MA(gm) × 1000 gm / WB(gm) × 1kg
अतः
ΔTf = Kf . wA(gm) / MA(gm) × 1000 gm / WB(gm) × 1kg
(4) विलयन का परासरण एवं परासरण दाब
वह प्रक्रिया जिसमें शुद्ध विलायक के कण, कम सान्द्र विलयन से उच्च सान्द्र विलयन में अर्धपारगम्य झिल्ली (SPM) से होकर प्रवाहित होते हैं, परासरण (Osmosis) कहलाती है।
विलयन का परासरण दाब वह अतिरिक्त द्रव स्थैतिक दाब है, जो परासरण को रोकने, अर्थात विलायक के अणुओं को अर्धपारगम्य झिल्ली द्वारा विलयन में जाने से रोकने के लिए लगाया जाता है।
परासरण दाब (π)
πV = nRT
π = n / V RT → (i)
π = CRT → (ii)
समीकरण (i) से
n = wA(gm) / MwA(gm/mol)
अतः
π = wA(gm) / [MwA(gm/mol) . V] RT
अथवा
MwA = wA(gm) / (π . V) RT
यहाँ,
- C = विलयन की सान्द्रता (मोल प्रति लीटर)
- R = गैस नियतांक (0.082 L bar mol−1 K−1)
- T = तापमान (298 K)
- n = विलेय के मोलों की संख्या
- V = विलयन का आयतन
- Mw = विलेय का आणविक द्रव्यमान (gm/mol)
- w = विलेय का भार
Note: परासरण दाब विधि द्वारा विलेयों जैसे प्रोटीनों, बहुलकों एवं अन्य वृहद्-अणुओं के मोलर द्रव्यमान ज्ञात करने में प्रयोग किया जाता है।
परासरण दाब विधि, दाब मापन की अन्य विधियों की अपेक्षा अधिक उपयोगी है, क्योंकि:
- (a) परासरण दाब मापन कमरे के ताप पर होता है और मोललता के स्थान पर विलयन की मोलरता उपयोग में ली जाती है।
- (b) विलेय जैसे जैव-अणु, जो उच्च ताप पर सामान्यतः स्थायी नहीं होते, तथा वे बहुलक जिनकी विलेयता कम होती है, उनके लिए यह तकनीक उपयोगी है।
समपरासरी विलयन
दिए गए ताप पर समान परासरण दाब वाले दो विलयन समपरासरी विलयन कहलाते हैं। जब ऐसे विलयन अर्धपारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक किए जाते हैं, तो उनके मध्य परासरण नहीं होता।
Note: 0.9% w/v NaCl का विलयन रुधिर के लिए समपरासरी विलयन होता है।
π1 = π2
C1 = C2
⇒
n1/V1 = n2/V2
या
w1 / (Mw1V1)
=
w2 / (Mw2V2)
अल्पपरासरी विलयन
वह विलयन जिसका परासरण दाब, दिए गए विलयन की अपेक्षा कम होता है, अल्पपरासरी विलयन कहलाता है।
उदाहरण के लिए, यदि NaCl विलयन की सांद्रता 0.9% w/v से कम हो, तो जल कोशिकाओं के अंदर प्रवाहित होगा और वे फूल जाएँगी।
π1 < π2
C1 < C2
⇒
n1/V1 < n2/V2
या
w1 / (Mw1V1)
<
w2 / (Mw2V2)
अतिपरासरी विलयन
वह विलयन जिसका परासरण दाब, दिए गए विलयन की अपेक्षा अधिक होता है, अतिपरासरी विलयन कहलाता है।
उदाहरण के लिए, यदि रुधिर कोशिकाओं को 0.9% w/v से अधिक NaCl विलयन (अतिपरासरी) में रख दें, तो जल कोशिकाओं से बाहर प्रवाहित हो जाएगा और वे संकुचित हो जाएँगी।
π1 > π2
C1 > C2
⇒
n1/V1 > n2/V2
या
w1 / (Mw1V1)
>
w2 / (Mw2V2)
Note: विलायक का बहाव हमेशा कम परासरण दाब से अधिक परासरण दाब की ओर, अर्थात अल्पपरासरी विलयन से अतिपरासरी विलयन की ओर होता है।
प्रतिलोम परासरण
परासरण की क्रिया में जब बाहरी दाब (परासरण दाब से अधिक) विलयन पर लगाया जाता है, तो परासरण के विपरीत क्रिया होने लगती है।
अर्थात अधिक सान्द्रता वाले विलयन से कम सान्द्रता वाले विलयन की ओर विलायक के कणों का गमन होता है। इसे प्रतिलोम परासरण कहते हैं।
उपयोग
- समुद्री जल से जल का शोधन प्रतिलोम परासरण द्वारा किया जाता है।
- घरों में RO के रूप में।
- सीवेज को साफ करने में।
असामान्य मोलर द्रव्यमान
यदि विलेय को विलायक में घोलने पर उसका वियोजन या संघटन होता है, तो विलयन में कणों की संख्या में क्रमशः वृद्धि या कमी हो जाती है।
इसके कारण अणुसंख्य गुणधर्मों में परिवर्तन हो जाता है।
ऐसे मोलर द्रव्यमान जो सामान्य मान की तुलना में कम या अधिक प्राप्त होते हैं, उन्हें असामान्य मोलर द्रव्यमान कहते हैं।
अणुसंख्य गुणधर्म और मोलर द्रव्यमान में सम्बन्ध
अणुसंख्य गुणधर्म विलयन में उपस्थित कुल कणों की संख्या पर निर्भर करते हैं। इसलिए यदि विलेय वियोजित या संयोजित होता है, तो उसका प्राप्त मोलर द्रव्यमान सामान्य मान से अलग आता है।
उदाहरण
NaCl, CaCl2 या AlCl3 आदि का यदि पूर्ण वियोजन (100%) मान लिया जाए, तो 1 मोल से क्रमशः 2, 3 और 4 मोल आयन उत्पन्न होते हैं।
इस कारण इनका प्रायोगिक मोलर द्रव्यमान, वास्तविक मोलर द्रव्यमान से कम प्राप्त होता है।
इसी प्रकार यदि विलेय का विलयन में संघटन हो जाता है, तो विलयन में कणों की संख्या कम हो जाती है। तब विलेय का मोलर द्रव्यमान सामान्य मोलर द्रव्यमान से अधिक प्राप्त होता है।
उदाहरण के लिए, CH3COOH का C6H6 में विलयन बनाने पर इसका द्विलक (Dimer) बन जाता है।
यह CH3COOH के अणुओं के बीच हाइड्रोजन बन्ध बनने के कारण संभव होता है।
वान्ट हॉफ गुणांक (i)
वान्ट हॉफ ने एक गुणांक दिया, जिसे वान्ट हॉफ गुणांक (Van’t Hoff’s factor) कहते हैं।
यह विलयन में विलेय के संघटन या वियोजन की मात्रा को व्यक्त करता है। i, विलेय के नॉर्मल अणुभार तथा प्रेक्षित अणुभार के अनुपात के बराबर होता है।
i = Normal molecular mass / Observed molecular mass
क्योंकि अणुसंख्य गुणधर्म अणुभारों के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं, इसलिए वान्ट हॉफ गुणांक (i) को अन्य रूप में भी लिखा जा सकता है।
i के विभिन्न मान
i = 1 : विलेय का विलयन में न तो संघटन होता है और न ही वियोजन।
उदाहरण: यूरिया, ग्लूकोज, सुक्रोज
i > 1 : विलेय का विलयन में वियोजन होगा।
उदाहरण:
FeCl3 ⟶ Fe+3 + 3Cl−
,
i = 4
| उदाहरण | वान्ट हॉफ गुणांक (i) |
|---|---|
| NaCl, KCl, MgSO4 | i = 2 |
| MgCl2, K2SO4 | i = 3 |
| K3[Fe(CN)6], FeCl3, Al(NO3)3 | i = 4 |
| Fe2(SO4)3, K4[Fe(CN)6] | i = 5 |
Note: जल में उपस्थित CH3COOH या C6H5COOH के लिए भी सामान्यतः i > 1 होता है, क्योंकि वे आंशिक रूप से आयनीकरण करते हैं।
i < 1 : विलेय का विलयन में संघटन होता है।
उदाहरण: बेंजीन में एथेनॉइक अम्ल (एसिटिक अम्ल) के अणुओं का संघटन / द्वियोजन (dimerization)।
वान्ट हॉफ गुणांक (i) का उपयोग करके अणुसंख्य गुणधर्म के सूत्र
वाष्पदाब में आपेक्षिक अवनमन
(ΔPS / PB0) =
(PB0 - PS) / PB0
= i . XA
क्वथनांक में उन्नयन
ΔTb = i . Kb . m
हिमांक में अवनमन
ΔTf = i . Kf . m
परासरण दाब
π = iCRT
i के मान की सहायता से पदार्थ के वियोजन या संघटन की मात्रा की गणना की जा सकती है।
वान्ट हॉफ गुणांक (i) और वियोजन की मात्रा (α) में सम्बन्ध
माना एक विद्युत अपघट्य An निम्न प्रकार से n कणों में विभाजित होता है, और α वियोजन की मात्रा है।
An ⇌ nA
| अवस्था | An | nA |
|---|---|---|
| प्रारम्भ में मोल | 1 | 0 |
| वियोजन के बाद | 1 − α | nα |
विलयन में विलेय के कुल कणों की संख्या = 1 − α + nα
विलेय के कणों की सामान्य संख्या = 1
अतः
i = (1 − α + nα) / 1
i = 1 − α + nα
i − 1 = −α + nα
i − 1 = α(n − 1)
α = (i − 1) / (n − 1)
वान्ट हॉफ गुणांक (i) और संघटन की मात्रा (α) में सम्बन्ध
माना एक विद्युत अपघट्य के n कण संघटित होकर एक अणु बनाते हैं, और α संघटन की मात्रा है।
nA ⇌ An
| अवस्था | nA | An |
|---|---|---|
| प्रारम्भ में मोल | 1 | 0 |
| संघटन के बाद | 1 − α | α / n |
विलयन में विलेय के कुल कणों की संख्या = 1 − α + α/n
विलेय के कणों का सामान्य मान = 1
अतः
i = (1 − α + α/n) / 1
i = 1 − α + α/n
i − 1 = −α + α/n
i − 1 = (α − nα) / n
n(i − 1) = α(1 − n)
α = n(i − 1) / (1 − n)
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
- जब अवाष्पशील विलेय को विलायक में मिलाया जाता है, तो वाष्पदाब घटता है, क्वथनांक बढ़ता है तथा हिमांक घटता है।
- एथिलीन ग्लाइकोल को सामान्यतः कार रेडिएटर में जल का हिमांक कम करने के लिए मिलाया जाता है। इसे एंटीफ्रीज कहते हैं।
- NaCl अथवा CaCl2 (निर्जलीय) को सड़क से बर्फ हटाने में प्रयोग किया जाता है। यह जल के हिमांक को अवनमित करता है और उस ताप को कम कर देता है जिस पर बर्फ बनती है।
- जिलेटिन कृत्रिम अर्धपारगम्य झिल्ली है।
- अचार बनाने के लिए सान्द्र लवणीय विलयन में रखा गया कच्चा आम, परासरण के कारण जल का क्षरण कर देता है एवं संकुचित हो जाता है।
- वातावरण में जल की कमी के कारण मुरझाई हुई गाजर को जल में रखकर पुनः उसकी पुरानी अवस्था में प्राप्त किया जा सकता है।
- जो लोग बहुत अधिक नमक या नमकीन भोजन लेते हैं, वे ऊतक कोशिकाओं एवं अंतराकोशिकीय स्थानों में जल धारण महसूस करते हैं। इसके परिणामस्वरूप होने वाली सूजन को शोफ (edema) कहते हैं।
- मांस में नमक मिलाकर संरक्षण तथा फलों में शक्कर मिलाकर संरक्षण, बैक्टीरिया की क्रिया को रोकता है।
- परासरण के कारण नमकयुक्त मांस एवं मीठे फलों पर स्थित बैक्टीरिया जल की कमी के कारण संकुचित होकर मर जाते हैं।
