रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती हैं। तथा इसके विपरीत विद्युत ऊर्जा का प्रयोग स्वतः नहीं होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं को पूर्ण करने के लिए किया जाता है।
विद्युत रासायनिक सेल अथवा गैल्वैनिक सेल
विद्युत रासायनिक सेल एक ऐसी युक्ति है जिसमें स्वतः ऑक्सीकरण अपचयन अभिक्रिया द्वारा रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। अर्थात विद्युत को ऑक्सीकरण या अपचयन प्रक्रिया द्वारा प्राप्त कर सकते हैं।
इसका विद्युत का उपयोग मोटर या अन्य विद्युतीय उपकरण जैसे हीटर, पंखा, गीजर इत्यादि में उपयोग किया जाता है।
इसे गैल्वैनिक सेल भी कहा जाता है।
बनावट — इस सेल को बनाने के लिए Zn धातु के छड़ को ZnSO4(aq) विलयन में तथा Cu धातु के छड़ को CuSO4(aq) के विलयन में रखकर दोनों विलयनों को लवण सेतु द्वारा जोड़ देते हैं।
गैल्वैनिक सेल में निम्नलिखित रेडॉक्स अभिक्रिया होती है
ऐनोड पर :
Zn(s) ⟶ Zn2+(aq) + 2e−
(ऑक्सीकरण)
(ऑक्सीकरण अर्ध अभिक्रिया)
कैथोड पर :
Cu2+(aq) + 2e− ⟶ Cu(s)
(अपचयन)
(अपचयन अर्ध अभिक्रिया)
कुल अभिक्रिया : Zn(s) + Cu2+(aq) ⟶ Zn2+(aq) + Cu(s)
महत्वपूर्ण बिंदु
ये अभिक्रियाएँ डेनियल सेल के दो भिन्न भागों में होती हैं। अपचयन अर्ध अभिक्रिया कॉपर इलेक्ट्रोड पर होती है जबकि ऑक्सीकरण अर्ध अभिक्रिया जिंक इलेक्ट्रोड पर होती है। सेल के ये दो भाग, अर्ध सेल या रेडॉक्स युग्म भी कहलाते हैं।
इलेक्ट्रॉन का प्रवाह ऐनोड से कैथोड की ओर तथा धारा का प्रवाह कैथोड से ऐनोड की ओर होता है।
रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदली जाती है।
दोनों अर्ध सेल को लवण सेतु द्वारा जोड़ देते हैं।
लवण सेतु के कार्य
(a) यह दो अर्ध सेलों के विलयनों को जोड़ता है तथा सेल परिपथ पूर्ण करता है।
(b) यह दो अर्धसेलों के विलयनों को विद्युत उदासीन बनाए रखता है।
सेल का निरूपण
Zn(s) | Zn2+(1M) || Cu2+(1M) | Cu(s)
याद रखें : ALONE
इलेक्ट्रोड विभव
जब धातु (M) को उसी के आयन (Mn+) युक्त विद्युत अपघट्य विलयन में रखते हैं तब वह e− त्यागता (ऑक्सीकरण) है या e− ग्रहण करता है।
इस प्रकार इलेक्ट्रोड तथा विद्युत अपघट्य के मध्य उत्पन्न विभवान्तर को इलेक्ट्रोड विभव कहते हैं।
इलेक्ट्रोड विभव के प्रकार
धातु इलेक्ट्रोड की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने या त्यागने की प्रकृति के आधार पर इलेक्ट्रोड विभव को दो भागों में बाँटा गया है।
(i) ऑक्सीकरण विभव : जब इलेक्ट्रोड विलयन के सापेक्ष ऋणावेशित हो जाता है अर्थात ऐनोड के समान कार्य करता है, तब ऑक्सीकरण सम्पन्न होता है।
(ii) अपचयन विभव : जब इलेक्ट्रोड विलयन के सापेक्ष धनावेशित होते हैं अर्थात कैथोड के समान कार्य करते हैं, तब अपचयन सम्पन्न होता है।
मानक ऑक्सीकरण विभव और मानक अपचयन विभव
जब अर्ध सेल अभिक्रिया में विलयन की सान्द्रता, ताप तथा गैसीय अवस्था में दाब नियत हो, तो इन्हें मानक ऑक्सीकरण विभव या मानक अपचयन विभव कहते हैं।
Note : IUPAC के नियम अनुसार मानक अपचयन विभव को अब मानक इलेक्ट्रोड विभव कहा जाता है।
किसी अर्ध सेल के लिए :
मानक ऑक्सीकरण विभव = − मानक अपचयन विभव
जैसे Cu(s) धातु के मानक अपचयन विभव का मान +0.34 V है, तो इसके मानक ऑक्सीकरण विभव का मान −0.34 V होगा।
सेल विभव तथा विभवान्तर में अंतर
| सेल विभव अथवा विद्युत वाहक बल | विभवान्तर |
|---|---|
| सेल के दो इलेक्ट्रोडों के मध्य का वह विभवान्तर, जब दोनों के बीच परिपथ में धारा प्रवाह नहीं होता है। | सेल को जब कार्य में लिया जाए, तो उसके दोनों इलेक्ट्रोडों के विभव का अंतर विभवान्तर कहलाता है। |
| यह सेल के अधिकतम विद्युत वाहक बल के बराबर होता है। | यह सेल के अधिकतम विद्युत वाहक बल से कम होता है। |
| इसका मापन वोल्टमीटर से नहीं किया जा सकता है। | इसका मापन वोल्टमीटर से किया जा सकता है। |
सेल का विद्युत वाहक बल अथवा सेल विभव
(1) “दो अर्ध सेलों के विभवों का अंतर सेल विभव या विद्युत वाहक बल (emf) कहलाता है।”
इलेक्ट्रॉन का प्रवाह ऐनोड से कैथोड की ओर होता है, जबकि धारा का प्रवाह कैथोड से ऐनोड की ओर होता है।
सेल के वि. वा. बल या सेल विभव को सेल के दोनों इलेक्ट्रोडों के विभव के मानों के अंतर से ज्ञात करते हैं।
Ecell = Eemf = (कैथोड का अपचयन विभव) − (ऐनोड का अपचयन विभव)
Ecell = (Eअपचयन विभव)कैथोड − (Eअपचयन विभव)ऐनोड
उदाहरण
सेल अभिक्रिया — Cu(s) + 2Ag+(aq) ⟶ Cu2+(aq) + 2Ag(s)
अर्ध सेल अभिक्रियाएँ —
कैथोड (अपचयन) : 2Ag+(aq) + 2e− ⟶ 2Ag(s)
ऐनोड (ऑक्सीकरण) : Cu(s) ⟶ Cu2+(aq) + 2e−
सेल का निरूपण — Cu(s) | Cu2+(aq) || Ag+(aq) | Ag(s)
सेल विभव का सूत्र
Ecell = (कैथोड का अपचयन विभव) − (ऐनोड का अपचयन विभव)
अथवा
Eसेल = Eकैथोड − Eऐनोड
अथवा
Eसेल = EAg+/Ag − ECu2+/Cu
इलेक्ट्रोड विभव का मापन
अलग-अलग अर्ध सेल के विभव का मापन नहीं किया जा सकता। इस प्रकार दो अर्ध सेलों के विभवों के अंतर का मात्र मापन करते हैं, जिसे उस सेल का विद्युत वाहक बल (emf) कहा जाता है।
यदि एक संदर्भ सेल या इलेक्ट्रोड (अर्ध सेल) का विभव ज्ञात कर लें तो इसके सापेक्ष दूसरे अर्ध सेल का विभव ज्ञात किया जा सकता है।
इसके लिए मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड अर्ध सेल का काम में लिया जाता है।
मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड (SHE)
मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड में प्लैटिनम फॉयल से लिपटी प्लैटिनम इलेक्ट्रोड डुबोई जाती है। इलेक्ट्रोड अम्लीय विलयन (HCl) में रखा जाता है और इस पर शुद्ध हाइड्रोजन गैस प्रवाहित की जाती है।
हाइड्रोजन का अपचयन एवं ऑक्सीकरण दोनों अवस्थाओं को संतुलित रखने के लिए एक मोलर (1M) तथा गैस का दाब 1 bar रखा जाता है।
सेल अभिक्रिया —
ऐनोड पर — H2(g) ⟶ 2H+(aq) + 2e− (ऑक्सीकरण)
कैथोड पर — 2H+(aq) + 2e− ⟶ H2(g) (अपचयन)
Pt(s) | H2(g)(1bar) | H+(aq) (1M)
मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड का विभव E0H+/H2 = 0.0 volt माना जाता है।
Zn इलेक्ट्रोड के मानक इलेक्ट्रोड विभव का मान
सेल अभिक्रिया —
ऐनोड पर — Zn(s) ⟶ Zn2+(aq) + 2e− (ऑक्सीकरण)
कैथोड पर — 2H+(aq) + 2e− ⟶ H2(g) (अपचयन)
Net : Zn(s) + 2H+(aq) ⟶ Zn2+(aq) + H2(g)
E0cell = E0cathode − E0anode
E0cell = E0H+/H2 − E0Zn2+/Zn [∵ E0H+/H2 = 0.0 volt]
0.76 volt = 0.0 volt − E0Zn2+/Zn
E0Zn2+/Zn = −0.76 volt
सेल का निरूपण — Zn(s) | Zn2+(aq) (1M) || H+(aq) (1M) | H2(g)(1bar) | Pt(s)
Note : E0cell का मापन परिपथ में उपस्थित वोल्टमीटर से किया जाता है।
Cu इलेक्ट्रोड के मानक इलेक्ट्रोड विभव का मान
सेल अभिक्रिया —
ऐनोड पर — H2(g) ⟶ 2H+(aq) + 2e− (ऑक्सीकरण)
कैथोड पर — Cu2+(aq) + 2e− ⟶ Cu(s) (अपचयन)
Net : Cu2+(aq) + H2(g) ⟶ Cu(s) + 2H+(aq)
E0cell = E0cathode − E0anode
E0cell = E0Cu2+/Cu − E0H+/H2 [∵ E0H+/H2 = 0.0 volt]
0.34 volt = E0Cu2+/Cu − 0.0 volt
E0Cu2+/Cu = 0.34 volt
सेल का निरूपण — Pt(s) | H2(g)(1bar) | H+(aq) (1M) || Cu2+(aq) (1M) | Cu(s)
Note : E0cell का मापन परिपथ में उपस्थित वोल्टमीटर से किया जाता है।
विद्युत रासायनिक श्रेणी
| तत्व | मानक इलेक्ट्रोड अपचयन विभव E0, वोल्ट |
|---|---|
| Li | −3.05 |
| K | −2.925 |
| Ba | −2.90 |
| Sr | −2.89 |
| Ca | −2.87 |
| Na | −2.714 |
| Mg | −2.37 |
| Al | −1.66 |
| Mn | −1.18 |
| Zn | −0.7628 |
| Cr | −0.74 |
| Fe | −0.44 |
| Cd | −0.403 |
| Co | −0.27 |
| Ni | −0.25 |
| Sn | −0.14 |
| Pb | −0.12 |
| H2 | 0.00 |
| Cu | +0.337 |
| I2 | +0.535 |
| Hg | +0.885 |
| Ag | +0.799 |
| Br2 | +1.08 |
| Pt | +1.20 |
| Cl2 | +1.36 |
| Au | +1.50 |
| F2 | +2.87 |
Au, Pt आदि पर तनु अम्ल से हाइड्रोजन उत्सर्जन नहीं करती हैं।
विद्युत रासायनिक श्रेणी के अनुप्रयोग
(i) धातुओं की क्रियाशीलता :
मानक इलेक्ट्रोड विभव में धनात्मक वृद्धि के साथ अपचायक प्रवृत्ति घटती है, जबकि ऑक्सीकारक प्रवृत्ति बढ़ती है।
Exa : F2 (+2.87 V) प्रबल ऑक्सीकारक है।
धातुओं का E0 जितना अधिक होगा, उनमें विलयन से इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर स्थायित्व प्राप्त करने की प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होती है।
मानक इलेक्ट्रोड विभव में अपचयन प्रवृत्ति घटती है, जबकि अपचायक प्रवृत्ति बढ़ती है।
Exa : Li (−3.05 V) प्रबल अपचायक है।
धातु विभव E0 जितना कम होगा, उनमें माध्यम से इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनने की प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होती है।
विस्थापन अभिक्रियायें
ऐसी धातुएँ जिनका E0 (मानक अपचयन विभव) कम है, वे ऐसी धातुओं के उनके लवण विलयन से विस्थापित कर देती हैं जिनका अपचयन विभव उच्च है।
धातुओं की श्रेणी में जो उच्च स्थानों पर होती हैं, उनमें इलेक्ट्रॉन देने की प्रवृत्ति उच्च होती है और वे धनायन को आसानी से अपचयित कर देती हैं।
इसी प्रकार, अर्थात् जब दो उच्च धनात्मक अपचयन विभव वाली धातुओं के धनायन का अपचयन उच्च अपचयन विभव की प्रवृत्ति कम होती है और वे इलेक्ट्रॉन प्राप्त करके प्रबल क्रियाशील होते हैं। इनके अपचयन विभव का मान जितना उच्च होता है।
धातुओं की अपचयन क्षमता
ऐसी धातुएँ जिनका मानक अपचयन विभव ऋणात्मक होता है, वे आसानी से ऑक्सीकरण होती हैं तथा H+(aq) को H2 में बदल सकती हैं।
इसलिए हाइड्रोजन से ऊपर स्थित धातुएँ अम्लों से हाइड्रोजन गैस विस्थापित कर सकती हैं।
हाइड्रोजन से नीचे आने वाली धातुएँ जैसे Cu, Hg, Ag, Au आदि ऐसा नहीं करती हैं।
धातुओं का निष्कर्षण
अधिक धन विद्युतधर्मी धातु की धन विद्युतधर्मी धातु को उसके लवण विलयन से विस्थापित कर सकती है।
उदाहरणतः Ag तथा Au को सायनाइड के द्वारा प्राप्त करने में Zn धातु का प्रयोग किया जाता है।
जैसे सिल्वर को Na[Ag(CN)2] विलयन से जिंक धातु पर प्राप्त कर सकते हैं, जिससे Ag धातु अवक्षेपित होती है।
2Na[Ag(CN)2](aq) + Zn(s) ⟶ Na2[Zn(CN)4](aq) + 2Ag(s)
इलेक्ट्रोड विभव के लिये नर्नस्ट समीकरण
नर्नस्ट ने इलेक्ट्रोड विभव तथा सान्द्रता के बीच सम्बन्ध दिया, जिसे नर्नस्ट समीकरण कहते हैं।
हर इलेक्ट्रोड अभिक्रिया के लिये इलेक्ट्रोड विभव इस प्रकार होगा :
Mn+(aq) + ne− ⟶ M(s)
E(Mn+/M) = E0(Mn+/M) − RT/nF ln [M(s)] / [Mn+(aq)] (M(s) की सान्द्रता, इकाई मानने पर)
E(Mn+/M) = E0(Mn+/M) − RT/nF ln 1 / [Mn+] (नर्नस्ट समीकरण)
जहाँ E(Mn+/M) किसी दी गई सान्द्रता पर उस इलेक्ट्रोड का विभव है।
नर्नस्ट समीकरण में प्रयुक्त राशियाँ
E0(Mn+/M) = मानक इलेक्ट्रोड विभव
R = गैस नियतांक 8.31 जूल केल्विन−1 मोल−1
T = परम ताप (298 K)
n = स्थानान्तरित इलेक्ट्रॉनों की संख्या
F = फैराडे नियतांक (1F = 96500 C/mol)
Mn+(aq) = विलयन में धातु आयन की सान्द्रता
चुंकि ln = 2.303 और R, F तथा T के मान रखने पर नर्नस्ट समीकरण इस प्रकार लिखा जाता है :
E(Mn+/M) = E0(Mn+/M) − 0.0591/n log 1 / [Mn+(aq)] (नर्नस्ट समीकरण)
प्रश्न
प्रश्न: 298 K ताप पर दी गयी समीकरण के अर्ध सेल अभिक्रिया के अपचयन विभव का परिकलन कीजिए।
Ag+(aq) + e− ⟶ Ag(s)
दिया है : [Ag+] = 0.1 M और E0 = +0.80 V
हल
नर्नस्ट समीकरण से
E(Mn+/M) = E0(Mn+/M) − 0.0591/n log 1 / [Mn+(aq)]
यहाँ [Mn+(aq)] = Ag+(aq) = 0.1 M
समीकरण में मान रखने पर :
E(Ag+/Ag) = +0.80 V − 0.0591/1 log 1/[0.1M]
E(Ag+/Ag) = +0.80 V − 0.0591 log 10 (∵ log 10 = 1)
E(Ag+/Ag) = +0.80 − 0.0591 = 0.741 V
डेनियल सेल के लिए नर्नस्ट समीकरण
डेनियल सेल जिंक तथा कॉपर इलेक्ट्रोडों का बना होता है।
ऐनोड और कैथोड अभिक्रियाएँ
ऐनोड (ऑक्सीकरण) : Zn(s) ⟶ Zn2+(aq) + 2e−
(ऑक्सीकरण अर्ध-अभिक्रिया)
E(Zn2+/Zn) = E0(Zn2+/Zn) − 0.0591/2 log 1/[Zn2+]
कैथोड (अपचयन) : Cu2+(aq) + 2e− ⟶ Cu(s)
(अपचयन अर्ध-अभिक्रिया)
E(Cu2+/Cu) = E0(Cu2+/Cu) − 0.0591/2 log 1/[Cu2+]
डेनियल सेल के लिए नर्नस्ट समीकरण का व्यंजक
Ecell = (Eअपचयन विभव)cathode − (Eअपचयन विभव)anode
Ecell = [E0(Cu2+/Cu) − 0.0591/2 log 1/[Cu2+]] − [E0(Zn2+/Zn) − 0.0591/2 log 1/[Zn2+]]
Ecell = [E0(Cu2+/Cu) − E0(Zn2+/Zn)] − [0.0591/2 log 1/[Cu2+] − 0.0591/2 log 1/[Zn2+]]
Ecell = E0cell − 0.0591/2 (log 1/[Cu2+] − log 1/[Zn2+]) (∵ log m/n = logm − logn)
Ecell = E0cell − 0.0591/2 log [Zn2+]/[Cu2+] (डेनियल सेल के लिए नर्नस्ट समीकरण)
महत्वपूर्ण बिंदु
डेनियल सेल के लिए E0cell = 1.1 volt
Ecell दोनों आयनों, Cu2+ एवं Zn2+ की सान्द्रता पर निर्भर करता है।
Ecell, Cu2+ आयनों की सान्द्रता बढ़ने पर बढ़ता है, एवं Zn2+ आयनों की सान्द्रता बढ़ने पर घटता है।
एक सामान्य वैद्युतरासायनिक अभिक्रिया के लिए नर्नस्ट समीकरण
aA + bB ⟶ cC + dD
Ecell = (E0cathode − E0anode) − 2.303RT/nF log [P]mol / [R]mol
E0cell = (E0cathode − E0anode)
Ecell = E0cell − 2.303RT/nF log [C]c[D]d / [A]a[B]b
Ecell = E0cell − 0.0591/n log [C]c[D]d / [A]a[B]b
Ecell = (E0cathode − E0anode) − 0.0591/n log [P]mol / [R]mol
साम्य स्थिरांक (Kc) तथा नर्नस्ट समीकरण
डेनियल सेल में जैसे-जैसे समय गुजरता है Zn2+ आयनों की सान्द्रता बढ़ती जाती है, लेकिन Cu2+ आयनों की सान्द्रता घटती जाती है।
जिससे वोल्टमीटर में सेल का वोल्टेज घटता जाता है। कुछ समय पश्चात Cu2+ एवं Zn2+ आयनों की सान्द्रता स्थिर हो जाती है एवं वोल्टमीटर शून्य पढ़ाता है।
यह उसी समय दर्शाता है कि अभिक्रिया में साम्य स्थापित हो चुका है।
इस अवस्था में नर्नस्ट समीकरण को निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है।
साम्य पर नर्नस्ट समीकरण
हम जानते हैं कि Ecell = E0cell − 2.303RT/nF log Kc
जहाँ Kc = साम्य स्थिरांक = [उत्पाद की सान्द्रता](मोल) / [अभिकारक की सान्द्रता](मोल)
0 = E0cell − 2.303RT/nF log Kc (∵ साम्य पर Ecell = 0)
E0cell = 2.303RT/nF log Kc अथवा E0cell = 0.0591/n log Kc
Kc ज्ञात करने का सूत्र
यदि हमें Kc ज्ञात करना हो, तो इसे इस प्रकार लिखा जायेगा :
Kc = antilog n × E0cell / 0.0591
डेनियल सेल के लिए साम्य स्थिरांक (Kc)
डेनियल सेल के लिए : Zn(s) + Cu2+(aq) ⟶ Zn2+(aq) + Cu(s)
इस अभिक्रिया में Zn2+ आयनों की सान्द्रता बढ़ती जाती है, जबकि Cu2+ आयनों की सान्द्रता घटती जाती है। जिससे वोल्टमीटर में सेल की वोल्टता का मान घटता जाता है।
कुछ समय बाद Zn2+ तथा Cu2+ आयनों की सान्द्रता स्थिर हो जाती है तथा साम्यावस्था प्राप्त होती है। एवं वोल्टमीटर शून्य प्रदर्शित (Ecell = 0) करता है।
अतः इस नर्नस्ट समीकरण को लिखा जाता है :
नर्नस्ट समीकरण
Ecell = E0cell − 0.0591 / 2 log [Zn2+] / [Cu2+] (∵ Kc = [P]mol / [R]mol = [Zn2+] / [Cu2+])
Ecell = E0cell − 0.0591 / 2 log Kc (∵ साम्य पर Ecell = 0)
E0cell = 0.0591 / 2 log Kc
डेनियल सेल के लिए E0cell = 1.1 volt
Kc का परिकलन
1.1 volt = 0.0591 / 2 log Kc
log Kc = 1.1 × 2 / 0.0591 = 37.288
पूर्णतः लघु (Antilog) लेने पर :
Kc = 2 × 1037 (298 K पर)
सेल विभव, गिब्स ऊर्जा तथा साम्य स्थिरांक में सम्बन्ध
गिब्स ऊर्जा : ΔG = −nFEcell
हम जानते हैं कि Ecell = E0cell − 2.303RT / nF log Kc
जहाँ Kc = साम्य स्थिरांक = [उत्पाद के सान्द्रता](मोलिक संख्या) / [अभिकारकों के सान्द्रता](मोलिक संख्या)
यदि सभी अभिकारकों को सामान्य इकाई में लें, तब Ecell = E0cell
मानक परिस्थितियों में सम्बन्ध
मानक परिस्थितियों में, गिब्स मुक्त ऊर्जा ΔG0 = −nFE0cell
∵ E0cell = 2.303RT / nF log Kc
ΔG0 = −nF × 2.303RT / nF log Kc
ΔG0 = −2.303RT log Kc अथवा ΔG0 = −RT lnKc
महत्वपूर्ण नोट
इस ज्ञात सूत्र से, ΔG = −nFEcell
| अभिक्रिया की प्रकृति | ΔG | Ecell | सेल |
|---|---|---|---|
| स्वतः | −ve | +ve | सेल कार्य करता है। (विद्युत रासायनिक सेल) |
| साम्यावस्था | 0 | 0 | सेल कार्य नहीं करता है। (मृत सेल) |
| अस्वतः | +ve | −ve | (विद्युत अपघटनी सेल) |
वैद्युतअपघटनी विलयनों का चालकत्व
विद्युत अपघट्य विलयन में जब इलेक्ट्रोडों पर विभव लगाया जाता है, तो विद्युत अपघट्य के आयन इलेक्ट्रोडों की ओर गति करने लगते हैं और विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
किसी विलयन में विद्युत धारा प्रवाह की क्षमता उस विलयन में उपस्थित आयनों की संख्या तथा उनके आवेश पर निर्भर करती है।
ये दोनों ही प्रति इकाई आयतन के कारण विद्युत धारा को प्रवाहित कराते हैं। इसे वैद्युतचालकता या आयनिक चालकत्व कहते हैं।
चालकत्व (G)
चालकत्व, G = 1 / R
यदि R ∝ l / a जहाँ l = चालक की लम्बाई तथा a = अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल।
∴ R = ρ . l / a
or, 1 / ρ = 1 / R × l / a
ρ = प्रतिरोधकता (विशिष्ट प्रतिरोध)
प्रतिरोधकता और चालकता
अतः भौतिक रूप से किसी पदार्थ की प्रतिरोधकता उसका वह प्रतिरोध है, जब यह एक मीटर लंबा हो एवं इसका अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल 1 m2 हो।
प्रतिरोधकता (ρ) का व्युत्क्रम, चालकता (विशिष्ट चालकता) (κ) तथा प्रतिरोध R का व्युत्क्रम, चालकत्व (G) कहलाता है।
अतः κ = G × l
सेल नियतांक और चालकता
चालकता (κ) = चालकत्व (G) × सेल नियतांक (G*)
κ = चालकत्व × सेल नियतांक (G* = l / a)
κ = चालकत्व × सेल नियतांक (G* = 1 / a)
चालकता (κ) की इकाई : Ωhm−1 cm−1 अथवा SI unit = S m−1
परिभाषा
किसी पदार्थ की चालकता (κ) इसका वह चालकत्व (G) है, जब दो इलेक्ट्रोडों के बीच दूरी 1 m हो एवं इसका अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल 1 m2 हो।
अर्थात् κ = G
चालकता (κ) के मान पदार्थ की प्रकृति, ताप व दाब पर निर्भर करते हैं। चालकता के आधार पर पदार्थों को चालकों, विद्युतरोधियों एवं अर्द्धचालकों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
| चालक | पदार्थ | ||
|---|---|---|---|
| पदार्थ | चालकता S m−1 |
पदार्थ | चालकता S m−1 |
| सोडियम | 2.1 × 107 | जलीय विलयन | |
| कॉपर (ताँबा) | 5.9 × 107 | शुद्ध जल | 3.5 × 10−5 |
| सिल्वर (चाँदी) | 6.2 × 107 | 0.1 M HCl | 3.91 |
| गोल्ड (सोना) | 4.5 × 107 | 0.01 M KCl | 0.14 |
| आयरन (लोहा) | 1.0 × 107 | 0.01 M NaCl | 0.12 |
| ग्रेफाइट | 1.2 × 105 | 0.1 M HAc | 0.047 |
| विद्युतरोधी | 0.01 M HAc | 0.016 | |
| काँच (साधारण) | 1.0 × 10−16 | अर्द्धचालक | |
| पॉलिथीन | 1.0 × 10−18 | CuO | 1 × 10−7 |
| Si | 1.5 × 10−2 | ||
| Ge | 2.0 | ||
धातुओं में विद्युत चालकत्व
धातुओं में विद्युतीय चालकत्व इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण होता है, जिसे धात्विक या इलेक्ट्रॉनिक चालकत्व कहते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक चालकत्व निम्न पर निर्भर करता है :
(i) धातु की प्रकृति एवं संरचना
(ii) प्रति परमाणु संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या
(iii) ताप (ताप बढ़ने पर कम होता है)
धातुओं में इलेक्ट्रॉन एक सिरे से प्रवेश करते हैं एवं दूसरे सिरे से निकल जाते हैं, इसलिए धात्विक चालक का संघटन अपरिवर्तित रहता है।
शुद्ध जल तथा विलयन की चालकता
अत्यधिक शुद्ध जल में भी थोड़ी मात्रा में हाइड्रोजन एवं हाइड्रॉक्सिल आयन (10−7 M) के कारण शुद्ध जल की चालकता (3.5 × 10−5 S m−1) बहुत ही कम होती है।
लेकिन जब जल में वैद्युतअपघट्य घोला जाता है, तो वैद्युतअपघट्य के वियोजन से जल में आयन बनते हैं, जिससे विलयन की चालकता बढ़ जाती है।
अतः विलयन में उपस्थित आयनों के कारण विद्युत के चालकत्व को वैद्युतअपघटनी या आयनिक चालकत्व कहते हैं।
वैद्युतअपघटनी (आयनिक) विलयनों की चालकता
वैद्युतअपघटनी (आयनिक) विलयनों की चालकता निम्न पर निर्भर करती है :
(i) मिलाए गए वैद्युतअपघट्य की प्रकृति : प्रबल वैद्युतअपघट्य वाले विलयनों की चालकता अधिक होती है, जबकि दुर्बल वैद्युतअपघट्य वाले विलयनों की चालकता कम होगी।
(ii) उत्पन्न आयनों का आकार एवं उनका विलायक योजन
छोटे आयनों की चालकता अधिक तथा बड़े आयनों की चालकता कम होती है।
Li+ > Na+ > K+ > Rb+
यदि आयन का विलायन अधिक होता है, तो उसकी गति धीमी होती है।
जलयोजित आयनों की चालकता का क्रम : Li+ < Na+ < K+ < Rb+
(iii) विलायक की प्रकृति एवं इसकी श्यानता
ध्रुवीय विलायकों में वैद्युतअपघट्य का आयनन अधिक होगा, अतः विद्युत वैद्युतअपघट्य की चालकता अधिक होगी।
विलायक की श्यानता अधिक होने पर आयनों की गति धीमी हो जाने से चालकता कम हो जाती है।
(iv) वैद्युतअपघट्य की सान्द्रता
दुर्बल एवं प्रबल दोनों प्रकार के वैद्युतअपघट्यों की सान्द्रता कम (विलयन को तनु करने पर) करने पर प्रति इकाई आयतन आयनों की संख्या घटती है, जिससे चालकता का मान घटता है।
(v) ताप (ताप बढ़ाने पर यह बढ़ती है)
आयनिक विलयनों की चालकता का मापन
जिस सेल में विलयन भरकर प्रतिरोध मापा जाता है, उसे चालकता सेल कहते हैं। इसमें प्लैटिनम के दो इलेक्ट्रोड होते हैं।
इसमें इलेक्ट्रोडों की बीच की दूरी (l) व अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (A), दोनों नियत होते हैं।
वे अनुपात को सेल नियतांक G* कहते हैं। विलयन का प्रतिरोध निम्न समीकरण द्वारा दिया जाता है :
R = ρ l / a = 1 / κ × l / a
अथवा
R = 1 / κ × G* ⟶ κ = G* / R
व्हीटस्टोन ब्रिज के द्वारा किसी अज्ञात प्रतिरोध R का मापन किया जाता है।
मोलर चालकता (λm)
विलयन में 1 मोल विद्युत अपघट्य के घोलने पर उत्पन्न समस्त आयनों द्वारा उत्पन्न चालकता को मोलर चालकता कहते हैं।
इसे λ (लैम्ब्डा) से व्यक्त करते हैं।
मोलर चालकता एवं विशिष्ट चालकता में सम्बन्ध — मोलर चालकता λm = चालकता × V(ml)
λm = K × V(ml)
λm = K × 1000 / M या
λm = K (ohm−1 cm−1) × 1000 (cm3/L) / M (mol/L) (∵ 1L = 1000 ml = 1000 cm3)
मोलर चालकता का मात्रक — ohm−1 cm2 mol−1
मोलर चालकता को प्रभावित करने वाले कारक
वैद्युतअपघट्य की प्रकृति विद्युत अपघट्य की चालकता विलयन में उपस्थित आयनों की संख्या पर निर्भर करती है। इसलिए विलयन में अधिक आयन होने पर चालकता भी अधिक होती है।
| प्रबल विद्युत अपघट्य विलयन की चालकता | दुर्बल विद्युत अपघट्य विलयन की चालकता |
|---|---|
|
प्रबल विद्युत अपघट्य विलयन में
पूर्णतः आयनीत हो जाते हैं,
अतः इनके विलयन की चालकता अधिक होती है।
(HCl, KCl, KNO3) |
दुर्बल विद्युत अपघट्य
अल्प आयनीत होते हैं
और कम संख्या में आयन देते हैं, इसलिए इन विलयनों की
चालकता कम होती है।
(CH3COOH, NH4OH) |
सान्द्रता के साथ चालकता एवं मोलर चालकता में परिवर्तन
दुर्बल एवं प्रबल दोनों प्रकार के वैद्युतअपघट्यों की सान्द्रता कम (विलयन की तनुता बढ़ाने पर) करने पर चालकता का मान घटता है, क्योंकि प्रति इकाई आयतन आयनों की संख्या घटती है।
प्रश्न 23: जलीय विलयन में विद्युत अपघट्य की चालकता, जल मिलाने से किस प्रकार परिवर्तित होती है?
उत्तर: जल मिलाने पर सामान्यतः विशिष्ट चालकता / चालकता (κ) का मान घटता है।
जबकि मोलर चालकता (λm) का मान प्रबल एवं दुर्बल विद्युत अपघट्यों के लिए अलग-अलग प्रकार से बदलता है।
प्रबल एवं दुर्बल विद्युत अपघट्यों की मोलर चालकता
प्रबल विद्युत अपघट्यों की मोलर चालकता तनुता बढ़ाने पर थोड़ी-सी बढ़ती है।
दुर्बल विद्युत अपघट्यों की मोलर चालकता तनुता बढ़ाने पर अत्यधिक बढ़ती है।
प्रबल विद्युत अपघट्यों के लिए तनुता में वृद्धि से आयनों की संख्या में वृद्धि नहीं होती, क्योंकि प्रबल विद्युत अपघट्य पहले से ही पूर्ण आयनित रहते हैं। किन्तु इनके आयनों के मध्य अन्तर-आयनिक आकर्षण होता है, जिसके कारण आयनों की इलेक्ट्रोड की ओर गमन क्षमता कम होती है।
तनुता बढ़ाने पर आयन एक-दूसरे से दूर जाने लगते हैं और उनके मध्य अन्तर-आयनिक बल कम होने लगता है। परिणामस्वरूप तनुता बढ़ाने से मोलर चालकता में थोड़ी वृद्धि होती है।
दुर्बल विद्युत अपघट्य में तनुता बढ़ाने पर वियोजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे आयनों की संख्या बढ़ती है। इसलिए मोलर चालकता का मान बहुत अधिक बढ़ जाता है।
कोलरॉश का नियम
अनन्त तनुता पर किसी विद्युत अपघट्य की मोलर चालकता प्रत्येक आयन की चालकता का योग होती है। अर्थात्,
λm∞ = v+ λ+∞ + v− λ−∞
जहाँ,
✎ v+ = धनायनों की संख्या तथा λ+∞ = अनन्त तनुता पर धनायन की मोलर चालकता
✎ v− = ऋणायनों की संख्या तथा λ−∞ = अनन्त तनुता पर ऋणायन की मोलर चालकता
उदाहरण
NaCl तथा AlCl3 की सीमान्त मोलर चालकता :
NaCl ⟶ Na+ + Cl− λm∞(NaCl) = λNa+∞ + λCl−∞
AlCl3 ⟶ Al3+ + 3Cl− λm∞(AlCl3) = λAl3+∞ + 3 λCl−∞
कोलरॉश नियम के अनुप्रयोग
(i) दुर्बल विद्युत अपघट्यों के λm∞ के निर्धारण में : दुर्बल विद्युत अपघट्यों की अनन्त तनुता पर मोलर चालकता का निर्धारण किया जाता है।
जैसे ऐसिटिक अम्ल (CH3COOH) जैसे दुर्बल विद्युतअपघट्य के लिए λm∞ का मान :
λm∞(CH3COOH) = λm∞(HCl) + λm∞(CH3COONa) − λm∞(NaCl)
Note: जिस दुर्बल विद्युत अपघट्य की मोलर चालकता ज्ञात करनी होती है, इसके लिए उसे तीन प्रबल विद्युत अपघट्य पदार्थों जैसे लेने होते हैं।
CH3COOH ⇌ CH3COO− + H+
जिनमें से प्रबल विद्युत अपघट्य पदार्थ, दुर्बल विद्युत अपघट्य पदार्थ से प्राप्त आयनों (CH3COO−, H+) के आधार पर लेते हैं। जो CH3COONa तथा HCl हैं और तीसरा प्रबल विद्युत अपघट्य पदार्थ NaCl होगा।
λm∞(HCl) = λH+∞ + λCl−∞ → (i)
λm∞(CH3COONa) = λCH3COO−∞ + λNa+∞ → (ii)
λm∞(NaCl) = λNa+∞ + λCl−∞ → (iii)
(i) + (ii) − (iii)
λm∞(HCl) + λm∞(CH3COONa) − λm∞(NaCl) = λH+∞ + λCl−∞ + λCH3COO−∞ + λNa+∞ − ( λNa+∞ + λCl−∞ )
λm∞(HCl) + λm∞(CH3COONa) − λm∞(NaCl) = λH+∞ + λCH3COO−∞
λm∞(HCl) + λm∞(CH3COONa) − λm∞(NaCl) = λm∞(CH3COOH)
(ii) दुर्बल विद्युत अपघट्यों के आयनन की मात्रा (α) का निर्धारण
अनन्त तनुता पर दुर्बल विद्युत अपघट्य पूर्ण रूप से आयनित हो जाते हैं।
α = λmc / λm∞ या α = λmc / (v+ λ+∞ + v− λ−∞)
जहाँ
✎ λmc = किसी भी सान्द्रता पर दुर्बल विद्युत अपघट्य की मोलर चालकता
✎ λm∞ = दुर्बल विद्युत अपघट्य की अनन्त तनुता पर मोलर चालकता
इस तरह λmc तथा λm∞ ज्ञात होने पर α का मान ज्ञात कर सकते हैं।
(iii) दुर्बल विद्युत अपघट्य के आयनन स्थिरांक की गणना
AB ⇌ A+ + B−
| अवस्था | AB | A+ | B− |
|---|---|---|---|
| प्रारम्भ में मोल | 1 | 0 | 0 |
| यदि आयनन की मात्रा (α) हो तो | (1 − α) | α | α |
| सान्द्रता C पर | C(1 − α) | Cα | Cα |
आयनन स्थिरांक, K = [उत्पाद]mol / [क्रियाकारक]mol
K = Cα × Cα / C(1 − α) = C2 α2 / C(1 − α) = Cα2 / (1 − α)
K = C( λmc / λm∞ )2 / ( 1 − λmc / λm∞ )
K = C (λmc)2 / λm∞ ( λm∞ − λmc )
इस प्रकार λm∞ तथा λmc ज्ञात होने पर K का मान ज्ञात कर सकते हैं।
वैद्युत अपघटनी सेल एवं वैद्युतअपघटन
“ऐसे पदार्थ जिनके जलीय विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर इनका आयनों में विघटन हो जाता है, विद्युत अपघट्य कहलाते हैं तथा यह विघटन प्रक्रम विद्युत अपघटन कहलाता है।”
उदाहरण —
विद्युत अपघट्य — अम्लों, क्षारों, लवणों आदि के जलीय विलयन या गलित लवण आदि।
विद्युत अनअपघट्य — गन्ने की शक्कर, ग्लिसरीन, एल्कोहल आदि।
विद्युत अपघटनी सेल या वोल्टामीटर : ऐसी युक्ति (device) जिसमें विद्युत अपघटन प्रक्रिया होती है, विद्युत अपघटनी सेल या वोल्टामीटर कहलाते हैं।
वोल्टामीटर के विशिष्ट लक्षण
(i) वोल्टामीटर विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलता है।
(ii) जिस इलेक्ट्रोड पर ऑक्सीकरण होता है उसे ऐनोड (या + वे) तथा जिस पर अपचयन होता है, उसे कैथोड (या − वे) कहते हैं। ऐनोड को धनावेशित जबकि कैथोड को ऋणावेशित रखा जाता है।
(iii) विद्युत अपघटन के समय वोल्टामीटर में धनायन कैथोड पर तथा ऋणायन ऐनोड पर विद्युत विसर्जित होते हैं।
(iv) वोल्टामीटर में, विद्युत अपघट्य के बाहर इलेक्ट्रॉन ऐनोड से कैथोड की ओर तथा धारा प्रवाह कैथोड से ऐनोड की ओर होता है।
वोल्टामीटर के लिए, Ecell = −ve तथा ΔG = +ve
ऐनोड पर अभिक्रिया
(v) ऋणायन ऐनोड पर अपने इलेक्ट्रॉनों को त्यागकर उदासीन परमाणु में बदल जाते हैं।
ऐनोड पर : A−(aq) ⟶ A + e− (ऑक्सीकरण)
कैथोड पर अभिक्रिया
(vi) दूसरी तरफ धनायन कैथोड पर पहुँच कर इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण करके उदासीन परमाणु बनाते हैं।
कैथोड पर : B+(aq) + e− ⟶ B (अपचयन)
वैद्युतअपघटन के उत्पाद
कैथोड पर जिस अभिक्रिया के लिए E0cell का मान अधिक होता है, उस अभिक्रिया को प्राथमिकता देते हैं।
ऐनोड पर जिस अभिक्रिया का E0cell का मान कम होता है, उस अभिक्रिया को प्राथमिकता देते हैं।
Case – 1 : पिघले हुए NaCl का वैद्युतअपघटन
पिघले हुए गलित NaCl का प्रयोग करने पर वैद्युतअपघटन के उत्पाद Na(s) तथा Cl2(g) होंगे।
ऐनोड पर — Cl− ⟶ 1/2 Cl2 + e− (ऑक्सीकरण)
कैथोड पर — Na+(aq) + e− ⟶ Na(s) (अपचयन)
Case – 2 : NaCl के जलीय विलयन का वैद्युतअपघटन
NaCl के जलीय विलयन के वैद्युतअपघटन में NaOH, Cl2 तथा H2 उत्पाद बनते हैं।
कैथोड पर — Na+(aq) + e− ⟶ Na(s) (E0cell = −2.71 volt)
या H+ + e− ⟶ 1/2 H2 (E0cell = 0.0 volt)
कैथोड पर अधिक E0 मान वाली अभिक्रिया होगी। अतः H+ + e− ⟶ 1/2 H2(g) को प्राथमिकता मिलेगी।
जहाँ H+ आयन H2O के वियोजन से प्राप्त होते हैं। अर्थात् H2O(l) ⟶ H+(aq) + OH−(aq)
कुल अभिक्रिया —
H+(aq) + e− ⟶ 1/2 H2(g)
H2O(l) ⟶ H+(aq) + OH−(aq)
H2O(l) + e− ⟶ 1/2 H2(g) + OH−(aq) → (i)
ऐनोड पर अभिक्रिया
Cl−(aq) ⟶ 1/2 Cl2(g) + e− (E0cell = 1.36 volt)
या H2O(l) ⟶ O2 + 4H+ + 4e− (E0cell = 1.23 volt)
ऐनोड पर जल के E0cell का मान कम होने के कारण यह अभिक्रिया होनी चाहिए, लेकिन शुद्ध ऑक्सीजन को बनाने के अधिविभव के कारण Cl− आयन के ऑक्सीकरण की अभिक्रिया को प्राथमिकता देते हैं। अतः
Cl−(aq) ⟶ 1/2 Cl2(g) + e− → (ii)
अन्तः ऐनोड तथा कैथोड पर होने वाली अभिक्रियाएँ
NaCl(aq) ⟶ Na+(aq) + Cl−(aq)
ऐनोड पर — Cl−(aq) ⟶ 1/2 Cl2(g) + e−
कैथोड पर — H2O(l) + e− ⟶ 1/2 H2(g) + OH−(aq)
NaCl(aq) + H2O(l) ⟶ Na+(aq) + OH−(aq) + 1/2 H2(g) + 1/2 Cl2(g)
क्षारीय प्रकृति
विद्युत अपघटन के फैराडे नियम
फैराडे का प्रथम नियम :
“किसी भी इलेक्ट्रोड पर एकत्रित या निक्षेपित होने वाली पदार्थ की मात्रा प्रवाहित विद्युतधारा की मात्रा के समानुपाती होती है।”
अर्थात् W ∝ Q
जहाँ,
✎ W = निक्षेपित आयन का ग्राम में द्रव्यमान
✎ Q = प्रवाहित विद्युत धारा की कूलॉम में मात्रा (Q = I × t)
W = Z × I × t
जहाँ, Z = स्थिरांक है, जिसे विद्युत रासायनिक तुल्यांक कहते हैं।
जब धारा की 1 ऐम्पियर मात्रा को 1 सेकण्ड तक प्रवाहित किया जाये, तो W = Z
अतः “जब विलयन में एक ऐम्पियर की धारा एक सेकण्ड तक प्रवाहित करते हैं, तो इलेक्ट्रोड पर अवक्षेपित मात्रा विद्युत रासायनिक तुल्यांक के बराबर होती है।”
इसकी इकाई ग्राम प्रति कूलॉम है।
फैराडे का द्वितीय नियम
“जब विद्युत धारा को समान मात्रा में विभिन्न विद्युत अपघट्यों से प्रवाहित किया जाता है, तो इलेक्ट्रोडों पर निक्षेपित पदार्थों के द्रव्यमान उनके विद्युत रासायनिक तुल्यांकों के समानुपाती होते हैं।”
फैराडे के द्वितीय नियम के अनुसार W = ZQ
समान आवेश प्रवाहित होने पर QA = QB = Q
जब Q = 96500 C तब W का मान तुल्यांक भार (E) के बराबर होता है।
अतः E = Z × 96500 C or Z = E / 96500
विभिन्न पदार्थ (A) के लिए WA = ZAQ → (i)
विभिन्न पदार्थ (B) के लिए WB = ZBQ → (ii)
अतः WA / WB = ZA / ZB या WA / WB = (EA / 96500) / (EB / 96500) = EA / EB
बैटरियां
| प्राथमिक बैटरियां | द्वितीयक बैटरियां |
|---|---|
| रासायनिक ऊर्जा ⟶ विद्युत ऊर्जा | रासायनिक ऊर्जा ⟷ विद्युत ऊर्जा |
| पुनः प्रयोग में नहीं लाया जा सकता। | पुनः आवेशित कर फिर से प्रयोग में लाया जा सकता है। |
| उदाहरण — शुष्क सेल या लेकलांशे सेल | उदाहरण — सीसा संचायक बैटरी |
| उपयोग — ट्रांजिस्टर एवं घड़ियों में | उपयोग — वाहनों एवं इन्वर्टरों में |
| मर्करी सेल | |
| उपयोग — श्रवण यंत्र, घड़ियों आदि में |
शुष्क सेल (लेकलांशे सेल)
इस सेल में जिंक का एक पात्र होता है, जो ऐनोड का कार्य करता है तथा कार्बन (ग्रेफाइट) की छड़, जो चारों ओर से चूर्णित मैंगनीज डाइऑक्साइड तथा कार्बन से घिरी रहती है, कैथोड का कार्य करती है।
इलेक्ट्रोडों के बीच का स्थान अमोनियम क्लोराइड (NH4Cl) एवं ZnCl2 के नम पेस्ट से भरा रहता है।
सेल अभिक्रियाएँ
ऐनोड पर : Zn(s) ⟶ Zn2+(aq) + 2e−
कैथोड पर : 2NH4(aq)+ + 2MnO2(s) + 2e− ⟶ Mn2O3(s) + 2NH3(g) + H2O(l)
Net-cell reaction : Zn(s) + 2NH4(aq)+ + 2MnO2(s) ⟶ Mn2O3(s) + [Zn(NH3)2]2+ + H2O(l)
सेल विभव : 1.5 volt
मर्करी सेल
इसमें जिंक-अमलगम ऐनोड का तथा HgO एवं कार्बन का पेस्ट कैथोड का कार्य करता है।
KOH एवं ZnO का पेस्ट वैद्युतअपघट्य होता है।
सेल अभिक्रियाएँ
ऐनोड पर : Zn(s) + 2OH−(aq) ⟶ ZnO(s) + H2O(l) + 2e− (ऑक्सीकरण)
कैथोड पर : HgO(s) + H2O + 2e− ⟶ Hg(l) + 2OH−(aq) (अपचयन)
कुल अभिक्रिया : Zn(s) + HgO(s) ⟶ ZnO(s) + Hg(l)
सेल विभव : 1.35 V
सीसा संचायक बैटरी
इसमें ऐनोड सीसे (Pb) का बना होता है तथा कैथोड लेड ऑक्साइड (PbO2) से भरे हुए लेड का ग्रिड होता है।
सल्फ्यूरिक अम्ल का विलयन वैद्युतअपघट्य का कार्य करता है।
सेल अभिक्रियाएँ
जब बैटरी उपयोग में होती है, इसे discharge कहते हैं।
ऐनोड पर : Pb(s) + SO42−(aq) ⟶ PbSO4(s) + 2e−
कैथोड पर : PbO2(s) + 4H+ + SO42−(aq) + 2e− ⟶ PbSO4(s) + 2H2O
Net reaction: Pb(s) + PbO2(s) + 2H2SO4(aq) ⟶ 2PbSO4(s) + 2H2O
जब सेल कार्य करता है, इसके इलेक्ट्रोड पर PbSO4 जमता है तथा H2SO4 नष्ट होती है, जिससे अम्लता का मान घटता है और स्पेसिफिक ग्रेविटी कम हो जाती है।
जब इस बैटरी को पुनः आवेशित किया जाता है, तब यह सेल अब विद्युत अपघटनी सेल की तरह कार्य करती है।
आवेशन (Charging) के समय अभिक्रियाएँ
जब बैटरी को आवेशित (charging) किया जाता है
ऐनोड पर : PbSO4(s) + 2e− ⟶ Pb(s) + SO42−(aq)
कैथोड पर : PbSO4(s) + 2H2O ⟶ PbO2(s) + 4H+ + SO42−(aq) + 2e−
Net reaction: 2PbSO4(s) + 2H2O ⟶ Pb(s) + PbO2(s) + 2H2SO4(aq)
ईंधन सेल
ऐसे गैल्वैनिक सेल जिनमें हाइड्रोजन, मीथेन एवं मीथेनॉल आदि जैसे ईंधनों के दहन से प्राप्त ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं, ईंधन सेल कहलाते हैं।
इन वोल्टीय सेल में क्रियाकारक को इलेक्ट्रोड पर लगातार पहुँचाया जाता है तथा उत्पादों को वैद्युतअपघट्य कक्ष से लगातार हटाया जाता है।
उदाहरण — हाइड्रोजन-ऑक्सीजन ईंधन सेल (H2–O2 सेल)
हाइड्रोजन-ऑक्सीजन (H2–O2) ईंधन सेल
इस सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को छिद्रमय कार्बन इलेक्ट्रोड के द्वारा सान्द्र जलीय NaOH या KOH विलयन में प्रवाहित किया जाता है।
हाइड्रोजन को ऐनोड कक्ष में भेजा जाता है, जहाँ यह ऑक्सीकरण होता है।
ऑक्सीजन को कैथोड कक्ष में भेजा जाता है, जहाँ इसका अपचयन होता है।
सेल अभिक्रियाएँ
ऐनोड पर : H2 + 2OH−(aq) ⟶ 2H2O + 2e− × 2
कैथोड पर : O2 + 2H2O + 4e− ⟶ 4OH−(aq) × 1
2H2 + 4OH−(aq) ⟶ 4H2O + 4e−
O2 + 2H2O + 4e− ⟶ 4OH−(aq)
Net reaction: 2H2(g) + O2(g) ⟶ 2H2O
महत्वपूर्ण बिंदु
सम्पूर्ण अभिक्रिया में H2 तथा O2 के दहन से H2O बनता है।
प्रत्येक इलेक्ट्रोड छिद्रमय कार्बन से बना होता है, जिसमें अल्प मात्रा में उत्प्रेरक (Pt, Ag) होते हैं।
ये सेल लगातार तब तक कार्य करते हैं, जब तक इनमें क्रियाकारक भेजा जाता है।
ये सेल ईंधन की ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदल देते हैं। इन सेल्स का उपयोग Apollo space programme में किया जा चुका है।
ईंधन सेल के लाभ
ईंधन सेल की दक्षता ≈ 70% होती है।
प्रदूषण की समस्या उत्पन्न नहीं होती है, इसलिए ये अधिक दक्ष एवं प्रदूषण रहित होते हैं।
संक्षारण
जब धातु को वायुमण्डलीय वातावरण में खुला रखते हैं, तो ये वायु या जल से क्रिया करके ऑक्सीभूत पदार्थों में बदल जाती है। इस प्रक्रम को संक्षारण कहा जाता है।
इसे सामान्यतः उत्तम धातुएँ (Au, Pt, Pd) के अतिरिक्त अन्य धातुओं के साथ देखा जाता है।
उदाहरण — लोहे में जब लालिमा लिये हुए कत्थई रंग का पदार्थ जमने लगे, तब इसे जंग लगना कहते हैं।
लोहे का संक्षारण — जब लोहे में जंग का संक्षारण होता है, तब यह जल एवं वायु की उपस्थिति में होता है। यह रासायनिक रूप से जलयोजित फेरिक ऑक्साइड (Fe2O3.xH2O) होता है।
जंग लगने की क्रियाविधि
(संक्षारण का विद्युत रासायनिक सिद्धांत)
लोहे से बनी किसी वस्तु के विशेष स्थान पर जब ऑक्सीकरण होता है, तो वे ऐनोड का कार्य करते हैं।
ऐनोड पर : Fe(s) ⟶ Fe2+(aq) + 2e−
धातु आयन ऑक्सीकरण होकर विलयन में जाने लगते हैं तथा लोहे प्रभेद छिद्रयुक्त एवं भंगुर होने लगते हैं।
कैथोड पर : लोहे द्वारा उत्पन्न H+ आयन द्वारा अपचय किये जाते हैं। ये H+ आयन वायु द्वारा प्राप्त होने वाले ऑक्सीजन के साथ जल में घुल कर ऑक्सीकरण माध्यम पर उपस्थित ऑक्सीजन को अपचयित करके H2O बनाते हैं।
कैथोड पर : O2(g) + 4H+(aq) + 4e− ⟶ 2H2O(l)
समग्र अभिक्रिया
ऐनोड पर — Fe(s) ⟶ Fe2+(aq) + 2e− × 2
कैथोड पर — O2(g) + 4H+(aq) + 4e− ⟶ 2H2O(l) × 1
कुल अभिक्रिया — 2Fe(s) + O2(g) + 4H+(aq) ⟶ 2Fe2+(aq) + 2H2O(l)
फेरस आयन (Fe2+) ऑक्सीभूत होकर फेरिक आयन (Fe3+) में बदल जाते हैं, जो जलयोजित फेरिक ऑक्साइड (Fe2O3.xH2O) होकर जंग बनाते हैं। तथा हाइड्रोजन आयन पुनः उत्पन्न हो जाते हैं।
2Fe2+(aq) + 2H2O(l) + 1/2 O2 ⟶ Fe2O3.xH2O + 4H+(aq)
संक्षारण से बचाव
• धातु लेपन द्वारा : सतह पर तेल, ग्रीस, पेंट, वार्निश आदि का उपयोग करके।
• सतह पर किसी ऐसी धातु की परत चढ़ाकर जो संक्षारित नहीं होती है, जैसे लोहे की सतह पर जिंक, निकिल, क्रोमियम आदि की परत चढ़ाना। इस धातु की सतह पर संक्षारण रोका जा सकता है।
• बलिदानी सुरक्षा : लौह पर Zn की परत चढ़ाने पर जिंक स्वयं संक्षारित होता है।
